किसी भी लोकतांत्रिक समाज में सबसे अधिक चिंता का विषय किसी लेखक, विचारक या सार्वजनिक बुद्धिजीवी का मत नहीं होता; उससे कहीं अधिक चिंताजनक वह रुग्ण और कुंठाजनित मानसिकता होती है, जो असहमति को अपराध और सहमति को षड्यंत्र में बदल देती है। इसीलिए यह कहना कि "अरुंधति रॉय से भी ख़तरनाक वे लोग हैं जो उसकी बात पर ताली बजा रहे हैं" न केवल वैचारिक रूप से अपरिपक्व है, लोकतांत्रिक चेतना के उस भारतीय मूलाधार पर भी आघात करता है, जिसे किसी समय शंकराचार्य जैसे विचारक ने पूरे देश में घूम-घूमकर शास्त्रार्थ के माध्यम से जीवंत और जीवित ही नहीं रखा, उसे एक गरिमा प्रदान की थी।
भारत किसी व्यक्ति, किसी सरकार या किसी राजनीतिक दल की इच्छाओं से नहीं, संविधान और विधि के शासन यानी रूल ऑव लॉ से संचालित होता है। यदि किसी नागरिक ने, चाहे वह लेखक हो, बुद्धिजीवी हो या राजनेता— वास्तव में कानून का उल्लंघन किया है, तो उसका निर्णय अदालतें करेंगी, इस तरह का कंगारू कोर्ट लगा लेने वाले फतवेबाज़ नहीं; विधिक प्रक्रिया करेगी, सोशल मीडिया का अभियोग नहीं। यही संवैधानिक गणराज्य और भीड़तंत्र के बीच का निर्णायक अंतर है।
भारतीय राजनीति का इतिहास स्वयं इस तथ्य का साक्षी है कि लगभग हर सत्ता ने किसी न किसी समय असहमति के प्रति असहिष्णुता दिखाई है। कांग्रेस के शासनकाल में वरवर राव जैसे लेखकों और कार्यकर्ताओं को लंबे समय तक जेलों का सामना करना पड़ा। सलमान रुश्दी की पुस्तक The Satanic Verses पर प्रतिबंध लगाया गया और उन्हें भारत आने से भी रोका गया। इससे अधिक हैरानीजनक यह रहा कि खुद भारतीय जनता पार्टी की सरकारें न केवल रुख्दी अपितु बांग्लादेश की विद्रोहिणी लेखक तसलीमा नसरीन तक को सुरक्षा मुहैया नहीं करवा पाई थीं और वे जाने कहाँ-कहाँ मारी-मारी फिरीं।
अनेक कम्युनिस्ट-शासित प्रदेशों और व्यवस्थाओं पर भी वैचारिक असहमति को सीमित करने, संस्थागत स्वतंत्रताओं को संकुचित करने और अभिव्यक्ति पर नियंत्रण के आरोप लगते रहे हैं। मुक्तिबोध की तेजस्विता से भरपूर इतिहास पुस्तक पर जनसंघ के लोगों ने हल्ला मचाया, माँग की और पंडित नेहरू जैसे व्यक्ति के रहते उस पुस्तक पर प्रतिबंध लगा। इतिहास का निष्कर्ष स्पष्ट है—सत्ता का रंग बदल सकता है, किंतु सत्ता का प्रलोभन अक्सर वही रहता है: आलोचना को नियंत्रित करने का।
फिर भी, आज का परिदृश्य भिन्न है। वे पुराने प्रहसन, जिनमें सत्ता अपने आलोचकों को सीमित करके स्वयं को विजयी मान लेती थी, अब बहुत छोटे पड़ चुके हैं। समय का वह "यस्य देशे नास्तिद्रुमो" वाला अरंड अब विशालकाय वटवृक्ष बन चुका है। सूचना, संवाद और सार्वजनिक विमर्श का विस्तार इतना व्यापक हो चुका है कि विचारों को दमन से नहीं, केवल बेहतर विचारों से चुनौती दी जा सकती है।
यदि किसी सरकार को यह विश्वास है कि किसी वक्तव्य ने भारतीय कानून का उल्लंघन किया है तो उसके पास संविधान और विधि प्रदत्त पर्याप्त साधन उपलब्ध हैं। वह सक्षम न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से कार्रवाई कर सकती है। किंतु किसी लेखक या उसके पाठकों के विरुद्ध सार्वजनिक उन्माद खड़ा करना और वह भी कथित तौर पर लेखक और पत्रकार कहलाने वाले व्यक्ति का, न तो न्याय है, न लोकतांत्रिक मर्यादा। कानून का स्थान भीड़ और स्वेच्छाचारिता वाली मानसिकता नहीं ले सकती और न ही नैतिक अभियोजन न्यायिक निर्णय का विकल्प हो सकता है।
