समाजवादी पार्टी (सपा) के एक प्रमुख राष्ट्रीय प्रवक्ता द्वारा अभी हाल ही में ब्राह्मण समाज को लेकर की गयी अभद्र, अशोभनीय एवं आपत्तिजनक टिप्पणी व बयानबाज़ी आदि को लेकर हर तरफ उपजा भारी आक्रोश व उसकी तीव्र निन्दा स्वाभाविक ही है तथा इस विवाद के फलस्वरूप पुलिस द्वारा मुक़दमा दर्ज किये जाने के बाद भी यह मामला थमने का नाम नहीं ले रहा है। किन्तु संकीर्ण जातिवादी राजनीति करने वाली सपा के नेतृत्व की इस मामले को लेकर ख़ामोशी से भी मामला और अधिक गंभीर होकर काफी तूल पकड़ता जा रहा है। स्थिति भी तनावपूर्ण होती जा रही है।
वैसे भी सपा प्रवक्ता के ग़ैर-ज़िम्मेदाराना बयान से ब्राह्मण समाज के आदर-सम्मान व स्वाभिमान को जो ठेस पहुँची है तो उसको गंभीरता से लेते हुये सपा मुखिया को इसका तत्काल संज्ञान लेकर ब्राह्मण समाज से छमा याचना व पश्चाताप कर लेना चाहिये तो यह संभवतः उचित होगा।
इसके अलावा, इस ताज़ा प्रकरण से लोगों की नज़र में यह भी साबित है कि सपा का ख़ासकर दलितों, अति-पिछड़ों व मुस्लिम समाज आदि की तरह ब्राह्मण समाज-विरोधी भी इनका जातिवादी चाल व चरित्र बदला नहीं है बल्कि और ज़्यादा गहरा ही हुआ है तथा इसके साथ ही, ब्राह्मण समाज के प्रति वर्तमान सरकार के रवैयों को लेकर भी जो ज़बरदस्त नाराज़गी इस समाज में देखने को मिल रही है वह भी किसी से छिपा हुआ नहीं है,
जबकि यह सर्वविदित है कि बी.एस.पी. द्वारा सर्वसमाज की तरह ब्राह्मण समाज को भी पार्टी व सरकार में भी भरपूर आदर-सम्मान देने के साथ-साथ हर स्तर पर उन्हें उचित भागीदारी भी दी गयी है अर्थात् बी.एस.पी. में यूज़ एण्ड थ्रो नहीं है बल्कि सर्वसमाज का हित हमेशा सुरक्षित रहा है।
देश में सामाजिक परिवर्तन के पितामह के रूप में प्रसिद्ध ’बहुजन समाज’ में अति-पिछड़े वर्ग में जन्मे महात्मा ज्योतिबा फुले को आज उनकी जयंती पर मेरे व बी.एस.पी. की ओर से भी शत्-शत् नमन व अपार श्रद्धा सुमन अर्पित।
ख़ासकर शिक्षा के माध्यम से स्त्री/नारी शक्ति के प्रणेता के रूप में महात्मा ज्योतिबा फुले व उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले का नाम इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। महात्मा ज्योतिबा फुले के शब्दों में ’’विद्या बिना मति गयी, मति बिना नीति गयी। नीति बिना गति गयी, गति बिना वित्त गया। वित्त बिना शुद्र हताश हेये, और गुलाम बनकर रह गये।’’ अर्थात यह सब कुछ शिक्षा के अभाव में हुआ और इसीलिये आगे चलकर परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर ने इनसे प्रेरित होकर शिक्षा की तरफ विशेष ध्यान दिया।
साथ ही, उन्नीसवीं सदी के मध्य में दलितों व शोषितों की मुक्ति के लिये महात्मा ज्योतिबा फुले के ज़बरदस्त प्रयासों के कारण अकेले पुणे में ही नहीं बल्कि पूरे महाराष्ट्र में सामाजिक परिवर्तन की नई अलख जगी और विशेषकर नारी मुक्ति व सशक्तिकरण का ऐतिहासिक कार्य शुरू हुआ, जिस संघर्षों के लिये उनकी जितनी भी सराहना व प्रशंसा की जाये वह कम है।
