मेरे विचारों से असहमत है तो सभ्य भाषा में जवाब दे।
असभ्य भाषा लिखकर खुद के मां बाप के संस्कार यहां न फैलाए।
अभी गांधीवादी हूं.. लेकिन भगत सिंह भी जिंदा है।
शशि थरूर से बहुत लोग असहमत रहते हैं, मैं भी उनमें से हूँ, मगर हाल में उन्होंने अपने लेख में एक अच्छी बात कही है, जिस पर सभी को ग़ौर करना चाहिए। ये लेख लोकसभा की सीटें बढ़ाने को लेकर है। ये तो आप जानते ही हैं कि लोकसभा की सीटें फिलहाल 543 हैं जो कि 1972 से जमी हुई है 1971 की जनगणना के आधार पर है।
सरकार का तर्क है कि भारत की आबादी दोगुनी से ज्यादा हो गई है अब जनसंख्या के अनुपात में सीटें बढ़ानी चाहिए। लेकिन थरूर कहते हैं कि यह सिर्फ गणितीय तर्क है, इसके पीछे बड़ा संस्थागत खतरा छिपा है।
थरूर के मुख्य तर्क हैं-
दुनिया में कोई परिपक्व लोकतंत्र इतनी बड़ी विधायिका नहीं रखता-
थरूर लिखते हैं कि हर विकसित लोकतंत्र में संसद का आकार इतना ही रखा जाता है कि असली बहस, जांच और व्यक्तिगत भागीदारी संभव हो। 850 सीटों वाली लोकसभा दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक सदन से बड़ी होगी। इससे सदन “विचार-विमर्श का मंच” नहीं रहकर “अराजक कोलोसियम” बन जाएगा, जहां चुनिंदा लोग ही बोल पाएंगे और बाकी सिर्फ वोटिंग मशीन पर संख्या बनकर रह जाएंगे।
अमेरिका का उदाहरण-
अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स 1929 से 435 सीटों पर स्थिर है। तब अमेरिका की आबादी 12 करोड़ थी, आज 33.5 करोड़ से ज्यादा है। फिर भी सीटें नहीं बढ़ाई गईं, क्योंकि इससे विधायी प्रक्रिया ठप हो जाती। हर सांसद ज्यादा लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन मजबूत स्टाफ, कम्युनिकेशन और कमिटी सिस्टम से काम चलता है। भारत के सांसद भी ऐसा कर सकते हैं।
अगर संख्या बढ़ी तो व्यक्तिगत सांसद की भूमिका खत्म हो जाएगी-
एक सामान्य सत्र में समय बहुत सीमित होता है।
चार घंटे की बहस में पार्टी की ताकत के हिसाब से अधिकतम 15-20 सांसद ही बोल पाएंगे।
बैक बेंचर और छोटी पार्टियों के सांसद लगभग चुप रह जाएंगे।
ज्यादातर सांसद पूरे पांच साल में एक भी सवाल नहीं पूछ पाएंगे, प्राइवेट मेंबर बिल नहीं ला पाएंगे या गंभीर बहस में हिस्सा नहीं ले पाएंगे। वे सिर्फ पार्टी के हुक्म पर हाथ उठाने वाले “खामोश प्लेस होल्डर” बन जाएंगे।
संसद की भूमिका और कमजोर होगी-
हाल के वर्षों में संसद के बैठने के दिन घट रहे हैं, बिल बिना स्टैंडिंग कमिटी की जांच के वॉयस वोट से पास हो रहे हैं और विपक्ष को किनारे किया जा रहा है। सैकड़ों अतिरिक्त सदस्यों से यह स्थिति और बिगड़ेगी। बड़ा सदन सरकार के लिए सुविधाजनक होता है, क्योंकि उसमें असली जांच-पड़ताल मुश्किल हो जाती है। संसद “रबडर-स्टैंप” या “नोटिस-बोर्ड” बन जाती है।
सत्तावादी मॉडल से समानता-
थरूर चेतावनी देते हैं कि 850 सीटों वाली लोकसभा चीन की पोलिटिकल कंसल्टेटिव कॉन्फ्रेंस या उत्तर कोरिया की सुप्रीम पीपुल्स असेंबली जैसी बन सकती है—बहुत बड़ी, भव्य दिखने वाली, लेकिन असली बहस या चुनौती देने में असमर्थ। ये सिर्फ “सहमति का नाटक” करती हैं।
बेहतर विकल्प-
सांसद का काम राष्ट्रीय कानून, विदेश नीति, अर्थव्यवस्था और केंद्र सरकार की जवाबदेही है। वे स्थानीय काउंसलर या विधायक नहीं हैं।
स्थानीय मुद्दे (सड़क, पानी, कचरा आदि) राज्य विधानसभाओं और पंचायत/नगरपालिकाओं के हैं (73वें और 74वें संविधान संशोधन के तहत)।
जनसंख्या बढ़ने पर विधायकों (MLAs) की संख्या बढ़ाएं, लोकसभा को कॉम्पैक्ट और राष्ट्रीय मुद्दों पर केंद्रित रखें।
300 अतिरिक्त सांसदों पर खर्च (वेतन, आवास, यात्रा, पेंशन) बचाने के बजाय मौजूदा सांसदों के लिए उचित ऑफिस बिल्डिंग बनाएं।
