"ਸ੍ਰੀ ਠਾਕੁਰ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਜੀ ਵਲੋਂ ਚੋਂਦੀਆਂ ਛੱਤਾਂ ਉੱ���ਰ ਤਰਪਾਲ ਪਾਕੇ ਸੇਵਾ ਕੀਤੀ ਗਈ।"
With the divine inspiration of Sri Satguru Dalip Singh Ji, Namdhari volunteers extended relief services to flood-affected families. Temporary tarpaulin coverings were placed on damaged rooftops to protect homes from rain and provide immediate shelter. This humble act of service reflects the spirit of humanity, compassion, and selfless dedication taught by Satguru Ji.
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Namdhari sikh faction steps up to preserve the fading legacy of Bhagat Panthi Sikhs.
AMRITSAR: To reclaim the fading legacy of the
lesser-known Bhagat Panthi sect of Sikhs, who once flourished in the Sindh province of Pakistan but are now on the brink of extinction due to relentless persecution, a faction of the Namdhari sect of Sikhs has announced their support aiming to breathe new life into the endangered sect so they can preserve their identity, rich traditions, and spiritual essence. Thakur Dalip Singh, the chief of a faction Namdhari Sikh sects, said, "The Bhagat Panthi sect once thrived in the Sindh region of Bharat (undivided India), but today, only a handful of its members remain due to various challenges.
There is an urgent need to safeguard the sect from disappearing."
Ranjeet Singh, a former Member of Parliament from Pakistan's Khyber Pakhtunkhwa, representing Jamiat Ulema-e-Islam (F), informed that the Bhagat Panthi sect is also referred to as 'Mona Sikhs' in the region.
He said that their population is now primarily concentrated in cities such as Dera Ismail Khan, Bannu, and Kohat.
"There are around 150 to 200 families of Bhagat Panthis in Jogia Wala Mohalla of Dera Ismail Khan. They practice both Sikhism and Hinduism, recite Japji Sahib, and maintain the parkash of the Geeta in the Jogi Wala Temple, while also paying obeisance to Sri Guru Granth Sahib," he added.
The majority of Bhagat Panthis are now shorn and continue to practice their traditions.
They do not perform the "shradh" rituals for the deceased, and they reject the concept of untouchability. However, over time, they faced persecution, which led many of them to either convert to Islam, embrace Hinduism, or migrate to the Punjab province of Pakistan, where there is a significant Sikh population, or to India.
Despite these challenges, they managed to retain certain elements of their cultural and spiritual practices. Dalip Singh said that they held a meeting with senior members of their sect to discuss the decline of various Sikh sects, particularly those that once flourished in Pakistan. "Regarding the Bhagat Panthis, we are considering sending a delegation to Pakistan to visit areas such as Dera Ismail Khan, Bannu, and Kohat, where a significant population of Bhagat Panthis once resided, but there is no trace of them left today," he said.
Extending their support to the Bhagat Panthis, Dalip Singh said that their goal is not to impose keeping hair or initiation upon them, but to ensure that the Bhagat Panth continues to thrive and follow the traditions they have upheld for generations, rather than disappearing. He said that while 'kesadhari' (with hair) Sikhs number approximately 2.5 crore worldwide, the followers of Guru Nanak (whether turbaned or not) number over 50 crore globally. A Sikh leader from Khyber Pakhtunkhwa, Sant Singh Kumar, said that the Bhagat Panthis celebrate both Gurpurabs as well as festivals like Holi, Diwali, and other cultural occasions, and now identify themselves as 'Mona Sikhs.'
He said that since they live in terrorist-infested areas which are in close proximity to Afghanistan, many of them embraced other religions, including Islam, Hinduism, and Christianity, for safety and survival. Kumar also praised the efforts announced by a Dalip Singh- led faction of the Namdhari sect, aimed at supporting the Bhagat Panthis and preventing their disappearance.
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हिंदू भाइयो! धर्म परिवर्तन के लिए ईसाइयों को दोष मत दीजिए।
“हिन्दू धर्म सर्व प्राचीन है। परंतु, सर्व प्राचीन होते हुए भी, हिन्दू धर्म अपनी जन्म भूमि भारत में ही समाप्त होता जा रहा है। हिन्दू धर्म की ऐसी दशा का कारण: केवल हिन्दू आगुओं की संकीर्ण व नकारात्मक सोच है, जिन्होंने कभी अपने धर्म को प्रफुलित करने का सोचा ही नहीं। यदि कोई विदेशी धर्मों वाले हिन्दू धर्म में शामिल होना भी चाहते थे, तो हिन्दू धर्म-आचार्यों ने उन्हें अपने धर्म में शामिल करने से मना कर दिया।
1320 ई. में लद्दाख के राजा रिनचिन को हिन्दू धर्म-आचार्य देवस्वामी ने दीक्षा देने से मना कर दिया। उसे पीर बुलबुल शाह ने मुसलमान बना लिया। राजा ��िनचिन ने इस्लाम ग्रहण करते ही पूरा कश्मीर मुसलमान बना दिया। कुछ समय उपरांत, कश्मीर के मुसलमानों ने महाराजा गुलाब सिंह की शरण में, पुनः हिन्दू बनने की प्रार्थना की। उस समय के धर्म आचार्यों ने मुसलमान बन चुके हिंदुओं को, वापिस हिन्दू बनाने से इनकार कर दिया। ऐसी संकीर्ण नकारात्मक सोच कारण ही; हिन्दू धर्म प्रफुलित होने की बजाय सिकुड़ गया है”।
“हिन्दू भाइयो! आत्म-विश्लेषण कीजिए। भारत में धर्�� परिवर्तन करके, अपना धर्म फैलाने में ईसाइयों का कोई दोष नहीं है; दोष आपका है। आज ईसाइयों के 108 देश हैं और आप हिंदुओं का तो भारत भी “अपना” नहीं रहा। आप कहते हैं “ईसाई छल-कपट, लालच, पाखंड व हिंसा करके धर्म परिवर्तन कर रहे हैं”। अपना धर्म प्रफुलित करने हेतु, ईसाई जो भी कार्य कर रहे हैं; धर्म प्रफुलित करने के तो वही ढंग हैं। ऐसे ढंगों से ही मानव जाति ने प्रगति की है तथा पृथ्वी पर राज कर रही है।
आप ही वि��ार कीजिए: हिंसा, छल-कपट, लालच आदि किए बिना प्रगति कैसे हो सकती है? यदि हो सकती होती, तो आप “हिंदुओं” ने प्रगति क्यों नहीं कर ली? हिन्दू धर्म: सर्व-प्राचीन होते हुए भी, अपनी नैतिकता और संकीर्ण सोच के कारण सिकुड़ता रहा है। और ईसाई: नैतिकता के बंधनों से मुक्त होकर, अपनी प्रगतिशील सोच के कारण पूरे विश्व में छा गए हैं।
हिन्दू भाइयो! आप तो अपनी नैतिकता का छुनछुना लेकर, भारत में ही समाप्त होते जा रहे हो। आप हिंदुओं ने, अपना धर्म क्यों नहीं फैलाया? या, आप ने ईसाइयों के देशों में जा कर, ईसाइयों का धर्म-परिवर्तन क्यों नहीं कर लिया? "बुद्ध धर्म" आज 10 देशों में फैला हुआ है; क्योंकि उन की सोच अपना धर्म फैलाने की थी। परंतु, आप हिंदुओं की तो सोच ही घटने की है। आश्चर्य है, आप ईसाइयों को दोष दे रहे हैं! क्यों? यदि बुद्ध धर्म 10 देशों में फैल सकता था; तो हिन्दू धर्म क्यों नहीं फैल सकता था?
