गोंडा रेलवे स्टेशन पर ड्यूटी निभाते हुए GRP सिपाही आकाश सिंह ने बहादुरी की मिसाल पेश की।
हिरासत से भाग रहे चोर को पकड़ने के लिए दौड़े और ट्रेन की चपेट में आ गए।
इस हादसे में उनके दोनों पैर चले गए, लेकिन घायल हालत में भी आरोपी को नहीं छोड़ा।
घटना मंगलवार रात करीब 12 बजे की है। जख्मी होने के बाद भी सिपाही आकाश सिंह (29) ने चोर सुनील कुमार (35) को पकड़ लिया। चीख-पुकार सुनकर GRP थाने से पुलिसकर्मी मौके पर पहुंचे और आरोपी को दबोच लिया।
मऊ के रहने वाले सिपाही आकाश को पहले गोंडा मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया, जहां प्राथमिक इलाज के बाद उन्हें लखनऊ KGMU ट्रॉमा सेंटर रेफर किया गया। डॉक्टरों के मुताबिक दोनों पैरों को बचाया नहीं जा सका। फिलहाल उन्हें ICU में रखा गया है और हालत खतरे से बाहर बताई जा रही है।
सलाम है ऐसे जांबाज सिपाही को, जिसने दर्द से ऊपर उठकर अपना फर्ज निभाया। 🙏🇮🇳
बहुत मुश्किल होता है कई बार पत्रकार होते हुए भी भावनाओं पर कंट्रोल में। यहां नहीं कर पाया
किसी फ़िल्म फेस्टिवल में दिखाने से बेहतर हमने सोचा ये डॉक्यूमेंट्री जिसपर बनी है,जिनके पास ना मोबाइल,TV नहीं है,उन्हें दिखाया जाए।पहला Premiere मुसहर टोली में
आज आखिरी बार काशी आएंगे काशी के अपने सबसे दुलारे सप्तक, पद्मभूषण छन्नूलाल जी। कुछ देर बड़ी गैबी वाले घर की दीवारों को अलविदा कहने। जहां आने और रहने पिछले कई सालों से छटपटाते रहे।
और फिर मसाने की होरी गाकर जिस मणिकर्णिका के हवाले शवों की राख से होली को काशी के उत्सव की धुन बनाया, वहां हमेशा के लिए बाबा की हथेली पर सो जाने। क्या कहते हैं उसे, चिरनिद्रा…।
बात फरवरी की है। सुरों के आला को मृग छौने सा ढूंढती मैं मीरजापुर पहुंची थी। इससे पहले उन्हे जमीन पर मसनत लगाए भारत भवन के मुक्ताकाश मंच पर सुना था। बनारस में वो ढूंढे नहीं मिल रहे थे। बेमन से मीरजापुर रह रहे थे। मीरजापुर में उन्हें दुनियादारी ने दुनिया वालों से छुपा रखा था। गंगा के दुलारे का मीरजापुर में जरा भी मन नहीं लग रहा था। वो कह नहीं पाते थे, पर उन्हें बनारस बहुत याद आता था।
बाहर बोर्ड लगा था - संगीत संत पद्म विभूषण पंडित छन्नूलाल मिश्र, मिलने का समय सायंकाल 7 से 9 बजे।
भीतर, अस्पताल वाले बेड जिसे ऊपर, नीचे कर सकते हैं, उस पर वो बिना हिले-डुले लेटे हुए थे। चेहरा मुरझाया सा। हां, लेकिन लाल गोल तिलक उनकी पुरातन शनाख्त सा ललाट पर धरा हुआ था। तार्रूफ करवाया गया। मेरे नाम के साथ बनारस सुनकर उनकी आंखें तारों सी टिमटिमाने लगीं।
मैंने पूछा, बनारस याद आता है? क्या-कुछ याद आता है?
बोले - हमारा पूजा करना याद आता है। छोटी गैबी में रहते थे। कहने के लिए छोटी गैबी है लेकिन है बड़ी गैबी। कौन सा गाना ध्यान आता है तो कहते हैं बहुत दिन हो गया। लेकिन शिष्यों को सिखाते थे। सब फरमाइश करते थे गुरुजी सुनाइए। खेले मसाने में होरी।
हमने कहा गुरुजी हमें भी सुना दीजिए तो बोले, दरअसल…खाने का और गाने का मन नहीं कर रहा है। पीछे से उनका केयरटेकर टोकते हुए कहता है - डॉक्टरवा मना किए हैं अभी बोलने, गाने को।
पर वो कहा रुकने वाले, वो गाने लगते हैं। चार अधूरी लाइनें गाए ही थे कि शब्द लड़खड़ाने लगते हैं। वो बोले- शब्दवा भूल जात हैं।
कुछ देर बाद कहते हैं, काशी में प्रोग्राम करेंगे। स्वास्थ्य ठीक रहा तो काशी के घाट पर करेंगे। मैंने पूछा - मसाने में होरी सुनाएंगे, तो कहने लगे वो हमीं ने बनाया है। फिर वो अचानक मसाने में होरी गाने लगते हैं। बीच-बीच कुछ शब्द बिसर जाते हैं। फिर क्षण भर सांस लेकर ऊंचा-नीचा सुर लगा गाने लगते हैं…. चिताभस्म भरी झोरी,दिगंबर मसाने में होरी। फिर आखर-आखर गाना समझाने लगते हैं…. होली में कौन कौन था, गोपन गोपी, श्यामन राधा।
वो अब थकने लगे थे। वहां तैनात उनका केयरटेकर घूर घूर कर जाने का इशारा कर रहा था। कभी पानी पूछकर तो कभी मिठाई सामने परोस कर। तभी मैंने संगीत के देवता का कंपकंपाता हाथ खुदई उठाकर अपने सिर पर धर लिया।… चलिए जल्दी से आशीर्वाद दे दीजिए। जैसे ही मैंने कहा वो जरा सा मुस्कुरा दिए।
काशी और उसे घाट में तुरपे मसाने की होरी, ठुमरी, दादरा, चैती, कजरी के राग आज हमेशा के लिए याददाश्त का सबसे जहीन टुकड़ा बन गया है।
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🌒🌓🌔🌕
जब चंद्रग्रहण होता है,
तो आकाश मानो मौन होकर
मनुष्य को एक शिक्षा देता है
कि हर जीवन में ऐसे पल आते हैं,
जब रोशनी ढक जाती है
मगर धैर्य रखने वाले ही समझते हैं
कि वो छाया असली नहीं,
जल्द गुजरने वाला बस एक अध्याय है ।।
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