एक गरीब बूढ़ी दादी अपने पोते के साथ दिए बेच रही थी,
तभी एक सहजादे गाड़ी से आते है और सारे दिए रौद कर भाग जाते है
😭 क्या गरीब लोग इंसान नहीं है ??
क्या देश मे इनकी यही इज्जत है ?
सुरक्षा मे लगा CRPF जवान नेता की रक्षा कर रहा था।
जवान का अपमान कर रहा है मतलब सेना का अपमान कर रहा है, इसकी तो सुरक्षा वापस ही लें लेनी चाहिए।
शर्म आनी चाहिए
जयपुर से बड़ी खबर!
दूदू हाईवे स्थित सोलर प्लांट में लगी भीषण आग
तेज हवाओं के कारण आग तेज़ी से फैल रही है।
हादसे की गंभीरता को देखते हुए मौके पर दमकल की 20 से अधिक गाड़ियां आग बुझाने के प्रयास में जुटी हुई हैं।
#Jaipur@BhajanlalBjp
टिका राम जुली के बोलने पर भड़के डोटासरा
मीडिया के सामने दलित नेता जुली जी का किया अपमान....
जैसे ही कोई दलित नेता का कद बढने लगता है इन जाट नेताओ के पेट
में साँप लोटने लगते है
@GovindDotasra@TikaRamJullyINC@INCRajasthan
क्या यही है कांग्रेस की नजरों में महिलाओं का सम्मान और 'दलित न्याय'?
बैजूपाड़ा की प्रधान सीट एसटी महिला के लिए आरक्षित है, लेकिन कांग्रेस के नेता कह रहे है ओमप्रकाश हुडला जी कि "एंट्री तो बेडरूम तक रहेगी"
डोटासरा जी और राहुल गांधी जी, ज़रा देश को समझाइए कि किसी दलित महिला जनप्रतिनिधि के बेडरूम तक एंट्री की बात करना कांग्रेस की किस 'विचारधारा' और 'मोहब्बत की दुकान' का हिस्सा है?
ऐसी विडियो लगातार आ रही है इसका उद्देश्य दलितों को नीचा दिखाना है
@GovindDotasra@INCRajasthan
विडंबना देखिए….
डोटासरा जी के दाहिने तरफ़ विनोद जाखड बैठे हैं
जिन्हें धरना प्रदर्शन करने पर उठाकर जेल में फेंक दिया गया था…
17 दिन बाद ज़मानत मिली थी…
कांग्रेस से कोई नेता पूछने तक नहीं आया था…
मदद की तो बहुत दूर की बात है…
और दूसरी तरफ़ बैठी रितु बराला…
जिसने एक महिला कांस्टेबल के बाल नोचे कपड़े नोचे महिला
कांस्टेबल ने अपनी आत्मरक्षा में रितु बराला को धक्का दे दिया…
लेकिन राहुल गांधी का ऑर्डर आया है…
इसलिए पूरी राजस्थान कांग्रेस एक FIR करवाने के लिए चार दिन से
एक पैर पर खड़ी हैं…
यह फर्क क्यों है ?
@VinodJakharIN@GovindDotasra
राजस्थान पंचायती राज चुनाव से पहले कांग्रेस पार्टी ने SC समाज की महिला नेत्री अनीता जाटव की बेचीं टिकट
क्या कांग्रेस को दलित समाज से दिक्कत है ?
जब जब कोई नेता या नेत्री अपने दम पर उभरने लगती है तब तब कांग्रेस के बड़े नेतो के पेट में मरोड़े उठने लगते है
गोविन्द सिंह डोटासरा जी नगर निगम चुनाव में भी आपने अपनी जेबे भारी और आम कार्यकर्त्ता का हक़ मारा
और बुरी तरीके से कांग्रेस हारी
क्या पंचायती राज चुनाव में भी अपना खजाना भरने में लगे हो...?
@GovindDotasra@INCRajasthan@TikaRamJullyINC
उत्तर प्रदेश में दलितों पर अत्याचार और जातिगत हिंसा के मामलों पर सरकार की जवाबदेही तय होनी चाहिए
दलितों की जान इतनी सस्ती है क्या ?
भीम आर्मी पीड़ित परिवार के साथ कब खड़ी होगी...?
सोचिए, उन मासूम बच्चियों पर क्या बीत रही होगी, जिनकी आँखों के सामने उनके पिता की हत्या कर दी गई
वे अपने पिता की जान बचाने के लिए हाथ-पैर जोड़ती रहीं
गिड़गिड़ाती रहीं, लेकिन हमलावरों का दिल नहीं पसीजा।
उत्तर प्रदेश के जनपद सीतापुर के कमलापुर थाना क्षेत्र के ग्राम लुधौरा में दलित समाज के मनोज गौतम की सत्ता के सजातीय स्वयंभू ठाकुर दबंगों द्वारा घेरकर पीट-पीटकर हत्या कर दी गयी है
यह मामला जातिगत हिंसा के गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच की मांग करता है।
तत्काल सभी आरोपियों की गिरफ्तारी, SC/ST एक्ट सहत सभी लागू कानूनी प्रावधानों के तहत कठोर कार्रवाई की जाए
पीड़ित परिवार की सुरक्षा और उचित मुआवजा सुनिश्चित करें @myogiadityanath@BhimArmyChief@SitapurPolice@UPPOLICE@dgpup@DMsitapur
जातिगत दीवारों को ढहाए बिना कैसा सशक्त भारत?