भारत में हो रहे धर्म परिव���्तन में दोष: ईसाईयों का नहीं, आप का है। यदि अपना धर्म प्रफुलित करना है; तो धर्म प्रफुलित करने वाले ईसाईयों जैसे, या उन से भी बढ़िया कार्य आप भी कीजिए। जैसे: छल-कपट, हिंसा आदि कार्य, भगवान श्री कृष्ण चंद्र जी ने महाभारत में करके, लक्ष्य-प्राप्ति की थी। उसी कृष्ण जी के उपासक होते हुए; आप भी धर्म प्रफुलित करने के लक्ष्य को महान मानकर, आवश्यकता अनुसार नैतिक-अनैतिक सभी प्रकार के कार्य कीजिए।
अभी तक तो आप का लक्ष्य, नैतिकता के नियमों को दृढ़ करना रहा है; अपने हिन्दू धर्म को जीवित रखना व प्रफुलित करना तो आपने लक्ष्य बनाया ही नहीं। आप को यह निश्चय कर लेना चाहिए कि लक्ष्य-प्राप्ति महान है। और, लक्ष्य-प्राप्ति के लिए, हर नैतिक-अनैतिक कार्य करना योग्य है।
कृपया! विचारवान बन कर, ईसाईयों की गलती निकालनी बंद कीजिए। अपनी संकीर्ण सोच को विशाल सोच में परिवर्तित करके, हिन्दू धर्म को प्रफुलित कीजिए। ��म नामधारी सिख आप के साथ हैं”।
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कुंभ स्नान का वास्तविक महत्व
कुंभ स्नान केवल पवित्र नदियों में स्नान करने तक सीमित नहीं है; इसका असली महत्व आत्मिक शुद्धि और आध्यात्मिक जागरूकता से जुड़ा है। जो व्यक्ति कुंभ समय गंगा स्नान के दौरान अपने पूर्व में किए गए पाप कर्मों का पश्चाताप करता है, उन्हें छोड़��े का संकल्प लेता है, और भविष्य में शुभ कर्म करने का दृढ़ निश्चय करता है—वही वास्तव में गंगा स्नान का सच्चा लाभ प्राप्त करता है।
संत-महात्माओं के दर्शन और उपदेश
कुंभ मेले में संत-महात्माओं, साधु-संतों एवं गुरुओं का सान्निध्य प्राप्त करना एक और महत्वपूर्ण पक्ष है। उनके उपदेशों को सुन कर, ग्रहण कर, और जीवन में उतार कर ही सच्ची आध्यात्मिक उन्नति संभव होती है। केवल बाहरी स्नान से आत्मिक शुद्ध��� संभव नहीं है, बल्कि बुरी आदतों को त्यागकर, शुभ कर्मों को अपनाकर, और धर्म के मार्ग पर चल कर ही मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
क्या केवल स्नान से मोक्ष संभव है?
यदि मात्र गंगा स्नान से मोक्ष संभव होता, तो मेंढक, मछली आदि जलचर जीव, जो निरंतर गंगा जी में रहते हैं, सब से पहले मोक्ष प्राप्त कर लेते। इस संदर्भ में गुरुबाणी में लिखा गया है:
जल के मजन जे गति होवै, नित नित मेंढक नावै। जैसे मेंढ�� तैसे ओइ न��, फिर फिर जोनी आवै।
अर्थात्, यदि केवल जल में स्नान करना ही मोक्ष का साधन होता, तो मेंढक, जो सदैव जल में रहते हैं, सब से पहले वही मुक्त हो जाते। सतगुरु अमर दास जी ने भी लिखा है:
"मन मैले सब कुछ मैला, तन धोते मन अच्छा ना होए"।
मोक्ष प्राप्ति के लिए केवल बाहरी स्नान पर्याप्त नहीं; उसके लिए आत्मिक शुद्धि अनिवार्य है।
मोक्ष प्राप्ति का सच्चा मार्ग
मोक्ष की प्राप्ति के लिए मन के विकारों को दूर करना आ��श्यक है। तीर्थों में स्नान से शारीरिक रोगों का निवारण हो सकता है, लेकिन मन के रोग—जैसे: बुरा बोलना, हर समय किसी की बुराई करनी, हर समय किसी के अवगुण देखने, अहंकार, लालच, ईर्ष्या, क्रोध आदि, केवल जल में स्नान करने से दूर नहीं हो सकते। इन मानसिक विकारों को समाप्त करने के लिए गुरु के उपदेशों को अपनाना, साधु-संतों के मार्गदर्शन में रहना, और शुभ कर्मों को अपनाना अति आवश्यक है।
कुंभ स्नान और आंतरिक शुद��धि
जो लोग कुंभ स्नान को केवल एक परंपरा या उत्सव मानते हैं, मन में छल-कपट रखते हैं, स्नान करके अहंकार करते हैं, दिखावे के लिए स्नान करते हैं, और अपने ��र्मों में कोई परिवर्तन नहीं लाते—उनके लिए यह स्नान मात्र एक औपचारिकता रह जाता है। जो लोग मन में किसी भी प्रकार की बुराई रखकर कुंभ स्नान करते हैं, मन में बुराई होने के कारण उन को दो गुना होकर पाप लगता है। सतगुरु नानक देव जी ने लिखा है:
नावण चले तीरथीं, मन खोटे तनु चोर। एक भउ लथी नातियां, दुइ भौ चड़ीअस होर।
कुंभ स्नान का वास्तविक उद्देश्य आत्मशुद्धि, गुरुजनों के उपदेशों का पालन, तथा जीवन में ध��्म और सद्गुणों को स्थापित करना है। मन के विकारों से मुक्ति केवल सत्संग, गुरु धारण करने, उनके उपदेशों को अपनाने और जीवन में धर्म का अनुसरण करने से संभव है। यही सच्चा कुंभ स्नान है और यही मोक्ष प्राप्ति का वास्तविक मार्ग है।
जो लोग केवल बाहरी दिखावे के लिए, अहंकारवश, या मात्र मेले का आनंद लेने के लिए कुंभ स्नान करते हैं, लेकिन अपने आचरण में कोई सुधार नहीं करते, वे मोक्ष के अधिकारी नहीं हो सकते। ��ास्तविक कुंभ स्नान तभी सार्थक होता है जब व्यक्ति आत्मविश्लेषण करे, अपने दोषों को पहचाने, सच्ची श्रद्धा से स्नान करे, और संत-महापुरु��ों के उपदेशों को जीवन में धारण करे।
#कुंभ #KumbhMela2025 #BamBam
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भारत की राष्ट्र-भाषा “हिन्दी” नहीं; “भारतीय” होनी चाहिए।
