ये है फिलिप भईया।
अमेरिका में जन्मे, फिलिप भाई अब 95 साल के हैं। माता पिता यूक्रेन से आकर अमेरिका में बसे। शिकागो यूनिवर्सिटी से एमए किया, और MIT से इकॉनमिक्स में पीएचडी करी।
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शुरुआत में वे अमेरिका की दूसरे तीसरे दर्जे की यूनिवर्सिटी में पढ़ाते थे। फिर उन्होंने एक किताब लिखी- मार्केटिंग मैनेजमेंट..
किताब बेस्ट सेलर हो गयी।
भारत मे एक शिव खेड़ा हुआ करते थे। उनकी किताब भी ऐसे ही मशहूर हुई थी- यू कैन विन। इसके बाद एक किताब और आई- यू कैन सेल। इसके बाद वे बियाबान में खो गए।
लेकिन अमेरिका के शिव खेड़ा, याने फिलिप भइया ��ी किताब माइलस्टोन होने वाली थी। इसलिए कि उनकी किताब को एमबीए के पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया गया।
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तो दुनिया के तमाम बिजनेस मैनेजमेंट कॉलेज में पढ़ रहे बच्चों को बेचने और मार्केटिंग के तौर तरीके सिखाने के लिए फिलिप भइया की किताब एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ हो गई है।
उन्हें आधुनिक बेचवाली, याने मार्केटिंग का गुरु माना जाता है। लोगो को सामान बेचने के लिए फिलिप भैया का सिद्धांत 4P पर केंद्रित है-
याने प्रोडक्ट, प्राइज, प्लेस, और प्रमोशन
बोले तो माल, कीमत, जगह और प्रचार।
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अपने सिद्धांतों से उन्होंने माल बेचने को, कला से ऊपर उठाकर एक विज्ञान बना दिया। उन्होंने ब्रांड इमेज को बड़ा महत्व दिया और उसे समाजसेवा से जोड़ दिया।
जैसे- अगर आप मेरा दन्तमंजन खरीदोगे, तो इसमें से चवन्नी कि��ी गरीब की पढ़ाई में जायेगी। ये फंडा, बेसिकली फिलिप भइया की ईजाद है।
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उन्होंने नई नई बातें बताई जैसे- डीमार्केटिंग। याने जब माँग ज्यादा हो, सप्लाई घटा दो। इससे लोग उसे खोजने लगेंगे। बढ़िया प्रचार मिलेगा।
उन्होंने मार्केटिंग, और ह्यूमन मार्केटिंग पर भी रणनीतियां ईजाद की। ब्रांड एक्टिविज्म, याने ब्रांड्स को सामाजिक मुद्दों जैसे पर्यावरण, न्याय पर सक्रिय होने की सलाह दी, जिससे उज्ज्वल छवि बने।
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उनका प्लेस मार्केटिंग का सिद्धान्त अनूठा है। किसी शहर या देश को ब्रांड की तरह बेचना। छवि बनाना, औऱ लोगो को एक ख्याली प्रोडक्ट इस तरह से बेचना की लोग उससे जुड़े हर माल को हाथोहाथ लें।
वह प्रोडक्ट डुप्लीकेट हो, खराब हो, अनुपयोगी और नुकसानदेह क्यो न हो, उसे लोग खरीदेंगे, प्रचार करेंगे और जाने अंजाने में खुद अपने इलाके के सेल्समैन इन चीफ बन जाएंगे।
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फिलिप भैया का यह फंडा, उपभोक्ता वस्तुओं के लिए था। आधुनिक युग मे पार्टी को ब्रांड, देश को कमोडिटी औऱ गर्व को करेंसी बनाकर वोट कबाड़ने का प्रयोग, मूलतः फिलिप भाई के बाजारू तकनीकों का राजनीतिक फील्ड में कन्वर्जन है।
