UGC नियमों से समस्याएँ:
१. कैम्पस में पुलिस का इन्वॉल्वमेंट पूरे कॉलेज परिसर को एक एक्टिव क्राइम सीन बना देता है। बच्चे हँसी-मजाक तक करने से कतराएँगे। जहाँ कॉलेज प्रशासन का मुख्य ध्येय, किसी कथित अपराध पर (जो जघन्य/हिंसक न हो), बच्चों को पंद्रह दिन का निलंबन जैसा होता है, वहाँ अब पुलिस को घुसेड़ा जा रहा है। इंटेंट में ही दोष है कि कोई भेदभावपूर्ण टिप्पणी एक गंभीर अपराध माना जा रहा है। हालाँकि ब्राह्मणों की कब्र खोदने और चार जूते मारना आज तक अपराध नहीं बना और कॉलेज में जाति पूछने वाले स्वघोषित प्रोफेसर सरकार के सलाहकार हैं।
२. कॉलेज में बच्चे स्कूल के यूनिफ़ॉर्म युग से बाहर आ कर, स्वच्छंदता का अनुभव करते हैं। यह उनके लिए स्वयं को अभिव्यक्त करने का पहला मुक्त अवसर होता है। इन नियमों ने बच्चों के बोलने, उपहास, व्यंग्य आदि को प्रभावी रूप से सीमित कर दिया है।
३. यह जातिवादी छात्र संगठनों के लिए द्वेष आधारित निशानदेही और केस करने का एक मार्ग बन जाएगा। जो अभी ‘जूते चार’ की डफली पीट रहे हैं, वो ऐसी जातियों के बच्चों को सीधे जेल में भेजने के लिए हर झूठ का प्रयोग करेंगे।
४. सरकार के सामाजिक न्याय मंत्रालय का अपना सर्वेक्षण बताता है कि SC/ST Act में औसत कनविक्शन की दर केवल 8% है। OBC सर्वाधिक आरोपित वर्ग है जो जातिगत अपराधों में 81% भागीदारी करता है। 2200 से अधिक कालेज कैम्पसों में पूरे वर्ष में केवल 378 जातिवादी भेदभाव के केस आए। फिर लॉजिक क्या है कि इस नियम को लाया जाए? एक झूठ फैलाया गया कि दलितों के साथ अत्याचार हो रहा है, आँकड़े सपोर्ट नहीं कर रहे, और आप नियम पर नियम बनाए जा रहे हैं?
५. पिछले 15 वर्षों में सोशल मीडिया से ले कर कॉलेज राजनीति में सर्वाधिक विषैली जातिगत टिप्पणी का केन्द्र ब्राह्मण/सवर्ण रहे हैं। चाहे कॉलेज की दीवारें हो या छात्र संगठनों के नारे, सवर्णों के देवता, जातियाँ, प्रतीक और ग्रंथों के नाम पर भयावह टिप्पणियों को हम हर दिन देखते हैं। फिर ‘विशेषकर’ शब्द को नियमों में जोड़ते समय इस बात का ध्यान क्यों नहीं रखा गया?
६. झूठे केस में फँसने पर, पुलिस तक बात जाने पर, अकादमिक समय के नष्ट होने पर, उचित जुर्माने का प्रावधान क्यों नहीं है? यदि कोई बच्चा झूठे आरोप के कारण आत्महत्या कर ले तो कौन उत्तरदायी होगा? कैम्पस में आत्महत्याओं की संख्या जातिवादी टिप्पणियों के केस से अधिक है। आजकल के बच्चे भविष्य की चिंता, माता-पिता से भय आदि के कारण ऐसे कदम उठा लेते हैं।
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यह पूरी नियमावली इंटेंट के स्तर पर ही घटिया है। कैम्पस अभिव्यक्ति का अड्डा होना चाहिए, जातिवादी विद्वेष का नहीं। जिस बात के रैम्पेंट होने के कोई प्रमाण नहीं, उससे प्रोटेक्शन को ले कर नियम किस जीव ने बनाए?
कैम्पस मित्रता के अंकुरन के लिए होता है, हेड-हंटिंग के लिए नहीं। यहाँ दीर्घकालिक दोस्ती बनती है, अल्पकालिक राजनीति नहीं।
इसकी समीक्षा हो। उचित प्रावधान रहें। हर जाति को जातिवादियों से सुरक्षा मिले। पुलिस की इन्वॉल्वमेंट केवल गंभीर हिंसा की स्थिति में हो। केस के निराकरण तक आरोपी-आरोपित पर कार्रवाई न हो। फर्जी केस पर, उसी केस के लिए प्रस्तावित दंड का दूना दंड मिले।
@ugc_india@BJP4India@nishikant_dubey@dpradhanbjp@narendramodi@EduMinOfIndia
सूत्रों से पता चला है की BJP और RSS के कुछ वरिष्ट लोगों ने कहा है की यह Youtube और X पर बोलेन वालों की क्या औकात है - यह सड़क पर 4 लोग इक्कठा नहीं कर सकते
इतना अहंकार
@atsshow7@ajeetbharti
जब DM साहब, राष्ट्रपति से 2 करोड़ वाला अवॉर्ड
फर्जी आंकड़ों के आधार पर ले रहे थे तब ध्यान नहीं आया ।
अब दावों की पोल खुली तो शिक्षकों को सस्पेंड कर दिया 🤡 क्योंकि आधिकारी तो राजा होते हैं,उनकी जांच थोड़े होगी।
जिस प्रकार मिलावटी पनीर पकड़े जाने पर पुलिस वालो पे कार्यवाही हो रही है,
वैसे ही
•सड़कों के ख़राब होने पर गाड़ी चालकों पर कार्यवाही होनी चाहिए,
• पेपर लीक होने पे छात्रों को नज़रबंद किया जाना चाहिए,
• मरीज के अस्पताल में लूटे जाने पे तीमारदार का चालान होना चाहिए,
• अवैध खनन होने पे मजदूरों और मशीनों को टाँग देना चाहिए।
• जलभराव होने पे बादलों को क़ैद करना चाहिए,
• नक़ली दवाईयां पकड़ी जाने पर रैपर कंपनी को सीज कर देना चाहिए,
• घोटाले की रकम बरामद होने पे नोट छापने वाली संस्था RBI गवर्नर पर कार्यवाही होनी चाहिए।
So that's how @passportsevamea PSK centers work now. Even after the @MEAIndia circular that citizens can apply at any PSK, Kanpur PSK APO is not accepting the application and is behaving badly with people applying for passports here.
@IndianDiplomacy@CPVIndia@narendramodi@AmitShah Are citizens going to receive this kind of behavior from government officials. Are passport offices are government offices or APO have personal preference on accepting applications.
@passportsevamea में मैनपुरी से अपना पासपोर्ट कानपुर ऑफिस में बनवाने के लिए आया हूं यहां के स्टाफ ने मेरा पासपोर्ट बनाने से यह कह कर मना कर दिया है कि मैनपुरी वालों का बरेली में ऑफिस है। जबकि भारत सरकार के 2018 के आदेशानुसार कोई भी भारतीय किसी भी पासपोर्ट ऑफिस में जा कर अपना पासपोर्ट बनवा सकता है।
वामपंथी यही सब भारत में भी
देखना चाहते हैं।
लेकिन उनको ये याद रखना चाहिए,
उनकी इस प्रकार की हर चाल को।
नाकाम करने के लिए ,
कुर्सी पर उनके आका बैठे हैं।