हम “हिन्दू” नहीं, “सनातनी हैं, “हिन्दुस्तानी” नहीं, “भारतीय” हैं; तो फिर हमारी राष्ट्र-भाषा भी “हिन्दी” नहीं कहलानी चाहिए। जिस प्रकार, इंग���लैंड की राष्ट्र-भाषा का नाम ‘इंग्लिश’ है; इसी प्रकार से भारत की राष्ट्र-भाषा का नाम भी “भारतीय” होना चाहिए।
भारत वासियो! यह सर्वमान्य सत्य है कि भारत के प्राचीन पंथ/धर्म का नाम "सनातन" है: "हिंदू" नहीं। इसी प्रकार से, हमारे देश का प्राचीन नाम "भारत" है: "हिंद" या “हिंदुस्तान” नहीं।
हमारे पंथ को "हिंदू" नाम तथा हमारे देश को "हिंदुस्तान" नाम: विदेशी आक्रांताओं, आक्रमणकारियों ने दिए थे। विदेशी ��क्रांताओं का लंबे समय तक भारत पर शासन होने के कारण; यह दोनों नाम प्रचलित हो कर प्रसिद्ध हो गए और हम भारतवासियों ने भी, इन दोनों नामों को सही समझ कर, इन का उपयोग करना आरंभ कर दिया; जो कि पराधीनता (गुलामी) का चिन्ह है। इस लिए, राष्ट्र-भाषा को “हिन्दी” कहना: अयोग्य है।
यदि हम “हिंदू” नहीं: “सनातनी” हैं, हम “हिंदुस्तानी” नहीं: “भारतीय” है; तो हमारी राष्ट्र-भाषा भी "हिंदी" नहीं कहला सकती। हमारी भारतीयों की राष्ट्र-भाषा का नाम तो "भारतीय" ही होना चाहिए। जिस प्रकार, जापान की राष्ट्र-भाषा का नाम ‘जापानी’, रूस की राष्ट्र-भाषा का नाम ‘रूसी’ है तथा ��रब की राष्ट्र-भाषा का नाम ‘अरबी’ है; इसी प्रकार से भारत की राष्ट्र-भाषा का नाम भी ‘भारतीय’ होना चाहिए।
“हिंदी” भाषा तो हिंदुस्तानियों की हो सकती है, भारतीयों की नहीं।
जब हमारे देश का मूल वास्तविक नाम ‘हिंदुस्तान’ ही नहीं: तो हम भी ‘हिन्दुस्तानी’ नहीं; हम तो भारतीय हैं। जिस प्रकार विदेशियों ने हमें “हिंदू” और हमारे देश को “हिंदुस्तान” नाम दे दिया, उसी प्रकार से उन्होंने हमारी भाषा को भी “हिंदी” नाम दे दिया। विदेशी आक्रांताओं ने हमें, जो भी गलत नाम दिए (भारतवासियों में स्वाभिमान न होने के कारण), हम ने उन गलत नामों को ही स्वीकार कर लिया।
आज हम भारतीय स्वतंत्र हैं। इस कारण, हमें विदेशियों के दिए हुए इन नामों को त्यागना चाहिए। सभी भारतीयों को मिल कर, एक नई “भारतीय” भाषा बना लेनी चाहिए, जिस में भारत से उपजी, भारतीय मूल की सभी भाषाओं के शब्द सम्मिलित हों।
(“भारतीय मूल की भाषा” का अर्��� है: जिन भाषाओं की शब्दावली तथा लिपि, भारत से उपजी हो; जैसे: संस्कृत, तमिल, तेलुगु, उड़िया आदि।) सभी भारतीय भाषाओं के अधिकतर शब्द, पहले ही आपस में मिलते हैं जैसे: दया, धर्म, करुणा, गुरु, नगर, शास्त्र आदि। इस कारण, ��भी भारतीय भाषाओं के शब्द मिला कर, एक नई भाषा बनाने में कोई समस्या नहीं हो सकती; अपितु, भाषा की अधिकतर समस्याओं का समाधान हो जाएगा। केंद्र सरकार को, उसी नई भाषा को ‘भारतीय’ नाम दे कर; राष्ट्र-भाषा घोषित कर देना चाहिए। अभी तो भारत सरकार के सभी केन्द्रीय सचिवालय तथा न्यायालयों में, प्रत्येक कार्यों में अंग्रेजी का उपयोग होता है।
जब सभी प्रांतों में तथा जनता में नई “भारतीय” भाषा प्रमाणित स्वीक���रित हो जाएगी, तो अंग्रेजी की बजाय “भारतीय” भाषा का प्रयोग आरंभ हो जाएगा और हम गुलामी के चिन्ह ‘अंग्रेजी’ से छुटकारा पा सकेंगे।
ऐसा करने से, दक्षिण प्रांतों की तमिल, कन्नड़ आदि कुछ भाषाओं के जो हिंदी के साथ झगड़े हैं; वह भी पूर्ण रूप से समाप्त हो जाएंगे। क्योंकि, उन की भाषाओं के शब्द भी, नई भाषा में सम्मिलित हो कर, “भारतीय” भाषा का अटूट अंग बन जाएंगे।
“भारत” देश, "भारतीय" भाषा: यह दोनों नाम उपयोग कर के, भारतीयों में आत्म सम्मान आएगा और एकता होगी। एकता से ही भारत की उन्नति होगी। इस प्रकार से, सभी भारतीय भाषाओं के शब्द मिला कर बनी नई “भारतीय” भाषा; राष्ट्र की उन्नति में अत्यंत स��ायक होगी। इस लिए, भारत को नई "भारतीय" भाषा बना कर, अपना लेनी चाहिए। नई "भारतीय" भाषा का बना कर अपना लेना; भारत को "विश्व गुरु" बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कार्य होगा।
जय भारत।
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भारत की राष्ट्र-भाषा “हिन्दी” नहीं; “भारतीय” होनी चाहिए।
हम “हिन्दू” नहीं, “सनातनी हैं, “हिन्दुस्तानी” नहीं, “भारतीय” हैं; तो फिर हमारी राष्ट्र-भाषा भी “हिन्दी” नहीं कहलानी चाहिए। जिस प्रकार, इंग���लैंड की राष्ट्र-भाषा का नाम ‘इंग्लिश’ है; इसी प्रकार से भारत की राष्ट्र-भाषा का नाम भी “भारतीय” होना चाहिए।
भारत वासियो! यह सर्वमान्य सत्य है कि भारत के प्राचीन पंथ/धर्म का नाम "सनातन" है: "हिंदू" नहीं। इसी प्रकार से, हमारे देश का प्राचीन नाम "भारत" है: "हिंद" या “हिंदुस्तान” नहीं।
हमारे पंथ को "हिंदू" नाम तथा हमारे देश को "हिंदुस्तान" नाम: विदेशी आक्रांताओं, आक्रमणकारियों ने दिए थे। विदेशी ��क्रांताओं का लंबे समय तक भारत पर शासन होने के कारण; यह दोनों नाम प्रचलित हो कर प्रसिद्ध हो गए और हम भारतवासियों ने भी, इन दोनों नामों को सही समझ कर, इन का उपयोग करना आरंभ कर दिया; जो कि पराधीनता (गुलामी) का चिन्ह है। इस लिए, राष्ट्र-भाषा को “हिन्दी” कहना: अयोग्य है।
