भईया पहली बात अगर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ विदेश जाते हैं, तो वह निजी पर्यटन के लिए नहीं बल्कि निवेश, औद्योगिक सहयोग और राज्य के प्रतिनिधित्व के लिए जाते हैं। 25 करोड़ आबादी वाले प्रदेश का प्रतिनिधित्व कोई साधारण यात्रा नहीं होती।
दूसरी बात Boeing 737-7BC (BBJ) कोई शौक़ का खिलौना नहीं बल्कि लंबी दूरी, आधिकारिक डेलिगेशन और सुरक्षा प्रोटोकॉल के अनुरूप उपयोग किया जाने वाला बिज़नेस जेट है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राज्य प्रमुख, उद्योगपति और सरकारी प्रतिनिधिमंडल इसी श्रेणी के विमानों से यात्रा करते हैं।
तीसरी बात फर्स्ट क्लास से जा सकते थे कहना आसान है, लेकिन क्या फर्स्ट क्लास में पूरा आधिकारिक दल , सुरक्षा, समय की लचीलापन और बैक-टू-बैक मीटिंग्स की सुविधा मिलती है ?
एक मुख्यमंत्री की यात्रा सिर्फ सीट नंबर तक सीमित नहीं होती, वह राज्य की रणनीतिक प्रस्तुति होती है। और जहां तक खर्च की बात है अगर एक सफल रोड शो से हजारों करोड़ का निवेश आता है, तो यात्रा का खर्च निवेश की तुलना में नगण्य होता है। 2018 और 2023 के ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के बाद उत्तर प्रदेश में रिकॉर्ड MoUs साइन हुए थे।
राजनीति में विरोध होना स्वाभाविक है, लेकिन हर कदम को "ऐश्वर्य" कहकर व्यंग्य करना विकास के विमर्श से ध्यान भटकाना है।"दरबार" नहीं यह यूपी की औद्योगिक, आर्थिक और सांस्कृतिक ताकत का प्रतिनिधिमंडल है।
और अंत में
नारे और व्यंग्य से निवेश नहीं आता,
दृष्टि, कूटनीति और नेतृत्व से आता है।
हर हर महादेव...
जिंदगी की इस आपाधापी में कुछ पल अपने और अपनों के लिए निकलना बड़ा ही सुखद होता है और जीवन को तनाव मुक्त रखने में सहायक भी, तो इसी सोच के साथ आशा है यह आने वाला समय हम सब के जीवन में पारिवारिक महत्व के नए आयाम स्थापित करेगा। बाकी.....
भगवान स्वामीनारायण सबका कल्याण करें।
क्या आप जानते हैं-आरएसएस साल में सिर्फ 6 त्योहार मनाता है ? इनमें विजयदशमी (दशहरा) सबसे बड़ा है, क्यों ? इस पर फिर कभी विस्तार से लिखेंगे...
पर @DrMohanBhagwat
यह जान/ देख हैरानी हुई कि यूपी में शताब्दी वर्ष वाली विजयदशमी पर गणवेशधारियों की संख्या न्यूनतम रही ? @RSSorg के पूज्य जी क्या क्षेत्रीय प्रचारकों ने यह सत्य आप तक पहुंचाया क्या @KGopalRSS@DattaHosabale@MUKUNDAckpura@ArunKumRSS ने आपको बताया कि बड़े दायित्वधारियों के संघर्ष छोड़ सत्ता लालसा में शामिल होने से सामान्य युवा गणवेशधारी बनने को तैयार ही नहीं.इतनी कम संख्या चिंता का विषय होना चाहिए.दरअसल इन दिनों संघ के प्रमुख दायित्वधारियों के इर्द गिर्द बड़ी गाड़ियों,IAS,IPS, इंजीनियर , डॉक्टर , बिल्डरों , ठेकेदारों और कुलपतियों का घेरा हो गया.जिसे सामान्य स्वयं सेवक फांद नहीं पा रहा है. बरसों से जनसेवा में जुटे स्वयंसेवकों को कतिपय लोग हिकारत की दृष्टि देख रहे हैं...! जिससे उसका सेवा भाव मर रहा.