जिसे देखकर खुद फिलिप भाई भी अचंभित रह गए। इसलिए भारत के किसी सस्ते।मार्केटिंग हाउस में उनकी अनुमति लिए बना, जब फिलिप कोटलर के नाम से एक अवार्ड स्थापित किया- तो उसे सिर्फ एक ही व्यक्ति को दिया गया।
उसके पहले, और बाद में किसी को नही।
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वही शख्स जिसे बनाने के बाद भगवान ने सांचा तोड़ दिया। जिसने बेचने के मामले मे दुनिया का हर रिकार्ड तोड़ दिया। जिसे देने के लिए दुनिया के सत्तर देशो ने, नए नए अवार्ड बनाये, और उसे देने के बाद वह अवार्ड ही खत्म कर दिया।
इसमे से 21 देशों ने "ऑर्डर ऑफ द फीनिक्स अवार्ड", 11 देशो ने "गॉब्लेट ऑफ फायर अवार्ड" सत्रह देशो ने "गार्डियन ऑफ द गैलेक्सी अवार्ड", 9 देशों ने "द ग्रेट गैम्बलर अवार्ड" और 28 राष्ट्रपतियो ने "ब्रदर फ्रॉम अदर मदर" अवार्ड दिया है।
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उस सभी अवार्डों का श्रीगणेश, फिलिप भैया पर नामित "फिलिप कोटलर अवार्ड" से ही हुआ था। उस विजेता का नाम अगर आप गेस कर सके तो आपकी मर्जी।
सही जवाब देने वाले को, ईडी द्वारा घर पहुंचाकर 15 लाख का इनाम दिया जाए��ा।
अब विपक्षी दलों को एक नया ‘रामजन्म भूमि आंदोलन’ चलाना चाहिए।एक रथ तैयार करके उत्तर प्रदेश के एक-एक ज़िले में उसे ले जाना चाहिए।रथ पर अविमुक्तेश्वरानंदजी के साथ साधु-संतों को सवार कर देना चाहिए।विपक्षी नेता��ं को साथ में पैदल चलना चाहिए।यूपी में 75 ज़िले हैं।चुनाव तक निपट जाएँगे।
लोककथा
नया ग़ज़नी और सोने का मंदिर
बहुत पुरानी बात है। इतनी पुरानी कि उस समय इतिहास किताबों में नहीं, अफ़वाहों में लिखा जाता था। उन दिनों एक लुटेरा था — महमूद ग़ज़नी। वह घोड़ों पर बैठकर हज़ारों कोस दूर से आता था। रास्ते में रेगिस्तान थे, पहाड़ थे, नदियाँ थीं, सेनाएँ थीं, तलवारें थीं, धूल थी, थकान थी — सब झेलकर वह मंदिर तोड़ता था, सोना लूटता था और लौट जाता था। यही उसका धंधा था। यही उसकी पहचान थी।
लेकिन धंधे में बड़ी मेहनत थी। बहुत खून-खच्चर था।
एक दिन उसे एहसास हुआ कि उसकी उम्र ढल रही है। उसने अपनी तलवार को देखा, घोड़े को देखा और हिसाब लगाया। मन ही मन बोला, "यह काम बहुत घाटे का है। मंदिरों तक पहुँ��ने में आधी ताक़त जाती है, तोड़ने में बाकी आधी। दो-दो हज़ार किलोमीटर चलना और घोड़ों की पीठ पर लदे रहना। ऊपर से लोग बदनाम करें सो अलग। लूट भी सीमित और यश तो बिल्कुल नहीं। इससे अच्छा कोई नया उपाय खोजो।"
उसी रात उसे एक सपना आया।
सपने में एक सोने की सड़क थी-- लंबी, चिकनी, चमकती हुई। सड़क के अंत में एक विशाल मंदिर था, जो टूटा नहीं था, पहले से भी अधिक दीप्तिमान था। उसके चारों ओर भीड़ थी — सिर झुकाए, हाथ जोड़े। कोई चाँदी चढ़ा रहा था, कोई सोना, कोई ज़मीन की रजिस्ट्री, कोई डॉलर में भरा लिफ़ाफ़ा, कोई नक��, कोई चेक, कोई हीरे, कोई जवाहररात। और मंदिर के द्वार पर एक आदमी बैठा था — माथे पर चंदन-तिलक, कंधे पर केसरिया अंगवस्त्र, गले में रुद्राक्ष की माला, और हाथ में एक रसीद-बुक।
गज़नी ने पूछा — "यह कौन है?"
स्वप्न ने उत्तर दिया — "यह तुम ही हो — लेकिन सुधरे हुए।"
गज़नी चौंका — "मैं? लेकिन मैंने तो मंदिर तोड़��� थे!"
