Dear @Bata_India, I paid for shoes for my wife after your store assured me they would be delivered once the color was available. Instead, my order was cancelled after 3 days. It's been over a month, and I'm still waiting for my refund despite multiple emails and customer care cal
My Jaipuri razai and an expensive shirt worth around ₹17,000 were burned in an EV fire while in DhobiLite’s care. Despite several emails and calls, I am still waiting for a proper response. Absolutely pathetic service by @dhobilite. Very disappointing.
@swiggycares Promised: 25 mins
Delivered: 1+ hour ⏳👏
Called customer care—got a lazy “sorry” and was forced to take it. 🤦♂️
You charge for Swiggyoneblck + handling but can’t deliver on time.
Goodbye Swiggy, hello #Zomato 🚪👋
इंटरव्यू के पाँच तत्व- सत्य, साहस, सहजता, सार्थक और सरोकार. इसी 'पंचतत्व' से बना है TV9 Bharatvarsh का सुपरहिट शो- &5. अब ये शो थोड़ा और दमदार, चमकदार होने वाला है. हम जल्द ही शो के नए सीजन में प्रवेश करने वाले हैं. नई कसावट, सजावट और तरावट के साथ.
Please track this vehicle... People in the vehicle are continuously misbehaving.. driver having iron rod. A few minutes earlier the vehicle is spotted near the gaur chauk .... Greater Noida West... Please check @noidapolice@Noidatraffic
काला-पानी का बदनाम कैदी
ये कहानी दूधनाथ तिवारी की है । काला पानी के शुरुआती कैदियों में से एक । एक तरह से अंडमान में सावरकर के 54 साल सीनियर कैदी । 1857 की बगावत के आरोपी । दूधनाथ, बंगाल नेटिव इन्फ्रैंटी के सिपाही हुआ करते थे । विद्रोह किया तो अंग्रेजों ने अंडमान भेज दिया । दूधनाथ के साथ तमाम बगावती कैदी भी भेजे गए । उस वक्त कैदियों को अंडमान के रॉस आईलैंड में रखा जाता था । क्योंकि अबतक पोर्ट ब्लेयर की सेल्युलर जेल नहीं बनी थी । ये 1890 में बननी शुरु हुई और 1906 में बनकर तैयार हुई । रॉस आईलैंड में कैदियों के साथ बेहद अमानवीय व्यवहार किया जाता था । जितना सावरकर की कहानियों में सुना उससे भी कहीं ज्यादा था । जैसे, जंगल काटना, पगडंडियां बनाना कुल मिलाकर अंग्रेज कैदियों को जानवरों की तरह इस्तेमाल कर रहे थे ।
राजद्रोह के आरोपी दूधनाथ तिवारी 6 अप्रैल 1858 को अंडमान पहुंचे । करीब 17 दिन तक जानवरों की तरह अंग्रेजों के लिए काम किया । और फिर 23 अप्रैल 1858 को करीब 90 कैदियों के साथ जेल से भाग गए । समंदर के बीच भागकर कहां जाते, तो जंगल में ही छिप गए । लेकिन खतरा सिर्फ अंग्रेजों से नहीं था, खतरा अंडमान के आदिवासियों से भी था । कई कैदी तो आदिवासियों का शिकार भी हो गए , कुछ भूख-प्यास से मर गए और कुछ वापस अंग्रेजों की शरण में लौट गए । दूधनाथ तिवारी पर भी आदिवासियों ने हमला किया । बहुत गंभीर चोट आईं लेकिन किसी तरह जान बचाकर जंगल में ही छिपे रहे । दूधनाथ का अगला सामना जंगल से गुजरती कुछ महिला आदिवासियों से हुआ । उन्होंने हमला करने के लिए हथियार उठाए ही थे कि दूधनाथ किसी तरह हाथ-पांव जोड़कर माफी की मुद्रा में आ गए । अमूमन ऐसा होता नहीं था फिर भी आदिवासियों को तरस आ गया और दूधनाथ को अपनी बस्ती में ले गए ।
आदिवासियों को दूधनाथ पर भरोसा नहीं था, लेकिन फिर भी उसका पूरा उपचार किया गया । वक्त के साथ दूधनाथ तिवारी ने आदिवासियों से घुलने मिलने की पूरी कोशिश की । कुछ दिनों में वो कोशिश कामयाब भी होने लगी । दूधनाथ ने आदिवासियों के तौर-तरीके सीखे । उनकी भाषा सीखी , रिवाज सीखे , खान-पान सीखा । धीरे-धीरे भरोसा इतना बढ़ गया कि आदिवासियों के मुखिया ने दूधनाथ के साथ एक आदिवासी लड़की की शादी करवा दी । हालांकि बाद में दूधनाथ ने एक और आदिवासी से शादी की । यानी दो शादियां ।
इस बीच आदिवासियों और अंग्रेजों के बीच तकरार बढ़ने लगी । अंग्रेज जंगल पर कब्जा करते जा रहे थे और आदिवासी अंग्रेजों के साथ एक बड़ी लड़ाई की तैयारी कर रहे थे । दूधनाथ ने आग में घी का काम किया । आदिवासियों में अंग्रेजों के खिलाफ भड़की चिंगारी को शोला बना दिया । एक तरह से उन्हें लड़ाई के लिए मोटिवेट किया । आदिवासी क्या करने वाले हैं, कैसे करने वाले हैं दूधनाथ तिवारी को सब पता था । लेकिन इससे पहले कि आदिवासी हमला करते, दूधनाथ के दिमाग में नया प्लान आया । अपनी रिहाई का आइडिया । उसने आदिवासियों का प्लान अंग्रेजों को लीक कर दिया और बदले में अंग्रेजों से अपनी रिहाई मांग ली । 17 मई 1859 को आदिवासियों ने अंग्रेजों की खिलाफ लड़ाई छेड़ दी । इतिहास की किताबों में इसे ‘एबरडीन युद्ध’ कहा गया । इस लड़ाई में आदिवासियों की बड़ी हार हुई, सैकड़ों आदिवासी मारे गए । अंग्रेजों का गद्दार अब वफादार बन चुका था और आदिवासियों का वफादार अब गद्दार था । 5 अक्टूबर 1860 को दूधनाथ तिवारी को अंडमान से रिहा कर दिया गया । दूधनाथ अपनी पत्नियों को उसी जंगल में छोड़कर मेन-लैंड इंडिया में चला गया और कभी वापस लौटकर नहीं आया
#नोएडा के एक छोटे चैनल में मामूली सैलरी पर कैमरामैन रहे राजेश तिवारी की जॉब 1 जुलाई को चली गई। उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। सदमे से बीमार पड़े और हार्ट अटैक से मौत हो गई। आपकी छोटी सी सहयोग राशि तिवारी जी के परिवार को बड़ी मदद पहुंचा सकती है। एकाउंट का ब्यौरा अटैच है।