कुल मिलाकर थरूर का कहना है कि असली प्रतिनिधित्व बहस की गुणवत्ता, विधायी कमेटियों की गंभीर जांच और स्थानीय सरकारों को सशक्त बनाने में है—न कि एक विशाल, अव्यवहारिक सदन बनाकर लोकतंत्र को “खाली नाटक” में बदलने में। 850 सीटों वाली लोकसभा सरकार के लिए इको चैंबर बन जाएगी, न कि शासन का मंच।
सरदार मनमोहन सिंह जी को क्लीन चिट मिली,
लेकिन अफसोस ये लम्हा उनकी मौत के 2 साल बाद आया, जब तक जीवित थे, भाजपाइयों ने गोदी मीडिया के साथ मिलकर खूब कीचड़ उड़ाया। आज सब खामोश है।
कोयला घोटाला मामले में निचली अदालत की ओर से पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को जारी किया समन गलत था : सुप्रीम कोर्ट।
यह फैसला मनमोहन सिंह जी के निधन के करीब डेढ़ साल बाद आया है। साल 2025 में निचली अदालत के जज ने CBI की ओर से दो क्लोजर रिपोर्ट खारिज करते हुए मनमोहन सिंह को समन जारी किया था। उस समन को मनमोहन सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
आज CJI जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने फैसला सुनाया कि निचली अदालत के जज ने CBI की क्लोजर रिपोर्ट खारिज करते समय तय कानूनी सिद्धांतों का पालन नहीं किया। उनके पास ऐसा कोई ठोस कारण नहीं था, जिसके आधार पर क्लोजर रिपोर्ट ठुकराकर उन्हें समन किया जाता।
ये पूर्व प्रधानमंत्री का मामला है, आम आदमी के बारे में सोचकर देखिए।
अपनी साख बचाइए, नीयत ठीक करिए, अकड़ का इलाज कीजिए और अपने वादों पर अमल कीजिए, क्योंकि हमने इस सरकार में बड़ी-बड़ी चोरियां देखी हैं।
• चुनावों में वोट चोरी
• राम मंदिर में चंदा चोरी
• किसानों की जमीन की चोरी
• उद्योगपतियों द्वारा देश की संपत्तियों की चोरी
लेकिन सबसे बड़ी चोरी तब हुई, जब देश के युवाओं का भविष्य और उनके सपने चुराए गए। भविष्य और सपनों की चोरी किसी भी चोरी से बड़ी होती है।
: लोकसभा में कांग्रेस महासचिव एवं सांसद श्रीमती @priyankagandhi जी
शिक्षा कम, तमाशा ज़्यादा...
ऑनलाइन पढ़ाई के नाम पर अब छात्रों को क्या-क्या देखने को मिल रहा है।
एक छात्र लिखता है "मैम, आप ज़हर लग रही हैं।"
जवाब आता है "आओ चाटकर स्वर्ग चले जाओ।"
अगर शिक्षक ही मर्यादा भूल जाएंगे, तो छात्रों से संस्कार की उम्मीद कैसी?
लगता है अब कुछ जगहों पर अच्छा पढ़ाने वालों की नहीं, वायरल होने वालों की ज़्यादा डिमांड है। व्यूज़ बढ़ रहे हैं, लेकिन शिक्षा की गरिमा लगातार घटती जा रही है।
आप सभी का क्या कहना है इस विषय पर....
सोमनाथ की लूट का एक हज़ार साल पुराना ज़ख़्म बार-बार कुरेदकर आज के मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत की आग जलाना इतिहास नहीं, राजनीति की सबसे घटिया बाज़ीगरी है।
यह वही चाल है, जिसमें मरे हुए बादशाहों के अपराध जीवित पड़ोसियों की छाती पर रख दिए जाते हैं।
महमूद गजनवी ने सोमनाथ लूटा; यह इतिहास का प्रसंग है; लेकिन इस प्रसंग को आज के किसी दर्जी, किसी रिक्शेवाले, किसी छात्र, किसी अध्यापक, किसी कलाकार, किसी मज़दूर मुसलमान के माथे पर अपराध की तरह चिपका देना सभ्यता नहीं, सामूहिक पागलपन है।
सवाल यह है कि अगर मंदिर-लूट इतिहास का इतना ही निर्णायक पैमाना है तो फिर इतिहास को पूरा पढ़िए।
मंदिरों को केवल मुसलमान आक्रांताओं ने नहीं लूटा; सत्ता, धन और विजय की भूख ने लूटा। भारतीय राजाओं ने भी एक-दूसरे के मंदिर तोड़े, मूर्तियाँ उठाईं, राजचिह्न अपमानित किए, देवताओं को पराजित राजसत्ता का प्रतीक मानकर अपने नगरों में ले गए।
मध्यकाल का राज्य धर्मशाला नहीं था; वह तलवार, कर, खजाना, प्रतीक और प्रभुत्व का संसार था। उसे आज के नागरिकों की जाति-धर्म पहचान में बदल देना मूर्खता भी है और खतरनाक अपराध भी।
और फिर एक प्रश्न और पूछा जाना चाहिए। जो लोग सोमनाथ की लूट सुनाकर मुसलमानों के विरुद्ध ज़हर उगलते हैं, वे अयोध्या के नाम पर हुई हिंसा, 1992 का विध्वंस, और उसके बाद की आग को किस खाते में रखेंगे?