स्वप्न हँसा — "मूर्ख! मंदिर तोड़ना पुरानी तकनीक थी। असली कला यह है कि मंदिर को अक्षुण्ण रखो और उसकी आत्मा लूट लो। पत्थर से क्या मिलेगा? आस्था से कमाओ।"
उसी रात गज़नी की आँखें खुल गईं।
अब वह घोड़े पर नहीं आया। वह पासपोर्ट पर भी नहीं आया। वह काबुल, कंधार या उज़्बेकिस्तान से भी नहीं आया। समय ने उसे सिखाया कि तू हमारी ही गलियों में पैदा हो। हमारे ही मुहल्ले में पल-बढ़। हमारी ही भाषा बोल, हमा��े ही त्योहार मना, हमारे ही देवताओं के नाम रटे।
उसने इतिहास से यह सीखा था कि इस देश में तलवार लेकर आओगे तो लोग पहचान लेंगे। लेकिन अगर माथे पर चंदन, गले में माला और हाथ में आरती की थाली लेकर आओगे तो लोग तुम्हें साधु समझ लेंगे। और साधु से कोई हिसाब नहीं माँगता।
इसलिए वह मंदिर तोड़ने नहीं आया। वह मंदिर बनवाने आया।
उसने एक सभा बुलाई और घोषणा की —"भाइयो और बहनो! मंदिर केवल पत्थर का नहीं होता — वह आस���था का होता है। और आस्था चढ़ावे से ही ��िद्ध होती है। यह मंदिर हमारी संस्कृति का, हमारे स्वाभिमान का, हमारे पूर्वजों के सम्मान का प्रतीक होगा।"
भीड़ भावुक हो गई।
किसी ने पूछा — "मंदिर कितना बड़ा बनेगा?"
वह बोला — "इतना बड़ा कि इतिहास छोटा पड़ जाए। और नभ एक मुष्टि दूर रह जाए।"
किसी ने पूछा — "चंदा कितना चाहिए?"
वह बोला — "आस्था की कोई सीमा नहीं होती।"
और फिर जो हुआ, वह देखने वाला था।
एक बूढ़े किसान ने अपनी बची हुई ज़मीन दे दी — बोला, "भगवान के घर से बड़ा घर कौन सा?" एक विधवा ने अपनी सोने की चूड़ियाँ उतार दीं — बोली, "गहना तो माटी है, धर्म असली धन है।" एक दुकानदार ने तिजोरी का आधा हिस्सा खाली कर दिया। एक बच्चे ने महीनों की बचत का गुल्लक फोड़ दिया। एक प्रवासी ने सात समंदर पार से डॉलर भेजे — "बस भगवान का काम पूरा होना चाहिए।"
लोग खुद लाइन लगाकर सोना दे रहे थे।
ग़ज़नी ने मन ही मन कहा — "पुराना ग़ज़नी कितना मूर्ख था। सेना लेकर आता था, लोग प्रतिरोध करते ��े, जान जाती थी, यश नहीं मिलता था। यहाँ तो मंदिर भी तुम्हारा, भक्त भी तुम्हारे, चंदा भी तुम्हारा, महिमा भी तुम्हारी। इससे अच्छा व्यापार संसार में क्या होगा?"
धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ता गया।
सेवक से प्रबंधक हुआ। प्रबंधक से संरक्षक। संरक्षक से धर्मरक्षक। धर्मरक्षक से — राजरक्षक।
और फिर एक दिन उसने कहा — "मंदिर की रक्षा के लिए राज्य भी चाहिए।"
लोगों ने राज्य भी दे दिया।
अब वह मंदिर के बाहर नही��� बैठता था। वह मंदिर के भीतर था — कोष में, कथा में, मंच पर, सभा में, घोषणाओं में, इतिहास में। और जो भी उससे सवाल करता, उसके लिए एक नई भाषा थी तैयार —
"जो हमसे सवाल करे — वह आस्था-विरोधी है।
जो हिसाब माँगे — वह धर्म-द्रोही है।
जो रसीद देखना चाहे — वह संस्कृति का शत्रु है।"
कहते हैं, उस देश के बच्चे अब भी यह कहानी सुनते हैं और पूछते हैं — "दादी, पुराना ग़ज़नी और नया गज़नी में क्या फ़र्क़ था?"
दादी कुछ देर चुप रहती हैं।
फिर बोलती हैं — "बेटा, पुराने गज़नी ने मंदिर तोड़े। नए ने मंदिर बनवाए। लेकिन दोनों का काम ��क ही था — सोना।"
"तो लोगों ने नए गज़नी को पहचाना क्यों नहीं?"