ऐसे अति-पिछड़े/ओबीसी समाज के महापुरुष की स्मृति व उनके सम्मान में मेरी बी.एस.पी. सरकार द्वारा अनेकों कार्य यहाँ यूपी में किये गये जिनमें अमरोहा को नया ज्योतिबा फुले नगर ज़िला बनाना शामिल है, किन्तु सपा सरकार ने इसे भी अपनी संकीर्ण राजनीति व जातिवादी द्वेष आदि के कारण इसका नाम भी बदल डाला।
उल्लेखनीय है कि बी.एस.पी की सरकार द्वारा कासगंज को कांशीराम नगर ज़िला बनाने के साथ-साथ कानपुर देहात को रमाबाई नगर, संभल को भीमनगर, शामली को प्रबुद्ध नगर व हापुड़ को भी पंचशील नगर के नाम से नया ज़िला बनाया था, जिसे सपा सरकार ने ज़िला तो बनाये रखा लेकिन इन सभी ज़िलों के नामों को बदल डाला, यह है इनके पीडीए का अति-दुखद चाल, चरित्र व चेहरा।
@PMOIndia सर ये जेवर एयरपोर्ट योजना बहनजी के कार्यकाल की थी जिससे केंद्र में काँग्रेस पार्टी की सरकार ने राजनीति के चक्कर में जमीनी स्तर पर लागू नहीं होने दी
एक तरफ शादी की खुशियाँ, ढोल-नगाड़ों की गूंज और उत्सव का माहौल…
दूसरी तरफ Bahujan Samaj Party के प्रति अटूट निष्ठा और गर्व।
दूल्हे राजा ने हाथी की सवारी कर और हाथ में बीएसपी का झंडा लहराकर यह साबित कर दिया कि विचारधारा केवल नारों में नहीं, बल्कि रगों में दौड़ती है।
यह बारात सिर्फ एक वैवाहिक समारोह नहीं, बल्कि स्वाभिमान, पहचान और बहुजन एकता का प्रतीक बन गई।
ऐसे जज़्बे को सलाम! 💙
जय भीम! जय भारत!
@Mayawati
#जयभीम #BSP #BSPMission2027
संवैधानिक सुरक्षा कवच पर प्रहार: क्या न्यायपालिका का झुकाव पक्षपाती है?
भारतीय संविधान में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षण का प्रावधान केवल आर्थिक उत्थान का जरिया नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित करने का एक 'सुरक्षा कवच' था। लेकिन हाल के दिनों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा 'क्रीमी लेयर' और 'कोटा के भीतर कोटा' जैसे विषयों पर दी जा रही व्यवस्थाओं ने दलित समाज और बुद्धिजीवियों के मन में गहरी शंकाएं पैदा कर दी हैं।
1. आरक्षण का आधार: आर्थिक नहीं, सामाजिक
एक दलित चिंतक के रूप में, सबसे बड़ी चिंता यह है कि न्यायपालिका बार-बार आरक्षण को 'गरीबी उन्मूलन' के चश्मे से देख रही है। संविधान निर्माता डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने स्पष्ट किया था कि आरक्षण 'प्रतिनिधित्व' का माध्यम है, न कि गरीबी दूर करने की योजना। जब कोर्ट SC/ST में 'क्रीमी लेयर' की बात करता है, तो वह इस कड़वी सच्चाई को नजरअंदाज कर देता है कि जातिगत भेदभाव केवल आर्थिक स्थिति से नहीं जुड़ा है। एक संपन्न दलित अधिकारी को भी उसी सामाजिक अपमान और छुआछूत का सामना करना पड़ता है, जो एक गरीब मजदूर को।
2. 'कोटा के भीतर कोटा' और फूट डालो की नीति
हाल ही में 'सब-क्लासिफिकेशन' (उप-वर्गीकरण) को हरी झंडी देना दलित एकजुटता को खंडित करने का प्रयास प्रतीत होता है। जहाँ एक तरफ पूरा समाज जातिगत अत्याचारों के खिलाफ एकजुट होने की कोशिश कर रहा है, वहीं इस तरह के कानूनी दांव-पेच समुदायों के भीतर ही आपसी प्रतिस्पर्धा और द्वेष पैदा कर सकते हैं।