इसी संदर्भ में सार्वजनिक जीवन से जुड़े लेखकों, संपादकों और टिप्पणीकारों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। वैचारिक असहमति लोकतंत्र का स्वाभाविक गुण है; किंतु असहमति को व्यक्तिगत अवमानना, मानसिक रोग के संकेत या भीड़ को उकसाने वाली भाषा में बदल देना बौद्धिक ईमानदारी का परिचायक नहीं है। जो लोग स्वयं को लेखक, संपादक या सार्वजनिक बुद्धिजीवी के रूप में प्रस्तुत करते हैं—चाहे उनकी राजनीतिक सहानुभूतियाँ किसी भी दल के साथ हों—उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे तर्क का उत्तर तर्क से दें, न कि व्यक्तित्व-हनन की भाषा से।
अरुंधति रॉय से असहमत होने का अधिकार प्रत्येक नागरिक को है, और उनकी तीखी आलोचना भी पूर्णतः वैध है। किंतु एक अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त, गंभीर और प्रभावशाली लेखिका के संबंध में ऐसी भाषा का प्रयोग, जो उनकी बौद्धिक अस्मिता के बजाय उनके प्रति घृणा या उपहास को केंद्र में रखे, सार्वजनिक विमर्श को समृद्ध नहीं करता; वह केवल वैचारिक दरिद्रता का परिचय देता है। किसी विचार का सबसे प्रभावशाली प्रतिवाद उसका तार्किक विश्लेषण है, न कि उसके समर्थकों को "ख़तरनाक" और उसके लेखक को सार्वजनिक घृणा का पात्र घोषित करना।
एक आत्मविश्वासी लोकतंत्र अपने आलोचकों से भयभीत नहीं होता। वह उन्हें सुनता है, उनका प्रतिवाद करता है और अंततः कानून तथा संविधान की मर्यादाओं के भीतर रहकर ही निर्णय करता है। क्योंकि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति नारों में नहीं, संवाद में है; प्रतिशोध में नहीं, विधि के शासन में है; और किसी लेखक से असहमति में नहीं, असहमति के अधिकार की रक्षा में है। George Orwell ने कितना सही लिखा था: "If liberty means anything at all, it means the right to tell people what they do not want to hear." यानी जिस समाज में सुनने की क्षमता मर जाती है, वहाँ सबसे पहले विवेक का अंतिम संस्कार होता है। इससे सही तो और क्या ही होगा। अपने कालखंड की वैदुष्य परंपरा की द्युति बन चुकीं अरुंधती के बारे में इस तरह के हलके कॉमेंट कभी तर्क का विकल्प नहीं हो सकते; वे केवल बौद्धिक दिवालियेपन का सार्वजनिक प्रमाणपत्र होते हैं।
जितना नुकसान और अपमान आप लोगों ने हिंदू धर्म का किया है, शायद भारत के 5000 वर्ष के इतिहास में बाहर से आने वाले आतताइयों ने भी नहीं किया। जितना आप लोगों ने हिंदुओं को लूटा है, आज तक किसी ने नहीं लूटा। हिंदू धर्म पर आप लोग कलंक हैं।
ये वीडियो देखिए। ये क्या कर रहे हैं आप। शर्म आती है आपको? माफ़ी माँगिए पूरे हिंदू समाज से।
हरनामसिंह नरवरिया:
आल्हा की हुंकार से राम मंदिर चढ़ावा विवाद को जन-जन तक ले जाने वाले लोकगायक
इन दिनों आल्हा शैली के कुछ लोकगीत एक खास अंदाज में गूंज रहे हैं : डाको परगयो अवधपुरी मैं, लुट गए राम लला सरकार। तीन लोक में मचो हाहाकार, जेवर सोना गहना सरे ले गए, लुट गई जनक दुलारी...
