"This is the beauty of Indian craftsmanship. In many villages, people still build their own boats by hand and rely on them every day—whether it's harvesting water chestnuts or heading out to the rivers to catch fish. It's a simple way of life, built on skill, tradition, and hard work." 🚣🇮🇳✨
Part 2
📍💥कोशिकाओं की पुनरुत्थान प्रक्रिया:
कुण्डलिनी ऊर्जा का प्रवाह शरीर की कोशिकाओं के डीएनए पर भी प्रभाव डालता है। इसे आधुनिक दृष्टिकोण से कोशिकीय पुनरुत्थान या सेलुलर रीजनरेशन कहा जा सकता है। इससे कोशिकाओं का पुनर्निर्माण होता है, और वे अधिक स्वस्थ, संतुलित और ऊर्जावान हो जाती हैं।
प्राचीन योगियों का मानना था कि कुण्डलिनी जागरण के बाद शरीर की कोशिकाओं में जीवन शक्ति का संचार बढ़ जाता है, जिससे शरीर युवा और दीर्घायु बना रहता है।
📍💥कुण्डलिनी जागरण के दौरान कोशिकाओं में होने वाले परिवर्तन
कुण्डलिनी जागरण से शरीर के ऊतकों और कोशिकाओं में कई परिवर्तन होते हैं। इनमें शारीरिक और जैव-रासायनिक (biochemical) स्तर पर भी परिवर्तन शामिल हैं।
🎊कोशिकीय ऊर्जा की वृद्धि:
कुण्डलिनी ऊर्जा जब चक्रों के माध्यम से कोशिकाओं में प्रवेश करती है, तो वह कोशिकाओं में अधिक ऊर्जा पैदा करती है। यह ऊर्जा कोशिकाओं को ऊर्जावान बनाती है, जिससे शरीर में चेतना का स्तर भी बढ़ता है। इस प्रक्रिया में ATP (Adenosine Triphosphate), जो कि कोशिकाओं में ऊर्जा का मुख्य स्रोत है, का उत्पादन भी बढ़ता है।
🎊डीएनए की संरचना में परिवर्तन:
कुण्डलिनी ऊर्जा कोशिकाओं के डीएनए (DNA) पर गहराई से असर डालती है। योग और अध्यात्म के अनुसार, कुण्डलिनी जागरण के दौरान डीएनए की रचना और कार्यप्रणाली में परिवर्तन हो सकता है, जिससे व्यक्ति की चेतना में विस्तार होता है। इसे आध्यात्मिक डीएनए परिवर्तन के रूप में देखा जा सकता है, जिससे व्यक्ति के मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक, और आध्यात्मिक पहलू भी प्रभावित होते हैं।
🎊सेलुलर डिटॉक्सिफिकेशन (शारीरिक शुद्धि):
कुण्डलिनी जागरण के दौरान शरीर की कोशिकाओं में शुद्धि की प्रक्रिया होती है। यह ऊर्जा शरीर में जमे हुए विषाक्त पदार्थों और नकारात्मक ऊर्जा को निकालने में मदद करती है। कोशिकाएं इस प्रक्रिया से शुद्ध और स्वस्थ हो जाती हैं, जिससे व्यक्ति अधिक स्वस्थ महसूस करता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है।
🎊कोशिकीय संचार (Cellular Communication):
शरीर की कोशिकाएं एक दूसरे के साथ लगातार संवाद करती हैं, और कुण्डलिनी जागरण के दौरान यह संचार और भी सशक्त हो जाता है। इससे शरीर की संपूर्ण प्रणाली में संतुलन और सामंजस्य उत्पन्न होता है, जिससे सभी अंग और प्रणालियाँ अधिक प्रभावी ढंग से काम करती हैं।
