इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी का बचाव यह कहकर किया था कि वे भारत को प्रगति के रास्ते पर ही रखना चाहती हैं।
चमचों क्या ये दलील सही थी ?😂🤣
Deathblow On democracy
#Emergency1975#DarkDaysOfEmergency
एक ऐसी रात जब कलम टूटे,🔥
जेलें भरी गईं, और बोलने का हक छीन लिया गया…🔥
A night when pens were broken, jails were filled, and the right to speak was taken away…!!🔥
Deathblow On Democracy
#Emergency1975#DarkDaysOfEmergency
25 जून 1975 भारतीय लोकतंत्र पर सबसे
बड़ा आघात। जब संविधान की आत्मा को
कुचला गया और आवाज़ों को कैद कर दिया
गया। आज उन सभी वीरों को नमन, जिन्होंने
सत्य और लोकतंत्र के लिए लड़ाई लड़ी।
#SamvidhanHatyaDiwas#Emergency1975
4 जुलाई 1975 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ऊपर प्रतिबंध लगा दिया गया | आपातकाल के दौरान सत्याग्रह करने वाले कुल 1,30,000 सत्याग्रहियों में से 1,00,000 से अधिक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्त्ता थे |
#Emergency1975
#आपातकाल#Emergency1975
भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय - 25 जून 1975
पूरा देश तानाशाही की गिरफ्त में आ गया पर समय सदा एक सा नहीं रहता। संघ द्वारा भूमिगत रूप से किये जा रहे प्रयास रंग लाने लगे। आपातकाल के विरुद्ध हुए सत्याग्रह में एक लाख से अधिक स्वयंसेवकों ने गिरफ्तारी दी।
#Emergency1975 Deathblow on democracy, Never Forget, Never Forgive
Indira Gandhi का 1975 से 1977 का #आपातकाल जो 19 महीने चला था।
देश भर में 83 लाख लोगों की जबरन नसबंदी की गई, पूरा देश डरा हुआ था।
भारत माता की जय बोलते ही जेल में ठूंस दिया जाता था।
#DarkDaysOfEmergency
#SamvidhanHatyaDiwas
ऐसी कौन सी आपात स्थिति आ गई थी जो लाखों नागरिकों पर अत्याचार किए गए।
क्या आपने इंदिरा जी को कभी चैलेंज किया ?
नहीं ना ?
#Emergency1975 के निराशाजनक वातावरण में, बेंगलुरु के कारागृह से अटल बिहारी वाजपेई जी ने एक कविता लिखी, जो चोरी छिपे भूमिगत पत्र को के माध्यम से सारे समाज में पहुंचने लगी। इस कविता ने उन दिनों कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा रखा था -
*टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते..*
सत्य का संघर्ष सत्ता से,
न्याय लड़ता निरंकुशता से,
अंधेरे ने दी चुनौती है,
किरण अंतिम अस्त होती है।
दीप निष्ठा का लिए निष्कम्प,
वज्र टूटे या उठे भूकंप,
यह बराबर का नहीं है युद्ध,
हम निहत्थे, विरोधी है सन्नद्ध
हर तरह के शस्त्र से है सज्ज,
और पशुबल हो उठा निर्लज्ज।
किंतु फिर भी जूझने का प्रण,
पुन: अंगद ने बढ़ाया चरण,
प्राण-पण से करेंगे प्रतिकार,
समर्पण की मांग अस्वीकार।
दांव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते।
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते..!