आल्हा गायन केवल लोक-संगीत नहीं है; यह उत्तर भारत के जन-मन की युद्ध-घोषणा है। बुंदेलखंड की इस परंपरा में ढोलक की थाप, गायक की फौलादी आवाज़ और लोक-न्याय की बेचैनी मिलकर ऐसी जन-अदालत बनाते हैं, जहाँ राजा भी कठघरे में खड़ा हो सकता है और साधु के भेस में बैठा हुआ चोर भी। आल्हा मूलतः वीर-रस की लोकगाथा रही है, जिसमें आल्हा-ऊदल के शौर्य, संघर्ष और लोक-प्रतिरोध की स्मृति गाई जाती है।
हरनामसिंह नरवरिया ने इसी परंपरा को आज के समय की सबसे तीखी जन-भाषा में बदल दिया है। राम मंदिर चढ़ावा और चंदे में कथित हेराफेरी को लेकर जब अख़बारों, दलों और संगठनों की भाषा बयानबाज़ी, आरोप-प्रत्यारोप और कानूनी शब्दावली में उलझी हुई थी, तब नरवरिया ने इसे आल्हा की सीधी, कड़क और जनता की समझ में आने वाली भाषा दी। राम मंदिर चंदा और चढ़ावा विवाद को लेकर गंभीर आरोप लगे हैं, जाँच की माँग उठी है, कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जाँच की माँग दोहराई है और VHP ने आरोप लगाने वालों से प्रमाण माँगे हैं।
नरवरिया की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे इस मामले को केवल “समाचार” नहीं रहने देते; वे उसे लोक-स्मृति में बदल देते हैं। उनकी आल्हा प्रस्तुति “राम राज में रामलला भी सुरक्षित नहीं” जैसे शीर्षकों के साथ सोशल मीडिया पर लाखों लोगों तक पहुँची है; एक वीडियो के विवरण में दो सप्ताह में लगभग 3.86 लाख व्यूज़ दिखते हैं। यह संख्या केवल वायरलिटी नहीं बताती, यह बताती है कि जनता अभी भी लोकधुनों में न्याय का स्वर खोजती है। और आल्हा के गीत रूप में यह रचना इतना सम्मोहक है कि इसे सुनते रहने में ही आनंद आने लगता है।
हरनामसिंह नरवरिया की गायकी में महज़ क्रोध नहीं है, उसमें लोक-नैतिकता है। वे मंदिर-विरोधी स्वर नहीं गाते; वे राम के नाम पर होने वाली बेईमानी के विरुद्ध राम की ही लोक-अदालत सजाते हैं। यह फर्क बहुत बड़ा है। वे आस्था पर चोट नहीं करते, आस्था के नाम पर बने प्रबंध और सत्ता-संरचना से सवाल करते हैं। उनकी आवाज़ कहती है कि राम के नाम पर चढ़ाया गया सोना, चाँदी, पैसा और विश्वास किसी की निजी तिजोरी का माल नहीं हो सकता।
आज जब टीवी की बहसें प्रायोजित शोर में बदलती जा रही हैं, हरनामसिंह नरवरिया जैसे लोकगायक जनता को याद दिलाते हैं कि असली मीडिया कभी-कभी चौपाल पर जन्म लेता है। आल्हा की एक पंक्ति वह कर सकती है, जो कभी-कभी सौ संपादकीय नहीं कर पाते। उन्होंने राम मंदिर चढ़ावा विवाद को गाँव, गली, खेत, चौराहे और मोबाइल स्क्रीन तक पहुँचा दिया। यह लोकगायन की विजय है, लोक-स्मृति की वापसी है और सत्ता से सवाल पूछती जनता की जीवित आवाज़ है। #HarnamsinghNarvaria
अयोध्या में लूट किस लेवल पर हुई वह जानने के लिए यह वीडियो देखें। यह भारत सरकार के पूर्व गृह सचिव एस लक्ष्मीनारायण हैं। यह व्यक्ति जिसका पूरा परिवार राम भक्ति में ही लीन रहा है पापियों ने उसके साथ भी ठगी कर ली।
इनका कहना है कि इन्होंने परिवार की राय से चंपत राय को स्वर्ण रचित श्रीरामचरित मानस भेंट किया जिसमें तकरीबन एक किलो सोना था। बाद मेँ पता चला वह गायब हो गया।
इन्होंने कई बार कई बार चंपत राय से शिकायत किया,पत्र लिखा लेकिन बदतमीजी से जवाब देकर इन्हें चलता किया। नृपेंद्र मिश्रा ने अपनी बेबसी जाहिर करते हुए कहा सब चंपत देख रहे हैं।
अंत में हारकर एस लक्ष्मीनारायण जी ने विशेष सलाहकार महोदय से भी शिकायत की जिनका बार बार सेवाकाल केंद्र ने दबाव देकर बढ़वाया। लेकिन उनका यह कहना था कि जो आपने दान किया वह भूल जाइए।
हे राम। भक्तों का तो ऐसा अपमान भारतीय प्राचीन इतिहास में भी न हुआ होगा। रामचिरमानस ही चुरा लिए और अपने घर में करोड़ों की चोरी पर हल्ला मचाने वाला कह रहा है कि भूल जाइए।
Kar liya “Viksit Bharat” ka pehla stress test.