भारत का संविधान केवल कानूनों की एक पुस्तक नहीं, बल्कि एक
सामाजिक क्रांति का घोषणापत्र है।
इसके रचयिता डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने जब 'एक व्यक्ति, एक वोट
और एक मूल्य' का विचार देश को दिया, तब उद्देश्य स्पष्ट था—जन्म के
आधार पर तय होने वाली श्रेष्ठता या हीनता के बोध को समाप्त करना।
किंतु आज, आजादी के सात दशकों से अधिक बीत जाने के बाद भी,
एक यक्ष प्रश्न हमारे राष्ट्रीय चिंतन के सामने खड़ा है क्या संवैधानिक
अधिकार सामाजिक व्यवस्था में वास्तविक रूप से उतर पाए हैं?
दृश्य से अदृश्य भेदभाव तक
पुराने समय में सामाजिक भेदभाव प्रत्यक्ष और मुखर था, लेकिन आधुनिक दौर में इसने रूप बदल लिया है।
आज यह संस्थागत ढांचों, कॉर्पोरेट कमरों, उच्च शिक्षा के परिसरों और अनकहे सामाजिक पूर्वाग्रहों में देखा जा सकता है।
जब किसी दलित युवा की योग्यता का मूल्यांकन उसकी प्रतिभा के बजाय उसके उपनाम या पृष्ठभूमि से किया जाता है, तो यह केवल उस व्यक्ति का अपमान नहीं, बल्कि राष्ट्र की उस समग्र क्षमता का नुकसान है जो देश के विकास में काम आ सकती थी।
समानता का पहला आधार
सच्चा सशक्तीकरण कागजी घोषणाओं से नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता से आता है।
आज भी कई ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में दलित बच्चों को बुनियादी संसाधनों, बेहतर मेंटरशिप और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
केवल सरकारी नौकरियों तक दायरा सीमित रखने के बजाय,
स्टार्टअप, उद्योग और कॉर्पोरेट क्षेत्र में दलित युवाओं की भागीदारी
सुनिश्चित करना आवश्यक है।
'आर्थिक लोकतंत्र' के बिना 'सामाजिक लोकतंत्र' अधूरा है।
राजनीतिक या सामाजिक मंचों पर केवल उपस्थिति दर्ज करा देना ही 'प्रतिनिधित्व' नहीं कहलाता।
सांकेतिकता और वास्तविक भागीदारी के बीच का अंतर समझना
होगा। जब तक निर्णय लेने वाली सर्वोच्च समितियों, नीति निर्माण
प्रक्रियाओं और प्रशासनिक ढांचों में दलित समाज के शिक्षित और योग्य
नेतृत्व को स्वतंत्र अधिकार नहीं मिलते, तब तक केवल चेहरे बदलने से
स्थितियां नहीं बदलेंगी।
यह समझना बेहद आवश्यक है कि दलित समाज के अधिकारों की रक्षा
या उनकी प्रगति किसी अन्य वर्ग के विरोध में नहीं है।
एक ऐसा समाज जहां आबादी का एक बड़ा हिस्सा अपनी पूरी क्षमता
का उपयोग न कर पाए, वह कभी वैश्विक महाशक्ति नहीं बन सकता।
जातिगत पूर्वाग्रहों को समाप्त करना केवल दलित समाज की जिम्मेदारी
नहीं, बल्कि यह पूरे भारतीय समाज का नैतिक और नागरिक कर्तव्य है।
समय आ गया है कि हम 'समानता' को एक अमूर्त सिद्धांत मानने के
बजाय इसे अपनी दैनिक जीवनशैली और संस्थागत कार्यप्रणाली का
हिस्सा बनाएं
भेदभाव और जातिगत उत्पीड़न के खिलाफ बने कानूनों का पारदर्शी और त्वरित क्रियान्वयन।
निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों में योग्यता-आधारित निष्पक्ष चयन प्रक्रिया को बढ़ावा देना।
विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और कार्यस्थलों पर संवेदनशीलता कार्यक्रमों को अनिवार्य बनाना।
जुली जी अगर पूरा दलित समाज मिलकर आपको और कांग्रेस पार्टी जीता देती है तो फिर भी क्या OBC एक्ट कांग्रेस लाएगी ?
क्या दलितों के पीठ पर खंजर खोपने के बराबर नहीं है ?
जबाब दो ??
#OBCActRollBack