#त्रिवेंद्रम में ‘केरल आर्ट एंड क्राफ्ट्स विलेज’ लोक कला के संरक्षण का शानदार नमूना है। हरियाली से लदा पूरा परिसर केरल की ग्रामीण #वास्तुकला और #संस्कृति की झलक देता है। यहाँ लुप्त होती हस्तकला को बखूबी संरक्षण दिया गया है। न कोई तामझाम है, न ही बनावटीपन। केरल की सरकार ने 2010 में इसका ख़्वाब देखा था। यह स्थान कॉपरेटिव संस्था का सुंदर प्रयास है। यह सुखद संयोग है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहल से इस दिशा में कई कोशिशें हुई हैं, उनमें कुछ सफल रही हैं।
@INCKerala@KeralaTourism
इसी महीने फरोज गांधी पैदा हुए है और जाने के लिए यही महीना मुनासिब समझा। उनका पूरा नाम फिरोज जहांगीर गांधी था। हालांकि, नाम के साथ गांधी बाद में जुड़ा। वे स्वभाव से फाइटर थे। जरूरत आन पड़ी तो अपने ससुर की सरकार का भी तीखा विरोध किया।
लोग कहते हैं कि वे शानदार पार्लियामेंटेरियन थे। गजब की संवादशैली थी। लेकिन, आज वे हमारी स्मृति में नहीं हैं। आज का तथाकथित गांधी परिवार और पूरी कांग्रेस उनसे जुड़ी किसी स्मृतियों को चिमटे से भी स्पर्श नहीं करना चाहती है। यह राहुल गांधी की अपनी दुविधा है कि दादा से दूर रहना पसंद करते हैं। अब जबकि दादा ही भुला दिए गए हैं तो उनके विचारों को कौन याद करता है!
कम पत्रकारों को मालूम होगा कि फिरोज गांधी ही वो शख्स थे, जिन्होंने संसदीय कार्यवाही की मीडिया कवरेज को आसान बनाया। वे रायबरेली से दो बार सांसद रहे। वे 'नेशनल हेराल्ड' और 'नवजीवन' सरीखे अखबारों के मैनेजिंग डायरेक्टर और पब्लिशर थे, जो आज दुर्भाग्य से विवाद में है।
फ़िरोज़ ने पहली बार 1933 में इंदिरा के सामने शादी का प्रस्ताव रखा था, जिसे इंदिरा और उनकी माँ ने ठुकरा दिया था, क्योंकि तब इंदिरा सिर्फ़ सोलह साल की थीं। हालांकि, कमला नेहरू उन्हें बहुत पसंद करती थीं। 28 फरवरी 1936 को जब कमला नेहरू का निधन हुआ, तो फ़िरोज़ उनके बिस्तर के पास ही मौजूद थे।
फिरोज ने अपनी ऊंची शिक्षा लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से प्राप्त की थी और 1935 से 1941 के बीच इंग्लैंड में रहे। भारत लौटने तो 'भारत छोड़ो आंदोलन' में शामिल हो गए। उससे पहले मार्च 1942 को आनंद भवन में इंदिरा से शादी की। फिर जेल चले गए। आजादी के बाद बतौर सांसद अपनी अलग पहचान बनाई।