मत मानिये,
यह तो बरसों से चल रही हिन्दू प्रथम के भाव को हिन्दू हृदय सम्राट योगी आदित्यनाथ जिन्दा किये हुए हैं, वरना हिंदी पट्टी में सेवा परमो धर्मा: का खत्म होता भाव...संघ की राजनीतिक ईकाई भाजपा को सत्ता से बेदखल करने में समय नहीं लेता...यूपी में भारी धार्मिक डिवीजन के बाद भी अगर मुसलमान बसपा के साथ एकजुट हो गया तो फिर यूपी में संघ के प्रचारको को नई ट्रेनिंग की ज़रूरत आ पड़ेगी...
वैसे मुझे लगता है कि श्रीमन @DrMohanBhagwat जी अब @RSSorg में एक नये दायित्व सृजित किया जाए और उसका नाम हो "सर कार्यवाह आंतरिक जाँच"!
भारत माता की जय !!
@SunilAmbekarM जी मेरी बात श्रीमन भागवत जी तक पहुंचा दीजिये !
अनुराग कश्यप, आप ब्राह्मणों पर मूत सकते हो! आसान है ब्राह्मण पर मूतना! कोई ऐसा कानून नहीं जो आपको ब्राह्मण पर मूतने से रोके! ब्राह्मण के लिए कोई प्रिवेंशन ऑफ एट्रोसिटीज एक्ट नहीं है। मूतने की पूरी आजादी है आपको!
लेकिन किस ब्राह्मण पर मूतोगे? आपके इंडस्ट्री वाले ब्राह्मण नायकों और निर्देशकों पर ! या सेंसर बोर्ड के ब्राह्मण सदस्यों पर ? सत्ता पक्ष के ब्राह्मण मंत्रियों पर या विपक्ष के ब्राह्मण नेताओं पर। या देश के सभी ब्राह्मणों पर अपने मूत्र का छिड़काव करोगे ?
गनीमत है कि ब्राह्मणों पर मूतने की इच्छा व्यक्त किए हो! किसी और जाति पर मूतने की बात किए होते तो अबतक लोग आप की मूत्र नलिका काटकर, मलद्वार में भूसा भर दिए होते! #Anuragkashyap #BRAHMAN #Phule
@anuragkashyap72
#ब्राह्मण:-ब्रह्म को जानने वाला,,,
कालांतर से अभ्यास के आधार पर ब्रह्म व विद्या को साध लेने वाला जिसे ब्राह्मण कहा गया।
इनदिनों ब्राह्मणों को गरियाना भी एक खास तरह के ट्रेंड का हिस्सा है सामाजिक दोषों को ब्राह्मणों के नाम सफलता पूर्वक मढ़ देने की कोशिश लेबड़चियों की एक खास तरह की रणनीति का हिस्सा है जिसमें अनावश्यक रूप से जाति के नाम पर अन्य गैर ब्राह्मण भी मुठ्ठी भींचे खड़े हैं। अब बात आती है समाज मे ब्राह्मणों के भूमिका की, पर यह समझने के लिए हमें समय के उस दौर में चलना होगा जिस दौर में उत्पीड़न के लिए ब्राह्मणों को सर्वाधिक ज़िम्मेदार माना जाता है।
हर युग हर काल में समाज को संचालित करने की एक व्यवस्था बनाई गई जो समय के साथ परिवर्तित होती रही।भारतीय सभ्यता के विकास के शुरुआत में जब कालोनियल निवास या समाज आकार ले रहा था तब कार्यप्रणाली के आधार पर वर्ण व्यवस्था लागू हुई जिसमें गुण के हिसाब से कर्म और कर्म के हिसाब से वर्ण निर्धारित हुए ।भगवद गीता के चौथे अध्याय के तेरहवें श्लोक में श्री कृष्ण भी यही कहते हैं
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।।4.13।।
मेरे द्वारा गुणों और कर्मोंके विभागपूर्वक चारों वर्णोंकी रचना की गयी है।