₹12,000 crore. 213 km. Inaugurated by PM Modi himself on 14th April with full pomp.
Not even 3 months in, and the “world-class” Delhi-Dehradun Expressway already has cracked slabs, leaking joints and potholes eating the road, even before monsoon peaked.
This isn’t bad luck. This is what happens when contracts get cleared faster than quality checks.
Where’s NHAI’s defect liability clause? Who signed the completion certificate? And who’s paying to fix a road that just opened?
12,000 crore roads shouldn’t need repairs in 90 days. Ask your MP why this one does.
@SushantBSinha@YouTubeIndia@YouTube सिन्हाजी, सभी कमेंट्स पढ़ लीजिए आपको आपके शंकाओं के उत्तर मिल जाएँगे, यूट्यूब को दोष देने से कुछ नहीं होगा, जनता की आवाज़ को पहचानिये.
Dear friends, good morning!
For the BBC, Vikas Pandey, India Editor came all the way down to Kochi to spend time with me.
https://t.co/foWrFt9zsh
He visited my home, spoke to my family and friends, and then spent two whole days with me in my outpatient department at Rajagiri Hospital, watching me diagnose and treat patients and interact with their family.
This report is the culmination of that visit and I am very glad for this opportunity. I hope you will like this read.
Loved and loathed: The making of India's viral liver doctor
https://t.co/foWrFt9zsh
@Riskiyadav01 हर धंदेबाज़ अपनी जागीर अपने बेटे को सौंपता है इसमे नया क्या है? सवाल है वें कौन बेवक़ूफ़ है जो इन्हे सुनने जाते है? उनकी बदौलत ही तो इनका धंधा चलता है.
जब राम के नाम पर आया दान भी सुरक्षित नहीं, तब धर्मस्थलों का नैतिक अर्थ क्या रह जाता है?
अयोध्या के ताज़ा प्रसंग को समझने, राम की मर्यादा और राम की भक्ति को जानने के लिए इस प्रसंग को समझना बहुत ज़रूरी है :
संत नाभादास संत तुलसी से मिलनेकाशी गए और ध्यानावस्था में होने के कारण तुलसी मिल नहीं सके तो नाभादास उसी समय वापस वृंदावन लौट गए। तुलसीदास को बाद में पता चला तो बड़ा खेद हुआ और वे तत्काल निकले और दो सप्ताह तक पैदल चलकर संत नाभादास के डेरे वृंदावन पहुँचे। नाभादास उस समय डेरे पर नहीं थे। वे पास ही भंडारे में निर्धन लोगों को भोजन करवा रहे थे। तुलसीदास ने नाभादास का जूता उठाया और भंडारे की एक पंगत के पास ही एक बहुत बुरी यानी गंदगी वाली जगह बैठ गए। नाभादास ने उन्हें देखा नहीं। वे सोच भी नहीं सकते थे कि तुलसी भी यहाँ आ सकते हैं। वे जब खीर डालने लगे तो तुलसीदास ने बर्तन की जगह संत नाभादास का जूता आगे कर दिया। नाभादास ने सोचा कि ग़लती हो गई। वे बोले, बर्तन! तुलसी बोले, आपके जूते से श्रेष्ठ बर्तन मेरे लिए क्या होगा? मैं तो खीर का प्रसाद इसी में खा लूँगा। नाभादास तुलसी की इस विनम्रता पर झार-झार रोने लगे।
अभी अयोध्या से लौटे एक पुराने कारसेवक और हिन्दूवादी धर्मप्राण व्यक्ति से मैंने पूछा, एक धर्मगुरु के रूप में और उन लोगों में से एक के रूप में जो मंदिर को केवल पत्थर, शिखर, आरती और घंटी का स्थान नहीं मानते, अपितु लोक-सेवा, लोक-विश्वास और लोक-धर्म का केंद्र मानते हैं, आप राम मंदिर से चंदा चोरी के प्रकरण को कैसे देखते हैं, वे बोले, अत्यंत वेदना के साथ यह कहना चाहता हूँ कि राम मंदिर से जुड़े दान में कथित गड़बड़ी का मामला केवल एक पुलिस केस नहीं है। यह हिन्दू समाज के आत्म-परीक्षण की घड़ी है। यह सवाल केवल इतना नहीं है कि कितने रुपए गए, किसने लिए, कितने बरामद हुए, किस पर एफआईआर हुई और कौन जेल गया। असली सवाल यह है कि अगर राम के नाम पर दिए गए दान की भी ऐसी दुर्गति हो सकती है तो देश भर के लाखों मंदिरों, मठों, आश्रमों और धर्मस्थलों में चढ़ावे, दान, जमीन, सोना-चांदी, नकद और सेवा-निधियों का क्या हाल होगा?
