इस शहर में पानी के लिए मचा है हाहाकार!
मध्य प्रदेश के धार जिले के उटावा गांव में पानी की समस्या आज भी लोगों के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है. ग्रामीणों का दावा है कि पाइपलाइन बिछने के बावजूद उन्हें नियमित जलापूर्ति नहीं मिल रही. हालात ऐसे हैं कि महिलाओं को रोजाना दूर स्थित एक गहरी खाई तक पहुंचकर जमीन से रिसते पानी को इकट्ठा करना पड़ता है. यह स्थिति ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं और जमीनी चुनौतियों पर कई सवाल खड़े करती है.
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भारत में सबसे महान राजा सम्राट असोक हैं. भारत को बनाने वाले सम्राट असोक हैं.
आज का अखंड भारत सम्राट असोक की देन है. इस अखंड भारत को असोक ने आज से 2500 साल पहले बनाया था.
सम्राट असोक को बौद्ध धम्म और 84000 स्तूप निर्माण तक सीमित कर दिया गया. जबकि उन्होंने अखंड भारत की नींव रखी. पूरा अफगानिस्तान अखंड भारत का हिस्सा था.
सम्राट असोक के युग में ही भारत सोने की चिड़िया था. लेकिन सम्राट असोक को बदनाम किया जा रहा है. बदनाम करने के लिए पूरा ब्लू प्रिंट तैयार है.
छोटे छोटे रियासतों के राजाओं का महिमा मंडन किया जा रहा है. उन्हें हिन्दू रक्षक और मुस्लिम आक्रांताओं से लड़ने वाला योद्धा बताया जा रहा है. असोक उनके एजेंडे और राजनीति के लिए फिट नही हैं. इसी कारण उन्हें बदनाम कर इतिहास में दफन करने की प्लानिंग चल रही है.
भारत में पुस्तकीय धारणा ऐसी है कि
ईस्वी सन के आस-पास जो भी विदेशी शासक भारत आये थे,
उन लोगों की बोली भाषा प्रारंभिक संस्कृत थी।
जबकि
ईस्वी सन के आस-पास जो विदेशी शासक का नाम लिखा हुआ अभिलेख मिला है
उसमें प्रारंभिक संस्कृत का नामों निसान नहीं मिलता है।
देखें चित्र:-
पहला अभिलेख यवन राजा का है।
जिन्होंने अपना नाम #दमित लिखा है जबकि संस्कृत में #दिमित्र होता है।
दूसरा अभिलेख कुषाण वंश के राजा का है।
जिन्होंने अपना नाम #कनिस्क लिखा है जबकि संस्कृत में #कनिष्क होता है।
तीसरा अभिलेख यवन राजा द्वारा स्तूप में दान का है।
जिस पर उन्होंने #थभो दान लिखवाया है, जबकि संस्कृत में #स्तम्भ दान होता है।
आठवी सदी बाद की विकसित संस्कृत भाषा को कैसे ब्राह्मणवादी लेखकों ने वर्तमान समय में पुस्तकों द्वारा ईसा पूर्व स्थापित किया है,
उसका आंखों देखा प्रमाण देखिए।
झारखण्ड के रामगढ़ में स्थित गोला स्तूप है , जिसे सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध विजय के बाद बनवाया!
अब स्थानीय लोग जागरूक होकर जीर्णोद्वार करा रहे हैं!
देश में लोग प्राचीन बौद्ध विरासत बचाव अभियान में जागरूक होकर , बौद्ध विरासत बचाने के लिए एकजुट हो रहे हैं!
इस भाई साहब ने IndiGo एयरलाइंस के एक खेल को उजागर किया है।
इनकी सुबह 6 बजे पुणे की फ्लाइट थी। जब समय पर एयरपोर्ट पहुंचे, इनका web check-in नहीं हो रहा था।
काउंटर पर इन्हें बोल दिया कि वेब चेक-इन 24 घंटे पहले ही करना होता है
अब फ्लाइट फुल हो गई है।
अब इनका सवाल यह है कि अगर फ्लाइट में जितनी सीटें हैं उतने ही टिकट बिके हैं,
आपकी सीट किसी और को कैसे मिल गई?
क्या ये कंपनियां सीटों से ज़्यादा टिकट बेच रही हैं?
दूसरा सवाल इनका यह है कि अगर कोई इमरजेंसी में फ्लाइट से 4-5 घंटे पहले टिकट बुक करता है,
वह 24 घंटे पहले वेब चेक-इन कैसे करेगा?