मतलब रक्षा करने वाला क्षत्रिय शिक्षा देने वाला ब्राह्मण सेवा करने वाला शुद्र व्यापार व भोजन की व्यवस्था देखने वाला वैश्य,अगर समय के उस दौर में जाएं तो ,आदमी जंगलो पहाड़ो से घिरे भूभाग में रहता जहां शिक्षा और रक्षा सर्वाधिक कठिनतम कार्य थे,,जानवर लुटेरे व गैर कबीलाई हमलो का खतरा चौबीसो पहर रहता था ऐसे में माहौल में भी वैदिक आधार पर ब्राह्मणों के लिए कितनी कठिन शर्तें थीं जैसे ब्रह्म मुहूर्त में स्नान,बिना वस्त्र के पूजन ,सर्दी गर्मी बरसात सर मुंडन जंगल जंगल भिक्षाटन फलाहार और इसी प्रक्रिया में पहले तप के आधार पर खुद ज्ञान प्राप्त करना फिर समाज को देना,कभी महसूस कर के देखिए,,
अब प्रश्न आता है वर्ण व्यस्था के जातीय व्यवस्था में तब्दील होने पर तो सामाजिक तौर पर आज भी नेता का बेटा नेता बनने की डॉ का बेटा डॉ बनने की प्रेरणा घर या अपने अपने आस पास के वातावरण से ही एडॉप्ट करता है,,जिसके नाते वर्ण व्यवस्था भी जातीय व्यवस्था में बदली और एक बड़ा दौर जिया लेकिन अगर आज के परिवेश में देखें तो जातियां सिर्फ सूचक या प्रतीक बन के रह गई हैं जो आज के समाज के हिसाब से सही भी है, मतलब आज सिर्फ ब्राह्मण ही अध्यापक नही होता सिर्फ क्षत्रिय सेना या पोलिस में नही जाता प्यून के लिए सिर्फ दलित या पिछड़े नही जाते लेकिन इस तमाम बदलाव में अगर कोई चीज़ नही बदली तो वो है सामाजिक उत्पीड़न के लिए अब भी ब्राह्मणों को दोषी ठहराना।अब इस पूरे विकास प्रक्रम को अगर वैदिक आधार पर भी देखें जिसे आधार बनाकर शोषण का आरोप लगता है तो ब्राह्मणों के त्याग के अनेको उदाहरण मिलेंगे जैसे अयोध्या के कुल गुरु वशिष्ठ मुनि हों या विश्वामित्र इतनी धनी व पराक्रमी रियासत के महागुरु होने के बावजूद महलों में नही जंगल में कुटी छवा के रहते थे,,क्या उनसे राजा ने सुविधाओ के लिए पूछा नही होगा या वो मुनि राजा को आदेश कर सुख विलासता प्राप्त नही कर सकते थे ? तब एक बात नही समझ आती नंगे पाँव आधी धोती ओढ़े सर मुंडाए भिक्षाटन करते एक जंगल से दूसरे जंगल भटकने वाले ब्राह्मण ने समाज का शोषण किया कब ?
सिर्फ लोकोक्तियों के आधार पर जुमले गढ़ के एक समाज को या किसी समाज जाति के आधार पर गाली देना मानसिक दिवालिया पन है। कौन लोग हैं जो मौलिक स्वतंत्रता की ओट लेकर महिसासुर को आदर्श मानते हैं और दुर्गा जी को गाली देते हैं।
ये बहुत बड़ी साजिश है। ध्यान रहे किसी व्यक्ति को मार के उसकी पहचान छीननी हो तो उसका सर कुचला जाता है,आज ब्राह्मण ही है जो सनातनी व्यवस्था में साधना को प्रमुख मानता है हमारे घर तक धर्म का प्रचार करता है और हिन्दू समाज का एक बड़ा भाग पूजा पाठ के लिए ब्राह्मणों पर आश्रित है ,अंग्रेज़ो ने भी वही चाल चली थी फूट डालो और राज करो क्यों कि उन्होंने देखा यहां विपन्नता के बावजूद बेईमानी नहीं है क्यों के लोग ईश्वर में मानते हैं,और आज अगर भारत के सौ करोड़ आबादी को धर्म से विमुख करना है तो ब्राह्मणों को बदनाम करना या कुचल देना ही एक मात्र तरीका है ।
फिर दुःख तो ये है कि जातीय भेद व निजी झगड़ो में एक बड़ा गैर ब्राह्मण वर्ग भी उनकी कुपित मुहिम की मद्त कर रहा है।
और हाँ एक बात और ,,जो राजपूत ब्राह्मणों को गरिया के बाँह बटोरने को बहादुरी समझते है वो बिन द्रोण के अर्जुन ,बिना चाणक्य के चन्द्रगुप्त और बिना चन्द्र वरदाई के पृथिवीराज की कल्पना कर के देख लें
याद रहे तिलक हो या राजतिलक बिना ब्राह्मण के संभव नहीं
#BrahminGenes
#riteshrajwada