राम मंदिर कोई साधारण स्थल नहीं है। यह वह स्थान है, जिसे दशकों तक आस्था, राजनीति, आंदोलन, “बलिदान”, दान और राष्ट्रीय प्रतीक की भाषा में प्रस्तुत किया गया। इससे देश के प्रधानमंत्री, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, बड़े-बड़े संत, संगठन और करोड़ों भक्त भावनात्मक रूप से जुड़े रहे। जब ऐसे मंदिर में दान-व्यवस्था पर ही सवाल उठें, जब दान गिनने, दर्ज करने, सुरक्षित रखने और सार्वजनिक जवाबदेही की व्यवस्था संदिग्ध दिखे, तब यह केवल “चोरी” नहीं रहती। यह धर्म की देहरी पर रखी हुई वह नैतिक दरार है, जिससे समाज के विश्वास का जल धीरे-धीरे रिसने लगता है।
धर्मस्थल का पहला धर्म क्या है?सेवा। दूसरा धर्म? सत्य। तीसरा धर्म?पारदर्शिता। चौथा धर्म? करुणा। पाँचवाँ धर्म? लोक-मंगल। छठा अहिंसा? सातवाँ अचौर्य? आठवाँ धी: यानी विवेकशीलता, नौवां अक्रोध और दसवाँ नैतिक सदाचार। मंदिर वह जगह नहीं हो सकता जहाँ गरीब भक्त अपनी जेब से सिक्का निकाले, किसान अपनी मेहनत की बचत दे, विधवा अपनी श्रद्धा का अंश दे, मजदूर अपनी मजदूरी से प्रसाद चढ़ाए और फिर वह धन ऐसी व्यवस्था में चला जाए जहाँ उसका स्पष्ट हिसाब ही न हो। ईश्वर को धन की आवश्यकता नहीं होती। धन की आवश्यकता मनुष्य को होती है—भूखे को भोजन, प्यासे को पानी, भयभीत को निर्भयता, रोगी को ओषधि, विद्यार्थी को पुस्तक, विधवा को सहारा, अनाथ को प्रश्रय, किसान को राहत, अनाथ को आश्रय और समाज को नैतिक बल देने के लिए। यदि मंदिर का दान सेवा में नहीं बदलता तो वह धर्म का धन नहीं, प्रबंधन की तिजोरी बन जाता है।
राम की मर्यादा क्या थी? सौतेली माँ के इशारे करते ही सत्तासीन होते-होते सत्ता को त्याग देना, सुख सुविधाओं को दरकिनार करदेना, सत्ता में रहते हुए भी निजी लोभ से ऊपर रहना। वन में रहते हुए भी धर्म न छोड़ना। राजधर्म को निजी सुविधा से बड़ा मानना। शबरी के जूठे बेर स्वीकार करना, निषाद को गले लगाना, विभीषण को शरण देना, सीता की खोज में वानरों तक से सहयोग लेना—राम का धर्म सत्ता, संपत्ति और प्रभुत्व का धर्म नहीं था। वह विश्वास का धर्म था। इसलिए राम के नाम पर आए दान में यदि जरा भी गड़बड़ी होती है तो यह अपराध केवल कानूनी नहीं, आध्यात्मिक भी है। यह भक्त के विश्वास की चोरी है। भक्त की जेब से पैसा नहीं गया, उसके भीतर का भरोसा गया।
बेहद प्रभावशाली कविता और उतना ही कमाल का पाठ राजेंद्र जी का। गिरने का महत्व बहुत सुंदर से बताया गया है। इसे सुनने के बाद गिरते रहने की असीम प्रेरणा मिलेगी। जो भी गिर रहे हैं, ज़्यादा गिरने के लिए यह कविता सुनें।
राजेंद्र जी के यू ट्यूब चैनल का लिंक-
https://t.co/F08YBm1faP
"गिरो, गिरो, गिरोकि अभी और गिरने की संभावनाएँ भरपूर हैं!" - हूबनाथ पांडेय
Poem for all the followers of Hindutva and the Mainstream propagandists @sudhirchaudhary, @RShivshankar@smitaprakash@navikakumar ,@RubikaLiyaquat@SushantBSinha,@AmanChopra_@AMISHDEVGAN ,@UnSubtleDesi@AnchorAnandN, Arnab via @republic, @RTArnabOfficial, @SureshChavhanke , @RajatSharmaLive , @chitraaum@anjanaomkashyap , @MeghaSPrasad@gauravcsawant@ShivAroor@_pallavighosh@RubikaLiyaquat ,
गिरो, गिरो, गिरोकि अभी और गिरने की संभावनाएँ भरपूर हैं!