यदि हम “हिंदू” नहीं: “सनातनी” हैं, हम “हिंदुस्तानी” नहीं: “भारतीय” है; तो हमारी राष्ट्र-भाषा भी "हिंदी" नहीं कहला सकती। हमारी भारतीयों की राष्ट्र-भाषा का नाम तो "भारतीय" ही होना चाहिए। जिस प्रकार, जापान की राष्ट्र-भाषा का नाम ‘जापानी’, रूस की राष्ट्र-भाषा का नाम ‘रूसी’ है तथा ��रब की राष्ट्र-भाषा का नाम ‘अरबी’ है; इसी प्रकार से भारत की राष्ट्र-भाषा का नाम भी ‘भारतीय’ होना चाहिए।
“हिंदी” भाषा तो हिंदुस्तानियों की हो सकती है, भारतीयों की नहीं।
जब हमारे देश का मूल वास्तविक नाम ‘हिंदुस्तान’ ही नहीं: तो हम भी ‘हिन्दुस्तानी’ नहीं; हम तो भारतीय हैं। जिस प्रकार विदेशियों ने हमें “हिंदू” और हमारे देश को “हिंदुस्तान” नाम दे दिया, उसी प्रकार से उन्होंने हमारी भाषा को भी “हिंदी” नाम दे दिया। विदेशी आक्रांताओं ने हमें, जो भी गलत नाम दिए (भारतवासियों में स्वाभिमान न होने के कारण), हम ने उन गलत नामों को ही स्वीकार कर लिया।
आज हम भारतीय स्वतंत्र हैं। इस कारण, हमें विदेशियों के दिए हुए इन नामों को त्यागना चाहिए। सभी भारतीयों को मिल कर, एक नई “भारतीय” भाषा बना लेनी चाहिए, जिस में भारत से उपजी, भारतीय मूल की सभी भाषाओं के शब्द सम्मिलित हों।
(“भारतीय मूल की भाषा” का अर्��� है: जिन भाषाओं की शब्दावली तथा लिपि, भारत से उपजी हो; जैसे: संस्कृत, तमिल, तेलुगु, उड़िया आदि।) सभी भारतीय भाषाओं के अधिकतर शब्द, पहले ही आपस में मिलते हैं जैसे: दया, धर्म, करुणा, गुरु, नगर, शास्त्र आदि। इस कारण, ��भी भारतीय भाषाओं के शब्द मिला कर, एक नई भाषा बनाने में कोई समस्या नहीं हो सकती; अपितु, भाषा की अधिकतर समस्याओं का समाधान हो जाएगा। केंद्र सरकार को, उसी नई भाषा को ‘भारतीय’ नाम दे कर; राष्ट्र-भाषा घोषित कर देना चाहिए। अभी तो भारत सरकार के सभी केन्द्रीय सचिवालय तथा न्यायालयों में, प्रत्येक कार्यों में अंग्रेजी का उपयोग होता है।
जब सभी प्रांतों में तथा जनता में नई “भारतीय” भाषा प्रमाणित स्वीक���रित हो जाएगी, तो अंग्रेजी की बजाय “भारतीय” भाषा का प्रयोग आरंभ हो जाएगा और हम गुलामी के चिन्ह ‘अंग्रेजी’ से छुटकारा पा सकेंगे।
ऐसा करने से, दक्षिण प्रांतों की तमिल, कन्नड़ आदि कुछ भाषाओं के जो हिंदी के साथ झगड़े हैं; वह भी पूर्ण रूप से समाप्त हो जाएंगे। क्योंकि, उन की भाषाओं के शब्द भी, नई भाषा में सम्मिलित हो कर, “भारतीय” भाषा का अटूट अंग बन जाएंगे।
“भारत” देश, "भारतीय" भाषा: यह दोनों नाम उपयोग कर के, भारतीयों में आत्म सम्मान आएगा और एकता होगी। एकता से ही भारत की उन्नति होगी। इस प्रकार से, सभी भारतीय भाषाओं के शब्द मिला कर बनी नई “भारतीय” भाषा; राष्ट्र की उन्नति में अत्यंत स��ायक होगी। इस लिए, भारत को नई "भारतीय" भाषा बना कर, अपना लेनी चाहिए। नई "भारतीय" भाषा का बना कर अपना लेना; भारत को "विश्व गुरु" बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कार्य होगा।
जय भारत।
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भारत की राष्ट्र-भाषा “हिन्दी” नहीं; “भारतीय” होनी चाहिए।
हम “हिन्दू” नहीं, “सनातनी हैं, “हिन्दुस्तानी” नहीं, “भारतीय” हैं; तो फिर हमारी राष्ट्र-भाषा भी “हिन्दी” नहीं कहलानी चाहिए। जिस प्रकार, इंग���लैंड की राष्ट्र-भाषा का नाम ‘इंग्लिश’ है; इसी प्रकार से भारत की राष्ट्र-भाषा का नाम भी “भारतीय” होना चाहिए।
भारत वासियो! यह सर्वमान्य सत्य है कि भारत के प्राचीन पंथ/धर्म का नाम "सनातन" है: "हिंदू" नहीं। इसी प्रकार से, हमारे देश का प्राचीन नाम "भारत" है: "हिंद" या “हिंदुस्तान” नहीं।
हमारे पंथ को "हिंदू" नाम तथा हमारे देश को "हिंदुस्तान" नाम: विदेशी आक्रांताओं, आक्रमणकारियों ने दिए थे। विदेशी ��क्रांताओं का लंबे समय तक भारत पर शासन होने के कारण; यह दोनों नाम प्रचलित हो कर प्रसिद्ध हो गए और हम भारतवासियों ने भी, इन दोनों नामों को सही समझ कर, इन का उपयोग करना आरंभ कर दिया; जो कि पराधीनता (गुलामी) का चिन्ह है। इस लिए, राष्ट्र-भाषा को “हिन्दी” कहना: अयोग्य है।
यदि हम “हिंदू” नहीं: “सनातनी” हैं, हम “हिंदुस्तानी” नहीं: “भारतीय” है; तो हमारी राष्ट्र-भाषा भी "हिंदी" नहीं कहला सकती। हमारी भारतीयों की राष्ट्र-भाषा का नाम तो "भारतीय" ही होना चाहिए। जिस प्रकार, जापान की राष्ट्र-भाषा का नाम ‘जापानी’, रूस की राष्ट्र-भाषा का नाम ‘रूसी’ है तथा ��रब की राष्ट्र-भाषा का नाम ‘अरबी’ है; इसी प्रकार से भारत की राष्ट्र-भाषा का नाम भी ‘भारतीय’ होना चाहिए।
“हिंदी” भाषा तो हिंदुस्तानियों की हो सकती है, भारतीयों की नहीं।