क्या आज के किसी हिंदू बच्चे को बाबरी मस्जिद गिराने वालों का वारिस घोषित कर दिया जाए? नहीं। क्योंकि सभ्य समाज व्यक्ति को उसके अपने कर्म से पहचानता है, इतिहास के अपराधों की सामूहिक वसूली से नहीं।
यही बात मुसलमानों पर भी लागू होती है।
आज का भारतीय मुसलमान महमूद गजनवी का सैनिक नहीं है। वह इसी मिट्टी का नागरिक है, इसी धूल का बेटा है, इसी देश की भाषा, भूख, मेहनत और उम्मीद में साँस लेता है। उसे गजनवी का हमलावर बनाकर पेश करना भारत की साझी नागरिकता पर हमला है।
धर्म के नाम पर इतिहास की चुनी हुई घटनाओं को चाबुक बनाना बहुत आसान है। कठिन काम है इतिहास को ईमानदारी से पढ़ना। कठिन काम है यह स्वीकार करना कि लूटेरे पहले लुटेरे थे, बाद में किसी धर्म के नाम से पहचाने गए।
सत्ता की तलवार को धर्म की आत्मा मत बनाइए।
सोमनाथ की पीड़ा स्मृति में रहे, लेकिन वह स्मृति न्याय पैदा करे, नफ़रत नहीं। राम मंदिर की आस्था रहे, लेकिन वह आस्था किसी समुदाय की नागरिकता पर शक न करे। इतिहास अगर हमें मनुष्य बनाना छोड़कर भीड़ बना दे, तो समझिए इतिहास नहीं पढ़ा गया; उसे चुनावी मंच से ज़हर में घोलकर पिलाया गया है।
जिस राज्य में बस आरोप के आधार पर बुलडोज़र जस्टिस की परम्परा शुरू की गयी, बिना ट्रायल के घर गिराए गए, उस राज्य में राम मंदिर के नाम पर इतना बड़ा शर्मनाक घोटाला हो गया तो बुलडोज़र तो दूर, केस तक दर्ज करने में हाथ कांपने लगे!
यही है समान न्याय? यही है राम राज्य की परिकल्पना ? कमजोर,वंचितों पर सरकार अपनी पूरी तरकत दिखाए और जब अपने साइड के लोग पकड़ में आ जाएं तो मौन वास में चले जाएं?
उम्मीद करते हैं हर अपराध में यही मानक उत्तर प्रदेश सरकार उठाएगी! पहले पूरी जांच! कानून का पालन होगा! तब एक्शन होगा!
राहुल गांधी : धूप, धूल और लोकतंत्र में धीरे-धीरे खुलती हुई एक शख्सियत
आज राहुल गांधी का जन्मदिन है।
भारतीय राजनीति में वे उन दुर्लभ चेहरों में हैं, जिन्हें उनके विरोधियों ने जितना कार्टून बनाया, जीवन ने उन्हें उतना ही धीरे-धीरे एक गंभीर रेखाचित्र में बदल दिया।
वे किसी तैयार सिंहासन के राजकुमार से अधिक उस व्यक्ति की तरह दिखते हैं, जिसे इतिहास ने बहुत जल्दी शोक, सुरक्षा, अकेलेपन और सार्वजनिक अपमान की पाठशाला में बैठा दिया था।
राहुल गांधी के बारे में दस बातें ऐसी हैं, जिन्हें लोग अक्सर नहीं जानते या गंभीरता से नहीं पढ़ते।
पहली, उनकी प्रारंभिक पढ़ाई दिल्ली के सेंट कोलंबा स्कूल और फिर देहरादून के दून स्कूल में हुई।
दूसरी, इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सुरक्षा कारणों से उन्हें और प्रियंका गांधी को घर पर पढ़ाया गया।
तीसरी, वे दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफंस कॉलेज में भी रहे।
चौथी, वे हार्वर्ड गए, लेकिन राजीव गांधी की हत्या के बाद सुरक्षा के कारण अमेरिका के फ्लोरिडा स्थित रोलिंस कॉलेज में शिफ्ट हुए।
पाँचवीं, उन्होंने 1994 में स्नातक की डिग्री ली।
छठी, 1995 में ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज से डेवलपमेंट स्टडीज़ में एमफिल किया।
सातवीं, राजनीति में आने से पहले वे लंदन की मैनेजमेंट कंसल्टिंग फर्म मॉनिटर ग्रुप में काम कर चुके हैं।
आठवीं, भारत लौटकर उन्होंने मुंबई में बैकऑप्स सर्विसेज नाम की टेक्नोलॉजी आउटसोर्सिंग कंपनी शुरू की।
नौवीं, वे आइकिडो में ब्लैक बेल्ट हैं—यानी उनकी राजनीति में जो संयम दिखता है, उसके पीछे शरीर और मन की एक अनुशासित साधना भी है।
दसवीं, वे स्कूबा और फ्री-डाइविंग के शौकीन हैं; पानी की गहराई में उतरना शायद उन्हें भीड़ के शोर से बाहर अपना मौन देता होगा।