इतना गिरो कि गुरुत्वाकर्षण बल भी शर्म के मारे गिर पड़े।
गिरो गिरो...
अभी तो गिरने की शुरुआत है।
गिरने के अपने सामर्थ्य पर भरोसा रखो।
गिरने मत दो — सारा विश्व तुम्हारा गिरना देख रहा है।
और खुद न गिर पाने पर अफसोस कर रहा है।
गिरो... गिरो...
गिरोह रुपए के साथ, गिरोह चरित्र के साथ, गिरोह गर्व के साथ।
एक तुम हो जिसमें गिरने का इतना साहस है।
उस साहस के साथ गिरो — बेशर्मी के साथ गिरो, बेदर्दी के साथ गिरो।
दुनिया तुम्हें सिर्फ गिरना सिखा रही है।
सिर्फ एक ही मामले में सही — तुम्हें विश्व गुरु होने से कोई नहीं रोक सकता।
आने वाली पीढ़ियां तुम्हारे गिरने में अपनी गिरने की संभावना ही तलाश करेंगी।
और वो तुमसे भी ज्यादा गिरने का पराक्रम करेंगी।
उनके पराक्रम पर यकीन करते हुए...
जरा और ज़ोर से गिरो, थोड़े शोर से गिरो।
चारों ओर से गिरो, निपट भोर से गिरो।
और गिरते रहो, गिरते रहो।
ये सच है कि इससे पहले तुम्हारी तरह कोई नहीं गिरा।
इसका कोई नहीं गिरा।
बल्कि तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि सदियों से खड़े समाज को तुम गिरना सिखा रहे हो।
एक ही जगह खड़े-खड़े लोग जड़ हो गए थे,
उन्हीं जड़ों को तुम ही हटा रहे हो।
ये कोई आसान काम नहीं है।
जो गिरने में असमर्थ हैं, वो तुम्हारी आलोचना करेंगे,
तुम्हारी निंदा करेंगे।
पर इन सबसे घबराना नहीं, गिरने से डगमगाना नहीं।
आज तक जो कुछ न गिरने के लिए प्रतिबद्ध था,
वो सब लेकर गिरो —
धर्म लेकर गिरो, कर्म लेकर गिरो,
देश लेकर गिरो, भेष लेकर गिरो,
पेड़ लेकर गिरो, रेड़ लेकर गिरो, पानी लेकर गिरो,
पहाड़ लेकर गिरो, सामान लेकर गिरो, भार लेकर गिरो,
प्रकृति लेकर गिरो, संस्कृति लेकर गिरो, विकृति लेकर गिरो...
गिरो!
वर्तमान सदी के बहुमतम महापुरुष पूरी कहानी को दिखा दो
कि तुम और कितना गिर सकते हो।
कल हो सकता है कि तुम्हारा गिरना देखकर ही लोगों में उठने की कामना जागे।
आने वाली पीढ़ियों को उठने का अर्थ बताने के लिए
कम और ज्यादा गिरने का फर्क बताने के लिए...
गिरो!
बिना किसी फिक्र के सिर्फ और सिर्फ गिरो।
गिरते रहो, गिरते रहो...
जब तक कि गिरने की प्रक्रिया निष्क्रिय न हो जाए।
P.S.हूबनाथ पांडेय जी की व्यंग्यात्मक कविता "गिरो" पर आधारित
Rendition by Rajendra