जब हमारे देश का मूल वास्तविक नाम ‘हिंदुस्तान’ ही नहीं: तो हम भी ‘हिन्दुस्तानी’ नहीं; हम तो भारतीय हैं। जिस प्रकार विदेशियों ने हमें “हिंदू” और हमारे देश को “हिंदुस्तान” नाम दे दिया, उसी प्रकार से उन्होंने हमारी भाषा को भी “हिंदी” नाम दे दिया। विदेशी आक्रांताओं ने हमें, जो भी गलत नाम दिए (भारतवासियों में स्वाभिमान न होने के कारण), हम ने उन गलत नामों को ही स्वीकार कर लिया।
आज हम भारतीय स्वतंत्र हैं। इस कारण, हमें विदेशियों के दिए हुए इन नामों को त्यागना चाहिए। सभी भारतीयों को मिल कर, एक नई “भारतीय” भाषा बना लेनी चाहिए, जिस में भारत से उपजी, भारतीय मूल की सभी भाषाओं के शब्द सम्मिलित हों।
(“भारतीय मूल की भाषा” का अर्��� है: जिन भाषाओं की शब्दावली तथा लिपि, भारत से उपजी हो; जैसे: संस्कृत, तमिल, तेलुगु, उड़िया आदि।) सभी भारतीय भाषाओं के अधिकतर शब्द, पहले ही आपस में मिलते हैं जैसे: दया, धर्म, करुणा, गुरु, नगर, शास्त्र आदि। इस कारण, ��भी भारतीय भाषाओं के शब्द मिला कर, एक नई भाषा बनाने में कोई समस्या नहीं हो सकती; अपितु, भाषा की अधिकतर समस्याओं का समाधान हो जाएगा। केंद्र सरकार को, उसी नई भाषा को ‘भारतीय’ नाम दे कर; राष्ट्र-भाषा घोषित कर देना चाहिए। अभी तो भारत सरकार के सभी केन्द्रीय सचिवालय तथा न्यायालयों में, प्रत्येक कार्यों में अंग्रेजी का उपयोग होता है।
जब सभी प्रांतों में तथा जनता में नई “भारतीय” भाषा प्रमाणित स्वीक���रित हो जाएगी, तो अंग्रेजी की बजाय “भारतीय” भाषा का प्रयोग आरंभ हो जाएगा और हम गुलामी के चिन्ह ‘अंग्रेजी’ से छुटकारा पा सकेंगे।
ऐसा करने से, दक्षिण प्रांतों की तमिल, कन्नड़ आदि कुछ भाषाओं के जो हिंदी के साथ झगड़े हैं; वह भी पूर्ण रूप से समाप्त हो जाएंगे। क्योंकि, उन की भाषाओं के शब्द भी, नई भाषा में सम्मिलित हो कर, “भारतीय” भाषा का अटूट अंग बन जाएंगे।
“भारत” देश, "भारतीय" भाषा: यह दोनों नाम उपयोग कर के, भारतीयों में आत्म सम्मान आएगा और एकता होगी। एकता से ही भारत की उन्नति होगी। इस प्रकार से, सभी भारतीय भाषाओं के शब्द मिला कर बनी नई “भारतीय” भाषा; राष्ट्र की उन्नति में अत्यंत स��ायक होगी। इस लिए, भारत को नई "भारतीय" भाषा बना कर, अपना लेनी चाहिए। नई "भारतीय" भाषा का बना कर अपना लेना; भारत को "विश्व गुरु" बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कार्य होगा।
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भारत की राष्ट्र-भाषा “हिन्दी” नहीं; “भारतीय” होनी चाहिए।
हम “हिन्दू” नहीं, “सनातनी हैं, “हिन्दुस्तानी” नहीं, “भारतीय” हैं; तो फिर हमारी राष्ट्र-भाषा भी “हिन्दी” नहीं कहलानी चाहिए। जिस प्रकार, इंग���लैंड की राष्ट्र-भाषा का नाम ‘इंग्लिश’ है; इसी प्रकार से भारत की राष्ट्र-भाषा का नाम भी “भारतीय” होना चाहिए।
भारत वासियो! यह सर्वमान्य सत्य है कि भारत के प्राचीन पंथ/धर्म का नाम "सनातन" है: "हिंदू" नहीं। इसी प्रकार से, हमारे देश का प्राचीन नाम "भारत" है: "हिंद" या “हिंदुस्तान” नहीं।
हमारे पंथ को "हिंदू" नाम तथा हमारे देश को "हिंदुस्तान" नाम: विदेशी आक्रांताओं, आक्रमणकारियों ने दिए थे। विदेशी ��क्रांताओं का लंबे समय तक भारत पर शासन होने के कारण; यह दोनों नाम प्रचलित हो कर प्रसिद्ध हो गए और हम भारतवासियों ने भी, इन दोनों नामों को सही समझ कर, इन का उपयोग करना आरंभ कर दिया; जो कि पराधीनता (गुलामी) का चिन्ह है। इस लिए, राष्ट्र-भाषा को “हिन्दी” कहना: अयोग्य है।
यदि हम “हिंदू” नहीं: “सनातनी” हैं, हम “हिंदुस्तानी” नहीं: “भारतीय” है; तो हमारी राष्ट्र-भाषा भी "हिंदी" नहीं कहला सकती। हमारी भारतीयों की राष्ट्र-भाषा का नाम तो "भारतीय" ही होना चाहिए। जिस प्रकार, जापान की राष्ट्र-भाषा का नाम ‘जापानी’, रूस की राष्ट्र-भाषा का नाम ‘रूसी’ है तथा ��रब की राष्ट्र-भाषा का नाम ‘अरबी’ है; इसी प्रकार से भारत की राष्ट्र-भाषा का नाम भी ‘भारतीय’ होना चाहिए।
“हिंदी” भाषा तो हिंदुस्तानियों की हो सकती है, भारतीयों की नहीं।
जब हमारे देश का मूल वास्तविक नाम ‘हिंदुस्तान’ ही नहीं: तो हम भी ‘हिन्दुस्तानी’ नहीं; हम तो भारतीय हैं। जिस प्रकार विदेशियों ने हमें “हिंदू” और हमारे देश को “हिंदुस्तान” नाम दे दिया, उसी प्रकार से उन्होंने हमारी भाषा को भी “हिंदी” नाम दे दिया। विदेशी आक्रांताओं ने हमें, जो भी गलत नाम दिए (भारतवासियों में स्वाभिमान न होने के कारण), हम ने उन गलत नामों को ही स्वीकार कर लिया।
आज हम भारतीय स्वतंत्र हैं। इस कारण, हमें विदेशियों के दिए हुए इन नामों को त्यागना चाहिए। सभी भारतीयों को मिल कर, एक नई “भारतीय” भाषा बना लेनी चाहिए, जिस में भारत से उपजी, भारतीय मूल की सभी भाषाओं के शब्द सम्मिलित हों।