राहुल गांधी की खास बात यह है कि वे अब केवल एक परिवार के उत्तराधिकारी नहीं रह गए। भारत जोड़ो यात्रा के बाद वे उन पैरों वाले नेता बने हैं, जो सड़क की धूल से अपनी भाषा बनाते हैं। कोटा में छात्रों के बीच खड़े होकर जब वे शिक्षा-व्यवस्था की निर्ममता पर बोलते हैं, तो लगता है कि यह आदमी अपनी निजी त्रासदी से आगे बढ़कर अब सार्वजनिक पीड़ा की भाषा सीख चुका है।
उन्हें जन्मदिन की असीम शुभकामनाएँ।
@RahulGandhi
प्रदेश की राजनीति में यह साहस दिखाने का साहस सिर्फ़ राजेंद्र गुढ़ा में ही है
इस्लामपुर का नाम क्यों बदले; यह सवाल राजेंद्र गुढ़ा ही पूछ सकते हैं
राजस्थान की आज की राजनीति में जहाँ अधिकांश नेता बोलने से पहले सत्ता की दिशा, जातीय गणित, धार्मिक ध्रुवीकरण और सोशल मीडिया की संभावित प्रतिक्रिया नापते हैं, वहाँ राजेंद्र सिंह गुढ़ा का इस्लामपुर के पक्ष में खड़ा होना एक दुर्लभ राजनीतिक साहस है।
यह केवल किसी गाँव का नाम बचाने की लड़ाई नहीं; राजस्थान की उस साझी विरासत की रक्षा का प्रश्न है, जिसमें नामों को धर्म की प्रयोगशाला में रखकर नहीं, इतिहास और जनजीवन की स्वाभाविक स्मृति से देखा जाता है।
विवाद झुंझुनूं के इस्लामपुर गाँव का नाम बदलकर श्रीरामपुर करने के प्रस्ताव से शुरू हुआ।
झुंझुनूं से भाजपा विधायक राजेंद्र भांबू ने 17 फरवरी को मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर नाम परिवर्तन की अनुशंसा की थी। इसके बाद मुख्यमंत्री कार्यालय ने 29 मई को जिला प्रशासन से रिपोर्ट और टिप्पणियाँ माँगीं।
अभी नाम बदला नहीं गया है, किंतु प्रशासनिक प्रक्रिया शुरू होते ही ग्रामीणों ने विरोध प्रारम्भ कर दिया। उनका कहना है कि इस्लामपुर का नाम उसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है तथा इसे बदलने का कोई ठोस ऐतिहासिक आधार प्रस्तुत नहीं किया गया।
मूल प्रश्न यही है—इस्लामपुर का नाम आखिर क्यों बदला जाए?
क्या केवल इसलिए कि उसके नाम में ‘इस्लाम’ आता है? क्या किसी स्थान का मुस्लिम-संदर्भ वाला नाम अपने आप में अपराध, पराजय या अपमान है?
यदि ऐसा है तो राजस्थान के इतिहास, भाषा, स्थापत्य, संगीत और लोकसंस्कृति के उस बड़े हिस्से का क्या किया जाएगा, जिसे हिंदुओं और मुसलमानों ने सदियों में मिलकर रचा है?
राजेंद्र गुढ़ा ने इस प्रश्न को भाषण तक सीमित नहीं रखा।
उन्होंने ग्रामीणों के साथ इस्लामपुर से झुंझुनूं कलेक्ट्रेट तक लगभग 22 किलोमीटर की पदयात्रा की। भीषण गर्मी में चलते हुए उनकी तबीयत बिगड़ी और वे कलेक्ट्रेट के सामने गिर पड़े।
समर्थकों ने पानी के छींटे दिए, हवा की, लेकिन उन्होंने अस्पताल जाने से इनकार कर दिया। उनका कहना था—जब उनके साथ आए लोग धूप में खड़े हैं तो वे स्वयं छाया में कैसे चले जाएँ?
गुढ़ा ने स्पष्ट कहा कि इस्लामपुर में जन्मे मुस्लिम कोई बाहरी व्यक्ति नहीं, बल्कि इसी मिट्टी और समाज के अभिन्न अंग हैं। यह कथन सामान्य दिखाई दे सकता है, लेकिन वर्तमान राजनीतिक वातावरण में इसे सार्वजनिक रूप से कहना असामान्य साहस की माँग करता है।
राजेंद्र गुढ़ा की राजनीति से असहमति हो सकती है, उनके अनेक पुराने वक्तव्यों और राजनीतिक यात्राओं की आलोचना भी की जा सकती है; किंतु जहाँ वे सही हैं, वहाँ उनकी निर्भीक प्रशंसा होनी चाहिए।
उन्होंने बताया है कि राम का सम्मान करने के लिए इस्लाम का नाम मिटाना आवश्यक नहीं। श्रीराम भारतीय चेतना के महान प्रतीक हैं, लेकिन उनके नाम को किसी आबादी की ऐतिहासिक पहचान के विरुद्ध राजनीतिक हथियार बना देना स्वयं राम की मर्यादा के प्रतिकूल है।
आज राजस्थान को ऐसे ही नेताओं की आवश्यकता है, जो लोकप्रिय हवा के साथ बहने के बजाय कभी-कभी उसके सामने खड़े होकर पूछ सकें—नाम बदलने से पहले बताइए, इस गाँव का दोष क्या है?