दादी फिर चुप हो जाती हैं।
और यही इस कहानी का सबसे भारी हिस्सा है।
CM विजय थलापति का बिग शॉट
तमिलनाडु सरकार ने सरकारी अस्पतालों में जन्म लेने वाले हर नवजात शिशु को एक ग्राम सोने की अंगूठी देने की घोषणा की है। इस योजना के लिए 755.53 करोड़ ₹ आवंटित किए गए। इस फैसले से कुछ हो या न हो लेकिन हर डिलीवरी पर महिला को ऑपरेशन से निजात मिलेगी, क्योंकि निजी अस्पतालों में तो यही होता है।
@actorvijay@TVKVijayHQ@INCIndia@BJP4India
द टेलीग्राफ के पूर्व संपादक आर. राजगोपाल की आपबीती:
मार्च 2026 में कोलकाता की बालीगंज विधानसभा सीट की वोटर लिस्ट से मेरा नाम हटा दिया गया। वजह यह बताई गई कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान न तो मेरा और न ही मेरे दिवंगत पिता का नाम 2002 की वोटर लिस्ट में मिला।
मेरे पिता गांधीवादी थे, प्रोफेसर रहे और केरल में गांधी स्मारक निधि के राज्य सचिव भी थे। उनका 2016 में निधन हो गया। आज तक समझ नहीं आया कि इतने जिम्मेदार मतदाता का नाम वोटर लिस्ट में कैसे नहीं था।
पश्चिम बंगाल के करीब 27 लाख लोगों की तरह मेरा नाम भी "तार्किक गड़बड़ियों" का हवाला देकर हटा दिया गया�� मैंने अपनी 10वीं की मार्कशीट भी जमा कर दी, लेकिन फिर भी कोई वजह नहीं बताई गई। अब मेरी अपील सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बने एक ट्रिब्यूनल में लंबित है। इसी वजह से मैं हाल का चुनाव भी नहीं लड़... बल्कि वोट भी नहीं डाल सका।
इससे भी बड़ी परेशानी मेरे पासपोर्ट रिन्यूअल में आई।
19 मार्च 2026 को मैंने बायोमेट्रिक की सारी प्रक्रिया पूरी कर ली थी, लेकिन पुलिस वेरिफिकेशन इसलिए पास नहीं हुआ क्योंकि मेरा नाम वोटर लिस्ट में नहीं है। मैंने कई दूसरे दस्तावेज़ भी दिए, लेकिन कहा गया कि वे पर्याप्त नहीं हैं।
आज, 27 जून 2026, मेरे बायोमेट्रिक हुए पूरे 100 दिन हो चुके हैं। पिछले हफ्ते पासपोर्ट कार्यालय ने मुझे आधिकारिक तौर पर बताया कि कोलकाता पुलिस ने मेरे खिलाफ प्रतिकूल रिपोर्ट भेजी है, क्योंकि मेरा नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया है।
मुझे तुरंत रीजनल पासपोर्ट ऑफिस आने को कहा गया, लेकिन जब मैंने अपॉइंटमेंट मांगी तो तारीख 17 जुलाई 2026 की मिली।
इसी ब���च मेरी बेटी, जो कैलिफोर्निया में पत्रकार है, की 17 अप्रैल को सैन फ्रांसिस्को में शादी हो गई। मेरे पास 10 साल का वैध अमेरिकी वीज़ा होने के बावजूद मैं सिर्फ इसलिए अपनी बेटी की शादी में नहीं जा सका क्योंकि मेरा पासपोर्ट रिन्यू नहीं हुआ था।
आज हालत यह है कि मैं खुद को एक तरह की नागरिक अनिश्चितता में पाता हूं। हाल ही में सरकार ने भी कहा था कि पासपोर्ट नागरिकता का सबूत नहीं है।
अब मेरा ज़्यादातर समय ���ुराने पारिवारिक रिकॉर्ड और दशकों पुराने दस्तावेज़ जुटाने में निकल रहा है।
हर सुबह उठकर मैं सबसे पहले अपनी वोटर लिस्ट वाली अपील और पासपोर्ट का स्टेटस देखता हूं। फिर उस कॉलेज को लिखता हूं जहां मेरी मां 1965 में पढ़ाती थीं और उस स्कूल को भी जहां से उन्होंने 1959 में पढ़ाई पूरी की थी, ताकि कोई ऐसा रिकॉर्ड मिल जाए जिससे साबित हो सके कि वे इस देश में थीं। स्कूल ने मदद की, लेकिन कॉलेज ने नहीं।
इसी तरह मैं केरल के प��राने सामाजिक कार्यकर्ताओं से भी संपर्क करता हूं और उनसे मेरे पिता की अवैध शराब और सांप्रदायिकता के खिलाफ चलाए गए अभियानों की कोई फोटो या अखबार की कटिंग मांगता हूं।
