एक तालाब है जो काई से भर जाएगा,
मेरा कमरा मेरी तन्हाई से भर जाएगा !!
दूर तक फैला हुआ दिल का ये ख़ाली मंज़र
देखते रहिए कि बीनाई से भर जाएगा !!
जैसे मैं उतरा हूँ दरियाओं की गहराई में
मुझ में पानी उसी गहराई से भर जाएगा !!
अजनबियत का ख़ला है जो हमारे मा-बैन
एक दिन रंग-ए-शनासाई से भर जाएगा !!
~ क़ासिम हयात
जरा सा साथ चलकर रास्ते में छोड़ देती है
मोहब्बत दिल बनाती है मगर फिर तोड़ देती है
कहानी में मेरी इक छोटा सा किरदार है उसका
मगर वो जब भी आती है कहानी मोड़ देती है
- शकील आज़मी
कहीं से चांद कहीं से कुतुबनुमा निकला
कदम जो घर से निकाला तो रास्ता निकला
जलाया धूप में खुद को तो एक साया सा
हमारे जिस्म की दीवार से लगा निकला
तुम्हारी आंखों में सदियों की प्यास डूब गई
हमारी रूह से एहसासे - कर्बला निकला
- शकील आज़मी
बिखरे हुए वजूद में सिमटी कहानियाँ,
कहने को अपने पास हैं कितनी कहानियाँ !!
दरवाज़ा बोल सकता है पर बोलता नहीं
दीवार याद रखती है सारी कहानियाँ !!
हम पूरा कर रहे हैं किसी का क़दीम शौक़
सारी कहानियाँ हैं उसी की कहानियाँ !!
इक दास्तान-गो जो हमारा रक़ीब था
मशहूर कर रहा है हमारी कहानियाँ !!
लो आज तुम्हें पहली बार देख भी लिया
बचपन से सुन रहे थे परी की कहानियाँ !!
~ फ़ैज़ान हाशमी
जब तिरे वास्ते घर छोड़ दिया जाता है,
दर-ब-दर होने का डर छोड़ दिया जाता है !!
हम तो वो हैं कि जिन्हें मिस्ल तमन्ना-ए-ज़ियाँ
देख कर एक नज़र छोड़ दिया जाता है !!
मैं वहाँ ख़ुद ही पहुँच जाता हूँ पहले से 'ज़रीम'
मेरे जैसों को जिधर छोड़ दिया जाता है !!
~ अब्दुल्लाह ज़रीम
ख़ामुशी अच्छी नहीं इंकार होना चाहिए
ये तमाशा अब सर-ए-बाज़ार होना चाहिए
बात पूरी है अधूरी चाहिए ऐ जान-ए-जाँ
काम आसाँ है इसे दुश्वार होना चाहिए
दोस्ती के नाम पर कीजे न क्यूँकर दुश्मनी
कुछ न कुछ आख़िर तरीक़-ए-कार होना चाहिए
झूट बोला है तो क़ाएम भी रहो उस पर 'ज़फ़र'
आदमी को साहब-ए-किरदार होना चाहिए
~जाफ़र इक़बाल🌷
अजीब है ये तमाशा कि मेरे अहद के लोग
सवाल करने से पहले जवाब माँगते हैं
तलब करें तो ये आँखें भी इन को दे दूँ मैं
मगर ये लोग इन आँखों के ख़्वाब माँगते हैं
~अब्बास रिज़वी 🌼🤎
गाँवों का उत्थान देखकर आया हूँ
मुखिया का दालान देखकर आया हूँ।
मनरेगा की कहाँ मजूरी चली गई
सुखिया को हैरान देखकर आया हूँ।
कागज़ पर पूरा पानी है नहरों में
सूख गया जो धान देखकर आया हूँ।
कल तक टूटी छान न थी अब पक्का है
नया-नया परधान देखकर आया हूँ।
लछमिनिया थी चुनी गयी प्रधान मगर
उसका ‘पति-प्रधान’ देखकर आया हूँ।
बंगले के अन्दर में जाने क्या होगा
अभी तो केवल लॉन देखकर आया हूँ।
रोज सदन में गाँव पे चर्चा होती है
‘मेरा देश महान’ देखकर आया हूँ।
~ डाॅ डी एम मिश्र
चलते रहिए ये हमें लेके जिधर जाते हैं ,
ख़्वाब अगर आँखों ही में रहे तो मर जाते हैं ..
दर्द के फूल भी खिलते है बिखर जाते है ,
जख्म कैसे भी हो कुछ रोज मे भर जाते है ..!!
~ जावेद अख्तर 🌻
दीवारों से मिल कर रोना अच्छा लगता है,
हम भी पागल हो जाएँगे ऐसा लगता है !!
आँखों को भी ले डूबा ये दिल का पागल-पन,
आते जाते जो मिलता है तुम सा लगता है !!
इस बस्ती में कौन हमारे आँसू पोंछेगा,
जो मिलता है उस का दामन भीगा लगता है !!
दुनिया भर की यादें हम से मिलने आती हैं,
शाम ढले इस सूने घर में मेला लगता है !!
~क़ैसर-उल-जाफ़री
वो मिरी बात को बातों में रख के भूल गया,
कि इक किताब किताबों में रख के भूल गया
नुजूमियों ने बताया कि कातिब-ए-तक़दीर,
मिरा नसीब सितारों में रख के भूल गया !!
हज़ार चेहरे जो बदले तो खो गया चेहरा,
मैं अपना जिस्म लिबासों में रख के भूल गया !!
न जाने कौन से प्याले में आब-ए-कौसर था
यहीं कहीं मैं शराबों में रख के भूल गया !!
~अहमद सलमान
ग़ज़ल
ऐसा नहीं कि हम को बुलाया नहीं गया
लेकिन बुला के पास बिठाया नहीं गया
उस ने भी मेरा हाल कभी पूछा ही नहीं
हम से भी अपना दर्द जताया नहीं गया
ख़ुद्दारियाँ भरी हैं हमारे मिज़ाज में
ख़ुद को गिरा के आगे बढ़ाया नहीं गया
हम ने तो रोज़ रोज़ वफ़ा ख़ूब की मगर
उन से कभी-कभार निभाया नहीं गया
कितने ही मरहलों से गुज़रता रहा हूँ मैं
पहले-पहल का प्यार भुलाया नहीं गया
दिल तोड़ने में उन के मुक़ाबिल नहीं कोई
हम से किसी का दिल भी दुखाया नहीं गया
~ राघवेंद्र द्विवेदी
अभी ज़मीर में थोड़ी सी जान बाक़ी है
अभी हमारा कोई इम्तिहान बाक़ी है
वो ज़ख़्म भर गया अर्सा हुआ, मगर अब तक
ज़रा-सा दर्द, ज़रा-सा निशान बाक़ी है
ज़रा सी बात जो फैली तो दास्तान बनी
वो बात ख़त्म हुई, दास्तान बाक़ी है
अब आया तीर चलाने का फ़न तो क्या आया
हमारे हाथ में ख़ाली कमान बाक़ी है
@Javedakhtarjadu sahab ❤️🙏
शामों को मैं घर रौशन भी करता था,
कितना कुछ तो मैं बेमन भी करता था !!
दुनिया मुझसे सिर्फ़ मुहब्बत करती है,
वो दीवाना पागलपन भी करता था !!
तुम जो कहते थे ना इक दिन छू लोगे,
छू लेते ना मेरा मन भी करता था !!
उसके हाथों में बस हम ही जँचते हैं,
दावा सोने का कंगन भी करता था !!
~ विशाल बाग़