@RajendraGudha
प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी केंद्र सरकार को इस बात के लिए घेरा करते थे कि वह आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को दुनिया में अलग-थलग करने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति पर दबाव डाले।
अब क्या मौजूदा केन्द्र सरकार वैसा ही दबाव अमेरिकी राष्ट्रपति पर डाल पा रही है? नाह!
उल्टा ट्रंप तो पाकिस्तान की शान में एक से बढ़ कर एक कसीदे पढ़ते नहीं थक रहे!
अमेरिका हमारे तीन इंडियन को होर्मुज में हमले में मार देता है! तीन दिन में तीन हमला! अभी भी कुछ लोग गायब हैं! इन लोगों की अपील के बाबजूद अमेरिका हमला करता है! हमले के बाद अमेरिका गलती तो नहीं हो मानता है बल्कि इसे सही ठहराते हुए उसका वीडियो जारी करता है।
लेकिन इस घटना के बाद भारत की चुप्पी बहुत ही शमर्नाक है! औपचारिक टाइप रोष जताकर मामला समाप्त कर दिया है! खुद को राष्ट्रवादी बताने वाली सरकार मामले पर आक्रोश दिखाने की जगह इसे हलके में ले रही है! ईरान तक ने भारत के पक्ष में बयान दिया!
लेकिन एक न्यूज़ चैनल के रिपोर्टर तो लम्बा चौड़ा पोस्ट लिखकर इस एक्ट को जस्टिफाय तक कर दे रहे हैं!
कहाँ गया गुस्सा ? क्या सारा गुस्सा अब अपने ही लोगों को नीचे दिखाने के लिए रखने लगे हैं?
याद कीजिये जब मनमोहन सिंह की सरकार थी तो किस तरह हमारे एक अधिकारी के साथ अमेरिका ने गलत किया था हमने उनके दूतावास से साडी सुरक्षा वापस ले ली थी!
भारत को इस मामले में बहुत कड़ा स्टैंड लेना चाहिए था! और आप टीवी मीडिया से तो अब कोई उम्मीद नहीं कर सकते हैं की वे आमजन के लिए खड़ा हो! या आप इसे ही बड़ी बात कह सकते हैं की दूरदर्शन या कोई दूसरे कुछ लोगों मरे भारतीय को पाकिस्तान से मिला हुआ नहीं बताया! इसके लिए आप इन्हें धन्यवाद दे सकते हैं। हमारी मीडिया अभी अपनी जनता नहीं ईरान के लोगों के रोटी को गिनने में लगी है। इसीलिए उनसे कोई उम्मीद न रखें!
ईरान ने अमेरिकी हमले में तीन भारतीयों के मारे जाने की निंदा की
ईरान विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाक़ई ने कहा
“भारतीय कमर्शियल जहाज़ों पर U.S. के क्रूर हमले, जिनमें कम से कम तीन भारतीय नागरिक मारे गए हैं, अमेरिका की हथियारों के साथ लूट और सरकारी चोरी की चल रही पॉलिसी का साफ़ सबूत हैं।
हम मारे गए भारतीय नाविकों के परिवारों और दोस्तों के प्रति अपनी सहानुभूति जताते हैं और भारतीय लोगों और सरकार के प्रति अपनी सच्ची संवेदनाएं व्यक्त करते हैं।
इंटरनेशनल कम्युनिटी को यूनाइटेड स्टेट्स को उसके कानून के खिलाफ काम के लिए ज़िम्मेदार ठहराना चाहिए, जो दुनिया की शांति और सुरक्षा के लिए ख़तरा बना हुआ है और नेविगेशन की आज़ादी को भी खतरे में डाल रहा है।
अभी मूल मुद्दा है-
-NEET पेपर लीक
-सीबीएसई का ध्वस्त सिस्टम
-CUET एग्जाम में अव्यवस्था
-अभी बढ़ती महंगाई
-युद्ध और नीतिओं के कारण आर्थिक सुस्ती
-डॉलर के मुक़ाबले रुपया का कमज़ोर होना
-एलनीनो की आशंका के बीच कृषि के प्रभावित होने का डर
बाक़ी सब डायवर्सन है!
जनसत्ता के कोलकाता और चंडीगढ़ संस्करण के संपादक रहे और बेबाकी से लिखने वाले सुविख्यात पत्रकार शंभुनाथ शुक्ल बड़ा ही सुंदर और चुटीला लिखते हैं। आज उन्होंने फेसबुक पर पंडित जवाहरलाल नेहरू का एक संस्मरण लिखा है, जो बहुत ही पठनीय है। पढ़िए :
नेहरू को मैंने नहीं देखा!
