अत्याचारों की हुनरबाजी को जेंडर न्यूट्रल करने की ये कैसी जिद है
आप महिला हैं। इसका फायदा उठाइए। जमकर।
मैट्रो में पुरुषों को उठाकर अपने लिए सीट मांगिए। बैंक, बिजली बिल भरनेवाली खिड़की पर अलग लाइन लगवाइए। पीरियड्स के लिए चार दिन की पेड लीव ले लीजिए। सब्सिडी, डिस्काउंट, अनुदान, बीमा, रजिस्ट्री, सहायता, योजना, परियोजना में आधी आबादी का चोगा पहन चाहे जितनी हिस्सदारी हड़प लीजिए। सिर्फ इसलिए कि आपके जीन में दो एक्स गुणसूत्र हैं, आप फीस, फॉर्म और फैशन के बही खाते में भरपल्ले छूट भी झपट लीजिए। और तो और इमोशन के मखमल में लिपटे कानून, कॉन्सटीट्यूशन भी अपने हक में करवा लीजिए।
…बस इन सब मोहलतों और तरजीहों का इतना फायदा मत उठाइए कि किसी के लिए ये घुटन की पराकाष्टा बनकर हाईड्रोजन सायनाइड ही बन जाए।
अब आप ही सोचिए। रोते हुए पुरुष क्या अच्छे लगते हैं? ये जिंदगी की किताब में इमोशन वाला पन्ना औरतों के हिस्से ही रहने देते हैं ना। क्यों न एम्पावरमेंट की होड़ नौकरी-पढ़ाई तक महदूद रखी जाए। फिर भला बदसलूकी, अपराध, प्रताड़ना की बारहखड़ी में बराबरी की कैसी तुक?
वो सुना होगा ना, फलानी परीक्षा में बेटियों ने बाजी मारी। फूल के कुप्पा हो गई होंगी मम्मियां-मौसियां। लेकिन क्या ये जानते हैं कि हमारे देश में आत्महत्या के मामले में पुरुष महिलाओं से आगे हैं। एक सर्वे की मानें तो प्रताड़ित पुरुषों का सबसे बड़ा डर ये होता है कि असली पीड़ित महिला को मान लिया जाएगा। क्या आप जानते हैं घरेलू हिंसा रोकने महिलाओं के लिए कानून बने हैं, लेकिन इससे जुड़ी 40 प्रतिशत शिकायतें पुरुषों की होती हैं। सेव इंडियन फैमिली फाउंडेशन कहता है देश में 90 प्रतिशत पुरुष शादी के तीन साल में कम से कम एक बार घरेलू हिंसा का सामना करते हैं। थोड़ा सा और हैरान हो लीजिए कि दहेज कानून धारा 498ए देश में सबसे ज्यादा दुरुपयोग किया गया कानून है।
लेकिन फिर भी आस्था और एतबार की भाषा बिना सोचे, समझे, दिमाग का चौथाई टुकड़ा भी इस्तेमाल किए बगैर फैसले सुना दिए जाते हैं। इरादे पूछे-पढ़े बिना माथे पर निष्कर्ष लिख दिए जाते हैं। अत्याचारों की हुनरबाजी को जेंडर न्यूट्रल करने की ये कैसी जिद है।
#WomenEmpowerment #Balance @yv_post
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