कुछ करीबी दोस्तों और सार्वजनिक जीवन के लोगों ने मेरी मदद की है। लेकिन मुझे नहीं पता कि किसी मीडिया संस्थान या पत्रकार संगठन ने मेरे मामले में कोई दिलचस्पी दिखाई।
एक वरिष्ठ पत्रकार ने मुझसे कहा कि यह सिर्फ मेरी कहानी नहीं है। सदियों से करोड़ों भारतीय रोज़ इसी तरह की अस्वीकृति और सरकारी परेशानियों का सामना करते आए हैं। मैं उनकी इस बात से सहमत हूं।
मेरा मकसद खुद को पीड़ित दिखाना नहीं है। मैं सिर्फ यह बताना चाहता हूं कि अगर एक ऐसा व्यक्ति, जिसने पूरी जिंदगी पत्रकारिता की और एक जाना-माना अखबार संपादित किया, उसे भी इतनी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है, तो सोचिए समाज के सबसे कमजोर लोगों पर क्या बीतती होगी।
क्या ��ैंने किसी अखबार से इस बारे में बात की? नहीं। क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि यह सिर्फ मेरी निजी कहानी बनकर रह जाए।
क्या संपादकों और पत्रकारों को मेरे मामले की जानकारी है? बिल्कुल है, कई लोगों को है। और अगर किसी को नहीं है, तो फिर उन्हें पत्रकारिता में नहीं होना चाहिए।
लेकिन इस पूरे मामले पर अखबारों की चुप्पी ने मेरे उस शक को और मजबूत कर दिया है कि तथाकथित मुख्यधारा की पत्रकारिता का अब आम लोगों क�� जिंदगी से बहुत कम लेना-देना रह गया है।
अब मैं कोई अखबार पढ़ता नहीं हूं। बस कभी-कभी सरसरी निगाह से देख लेता हूं, लेकिन उसमें ऐसा कुछ नहीं मिलता जो मुझे पढ़ने के लिए मजबूर करे।
मौत के अगले दिन इनमे से एक शहीद सैनिक के भाई ने ट्विटर डीएम में सम्पर्क किया था।
नाम, लाश की कॉफिन में फ़ोटो और छोड़ने आये फौजी दल की तस्वीरे दी। उस वक्त देश के रक्षा मंत्री संसद में बयान दे रहे थे कि ऑपरेशन सिंदूर में कोई भारतीय सैनिक नही मरा।
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शहीद के भाई चाहते थे कि इस पर पोस्ट लिखूं, सबको बताऊं। मगर जब देश युद्ध मे हो, तो वह वक्त फौज और नेतृत्व से, डिस्प्यूट करने का नही होता।
तो यदि वे इस मौत को छुपाना चाहते हैं,
तो यही सही।
मैंने वह पोस्ट नही लिखी। मगर हृदय में बोझ रहा। आज सरकार ने एक नही, 6 मौते कबूल ली हैं। देर सवेर गिरे विमानों की सँख्या भी पब्लिक डोमेन में आ जायेगी।
पर आर्मी सर्कल्स में तो पहले पता होगा सबको। क्या बीती होगी फौजियों के दिलो�� पर। हम मरें, और शहादत की कृतज्ञता तक यह ��ेश नही दिखाता।
जब यह सरकार जाएगी तो उनके मेमोयर्स भी आएंगे। जाने क्या क्या खुलासे हों। जो भी होगा, शॉकिंग होगा। शर्मनाक होगा।
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मगर जनता के लिए इसके फौरी तौर पर अर्थ समझिए। पहलगाम अटैक, पुलवामा अटैक के बाद हुआ। दोनों ही मामलों में इसके कलप्रिट पकड़े नही जा सके। हां, पाकिस्तान पर चटपट हमला कर दिया गया।
पहली बार, बालाकोट स्ट्राइक एक सरप्राइज थी। क्योंकि क्रॉस बॉर्डर एरियल अटैक के उदाहरण ���हले नही थे। सिन्दूर के समय यह सरप्राइज खत्म हो चुका था।
अबकी बार दुश्मन तैयार था।
चीनी के दिये सेटेलाइट सपोर्ट और मिसाइलों के साथ... (जो आगे भी रहेगा)
हमारे लोग मरे, विमान खोए। कुछ हासिल किए बिना युद्ध विराम कर लिया। शहादते बेकार हो गयी। उनके नाम छुपाए।
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आतंकी खत्म हो गए हैं, या उनकी हिम्म��� टूट गयी,ऐसा कहना बचपना होगा। ये लोग, आतंकी हमले रोक पाते नही, कलप्रिट्स को पकड़ पाते नही। यह हुआ इंटेलिजेंस का, इन्वेस्टिगेशन का फेलियर..