🎊चक्रों के साथ कोशिकाओं का संबंध
शरीर के सात प्रमुख चक्र शरीर के विभिन्न अंगों और उनके कोशिकीय तंत्र से जुड़े होते हैं। कुण्डलिनी जागरण के दौरान इन चक्रों की ऊर्जा संबंधित अंगों की कोशिकाओं को प्रभावित करती है, जिससे न केवल अंग, बल्कि उन क्षेत्रों की कोशिकाएं भी ऊर्जावान और पुनरुत्थानकारी अवस्था में प्रवेश करती हैं।
🎊मूलाधार चक्र और कोशिकीय स्थिरता:
मूलाधार चक्र शरीर के निचले हिस्से और हड्डियों से जुड़ा होता है। जब यह चक्र सक्रिय होता है, तो यह शरीर के स्थायित्व और सुरक्षा की भावना को बढ़ाता है। इस दौरान निचले शरीर की कोशिकाएं जागृत हो जाती हैं और अधिक स्थिर ऊर्जा का अनुभव करती हैं।
🎊अनाहत चक्र और हृदय की कोशिकाएँ:
अनाहत चक्र हृदय और फेफड़ों से जुड़ा होता है। जब कुण्डलिनी अनाहत चक्र को सक्रिय करती है, तो हृदय की कोशिकाओं में ऊर्जा प्रवाहित होती है, जिससे हृदय की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है। इससे रक्तसंचार बेहतर होता है और शारीरिक व मानसिक रूप से अधिक संतुलन का अनुभव होता है।
♦️💥🚩आज्ञा चक्र और मस्तिष्क की कोशिकाएँ:
आज्ञा चक्र मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र से जुड़ा होता है। कुण्डलिनी जागरण के दौरान यह चक्र मस्तिष्क की कोशिकाओं को सक्रिय करता है, जिससे मानसिक स्पष्टता, अंतर्दृष्टि, और चेतना का स्तर बढ़ता है। कई लोगों को इस अवस्था में मानसिक जागरूकता और बौद्धिक क्षमता में वृद्धि का अनुभव होता है।
💥कोशिकाओं में ऊर्जा प्रवाह का अनुभव
कुण्डलिनी जागरण के दौरान कोशिकाओं में ऊर्जा प्रवाह का अनुभव व्यक्तिगत रूप से भिन्न हो सकता है। कुछ लोग इसे तीव्रता से अनुभव करते हैं, जबकि अन्य को इसका सूक्ष्म अनुभव होता है। आमतौर पर यह अनुभव निम्नलिखित रूप में होता है:
💥शारीरिक गर्मी:
कुण्डलिनी ऊर्जा जागरण के दौरान शरीर में गर्मी महसूस हो सकती है। यह गर्मी कोशिकाओं में ऊर्जा के प्रवाह का संकेत देती है। इसे "योगिक गर्मी" के रूप में जाना जाता है, जो शरीर को ऊर्जावान बनाती है।
💥कंपन या झनझनाहट:
कुण्डलिनी जागरण के दौरान शरीर में कोशिकीय स्तर पर कंपन या झनझनाहट का अनुभव हो सकता है। यह इस बात का संकेत है कि कुण्डलिनी ऊर्जा शरीर में प्रवाहित हो रही है और कोशिकाएं इस ऊर्जा को ग्रहण कर रही हैं।
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😀खेती-किसानी और जुगाड़😀
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मेंहगाई का असर, खेती-किसानी में बढ़ती लागत और समय पर मजदूरों की अनुलब्धता के विकल्प में भारतीय किसान अपनी सूझबूझ और कम संसाधनों में भी खेती को आसान बनाने के लिए आधुनिक और सस्टेनेबल (Sustainable) तरीके अपना रहे हैं।
सस्ता और जुगाड़ू तरीका अपनाकर दूसरों को भी प्रेरित कर रहे हैं!