(“भारतीय मूल की भाषा” का अर्��� है: जिन भाषाओं की शब्दावली तथा लिपि, भारत से उपजी हो; जैसे: संस्कृत, तमिल, तेलुगु, उड़िया आदि।) सभी भारतीय भाषाओं के अधिकतर शब्द, पहले ही आपस में मिलते हैं जैसे: दया, धर्म, करुणा, गुरु, नगर, शास्त्र आदि। इस कारण, ��भी भारतीय भाषाओं के शब्द मिला कर, एक नई भाषा बनाने में कोई समस्या नहीं हो सकती; अपितु, भाषा की अधिकतर समस्याओं का समाधान हो जाएगा। केंद्र सरकार को, उसी नई भाषा को ‘भारतीय’ नाम दे कर; राष्ट्र-भाषा घोषित कर देना चाहिए। अभी तो भारत सरकार के सभी केन्द्रीय सचिवालय तथा न्यायालयों में, प्रत्येक कार्यों में अंग्रेजी का उपयोग होता है।
जब सभी प्रांतों में तथा जनता में नई “भारतीय” भाषा प्रमाणित स्वीक���रित हो जाएगी, तो अंग्रेजी की बजाय “भारतीय” भाषा का प्रयोग आरंभ हो जाएगा और हम गुलामी के चिन्ह ‘अंग्रेजी’ से छुटकारा पा सकेंगे।
ऐसा करने से, दक्षिण प्रांतों की तमिल, कन्नड़ आदि कुछ भाषाओं के जो हिंदी के साथ झगड़े हैं; वह भी पूर्ण रूप से समाप्त हो जाएंगे। क्योंकि, उन की भाषाओं के शब्द भी, नई भाषा में सम्मिलित हो कर, “भारतीय” भाषा का अटूट अंग बन जाएंगे।
“भारत” देश, "भारतीय" भाषा: यह दोनों नाम उपयोग कर के, भारतीयों में आत्म सम्मान आएगा और एकता होगी। एकता से ही भारत की उन्नति होगी। इस प्रकार से, सभी भारतीय भाषाओं के शब्द मिला कर बनी नई “भारतीय” भाषा; राष्ट्र की उन्नति में अत्यंत स��ायक होगी। इस लिए, भारत को नई "भारतीय" भाषा बना कर, अपना लेनी चाहिए। नई "भारतीय" भाषा का बना कर अपना लेना; भारत को "विश्व गुरु" बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कार्य होगा।
जय भारत।
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भारत की राष्ट्र-भाषा “हिन्दी” नहीं; “भारतीय” होनी चाहिए।
हम “हिन्दू” नहीं, “सनातनी हैं, “हिन्दुस्तानी” नहीं, “भारतीय” हैं; तो फिर हमारी राष्ट्र-भाषा भी “हिन्दी” नहीं कहलानी चाहिए। जिस प्रकार, इंग���लैंड की राष्ट्र-भाषा का नाम ‘इंग्लिश’ है; इसी प्रकार से भारत की राष्ट्र-भाषा का नाम भी “भारतीय” होना चाहिए।
भारत वासियो! यह सर्वमान्य सत्य है कि भारत के प्राचीन पंथ/धर्म का नाम "सनातन" है: "हिंदू" नहीं। इसी प्रकार से, हमारे देश का प्राचीन नाम "भारत" है: "हिंद" या “हिंदुस्तान” नहीं।
हमारे पंथ को "हिंदू" नाम तथा हमारे देश को "हिंदुस्तान" नाम: विदेशी आक्रांताओं, आक्रमणकारियों ने दिए थे। विदेशी ��क्रांताओं का लंबे समय तक भारत पर शासन होने के कारण; यह दोनों नाम प्रचलित हो कर प्रसिद्ध हो गए और हम भारतवासियों ने भी, इन दोनों नामों को सही समझ कर, इन का उपयोग करना आरंभ कर दिया; जो कि पराधीनता (गुलामी) का चिन्ह है। इस लिए, राष्ट्र-भाषा को “हिन्दी” कहना: अयोग्य है।
यदि हम “हिंदू” नहीं: “सनातनी” हैं, हम “हिंदुस्तानी” नहीं: “भारतीय” है; तो हमारी राष्ट्र-भाषा भी "हिंदी" नहीं कहला सकती। हमारी भारतीयों की राष्ट्र-भाषा का नाम तो "भारतीय" ही होना चाहिए। जिस प्रकार, जापान की राष्ट्र-भाषा का नाम ‘जापानी’, रूस की राष्ट्र-भाषा का नाम ‘रूसी’ है तथा ��रब की राष्ट्र-भाषा का नाम ‘अरबी’ है; इसी प्रकार से भारत की राष्ट्र-भाषा का नाम भी ‘भारतीय’ होना चाहिए।
“हिंदी” भाषा तो हिंदुस्तानियों की हो सकती है, भारतीयों की नहीं।
जब हमारे देश का मूल वास्तविक नाम ‘हिंदुस्तान’ ही नहीं: तो हम भी ‘हिन्दुस्तानी’ नहीं; हम तो भारतीय हैं। जिस प्रकार विदेशियों ने हमें “हिंदू” और हमारे देश को “हिंदुस्तान” नाम दे दिया, उसी प्रकार से उन्होंने हमारी भाषा को भी “हिंदी” नाम दे दिया। विदेशी आक्रांताओं ने हमें, जो भी गलत नाम दिए (भारतवासियों में स्वाभिमान न होने के कारण), हम ने उन गलत नामों को ही स्वीकार कर लिया।
आज हम भारतीय स्वतंत्र हैं। इस कारण, हमें विदेशियों के दिए हुए इन नामों को त्यागना चाहिए। सभी भारतीयों को मिल कर, एक नई “भारतीय” भाषा बना लेनी चाहिए, जिस में भारत से उपजी, भारतीय मूल की सभी भाषाओं के शब्द सम्मिलित हों।
(“भारतीय मूल की भाषा” का अर्��� है: जिन भाषाओं की शब्दावली तथा लिपि, भारत से उपजी हो; जैसे: संस्कृत, तमिल, तेलुगु, उड़िया आदि।) सभी भारतीय भाषाओं के अधिकतर शब्द, पहले ही आपस में मिलते हैं जैसे: दया, धर्म, करुणा, गुरु, नगर, शास्त्र आदि। इस कारण, ��भी भारतीय भाषाओं के शब्द मिला कर, एक नई भाषा बनाने में कोई समस्या नहीं हो सकती; अपितु, भाषा की अधिकतर समस्याओं का समाधान हो जाएगा। केंद्र सरकार को, उसी नई भाषा को ‘भारतीय’ नाम दे कर; राष्ट्र-भाषा घोषित कर देना चाहिए। अभी तो भारत सरकार के सभी केन्द्रीय सचिवालय तथा न्यायालयों में, प्रत्येक कार्यों में अंग्रेजी का उपयोग होता है।
जब सभी प्रांतों में तथा जनता में नई “भारतीय” भाषा प्रमाणित स्वीक���रित हो जाएगी, तो अंग्रेजी की बजाय “भारतीय” भाषा का प्रयोग आरंभ हो जाएगा और हम गुलामी के चिन्ह ‘अंग्रेजी’ से छुटकारा पा सकेंगे।