दिसंबर 1955 में फ़िरोज गांधी ने एक खुलासा किया। उन्होंने आरोप लगाया कि एक बड़े उद्योगपति राम किशन डालमिया (जो एक बैंक और एक इंश्योरेंस कंपनी के चेयरमैन थे) ने इन कंपनियों का इस्तेमाल 'बेनेट, कोलमैन एंड कंपनी' को खरीदने के लिए किया। डालमिया ने निजी फ़ायदे के लिए पब्लिक कंपनियों से पैसे की हेराफेरी यानी मनी लॉन्ड्रिंग शुरू कर दी। इसी तरह 1956 में उन्होंने प्रेस की आज़ादी के लिए 'प्राइवेट मेंबर बिल' पेश किया। उनका मानना था कि भारतीयों को संसद के रोज़मर्रा के कामकाज के बारे में जानने का अधिकार है। इस बिल की वजह से 'संसदीय कार्यवाही अधिनियम, 1956' बना, जिसने मीडिया को संसदीय कार्यवाही की रिपोर्ट करने की इजाज़त दी।
08 सितंबर 1960 को दिल का दौरा पड़ने से दिल्ली के विलिंगडन अस्पताल (आज का राममनोहर लोहिया) में उनका निधन हो गया। इस तरह सार्वजनिक जीवन के लिए समर्पित काबिलियत ऱखने वाल इंसान ज़िंदगी के सबसे अच्छे दौर में चला गया।
योग की बयार जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती गांव में पहुंच गई है। यह नजारा राजौरी जिले में स्थित
नौशेरा के 'वाइब्रेंट विलेज' सरिया का है।
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर ज़िला प्रशासन, IGNCA, संस्कृति मंत्रालय और भारतीय सेना की संयुक्त पहल से यह कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में सीमावर्ती इलाकों के सैकड़ों निवासी शामिल हुए।
@ignca_delhi@PMOIndia@PIBHomeAffairs@IndianArmyinJK
Archaeological discoveries at Girija Sthan, Madhubani, Mithila
During a lake restoration several archaeological objects were unearthed few days ago.
The image of stone depicting Tara. The image is carved in the Pala style with Mithilakshar inscription.
23 साल पुरानी बातचीत ने अब किताब का स्वरूप ले लिया है। यह बातचीत श्री गोविंदाचार्य और राय साहब के बीच हुई थी। अब दस्तावेज बन चुकी है। 23 अप्रैल 2003 की इस बातचीत में इतिहास है। राजनीति का दावपेंच है। आपातकाल का सच और उससे जुड़े द्वंद हैं। भविष्यवाणी है, जो एक-एक कर सच साबित हो रही है।
गोविंदाचार्य भारतीय राजनीति में ऐसे बिरले उदाहरण हैं, जिनमें लोगों की जिज्ञासा बनी हुई है। हालांकि उन्होंने स्वयं को दलीय राजनीति से परे कर लिया है। इसके बावजूद लोग-बाग पूछते पाए गए कि क्या गोविंदाचार्य भाजपा में आ रहे हैं? इससे इतना तो साफ हो गया कि गोविन्दाचार्य को लेकर कयासों में ही जिज्ञासु लोगों ने अपना समय बर्बाद किया है।
किताब को पढ़कर वे इस निष्कर्ष तक पहुंच जाएंगे। यह पुस्तक विषय के दो मर्मज्ञ के बीच होती बातचीत का नजीर है।
@kngovindacharya@RSSorg@BJP4India
साल 2010 की अपनी रिपोर्ट:
जिन्होंने महात्मा गांधी को गोली लगते देखा था !