अब भविष्य में आतंकी हमला हुआ, तो एडे बेड़े कराची पे हमला करने की हिम्मत भी ये नही कर सकेंगे। याने सैन्य विकल्प खत्म..
वैश्विक कूटनीति के स्तर पर मामला पहले खत्म है।सिन्दूर के बाद थरूर सहित तमाम दल देश दुनिया घूमें। और नतीजा सिफर रहा। ईरान युद्ध के बाद पाक���स्तान ऊंचे लेवल पर बैठा है। । तो कूटनीति भी नहीं जीरो।
क्या बचा??
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बन्द मुट्ठी लाख की होती है।
उसका भय होता है।
हर कवच विदीर्ण है। सारी मुट्ठियाँ खोल दी गई, अब वे खाक की हैं। पाकिस्तान पहले से ज्यादा निर्भय है। और भारत-
तथ्य और सत्य छुपाने वाला निर्बल देश।
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इन बहादुरों की शहादत छुपाकर रखने वाले लोगो को लानत देना बेकार है।
उन्हें चुनने वालो को जरूर लानत दें। जिन गालीबाज बड़बोलों के हाथों इस देश, सेना और भारत की अस्मिता मलिन हो चुकी है।
अभी तो हमे और जलील होना है।
फिलहाल आइये, इन शहीदों के लिए 2 मिनट का मौन रखें। इनके परिवारों को हमारी (विलम्बित) सांत्वना पहुँचे।
देश के इन शहीदों को कोटि कोटि प्रणाम।
🙏
हूबनाथ पांडे जी की कविता : राजेंद्र गुप्ता जी ने कविता के साथ पूरा न्याय किया है.
“गिरो, गिरो, गिरो और गिरने की संभावनाएं भरपूर हैं. इतना गिरो कि गु��ुत्वाकर्षण बल भी शर्म के मारे गिर पड़े, गिरो……
…..गिरो वर्तमान सदी के महानतम महापुरुष ! पूरी कायनात को दिखा दो कि तुम और कितना गिर सकते हो….
कल हो सकता है कि तुम्हारा गिरना देखकर ही लोगों में उठने की कामना जाग उठे…..और आने वाली पीढ़ियों को ‘उठने का अर्थ’ बताने के लिए, कम और ज्यादा गिरने का फर्क बताने के लिए गिरो!”
देश की संसद में रक्षा मंत्री जी का खुलेआम झूठ बोलना कि कोई क्षति नहीं हुई और अब साल भर बाद 6 शहीदों के नाम सार्वजनिक करना।
ये सरकार संसद में झूठ बोलती है और अपनी पीठ थपथपाती है।
साल भर तक सैनिकों की शहादत को ना स्वीकारना,
ये उन शहीदों के परिजनों क��� ऑंसुओं का भी अपमान है।
संविधान सम्मत ,इमरजेंसी लगाकर लौह महिला इंदिरा जी में ,देश विखंडन की अमेरिकन साज़िश को नाकाम कर दिया था ।पाकिस्तान युद्ध की हार से भन्नाया हुआ अमेरिका ,सम्पूर्ण क्रांति के नाम पर अस्थिरता फैलाने की साज़िश कर रहा था ,बैलेट की जगह बुलेट की बात चल पड़ी थी ।इमरजेंसी काल भारतीय इतिहास का सबसे अनुशासित काल था ।लगभग सही समय पर free एंड fair इलेक्शन हुए ,हारीं ,फिर देश बर्बाद हुआ ,अंत में पुनः जनमत प्राप्त कर देश इंदिरा जी के सुरक्षित हाथों में पहुँचा ।#emergency @SupriyaShrinate@watchsandesh@skjain_05@AskThePremKumar
सबूतपुर का नागरिक!
