वास्तव में
दो ही दुनिया हैं-
लोगों की दुनिया
और माँ की दुनिया।
("लौटती नहीं जो हँसी":पुस्तक से)
*
"वह बड़ी मोहब्बत से हर चीज़ के
ज़िस्म पर उंगलियां फ़िराता था।
वह नाबीना था!बचपन से अंधा!
उसके लम्स को बदचलनी जानने
की कोई वज़ह न थी!" ("बेदावा":से)
~तरुण भटनागर✍️
चर्चित कवि,कथाकार
जब कोई उससे कहता कि उस पर प्रेतछाया पड़ी है तो वह उसे ऐसे देखता मानो कच्चा चबा जाएगा। अपनी दीवानगी के लिए कोई भी हल्का लफ़्ज़ वह बर्दाश्त न कर पाता।
बेदावा • तरुण भटनागर
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आँखों से न देख पानेवालों, ट्रांसजेंडरों और दग़ाबाज़ों की अनदेखी दुनिया के इश्क़ का फ़साना है 'बेदावा' इश्क़ का ऐसा क़िस्सा है जो आदमी और औरत के इश्क़ से अलहदा इंसानियत के फ़लसफ़े को गढ़ता है।
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साहित्य तक @sahitya_tak के Book Cafe में तरुण भटनागर #tarunbhatnagar के @RajkamalBooks से छपे उपन्यास 'बेदावा' पर वरिष्ठ पत्रकार @jai_shiven की राय. #EkdinEkKitab में सुनिए एक लड़की के तीन इश्क के पीछे मजहब, युवा राजनीति व जंगल का फसाना.
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रोचक अन्दाज़ में लिखा गया उपन्यास 'बेदावा' आँखों से न देख पानेवालों, ट्रांसजेंडरों और दगाबाज़ों की अनदेखी दुनिया के इश्क़ का फ़साना है।
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"कॉलेज से अचानक एक दिन ग़ायब हुए एक लड़के का फिर क्या हुआ? न मीडिया, न पुलिस, न कोर्ट, न सारी दुनिया... कोई नहीं, कोई भी नहीं..."
बेदावा : एक प्रेमकथा / तरुण भटनागर
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रोचक अन्दाज़ में लिखा गया उपन्यास 'बेदावा' आँखों से न देख पानेवालों, ट्रांसजेंडरों और दग़ाबाजों की अनदेखी दुनिया के इश्क़ का फ़साना है. यह किताबों और रौशनियों की कहानी है.
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#बेदावा_एक_प्रेमकथा पढ़ते हुए ऋतिक रौशन की फिल्म काबिल याद आती है
हिंदी और उर्दू का बेमिसाल फ्युजन है यह पुस्तक।एक स्त्री,एक नाबीना पुरुष और एक ट्रांसजेंडर.. तीनों के मनोविज्ञान को शानदार ढंग से उकेरा गया है । प्रेम में डूबी हुई स्त्री इस तरह से भी सोचती है?