एयरलाइंस आसानी से कह देती हैं कि हम फ्लाइट चेंज कर देंगे लेकिन यात्री के समय, मानसिक परेशानी और अर्जेंट मीटिंग का नुकसान हो जाता है।
हरियाणा में 350 पर लगभग बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी के नाम से ई लाइब्रेरी है सरकार द्वारा उनका नाम बदलकर अटल लाइब्रेरी के नाम से करने की घोषणा की गई है इसके विरोध में कल जींद में देश की राष्ट्रपति महामही द्रौपदी मुर्मू के नाम ज्ञापन दिया जिसके माध्यम से बाबा साहब जी को मानने वाले लोगों की भावनाएं व्यक्त की कहा गया कि यह लाइब्रेरी बाबा साहब जी के नाम पर ही होनी चाहिए ।
बीजेपी को बाबा साहेब से बहुत दिक्क़त है
सुनो बाबा साहेब के बच्चे है हम बाबा साहेब की शान में गुस्ताखी की तो ठीक नहीं होगा।
पीढ़ियों से जिन जंगलों और जमीनों पर आदिवासी समुदाय रहते आए हैं, उन्हें अचानक "अतिक्रमण" और "अवैध कब्जा" बताकर उजाड़ देना बेहद चिंताजनक है। जंगल आदिवासियों के लिए केवल भूमि नहीं, बल्कि उनकी पहचान, संस्कृति, आजीविका और अस्तित्व का आधार हैं। बिना न्यायपूर्ण प्रक्रिया, ग्राम सभा की सहमति और उनके पारंपरिक वन अधिकारों की मान्यता के बेदखली लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।
पशुआहार में तय सीमा से ज्यादा यूरिया: दूध भी इन्फेक्टेड, लिवर-किडनी डैमेज का रिस्क, पीने से पहले चेक करें क्वालिटी
पूरा वीडियो देखने के लिए लिंक पर क्लिक करें- https://t.co/P1YjjzlOpf
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गरीबी बहुत दर्द देती है, और हमने उसे करीब से जिया है। भूख, अभाव, संघर्ष और बेबसी का दर्द वही समझ सकता है जिसने इसे अपनी जिंदगी में महसूस किया हो। शायद इसी वजह से गरीब की तकलीफ़ देखकर मेरा दिल आज भी बेचैन हो उठता है।
झारखंड के रांची स्थित नगड़ी में आदिवासी किसान अपनी पुश्तैनी जमीन बचाने के लिए सड़कों पर हैं। ₹4000 करोड़ से अधिक की RIMS-2 परियोजना के नाम पर 100 एकड़ से अधिक कृषि भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे ग्रामीणों का सवाल है क्या विकास आदिवासियों की जमीन और आजीविका छीनकर होगा? जिन समुदायों ने सरकार पर भरोसा किया, आज वही अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आंदोलनरत हैं। विकास और आदिवासी अधिकारों के बीच संतुलन बनाना सरकार की जिम्मेदारी है।
मनुवादी कितने बेरहम होते है ये देखकर जंगली जानवरों से भी भरोसा उठ गया?
इतना बड़ा अमानवीय घटना हो गई लेकिन कोई हल्ला नहीं क्योंकि इस देश में दलित के लिए ये नॉर्मल है क्या किसी दलित के न्याय के लिए कभी सुप्रीम कोर्ट स्वत संज्ञान लेगा?
अबूझमाड़ में जंगल काटे जा रहे हैं, पेड़ जलाए जा रहे हैं, आदिवासी इलाकों को उजाड़ा जा रहा है और जिम्मेदार विभाग सर्वेक्षण का बहाना बनाकर तमाशा देख रहा है! अगर यह सब खनन कंपनियों के लिए रास्ता साफ करने की तैयारी नहीं है, तो फिर क्या है? जंगल सिर्फ लकड़ी नहीं हैं, वे आदिवासियों की पहचान, संस्कृति और जीवन हैं। विकास के नाम पर अगर जंगलों को मिटाया जा रहा है, तो यह पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों दोनों पर सीधा हमला है।
झारखंड के पूर्वी सिंहभूम ज़िले के बोड़ाम प्रखंड स्थित बोटा गाँव में आदिवासी परिवार आज भी बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जबकि सरकारें योजनाओं के बड़े-बड़े विज्ञापन चला रही हैं। आखिर इन आदिवासियों तक पेयजल जैसी बुनियादी सुविधा क्यों नहीं पहुँच पाई? जब आदिवासी क्षेत्रों में लोग गड्ढों और असुरक्षित स्रोतों से पानी लेने को मजबूर हों, तब विकास के दावों पर गंभीर सवाल उठना स्वाभाविक है।
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भारत में बिक रहे खतरनाक एग्रो-केमिकल के पीछे मुख्य रूप से दो बड़े गुनहगार हैं. पहला, मोटी कमाई में अंधी हो चुकीं मल्टीनेशनल एग्रोकेमिकल कंपनियां और दूसरा आंखें मूंदे बैठे सरकारी नियामक संस्थान और उनके अधिकारी.
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झारखंड में आदिवासी हितों के नाम पर राजनीति तो बहुत हुई, लेकिन असुर जनजाति की स्थिति आज भी बेहद चिंताजनक है। रांची के पास बसे इस PVTG समुदाय के कई परिवार अब भी स्वच्छ पानी, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं।
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ओडिशा की सिजीमाली पहाड़ियों में कोंध आदिवासी समुदाय 311 मिलियन टन बॉक्साइट के लालच में अपनी जल, जंगल और जमीन पर हो रहे कॉर्पोरेट हमले का डटकर मुकाबला कर रहा है। 1,549 हेक्टेयर की इस खनन परियोजना के लिए जंगलों को उजाड़ने और ग्राम सभाओं की सहमति पर सवाल उठने के बावजूद सरकारें और कंपनियाँ आगे बढ़ रही हैं। 2023 से जारी विरोध 2026 में हिंसक टकराव तक पहुँच गया, लेकिन आदिवासियों का संघर्ष जारी है। विकास के नाम पर आदिवासियों का विस्थापन, जंगलों का विनाश और संविधान प्रदत्त अधिकारों की अनदेखी कब तक? सिजीमाली सिर्फ एक पहाड़ी नहीं, बल्कि आदिवासी अस्तित्व, संस्कृति और प्रकृति की रक्षा की लड़ाई है।