जंतर-मंतर प्रोटेस्ट में पिज्जा और रसमलाई खाकर नारेबाजी करते आंदोलनकारी ,
कुछ हराम कहेंगे कि झारखंड के आदिवासी छात्र अन्याय के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे और कोई उनकी सुन नहीं रहा
देखिए, मैं एकदम स्पष्ट करता हूं। इससे पहले भी अनेक छात्र आंदोलन हुए।
इमरजेंसी का आंदोलन बहुत भयानक परिस्थितियों में था, सबको उठा-उठाकर जेल में डाल दिया गया था। लेकिन उस समय युवाओं के मन में अपने नेतृत्व के प्रति विश्वास था। इसलिए युवा जयप्रकाश नारायण जी, चौधरी चरण सिंह जी, चंद्रशेखर जी और अटल बिहारी वाजपेयी जी के पास गए।
आज सवाल यह है कि युवा विपक्ष के पास क्यों नहीं जा रहा? क्योंकि उसे विश्वास नहीं कि विपक्ष उनके विषय को ईमानदारी से उठाकर समाधान दिला सकता है।
आज अगर यदि बच्चे गुमराह हो रहे हैं, तो समाज के साथ-साथ माता-पिता को भी सजग रहने की आवश्यकता है।
प्रधानमंत्री जी ने परिवार के अभिभावक के रूप में भारतीय परंपरा की उस सूक्ति का पालन किया “क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात।”
आज जो गलती हुई है, वह नौजवान तो भटका हुआ नौजवान है। मगर उससे ज्यादा सावधान रहने की जरूरत उस सत्ता की लालच में पक्की दाढ़ी वाले, लटके हुए नौजवान से है। लालच में लटका हुआ नौजवान ज्यादा खतरनाक है, इसलिए बच्चों को उनसे बहुत सावधान रहने की जरूरत है।
रांची में छात्रों का जबरदस्त प्रदर्शन!
- लेफ्टिस्ट्स गायब
- जुनैद का भंडारा गायब
- प्रोटेस्ट कवर करने वाले यूट्यूबर गायब
- #पालतू_मीडिया कवरेज गायब
- कथित NGO सपोर्ट गायब!
- कथित किसान संगठन और नीली घाघरी गायब
कोई बताएगा ये सब कहाँ गायब हैं..?
सड़क पर भूखा भविष्य, नीलाम होते सपने!🛑
सूखे चावल और बिस्कुट खाकर रातें बिताते ये युवा झारखंड का असली दर्द हैं। JMM-कांग्रेस सरकार ने JPSC-JSSC को ‘सीटें बेचने की दुकान’ बना दिया, जबकि NEET पर शोर मचाने वाले नेता अब अपनी ही नाकामी और पेपर लीक पर पूरी तरह मौन हैं!
”जिस युवा ने तुम्हें सत्ता दी, वही तुम्हें सड़क पर लाएगा!”
भारत को आगे बढ़ता देख आज दुनिया के बड़े-बड़े देश घबरा रहे हैं।
भारत को जितना खतरा बाहरी ताकतों से है उतना ही खतरा अंदर बैठे कुछ लोगों से भी है।
: अजित डोवाल, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार
क्या इस देश के लोग सिर्फ गालियां देने वाली लड़कियों की बात सुनेंगे? क्या सिर्फ उन्हीं के वीडियो वायरल होंगे ?
सभ्य और मर्यादित भाषा में अपनी बात कहने वाली कुंजन की बात भी सुनिए ।
अश्लीलता की इस मंडी में मर्यादा कहीं खो गई है।
जो देश के लिए देते हैं बलिदान,
राहुल गांधी करते हैं उनका अपमान।
जंतर मंतर पर प्रदर्शन के दौरान घायल हुए पुलिसकर्मियों के परिवार द्वारा की गई प्रेस वार्ता के बारे में प्रश्न पूछने पर श्रीमान राहुल गांधी द्वारा पत्रकार से किया गया दुर्व्यवहार ये दर्शाता है कि कैसे वो अपने पूर्वजों की दिखाई हुई लीक पर चल रहे हैं। जिस प्रकार उनकी दादी ने प्रेस को कुचला था, ठीक उसी तरह राहुल जी भी प्रेस से उतनी ही नफरत करते हैं।
प्रदर्शन के दौरान घायल हुए पुलिसकर्मियों के प्रति श्रीमान राहुल गांधी के असंवेदनशील व्यवहार ने एक बार फिर दिखा दिया है कि देश की रक्षा और सुरक्षा में तैनात सेना, अर्धसैनिक बलों और पुलिस के प्रति राहुल गांधी के मन में किस तरह की नफरत और दुश्मनी का भाव है।
भारतीय सेना और सुरक्षाबलों को कठघरे में खड़ा करना श्रीमान राहुल गांधी की पुरानी फितरत रही है। कभी सर्जिकल स्ट्राइक के संदर्भ में भारतीय सेना के मनोबल पर चोट करने वाले बयान, तो कभी ऑपरेशन सिंदूर और अन्य सैन्य अभियानों पर सवाल उठाना, राहुल गांधी और उनकी प्रोपेगैंडा टोली हमेशा देश का नाम बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ती।
राजनीतिक विरोध अपनी जगह है, लेकिन देश के लिए वर्दी पहनने वालों के शौर्य, सम्मान और बलिदान का अपमान स्वीकार नहीं किया जा सकता। देश के नेता प्रतिपक्ष के रूप में श्रीमान राहुल गांधी का आचरण अत्यंत अशोभनीय और निंदनीय है।
आसान शब्दों में कहें तो
फितरत से नफरती हैं राहुल!
पत्रकार:- जिन पुलिस वालों के परिवार वालों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की
राहुल गांधी:- भैया BJP के हो क्या?
पत्रकार:- नहीं, BJP का नहीं हूं,
ये बार-बार BJP का बोल देने का क्या मतलब है सर? तरीका नहीं है। आप हर बार BJP का बोल देंगे.