नेहरू जी जिस दिन मरे, उसी दिन मेरा रिजल्ट आया था। मैं पाँचवीं कक्षा के बोर्ड इम्तिहान में पास हो गया था और छठे दरजे के लिए कानपुर में तब के एक अव्वल स्कूल नगर महापालिका गांधी स्मारक इंटर कालेज, गोविंद नगर में मुझे प्रवेश मिल गया था। मैं उसके एडमिशन टेस्ट में भी पास हो गया था और कालेज के सूचना पट्ट पर 40 छात्रों की जो सूची लगी थी उस पर मेरा भी नाम था। यह बताने के लिए मैं घर की तरफ भागा। लेकिन घर आकर देखा कि पिताजी खुद घर पर हैं और उदास-से हैं। मैंने उनकी उदासी को अनदेखा करते हुए कहा पिताजी मैं पास हो गया। मगर पिताजी कुछ नहीं बोले। मैंने फिर कहा लिस्ट में मेरा नाम है, पर पिताजी फिर चुप। तब मैंने पूछा क्या हुआ? पिताजी ने बताया कि चाचा नेहरू नहीं रहे। अम्माँ सुबक रही थीं और दादी भी। आसपास के सारे लोग रो रहे थे। वहां पंजाबियों की बस्ती थी मगर वे भी उदास थे। हालांकि पंजाबी नेहरू जी को पसंद नहीं करते थे।
बाहर आकर देखा कि नीलम की झाई से लेकर बाबा बस्तीराम तक सब पूछ रहे थे कि रेडियो किस के पास है। पर पूरे छह ब्लाक में किसी के पास रेडियो नहीं। तब हम सब बी ब्लाक स्थित एक शुक्ला जी के घर को भागे। शुक्ला जी वहां एक इंटर कालेज में फिजिक्स के लेक्चरर थे और उनके घर पर रेडियो से लगातार सूचनाएं प्रसारित हो रही थीं। उनके घर के बाहर मेला लगा था। ठठ के ठठ लोग जुटे थे और रो रहे थे। हम वहां शाम तक रहे और सबके सब चुपचाप आंसू बहाते वहां बैठे रहे। सूचना आई कि तमिलनाडु में एक औरत ने आत्मदाह कर लिया।
कुछ लोगों को भरोसा ही नहीं हो रहा था कि अब देश का क्या होगा। तब किसी ने नहीं कहा कि उनकी बेटी तो है। सब यह सोच रहे थे कि देश फिर गुलाम हो जाएगा क्योंकि एक ऐसा आदमी चला गया जिसका कोई जोड़ीदार नहीं था। देर रात हम लौटे। मां तब तक जाग रही थीं।
पिताजी को छोड़कर किसी ने नेहरू जी को देखा नहीं था लेकिन नेहरू का नाम ही सबको सिहरा देता था। मरे आदमी को जीवन दे सकता था। नेहरू जी मर गए, नेहरू जी मर सकते थे, ऐसा सोचना भी असंभव लग रहा था। इसके बाद नेहरू जी अंत्येष्टि और उनकी अस्थियों का संगम में प्रवाह देखने हेतु लोग इलाहाबाद गए। पिताजी मुझे तब पहली बार संगम ले गए थे। वहां की भीड़ देखकर लगा कि महाकुंभ शायद ऐसा ही होता होगा। आज नेहरू जी को दिवंगत हुए 62 साल हो गए।
केंद्र सरकार नेहरू जी की स्मृति में एक सरकारी स्तर पर आयोजन करे। भले वे कांग्रेस पार्टी के रहे हों मगर नेहरू जी वह प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने कभी भी जनसंघ (जो बाद में भारतीय जनता पार्टी बनी) को नेस्तनाबूद करने की तमन्ना नहीं की। उलटे 1957 में जनसंघ के युवा सांसद अटलबिहारी वाजपेयी ‘भारत की विदेश नीति’ पर अपना ओजस्वी भाषण देकर जब अपनी सीट पर बैठे तो प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने उनकी वक्तृता की प्रशंसा की। अभिभूत वाजपेयी ने उनके पैर छुये, तो उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि यह युवा सांसद एक दिन देश का प्रधानमंत्री बनेगा। उन ब्राह्मण पंडित नेहरू की भविष्यवाणी सच निकली। अटल जी ने भी नेहरू की बेटी को देवी दुर्गा बताया था। उस विभूति को याद करना चाहिए जो आज के भारत का भाग्यविधाता था।
#JawaharLalNehru #पंडितजवाहरलालनेहरू #पंडित_जवाहर_लाल_नेहरू #जवाहरलाल_नेहरू #नेहरू #प्रथम_प्रधानमंत्री #प्रथमप्रधानमंत्री #आधुनिकभारत #आधुनिकभारतकेनिर्माता
“हाथ कंगन को आरसी क्या,
पढ़े-लिखे को फ़ारसी क्या!”
