13
धर्म के केंद्र में, सद्गुरु है सदा
बहिर्पूजा नहीं, धर्म की आत्मा
तंत्र मंत्र अधोर पंथ भटकाव है
धर्म के नाम पर, सब उलझाव है
14
जिसने जाना न आत्मा, धिक्कार है
गुरु होने का उसको न अधिकार है
मंत्र लेना देना इक, शिष्टाचार है
तत्त्व की बात वस्तुतः निराकार है
15
तुम सभी की भक्ति से मैं चकित हूँ
देखकर सेतु सुंदर मैं प्रसन्न हूँ
मेरे मन में है उठती संकल्पना
इच्छा है करूँ शिव की स्थापना
16
शिव सगुण ब्रह्म हैं मेरे आराध्य हैं
मेरे भक्तों के सर्वथा पूज्य हैं
जो मुझे प्रेम करते, उन्हें पर नहीं
भक्ति का फल उनको, है मिलता नहीं
-समर्थगुरु, लंका कांड
श्री सिद्धार्थ रामायण
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