ऐसा करने से, दक्षिण प्रांतों की तमिल, कन्नड़ आदि कुछ भाषाओं के जो हिंदी के साथ झगड़े हैं; वह भी पूर्ण रूप से समाप्त हो जाएंगे। क्योंकि, उन की भाषाओं के शब्द भी, नई भाषा में सम्मिलित हो कर, “भारतीय” भाषा का अटूट अंग बन जाएंगे।
“भारत” देश, "भारतीय" भाषा: यह दोनों नाम उपयोग कर के, भारतीयों में आत्म सम्मान आएगा और एकता होगी। एकता से ही भारत की उन्नति होगी। इस प्रकार से, सभी भारतीय भाषाओं के शब्द मिला कर बनी नई “भारतीय” भाषा; राष्ट्र की उन्नति में अत्यंत स��ायक होगी। इस लिए, भारत को नई "भारतीय" भाषा बना कर, अपना लेनी चाहिए। नई "भारतीय" भाषा का बना कर अपना लेना; भारत को "विश्व गुरु" बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कार्य होगा।
जय भारत।
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भारत की राष्ट्र-भाषा “हिन्दी” नहीं; “भारतीय” होनी चाहिए।
हम “हिन्दू” नहीं, “सनातनी हैं, “हिन्दुस्तानी” नहीं, “भारतीय” हैं; तो फिर हमारी राष्ट्र-भाषा भी “हिन्दी” नहीं कहलानी चाहिए। जिस प्रकार, इंग���लैंड की राष्ट्र-भाषा का नाम ‘इंग्लिश’ है; इसी प्रकार से भारत की राष्ट्र-भाषा का नाम भी “भारतीय” होना चाहिए।
भारत वासियो! यह सर्वमान्य सत्य है कि भारत के प्राचीन पंथ/धर्म का नाम "सनातन" है: "हिंदू" नहीं। इसी प्रकार से, हमारे देश का प्राचीन नाम "भारत" है: "हिंद" या “हिंदुस्तान” नहीं।
हमारे पंथ को "हिंदू" नाम तथा हमारे देश को "हिंदुस्तान" नाम: विदेशी आक्रांताओं, आक्रमणकारियों ने दिए थे। विदेशी ��क्रांताओं का लंबे समय तक भारत पर शासन होने के कारण; यह दोनों नाम प्रचलित हो कर प्रसिद्ध हो गए और हम भारतवासियों ने भी, इन दोनों नामों को सही समझ कर, इन का उपयोग करना आरंभ कर दिया; जो कि पराधीनता (गुलामी) का चिन्ह है। इस लिए, राष्ट्र-भाषा को “हिन्दी” कहना: अयोग्य है।
यदि हम “हिंदू” नहीं: “सनातनी” हैं, हम “हिंदुस्तानी” नहीं: “भारतीय” है; तो हमारी राष्ट्र-भाषा भी "हिंदी" नहीं कहला सकती। हमारी भारतीयों की राष्ट्र-भाषा का नाम तो "भारतीय" ही होना चाहिए। जिस प्रकार, जापान की राष्ट्र-भाषा का नाम ‘जापानी’, रूस की राष्ट्र-भाषा का नाम ‘रूसी’ है तथा ��रब की राष्ट्र-भाषा का नाम ‘अरबी’ है; इसी प्रकार से भारत की राष्ट्र-भाषा का नाम भी ‘भारतीय’ होना चाहिए।
“हिंदी” भाषा तो हिंदुस्तानियों की हो सकती है, भारतीयों की नहीं।
जब हमारे देश का मूल वास्तविक नाम ‘हिंदुस्तान’ ही नहीं: तो हम भी ‘हिन्दुस्तानी’ नहीं; हम तो भारतीय हैं। जिस प्रकार विदेशियों ने हमें “हिंदू” और हमारे देश को “हिंदुस्तान” नाम दे दिया, उसी प्रकार से उन्होंने हमारी भाषा को भी “हिंदी” नाम दे दिया। विदेशी आक्रांताओं ने हमें, जो भी गलत नाम दिए (भारतवासियों में स्वाभिमान न होने के कारण), हम ने उन गलत नामों को ही स्वीकार कर लिया।
आज हम भारतीय स्वतंत्र हैं। इस कारण, हमें विदेशियों के दिए हुए इन नामों को त्यागना चाहिए। सभी भारतीयों को मिल कर, एक नई “भारतीय” भाषा बना लेनी चाहिए, जिस में भारत से उपजी, भारतीय मूल की सभी भाषाओं के शब्द सम्मिलित हों।
(“भारतीय मूल की भाषा” का अर्��� है: जिन भाषाओं की शब्दावली तथा लिपि, भारत से उपजी हो; जैसे: संस्कृत, तमिल, तेलुगु, उड़िया आदि।) सभी भारतीय भाषाओं के अधिकतर शब्द, पहले ही आपस में मिलते हैं जैसे: दया, धर्म, करुणा, गुरु, नगर, शास्त्र आदि। इस कारण, ��भी भारतीय भाषाओं के शब्द मिला कर, एक नई भाषा बनाने में कोई समस्या नहीं हो सकती; अपितु, भाषा की अधिकतर समस्याओं का समाधान हो जाएगा। केंद्र सरकार को, उसी नई भाषा को ‘भारतीय’ नाम दे कर; राष्ट्र-भाषा घोषित कर देना चाहिए। अभी तो भारत सरकार के सभी केन्द्रीय सचिवालय तथा न्यायालयों में, प्रत्येक कार्यों में अंग्रेजी का उपयोग होता है।
जब सभी प्रांतों में तथा जनता में नई “भारतीय” भाषा प्रमाणित स्वीक���रित हो जाएगी, तो अंग्रेजी की बजाय “भारतीय” भाषा का प्रयोग आरंभ हो जाएगा और हम गुलामी के चिन्ह ‘अंग्रेजी’ से छुटकारा पा सकेंगे।
ऐसा करने से, दक्षिण प्रांतों की तमिल, कन्नड़ आदि कुछ भाषाओं के जो हिंदी के साथ झगड़े हैं; वह भी पूर्ण रूप से समाप्त हो जाएंगे। क्योंकि, उन की भाषाओं के शब्द भी, नई भाषा में सम्मिलित हो कर, “भारतीय” भाषा का अटूट अंग बन जाएंगे।
“भारत” देश, "भारतीय" भाषा: यह दोनों नाम उपयोग कर के, भारतीयों में आत्म सम्मान आएगा और एकता होगी। एकता से ही भारत की उन्नति होगी। इस प्रकार से, सभी भारतीय भाषाओं के शब्द मिला कर बनी नई “भारतीय” भाषा; राष्ट्र की उन्नति में अत्यंत स��ायक होगी। इस लिए, भारत को नई "भारतीय" भाषा बना कर, अपना लेनी चाहिए। नई "भारतीय" भाषा का बना कर अपना लेना; भारत को "विश्व गुरु" बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कार्य होगा।
जय भारत।