3. प्रतिनिधित्व की कमी और न्यायिक पूर्वाग्रह
न्यायपालिका के फैसलों पर सवाल उठना इसलिए भी स्वाभाविक है क्योंकि भारत की उच्च न्यायपालिका (High Courts और Supreme Court) में दलित, आदिवासी और पिछड़ों का प्रतिनिधित्व नगण्य है। जब फैसला सुनाने वाली बेंच में विविधता नहीं होती, तो उनके फैसलों में उस वर्ग के प्रति 'सहानुभूति' तो हो सकती है, लेकिन 'अनुभवजन्य सत्य' की कमी होती है। यही कारण है कि 'योग्यता' (Merit) के नाम पर अक्सर आरक्षित वर्गों के अधिकारों को सीमित करने की कोशिश की जाती है।
4. ऐतिहासिक अन्याय की अनदेखी
SC/ST एक्ट को नरम करने के पुराने प्रयास (जैसे मार्च 2018 का फैसला) यह दर्शाते हैं कि कोर्ट जमीनी स्तर पर होने वाली हिंसा और सामाजिक ढांचे की कठोरता को समझने में अक्सर विफल रहता है। हालांकि भारी जन-विरोध के बाद इसे पलटा गया, लेकिन ऐसे विचार बार-बार सामने आना न्यायपालिका की मंशा पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
माता रमाबाई जी की जन्म जयंती के पावन अवसर पर, सीमित संसाधनों के बावजूद जिस अनुशासन, उत्साह और श्रद्धा के साथ ये नन्हे बच्चे झाँकी निकाल रहे हैं, वह दृश्य मन को भाव-विभोर कर देता है।
इन मासूम चेहरों में अपने महापुरुषों और महान नायिकाओं के प्रति जो सम्मान, समर्पण और गर्व झलकता है, वही हमारे समाज की सबसे बड़ी पूँजी है।
आज इन बच्चों के कदम छोटे हैं, लेकिन इनके सपने, सोच और संस्कार बेहद विशाल हैं।
यही नन्हे हाथ आने वाले कल का निर्माण करेंगे,
यही उजले मन समाज में समानता, संवेदना और परिवर्तन की नई इबारत लिखेंगे।
1. आज की बैठक में क्या फैसले ले सकती हैं बहनजी?
आज (7 फरवरी 2026) लखनऊ में हो रही इस बैठक में उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों के जिलाध्यक्षों और मुख्य प्रभारियों को बुलाया गया है।
सूत्रों और मौजूदा राजनीतिक हालात के अनुसार, बहनजी निम्नलिखित बड़े फैसले ले सकती हैं:
पंचायत चुनाव 2026 की रणनीति: उत्तर प्रदेश में आगामी पंचायत चुनावों के लिए पार्टी 'बूथ स्तर' तक की तैयारी और प्रत्याशियों के चयन पर अंतिम मुहर लगा सकती है।
संगठनात्मक बदलाव: 'जिला प्रभारी' व्यवस्था में बदलाव के बाद नए सिरे से पदाधिकारियों को जिम्मेदारियां सौंपी जा सकती हैं।
सर्वसमाज को जोड़ना: हाल ही में बहनजी ने जिस तरह से 'घूसखोर पंडत' जैसे मुद्दों पर ब्राह्मण समाज और UGC नियमों पर अन्य वर्गों के हक की बात की है, उसे आगे बढ़ाने के लिए 'सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय' के फॉर्मूले पर नई गाइडलाइंस जारी हो सकती हैं।
अकेले चुनाव लड़ने का संकल्प: जैसा कि उन्होंने अपने जन्मदिन (15 जनवरी) पर स्पष्ट किया था, 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए 'एकला चलो' की रणनीति को जमीन पर उतारने का निर्देश दिया जाएगा।
2. आकाश आनंद: 403 सीटों पर रैली और रोड शो?