“वह भी एक दिन था।” वे क्षण भर रुके। थोड़ी दूर चलकर बताया," गांधीजी को जब गोली लगी तो मैं इस स्थान (10 से 12 फुट की दूरी) पर था।” यह बात गांधी स्मृति केंद्र के मैदान पर बुजुर्ग के.डी.मदान आंखों देखा हाल सुना रहे थे।
मदान उन दो लोगों में हैं, जिन्होंने गांधी को करीब से गोली लगते देखा था। उन दिनों मदान वहां ऑल इंडिया रेडियो की तरफ से गांधी के भाषण को रिकार्ड करने आते थे।अपनी स्मृति को साझा करते हुए मदान ने कहा कि प्रार्थना सभा का समय शाम पांच बजे निश्चित था। पर घटना वाली शाम वे करीब 15 मिनट की देरी से वहां पहुंचे। कहा जाता है कि गांधीजी को शाम 5.17 बजे गोली लगी थी। पर मेरी घड़ी तब शाम के 5.16 का समय बता रही थी । तब सूचना पहुंचाने का कोई सीधा माध्यम नहीं था। इसके बावजूद घटना की सूचना इतनी तेजी से फैली कि शाम के छह बजते-बजते करीब बीस हजार से अधिक लोग गेट के बाहर इकट्ठा हो गए थे। यहां पहुंचने वालों में लार्ड माउंटबेटन पहले महत्वपूर्ण व्यक्ति थे। इसके बाद नेहरू, सरदार पटेल व अन्य लोग आए।यहीं से नेहरू ने अपना देश के नाम संबोधन दिया।
पत्रकार-लेखक देवदत्त ने घटना को दो-तीन फुट की दूरी से देखा था। उन्होंने कहा कि जो लोग गांधीजी पर गोली चलाने वाले को पकड़ रहे थे, वे कोई प्रशिक्षित नहीं लग रहे थे। गोली लगने के बाद गांधी जी को “हे राम” कहते उन्होंने नहीं सुना था। जब वही सवाल यहां के.डी.मदान से हुआ तो उन्होंने कहा, “हालांकि, मैंने गांधी को ‘हे राम’ कहते नहीं सुना। पर यह लीजेंड है और इसे लीजेंड ही रहने दिया जाय। ”
के डी मदान की खोज अनुपम मिश्र जी ने की थी। जबकि देवदत्त को राय साहब (रामबहादुर राय) ने ढूंढा था। गांधी स्मृति में दाखिल होते ही महसूस हुआ कि इस आंगन में न जाने कितनी पुरानी सदियों का मौन जमा है। मदान और देवदत्त उसी मौन की वजह बता रहे थे।
I had the privilege of delivering a lecture on The Fundamentals of Research
on 25th September 2025, as part of the Three-Day Research Workshop organized by Dakshi. It was a pleasure to contribute to this enriching initiative aimed at fostering research competence.
Presented paper titled 'The Dhūrtasamāgama of Jyotirīśvara: A Manuscriptological Exploration of Linguistic Diversity, Nātya tradition and Judiciary system' in Gyan Bharatam International conference at Vijnana Bhavan, New Delhi. Inaugurated by the Honorable PM.
Mark S.G. Dyczkowski (August 29, 1951- February 2, 2025) was a sage scholar of Tantra, Kashmir Shaivism, Shaktism, Indology, and the Indian Knowledge Tradition. His sadgati marks the end of an era in philosophical thought, yet his intellectual legacy continues to resonate.
Presenting my paper on
Nandi and Shaivism in Early Mithila at a National Conference organised by the Indira Gandhi National Centre for the Arts, New Delhi. Grateful to my gurus, colleagues, Shubh-chintak-jan and friends.
अपडेट: A exhibition celebrating the contributions of 15 women in drafting the Constitution was held in Srinagar (Aug 17–25) with invaluable support from @srinagaradmin. Specially DC Srinagar @ The Constitution embodies our collective and individual pride.
@thakur_ripunjay Shubh Janmashtami!!Statue of Shri Krishna from Simraungarh!Simraungadh was the capital city of a sovereign Hindu kingdom of the Mithila from the 11th century to early 14th century CE. The city is located along the border between Bharat and Nepal.
@thakur_ripunjay
A Historic Day!
Maidams of Ahom dynasty included in UNESCO World Heritage List!!
Maidams are the Burial mounds of the Ahom Kings and Nobles. Maidam site is situated in Charaideo district of Assam, Bharat.
@PMOIndia@himantabiswa#UNESCO#Indianhistory
प्रतिष्ठित भारतीय पुरातत्वविद् 'पद्म विभूषण' प्रो. ब्रज बासी लाल प्राचीन भारतीय इतिहास और पुरातत्व में अपने योगदान के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने भारतीय पुरातत्व के कई महत्वपूर्ण पहलुओं को उजागर किया।
संस्कृति संवाद के 7th एपिसोड के विशेष साक्षात्कार में सुनिए, प्रो. ब्रज बासी लाल से उनके जीवन से जुड़े दिलचस्प किस्से। 👇🏻
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