भारत तरक्की कर रहा है..!
आज भुसावल से गोवा ट्रेन से यात्रा करते समय एक अनुभव हुआ..!
अचानक, मेरे दोस्त के 2 साल के बेटे को बुखार आ गया। हमारे पास कोई दवा नहीं थी, और हमारी मंज़िल, मडगांव, पहुँचने में अभी भी 7 घंटे बाकी थे। हमने सोचा कि अगले स्टेशन पर उतरकर डॉक्टर से सलाह लेंगे और फिर सड़क मार्ग से यात्रा जारी रखेंगे..!
मैंने यूँ ही ट्रेन में सामान बेचने वाले एक वेंडर से कहा..!
"हमें कुछ दवा चाहिए। क्या आप अगले स्टेशन पर इसका इंतज़ाम कर सकते हैं ? मैं आपकी मेहनत के लिए ₹500 दूँगा"
वेंडर ने जवाब दिया..!
"इसकी कोई ज़रूरत नहीं है। TTE (टिकट परीक्षक) से मिलिए; आपकी समस्या हल हो जाएगी"
हम तुरंत TTE से मिले..!
मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में किसी सरकारी कर्मचारी से इतनी तत्परता का अनुभव नहीं किया था..!
उन्होंने अपना काम रोका, तुरंत फ़ोन किया, हमारी सीट नंबर और बीमारी की स्थिति नोट की, और हमें अपनी सीट पर वापस जाने के लिए कहा..!*
सच कहूँ तो, हमें ज़्यादा उम्मीद नहीं थी। हमने पहले ही तय कर लिया था कि अगर ज़रूरत पड़ी तो हम अगले स्टेशन पर उतरकर बच्चे को डॉक्टर के पास ले जाएँगे..!
हमने सोचा था कि शायद कोई कागज़ में लिपटी कुछ गोलियाँ ही लाएगा..!
लेकिन ठीक अगले स्टेशन पर, एक डॉक्टर अपने असिस्टेंट के साथ हमारी सीट पर आए। TTE भी वहाँ मौजूद थे। बच्चे की जाँच करने के बाद, डॉक्टर ने तुरंत अपने असिस्टेंट को हमें सिरप की कुछ बोतलें देने का निर्देश दिया। उन्होंने दवा देने का तरीका समझाया और फिर TTE से पैंट्री से थोड़ा नमक मँगवाने को कहा..!
TTE ने तुरंत एक और फ़ोन कॉल किया। डॉक्टर ने हमें बच्चे के माथे पर नमक के पानी में भीगा हुआ कपड़ा रखने की सलाह दी और चले गए..!
जब हमने आवाज़ देकर पूछा कि हमें कितने पैसे देने हैं, तो हमें बताया गया कि यह सब पूरी तरह से मुफ़्त था..!
हम अभी भी हैरान और चकित थे कि जब तक हम अपनी सीट पर वापस पहुँचे, पैंट्री का एक कर्मचारी नमक लेकर आ गया..!
मेरा देश सचमुच बेहतर के लिए बदल रहा है..!
इतनी सारी आलोचनाओं का हम क्या करें..!
क्या उन्हें पेट्रोल के साथ पी जाएँ..!
मीडिया या अख़बारों में अक्सर ऐसे सकारात्मक बदलावों को उजागर नहीं किया जाता है..!
बदलाव हो रहा है। हमें भी इन अनुभवों को अपने रिश्तेदारों और दोस्तों के साथ साझा करना चाहिए..!
इसमें समय लगेगा, लेकिन हम उस बदलाव को देख और महसूस कर रहे हैं जो हो रहा है..!
राष्ट्रहित सर्वोपरि..
🪷 🇮🇳 🙏 🇮🇳 🪷🇮🇳
1894 में अंग्रेजों ने हर बड़े शहर के सबसे पॉश इलाकों में चर्च को 99 साल की लीज़ पर जमीन दी थी।
1993 में वो लीज़ एक्सपायर्ड हो चुकी हैं और कानूनन ज़मीन अब सरकार की सम्पत्ति फिर भी किसी चर्च से ज़मीन वापस नहीं ली गयी ना चर्च ने लौटाई।
सुप्रीमकोर्ट साइलेंट ?
सरकार साइलेंट विपक्ष साइलेंट ?
"उस दौर में कोई स्टेशन पे परिवार चलाने को जूठी चाय के गिलास उठाता था
और कोई इटली में अपनी दोनों टां.. ग"...!
अब चमचे बोलेंगे अपनी मां का अपमान नहीं सहेंगे , मत सहो , भाड़ में जाओ😁
- ऋषि सुनक एक चुनाव हारे और करियर खत्म
- जस्टिन ट्रूडो की वजह से पार्टी पर आँच आयी और वे भी बाहर हो गए…
- एड मिलिबेंड जैसे नेता का भी करियर स्वाहा हो गया।
ब्रिटेन और कनाडा के उदाहरण छोड़ दीजिये भारत मे
- नरसिम्हाराव
- सीताराम केसरी
- स्वयं आडवाणी जी भी इसके इसके उदाहरण हैं, उनके नेतृत्व में जब पार्टी हारी या कमजोर हुई, इन नेताओं ने इसकी जिम्मेदारी लेकर नेपथ्य चुना।
लेकिन इसी लोकतंत्र के इतिहास मे पहला और शायद आखिरी नेता भी जन्मा है जिसके लिए पराजय का आकाश अनंत है।
राहुल गाँधी की हर पराजय पहले वाली की तुलना मे तीव्र होती है मगर उतनी ही तीव्रता से उसे ढाल दी जाती है।
आपको शायद हँसी आये मगर ये विषय मज़ाक का है ही नहीं, ये सीधे हम सभी से जुडा है…
जनहित के सैकड़ो मुद्दे जो सत्ता प्रतिष्ठान से छूट जाते हैं उन्हें पूछने वाला आज कोई विपक्ष ही नहीं है।
यदि ये पोस्ट दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, अशोक गहलोत या DK शिवकुमार जैसे कांग्रेसी पढ़ रहे हो और आपके बुजुर्ग हाथ पैरो मे थोड़ी बहुत जान बची है तो कमान ले लो भाई।
आपका ये “पाड़ा” 56 का हो गया उसे बधाई दो लेकिन अब बाड़े मे बाँध दो और एक अच्छे विपक्ष का पुनः गठन कर लो…
99 इलेक्शन हारने के बाद #राहुल_गांधी
काश उस रात उसके बाप ने कंडोम पहन लिया होता तो देश आज ज्यादा सुरक्षित और आगे होता
अपनी अय्याशी के चक्कर मे सूरा सुंदरी उठा लाया और देश को संकट में डलवा दिया 😡
अमेरिका में एक नशेड़ी पकड़ा गया था, उसकी इटली वाली मम्मी तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल जी के पैर पकड़ के रोई तब अटल जी ने अमेरिका के राष्ट्रपति से बात की और वो नशेड़ी किसी तरह बचकर भारत वापस आया, ऐसे होनहार बालक को कुछ लफ़ंगे देश का प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं...क्या ज़माना आ गया है !