#विनम्र_श्रद्धांजलि
दुनियादारी जड़े हिला दी थी, इस संत ने.. "प्रह्लाद जानी" वो इंसान जिसने 76 सालो से जीवन मे कुछ नही खाया और न ही कुछ पिया, फिर भी ताउम्र जीवित रहा। डॉक्टर इन पर शोध कर करके थक गए मगर कुछ न मिला। भारतीय सेना के डॉक्टर्स की टीम ने इन्हें 15 दिन तक एक ऐसे कमरे में बंद रखा जहां कुछ भी नही था, सिवाय बिस्तर के। इनके कमरे में cctv लगाए गए। 15 दिन बाद इन्हें चेक किया तो सब कुछ नार्मल था, डॉक्टर भी हैरान थे। फिर देश विदेश के डॉक्टर्स की टीम ने इन पर अलग अलग शोध किये मगर उन्हें कोई रिजल्ट न मिला कि कैसे कोई इंसान इतने सालों से बिना खाये पिये जीवित है।
प्रह्लाद जानी, गुजरात काठियावाड़ जिले में रहते थे और कल इन्होंने प्राण त्याग दिए। इनके अनुसार मात्र 9 वर्ष की आयु में भगवान श्रीनाथ (कृष्ण) की ये पूजा करते थे और एक दिन अचानक भगवती महामाया (काली) प्रगट हुई और इन्हें वरदान मांगने को कहा, इन्होंने मांगा की इन्हें कभी भूंख प्यास न लगे ! देवी ने तथास्तु बोलते हुये वरदान दिया। तब से ये बिना अन्न जल के रहने लगे, इनकी तालु से अमृत गिरता था। इनका न बड़ा आश्रम, न ही अरबो की दौलत ! मगर प्रह्लाद जानी ने विज्ञान की जड़े हिला दी थी। अच्छे अच्छे नास्तिक न चाहते हुए भी स्वीकार करने को मजबूर थे... संत प्रह्लाद जानी - चुनरी वाली माताजी का गुजरात मे 26 मई को निधन हो गया। आप 90 साल के थे।
आपके बारे में कहा जाता था कि आपने पिछले 76 साल से अन्न जल ग्रहण नही किया है। आप सिर्फ श्वास के सहारे जीवित हैं। DRDO मतलब Defence Research & Development Organisation की एक अनुषांगिक संस्था DIPAS यानि कि Defence Institute of Physiology and Allied Sciences ने दो बार संत प्रह्लाद जानी के इस दावे की जाँच की कि उन्होंने पिछले 76 साल से अन्न जल ग्रहण नही किया। उनके ऊपर बड़ी वृहद Scientific Research हुई है। पहली बार 2003 मे और दोबारा 2010 में। 2010 में DIPAS , DRDO, AIIMS जैसे संस्थानों के Doctors , Scientists और Researchers ने अहमदाबाद के Sterling हॉस्पिटल के एक शीशे के Chamber नुमा रूम में पूरे 15 दिन तक उनकी निगरानी की। कुल 40 Doctors की टीम और 24 घंटे CC TV कैमरा की निगरानी में उन्हें देखते जांचते रहे। पल पल उनका Temperature, BP, Heart Beat, Blood Sugar, Lipid Profile, CBC, Kidney एवं liver function जैसे तमाम tests होते रहे। इस बीच उनके शौचालय जाने, मल मूत्र विसर्जन की भी निगरानी और Tests हुए। वैज्ञानिकों ने पाया कि उन पंद्रह दिनों में संतजी ने एक बूंद भी जल या कोई अन्न नही लिया। 24 घंटे में औसतन 100 ml पेशाब उनको होता था। मल त्याग नही किया, एक बार भी।
तमाम research के बाद वैज्ञानिकों ने यही निष्कर्ष निकाला कि संत जी एक अज्ञात रहस्यमयी प्राण शक्ति से ही ऊर्जा ग्रहण करते हैं। DIPAS और DRDO जैसी संस्थाएं सेना के लिए ऐसी research करती हैं जिनसे विकट परिस्थितियों में मरुस्थल या बर्फीली चोटियों पे सैनिक बिना कुछ खाये पिये भी न सिर्फ Survive कर सकें बल्कि लड़ सकें। इसी क्रम में DRDO Energy Drinks , Energy foods, पे रिसर्च करती हैं जिससे जेब मे रखी एक चॉकलेट मात्र से हफ्ते भर की ऊर्जा मिल सके। तो DIPAS जैसी संस्था ने भी संत प्रह्लाद जानी के इस दावे को सत्य माना कि उन्होंने लंबे समय तक अन्न जल ग्रहण नही किया। ऐसे में हमारे ग्रंथों में समाधि की जिस अवस्था का ज़िक्र आता है जिसमे योगी सिर्फ योग प्राणायाम और प्राण वायु के सहारे ही वर्षों समाधि में बिता देते थे। वैसे ही योगी थे संत प्रह्लाद जानी ।
26 मई 2020 सुबह आपका निधन हो गया, आपको भावपूर्ण श्रद्धांजलि.. शत-शत नमन्
"पिछले 40 साल से हम बंगाल में रह रहे हैं, हमें किसी ने कुछ नहीं बोला।
हमारे पास वोटर कार्ड, आधार कार्ड, राशन कार्ड सब है।
2024 के लोकसभा चुनाव में हमने वोट भी किया था।
लेकिन भाजपा सरकार आने के बाद हमें बांग्लादेश वापस जाना पड़ रहा है।"