PIB के अधिकृत बयान के अनुसार, आज से ठीक बारह साल पहले 26 मई 2014 को जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सत्ता संभाली थी, उस दिन भारतीय basket का कच्चा तेल $108.05 प्रति बैरल था और डॉलर-रुपया exchange rate 58.59 रुपए थी। उस समय पेट्रोल ₹71.51 और डीज़ल ₹56.71 प्रति लीटर मिल रहा था।
आज कच्चे तेल की कीमत $99 प्रति बैरल से कम है, लेकिन पेट्रोल और डीज़ल के दाम बढ़कर क्रमशः ₹102.12 और ₹95.20 प्रति लीटर हो गए हैं।
यानी कच्चा तेल सस्ता हुआ, लेकिन पेट्रोल करीब 42.8 % और डीज़ल करीब 67.9 % महँगा हो गया।
हर अर्थशास्त्री जानता है कि पेट्रोल-डीज़ल की महँगाई का असर हर क्षेत्र पर पड़ता है। परिवहन से लेकर खाद्य वस्तुओं तक, आम आदमी पर महँगाई की मार बढ़ती है। इसके बावजूद सरकार की मुनाफ़ाख़ोरी जारी है।
सवाल सीधा है कि जब कच्चा तेल सस्ता हुआ, तो पेट्रोल-डीज़ल महँगा क्यों?
जनता को राहत क्यों नहीं?
आज़ादी मिलने के तुरंत बाद नेहरू ने जिस अन्दाज़ में एक के बाद एक संस्थाओं को खड़ा किया,देश को दिशा दी,आज भी वे संस्थाएँ हमारे तंत्र की रीढ़ है। आज़ादी मिलने के तुरंत बाद वह लग गये बिना रोये कि 200 साल से ग़ुलाम रहे और उसका बहाना बनाकर।
उस वक़्त खड़ी की गई तमाम संस्थाएँ आजादी के बाद सालों के बेमिसाल सफर की पटकथा लिखने वाली है।वह एक विजनरी लीडरशिप की पहचान थी। उनके योगदान को कभी कमतर नहीं कर सकते हैं
न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने पीएम केयर्स फंड को लेकर दायर की गई जनहित याचिका खारिज कर दी।
अदालत ने याचिका की मंशा पर सवाल उठाते हुए याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार लगाई और अपमानजनक टिप्पणी की।
याचिकाकर्ता को कहा गया कि वह ......“लुधियाना वापस जाकर दो-तीन और स्वेटर बेचें”
माय लॉर्ड यही तो याचिकाकर्ता भी और यह देश भी जानना चाहता है कि "पीएम केयर्स फंड" की जानकरी छुपाने के पीछे की आखिर मंशा क्या है ?
पीएम केयर्स फंड में कब, किससे, कितने पैसे आए और उसे कब, कहां, कितना, कैसे खर्च किया गया? इतनी साधारण सी बात जाहिर न करने के पीछे सरकार की आखिर मंशा क्या है?
लोकमान्य सच और अनुभवजन्य सच तो यही कहता है कि जहां गड़बड़ घोटाला होता है, वहीं परदादारी की जाती है, इतनी सी छोटी बात न समझने वाली अदालत की आखिर मंशा क्या है ?
अदालत का कर्तव्य नागरिक अधिकार और संविधान का संरक्षण है न कि सरकार का कवच बनना।
माय लॉर्ड क्या आपको नहीं लगता कि जो अदालत अपना डर और अपनी झेंप छुपाने के लिए याचिकाकर्ता को अपमानित करने पर उतर आए उसकी मंशा पर देश को सवाल उठाना चाहिए ?
राजीव का अखण्ड भारत!!!
अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मालदीव- सात देश। मगर एक वीजा, एक मुद्रा, बाधाहीन व्यापार
लोगो का आना जाना मुक्त
कार्य, व्यापार, सेवाएं मुक्त
अपने अपने स्टेट की अपनी सरकारें हो, जैसे तमिलनाडु और बंगाल में हैं। पर एक दूसरे की सहयोगी हो। यही सार्क का विजन था।
किसी महादेश के और क्या लक्षण होते हैं।
●●
सार्क का गठन EU की तर्ज पर हुआ। वक्त के साथ एक एक कदम बढ़ाते यूरोपियन देश, एक साझा यूरोप बना चुके है।
उनकी एक मुद्रा, यूरो है। मुक्त व्यापार है। सीमाओं पर बड़ी ऊंची इलेक्ट्रिक फेन्स नही, और न गश्त करते जवान। हाइवे पर जहां देश बदलते है, वहां टोल नाकों की तरह नाके है बस।
ग्रामीण इलाकों में तो कोई सीमा ही नही। आप एक देश के गांव मे सब्जी उगाइये। चार किमी दूर, दूसरे देश के कस्बे में बेच आइये।
●●
एक पास लीजिये, यू-रेल पास कहते है, पूरा यूरोप घूमिए। एक वीजा, शेन्ज़ेन 27 देशो में मान्य हैं।
फ्रांस से वीजा लीजिये, इटली, ऑस्ट्रिया, स्विट्जरलैंड घूमते हुए, जर्मनी से वापसी कीजिये। न कांटेदार फेन्स, न नफरत और पैर पटकते, मुंह चमकाते सैनिक..