सबूतपुर नाम के देश में एक आदमी रहता था—नाम था नागरिक प्रसाद। एक दिन सरकार ने घोषणा की, “हर नागरिक को साबित करना होगा कि वह नागरिक है।”
नागरिक प्रसाद बहुत खुश हुआ। उसने सोचा, “यह तो आसान है। मेरे �����स सब कुछ है।”
वह दफ्तर पहुँचा। बाबू ने पूछा, “सबूत?”
नागरिक प्रसाद ने जेब से वोटर आईडी निकाली।
बाबू मुस्कुराया, “इससे आप वोटर साबित होते हैं, नागरिक नहीं।”
उसने आधार कार्ड निकाला।
बाबू बोला, “इससे आप आधार-युक्त साबित होते हैं, नागरिक नहीं।”
उसने पैन कार्ड रखा।
बाबू ने चश्मा सीधा किया, “इससे आप करदाता या कर-संदिग्ध साबित होते हैं, नागरिक नहीं।”
अब नागरिक प्रसाद ने सबसे गर्व से पासपोर��ट निकाला। बाबू ने पासपोर्ट को ऐसे देखा जैसे किसी कवि की पांडुलिपि देख रहा हो।
“इससे आप विदेश जा सकने योग्य व्यक्ति साबित होते हैं, नागरिक नहीं।”
नागरिक प्रसाद घबरा गया। बोला, “तो नागरिक कौन होता है?”
बाबू ने कहा, “जो नागरिकता साबित कर दे।”
“और नागरिकता कैसे साबित होगी?”
बाबू ने फाइल बंद कर दी। “उसका प्रमाण दीजिए।”
नागरिक प्रसाद ने धीरे से कहा, “मेरे पिता यहीं पैदा हुए थे।”
“प्रमाण?”
���दादा भी।”
“प्रमाण?”
“परदादा भी।”
“उनका बर्थ सर्टिफिकेट?”
“तब गाँव में दाई होती थी, नगरपालिका नहीं।”
बाबू ने गहरी सांस ली, जैसे देश की पूरी ��भ्यता उसी के कंधे पर हो। बोला, “देखिए, भावना से राष्ट्र नहीं चलता, फाइल से चलता है।”
नागरिक प्रसाद बाहर निकला। चौराहे पर उसकी अपनी तस्वीर लगी थी—“जागरूक मतदाता, मजबूत लोकतंत्र।”
नीचे लिखा था:
आपका वोट, आपका अधिकार।
वह हँस पड़ा।
पहली बार उसे समझ आया कि इस देश में वह वोट दे सकता है, टैक्स दे सकता है, राशन ले सकता है, पासपोर्ट बनवा सकता है, सेना में बेटा भेज सकता है—लेकिन खुद को साबित नहीं कर सकता।
शाम को उसने अपने सारे कार्ड मेज़ पर रखे।
वोटर आईडी बोला, “मैं चुनाव में काम आता हूँ।”
आधार बोला, “मैं सब जगह काम आता हूँ।”
पैन बोला, “मैं पैसे पर काम आता हूँ।”
पासपोर्ट बोला, “मैं सीमा पर काम आता हूँ।”
नागरिक प्रसाद ने पूछा, “मेरे काम कौन आएगा?”
चारों कार्ड चुप रहे।
वह घर लौटा—वह अपने ही घर के दरवाज़े पर खड़ा था और मूछों पर ताव देता एक आदमी पूछ रहा है, “कौन?”
वह बोला, “मैं।”
मूछों वाले गुंडेनुमा आदमी ने कहा, "मैं कौन?"
वह बोला, "मैं घर का मालिक!"
गुंडे ने कहा, “सबूत?....जब तू नागरिक ही नहीं देश का तो घर का सबूत सबूत कैसे हो सकता है?”
उसके पैरों के नीचे खिसकने के लिए ज़मीन तक नहीं बची थी।