आकाश आनंद को लेकर पार्टी के भीतर काफी उत्साह है। हालांकि 403 सीटों का औपचारिक शेड्यूल अभी जारी नहीं हुआ है,
लेकिन संकेत मिल रहे हैं कि:
आकाश आनंद को युवाओं को जोड़ने और सोशल मीडिया पर पार्टी को आक्रामक बनाने की बड़ी जिम्मेदारी दी गई है।
मिशन 2027 के लिए वह यूपी के विभिन्न मंडलों में बड़ी रैलियों की शुरुआत कर सकते हैं।
उनका मुख्य फोकस उन सीटों पर होगा जहाँ दलित-मुस्लिम और सर्वसमाज का समीकरण बसपा के पक्ष में मजबूत है।
🟦 बहुजन समाज पार्टी की महत्वपूर्ण संगठनात्मक बैठक — लखनऊ 🟦
बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व सांसद आदरणीय बहन कु. मायावती जी कल एक विशेष बैठक को संबोधित करेंगी।
यह बैठक पार्टी संगठन की ज़मीनी तैयारियों को मज़बूत करने और पार्टी के जनाधार को बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
बैठक के मुख्य बिंदु:
समीक्षा: पार्टी संगठन द्वारा अब तक किए गए कार्यों की विस्तृत समीक्षा की जाएगी।
दिशा-निर्देश: भविष्य की रणनीतियों को लेकर माननीय बहन जी आवश्यक दिशा-निर्देश देंगी।
प्रतिभागी: बैठक में उत्तर प्रदेश स्टेट के वरिष्ठ पदाधिकारी, सभी ज़िला अध्यक्ष और विधानसभा अध्यक्ष शामिल होंगे।
मीडिया के लिए विशेष:
बैठक शुरू होने से पूर्व माननीय बहन जी मीडिया बंधुओं से रूबरू होकर अपनी बात रखेंगी।
📅 दिनांक: 07 फरवरी 2026 (शनिवार)
⏰ समय: प्रातः 11:00 बजे से
📍 स्थान: बी.एस.पी. यूपी स्टेट कार्यालय, 12 मॉल एवेन्यू, लखनऊ।
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🚨 दिल्ली में सिस्टम की लापरवाही ने ली एक और युवा की जान! 🚨
10 मिनट का सफर... जो कभी खत्म न हुआ 😢
गुरुवार रात, 25 साल के कमल ध्यानी (HDFC बैंक असिस्टेंट मैनेजर) रोहिणी से बाइक पर घर लौट रहे थे।
जनकपुरी के जोगिंदर सिंह मार्ग पर दिल्ली जल बोर्ड (DJB) की पाइपलाइन खुदाई का खुला गड्ढा उनकी मौत का काल बन गया!
❌ कोई बैरिकेडिंग नहीं
❌ कोई चेतावनी साइनबोर्ड नहीं
❌ कोई रिफ्लेक्टर नहीं
❌ कोई जिम्मेदारी नहीं!
कमल ने हेलमेट, राइडिंग जैकेट, ग्लव्स—सभी सुरक्षा नियम पाले थे।
लेकिन प्रशासन की नींद ने सब बर्बाद कर दिया। सबसे दिल दहला देने वाली बात:
भाई से कहा था—"भाई, 10 मिनट में घर पहुँच रहा हूँ!"
वो 10 मिनट... कभी पूरे न हुए। 💔
परिवार ने रातभर 6 थानों के चक्कर लगाए—जनकपुरी, विकासपुरी, सागरपुर...
अगर पुलिस-प्रशासन ने समय पर हरकत की होती, तो कमल आज जिंदा होता!
शुक्रवार सुबह 8 बजे उसी गड्ढे से मिला शव।
यह हादसा नहीं, प्रशासनिक कत्ल है!#janakpuri