सीमाएं फांदते आपको लगेगा नही, कि ये देश एक दूसरे के खिलाफ, मानवता का सबसे भीषण युध्द लड़ चुके हैं।
●●
1985 में सार्क बना था। राजीव ढाका पहुंचे थे। और सार्क का डिटेल विजन दिया था।
सबसे बड़े देश के पीएम होने के नाते राजीव का बड़प्पन ही सार्क की नींव था। बड़े की भूमिका को उन्होंने निभाया भी।
पड़ोसी देशों को फेवरेबल डील दी, इन्वेस्टमेंट दिया, ग्रांट दी। सार्क का मुखिया नेपाल को बनाया। सबको प्यार, इज्जत दी।
उनकी पकड़, और हिंदुस्तान का वकार बढ़ता गया। हर देश संकट में नई दिल्ली की ओर देखता। मालदीव में सेना भेजकर उन्होंने गयूम की सरकार को तख्तापलट से बचाया।
तो श्रीलंका में शांति सेना भेजी,
जिस वजह से उनकी जान भी गयी।
●●
राजीव के बाद सार्क धीमी गति से आगे बढ़ा। कारगिल, एटम बम, ऑपरेशन पराक्रम, बंगलादेश से सीमा विवाद आदि से सार्क बेदम हो गया।
लेकिन मनमोहन के समय सार्क को फिर गति मिली। फ्री ट्रेड के कई एग्रीमेन्ट हुए। SAFTA फ्री ट्रेड जोन बना। SAF गेम्स होते थे।
●●
मगर अंततः सार्क का मलीदा निकल गया है।
दरअसल,परिवार जब बड़ा होता है, सबको स्पेस की जरूरत होती है। संयुक्त परिवार की सफलता का राज म्यूचुयल रिस्पेक्ट है।
परिवार का सबसे बड़ा बन्दा, हेकड़ी और अहंकार दिखाने लगे, परिवार की हर बैठक में औरो को चाकर समझे। छोटों की संपत्ति, भूमि, बहू बेटियों पर निगाह रखे,
जलील करे, सुपीरियरिटी झाड़े..
तो परिवार भी संयुक्त रह नही सकता।
●●
सार्क, जो अखण्ड भारत का संयुक्त परिवार था, पाकिस्तान भारत के झगड़ों, और अब मोदी सरकार के अहंकार का शिकार होकर वहां नही पहुंच सका,
जहां यूरोपियन यूनियन जा चुका।
आज मिलकर यूरोपियन स्पेस एजेंसी बना चुके हैं। डॉलर से ज्यादा कीमत उनकी संयुक्त मुद्रा की है।
●●
यह सब इसलिए कि सब एक दूसरे की इज्जत करते हैं। जर्मनी फ़्रांस इसके युधिष्ठिर भीम हैं, बाकी बराबर के भाई।
एक सँयुक्त परिवार।
यूरोपियन पार्लियामेंट भी है।
ब्रिटेन भी मेम्बर था, पर अपने राष्ट्रवादी नेताओ के चक्कर मे एग्जिट कर गया। उसके बाद से ब्रिटेन के हालात गम्भीर हैं। राष्ट्रवादियों की हालत सांप छछूंदर है। ब्रिटेन जिसे इस संघ का सबसे ज्यादा लाभ था, अपने अहंकार का फल भुगत रहा है।
और हम भी..
●●
सार्क का मुख्यालय आज भी काठमांडू में है।
पर काठमांडू हमें आंख दिखा रहा है। बाग्लादेशी तो सब घुसपैठिये हैं। मालदीव ने आपका मिलिट्री अड्डा उड़खवा दिया। भूटान, इंडिया को बाईपास कर चीन से सीधे डील कर रहा है। श्रीलंका चीनी अड्डा हो गया है।
और पाकिस्तान से तो खैर, रोज सुबह शाम POK लेने की कसमें खाते जी रहे हैं।।रोज रात हमे पीओके में प्लाट के सपने आते हैं।
हम पहाड़ियों, रन और रेगिस्तानों की बंजर भूमि के लिए बेटे कुर्बान करते रहे है। दरअसल हम दिल से कबायली है, जो कटने मरने को गौरव समझते हैं।
●●
अब तो पाकिस्तान भी पलट कर बयान देने की जहमत नही उठाता। दोनो तरफ के टीवी एंकर और छुटभैये ही लड़ लेते हैं।
दरअसल, मुसलमानो के प्रति अथाह नफरत, और छोटे देशो के प्रति हमारे घमंडी, बदतमीज डिप्लोमेसी ने, सार्क की हत्या करर दी है।
उसकी लाश, हमारे आंगन में पड़ी है।
●●
मगर ठीक से सार्क देशों का नक्शा देखिए।
सार्क वही अखण्ड भारत, वह नाभि की कस्तूरी है, जिसे खोजने के लिए आप मशीन का गलत बटन दबा रहे हैं।
भारत के लोगों, याद रखना। भारत अखण्ड अगर कभी बना.. तो दंगाई और गुंडा साइकोलॉजी से नही, मोहब्बत से, सलाहियत से ,
बड़प्पन से बनेगा।
राजीव की राह पर चलकर बनेगा।
🙏❤️