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भारत की राष्ट्र-भाषा “हिन्दी” नहीं; “भारतीय” होनी चाहिए।
हम “हिन्दू” नहीं, “सनातनी हैं, “हिन्दुस्तानी” नहीं, “भारतीय” हैं; तो फिर हमारी राष्ट्र-भाषा भी “हिन्दी” नहीं कहलानी चाहिए। जिस प्रकार, इंग्लैंड की राष्ट्र-भाषा का नाम ‘इंग्लिश’ है; इसी प्रकार से भारत की राष्ट्र-भाषा का नाम भी “भारतीय” होना चाहिए।
भारत वासियो! यह सर्वमान्य सत्य है कि भारत के प्राचीन पंथ/धर्म का नाम "सनात���" है: "हिंदू" नहीं। इसी प्रकार से, हमारे देश का प्राचीन नाम "भारत" है: "हिंद" या “हिंदुस्तान” नहीं।
हमारे पंथ को "हिंदू" नाम तथा हमारे देश को "हिंदुस्तान" नाम: विदेशी आक्रांताओं, आक्रमणकारियों ने दिए थे। विदेशी आक्रांताओं का लंबे समय तक भारत पर शासन होने के कारण; यह दोनों नाम प्रचलित हो कर प्रसिद्ध हो गए और हम भारतवासियों ने भी, इन दोनों नामों को सही समझ कर, इन का उपयोग करना आरंभ कर दिया; जो कि पर���धीनता (गुलामी) का चिन्ह है। इस लिए, राष्ट्र-भाषा को “हिन्दी” कहना: अयोग्य है।
यदि हम “हिंदू” नहीं: “सनातनी” हैं, हम “हिंदुस्तानी” नहीं: “भारतीय” है; तो हमारी राष्ट्र-भाषा भी "हिंदी" नहीं कहला सकती। हमारी भारतीयों की राष्ट्र-भाषा का नाम तो "भारतीय" ही होना चाहिए। जिस प्रकार, जापान की राष्ट्र-भाषा का नाम ‘जापानी’, रूस की राष्ट्र-भाषा का नाम ‘रूसी’ है तथा अरब की राष्ट्र-भाषा का नाम ‘अरबी’ है; इसी प्रकार से भारत की राष्ट्र-भाषा का नाम भी ‘भारतीय’ होना चाहिए।
“हिंदी” भाषा तो हिंदुस्तानियों की हो सकती है, भारतीयों की नहीं।
जब हमारे देश का मूल वास्तविक नाम ‘हिंदुस्तान’ ही नहीं: तो हम भी ‘हिन्दुस्तानी’ नहीं; हम तो भारतीय हैं। जिस प्रकार विदेशियों ने हमें “हिंदू” और हमारे देश को “हिंदुस्तान” नाम दे दिया, उसी प्रकार से उन्होंने हमारी भाषा को भी “हिंदी” नाम दे दिया। विदेशी आक्रांताओं न��� हमें, जो भी गलत नाम दिए (भारतवासियों में स्वाभिमान न होने के कारण), हम ने उन गलत नामों को ही स्वीकार कर लिया।
आज हम भारतीय स्वतंत्र हैं। इस कारण, हमें विदेशियों के दिए हुए इन नामों को त्यागना चाहिए। सभी भारतीयों को मिल कर, एक नई “भारतीय” भाषा बना लेनी चाहिए, जिस में भारत से उपजी, भारतीय मूल की सभी भाषाओं के शब्द सम्मिलित हों।
(“भारतीय मूल की भाषा” का अर्थ है: जिन भाषाओं की शब्दावली तथा लिपि, भा���त से उपजी हो; जैसे: संस्कृत, तमिल, तेलुगु, उड़िया आदि।) सभी भारतीय भाषाओं के अधिकतर शब्द, पहले ही आपस में मिलते हैं जैसे: दया, धर्म, करुणा, गुरु, नगर, शास्त्र आदि। इस कारण, सभी भारतीय भाषाओं के शब्द मिला कर, एक नई भाषा बनाने में कोई समस्या नहीं हो सकती; अपितु, भाषा की अधिकतर समस्याओं का समाधान हो जाएगा। केंद्र सरकार को, उसी नई भाषा को ‘भारतीय’ नाम दे कर; राष्ट्र-भाषा घोषित कर देना चाहिए। अभी तो भारत सर���ार के सभी केन्द्रीय सचिवालय तथा न्यायालयों में, प्रत्येक कार्यों में अंग्रेजी का उपयोग होता है।
जब सभी प्रांतों में तथा जनता में नई “भारतीय” भाषा प्रमाणित स्वीकारित हो जाएगी, तो अंग्रेजी की बजाय “भारतीय” भाषा का प्रयोग आरंभ हो जाएगा और हम गुलामी के चिन्ह ‘अंग्रेजी’ से छुटकारा पा सकेंगे।
ऐसा करने से, दक्षिण प्रांतों की तमिल, कन्नड़ आदि कुछ भाषाओं के जो हिंदी के साथ झगड़े हैं; वह भी पूर्ण ���ूप से समाप्त हो जाएंगे। क्योंकि, उन की भाषाओं के शब्द भी, नई भाषा में सम्मिलित हो कर, “भारतीय” भाषा का अटूट अंग बन जाएंगे।
“भारत” देश, "भारतीय" भाषा: यह दोनों नाम उपयोग कर के, भारतीयों में आत्म सम्मान आएगा और एकता होगी। एकता से ही भारत की उन्नति होगी। इस प्रकार से, सभी भारतीय भाषाओं के शब्द मिला कर बनी नई “भारतीय” भाषा; राष्ट्र की उन्नति में अत्यंत सहायक होगी। इस लिए, भारत को नई "भारतीय" भाषा बन�� कर, अपना लेनी चाहिए। नई "भारतीय" भाषा का बना कर अपना लेना; भारत को "विश्व गुरु" बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कार्य होगा।
जय भारत।
@DrManmohanPM@RahulGandhi @INCIndia @IYC @INCMP @YSRCParty @SGPCAmritsar @mssirsa @diljitdosanjh @editorvskbharat @RVCJ_FB@MediaCellSP @PTI_News @medianama @CongressMediaMV @SoniaGandhi_FC @narendramodi @myogiadityanath@unitedsikhs @SikhFedUK@PTC_Network@PTC_Network @dailypostpunjab @RozanaSpokesman @RSSorg @friendsofrss @VHPDigital @NewsNationTV @DrGauravGarg4 @SanatanTalks @lokeshchugh09 @bharatjodo @ZeeNews @ZeeNewsEnglish @DDNewslive @ashwinravi99 @sikka_harinder
@narendramodi#INDvsAUS#SquidGame2 सितंबर में श्री ठाकुर दिलीप सिंह जी के द्वारा अपील करने के बावजूद भी आपने इग्नोर किया और डॉक्टर मनमोहन सिंह को भारत रत्न देने का कोई निर्णय नहीं लिया।
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