Shri Kedarnath dham evening aarti
Continuously raining in dham and snowing over peaks from past 2 days
There is no snow accumulation in the temple premises, yatra to remain suspended tomorrow also
🚨 केदारनाथ धाम पैदल मार्ग अपडेट - लगातार बारिश के चलते गौरीकुण्ड से करीब 2.5 किमी आगे चीरवासा के पास मलबा-पत्थर आने से पैदल मार्ग अवरुद्ध है। 🌧️
☔️भारी बारिश व लगातार पत्थर गिरने के कारण आज मार्ग सुचारु नहीं हो सका है।
पितृऋण से मुक्त हुए बिना आर्थिक उन्नयन संभव ही नहीं पितृ पक्ष पितरों को तारने का यज्ञ है, नेक कर्म, अच्छे विचार,यथा शक्ति दान,नाम जप जरूर करे तो करे, जीवन उत्सव में बदल जाना तय तो तय,
2025 तक सब मिलकर लव जिहाद, लैंड जिहाद, घुसपैठ, धर्मांतरण और जनसंख्या नियंत्रण के लिए कठोर कानून मांग रहे थे
लेकिन अब आपस में लड़ रहे हैं और जनसंख्या असंतुलन का मुद्दा खत्म हो गया।
इस खेल का असली खिलाड़ी कौन है?
याद रखिए,
डेमोग्राफी प्रतिदिन बदल रही है और परिणाम भयानक होगा।
प्रिंसिपल ने माता-पिता को स्कूल बुलाकर कहा, "आज हमने बच्चों से 'मेरे पापा' पर निबंध लिखवाया था... लेकिन आपके बेटे की कॉपी पढ़कर पूरा स्टाफ रो पड़ा।"
माँ और पिता दोनों घबराकर कुर्सी पर बैठ गए।
प्रिंसिपल ने धीरे से कॉपी उनके हाथ में रख दी।
ऊपर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—
"मेरे पापा"
"मेरे पापा बहुत अजीब इंसान हैं।
उनके दो हाथ हैं, लेकिन उन्होंने कभी अपने लिए कुछ नहीं खरीदा।
उनकी दो आँखें हैं, लेकिन मैं उन्हें कई बार रात को चुपके से रोते हुए देख चुका हूँ।
उनके पास एक पुरानी घड़ी है, जो हमेशा पाँच मिनट पीछे रहती है। शायद इसलिए क्योंकि मेरे पापा हमेशा अपनी खुशियों से भी पीछे रह जाते हैं।
मेर�� पापा मुझे कहते हैं कि मैं दुनिया का सबसे अमीर बेटा हूँ। लेकिन मुझे पता है कि उन्होंने पिछले तीन साल से अपने लिए नए जूते नहीं खरीदे।
माँ कहती हैं कि तुम्हारे पापा बहुत ज़िद्दी हैं। दादी कहती हैं कि बचपन से ही ऐसे हैं। पड़ोसी कहते हैं कि तुम्हारे पापा बड़े स्वाभिमानी आदमी हैं, किसी के आगे हाथ नहीं फैलाते।
लेकिन मुझे लगता है कि मेरे पापा जादूगर हैं।
क्योंकि महीने की आ��़िरी तारीख़ में भी घर का राशन आ जाता है... मेरी फीस भर जाती है... मेरी किताबें आ जाती हैं... लेकिन उनके लिए कभी कुछ नहीं आता।
एक दिन मैंने उनसे पूछा था— 'पापा, आप नया मोबाइल कब लोगे?'
उन्होंने हँसकर कहा— 'जब मेरा बेटा बड़ा अफसर बन जाएगा।'
उस दिन मैंने देखा था कि उनका मोबाइल पीछे से टूट चुका था और स्क्रीन पर दरारें थीं।
एक रात मैं पानी पीने उठा। पापा बरामदे में बैठे थे। उनके हाथ में बिजली का बिल था और ���ँखों में आँसू।
उन्होंने मुझे देखकर तुरंत मुस्कुरा दिया और बोले— 'मच्छर बहुत हैं, इसलिए बाहर बैठा हूँ।'
मुझे पता था कि वह झूठ बोल रहे हैं।
स्कूल में जब दोस्त अपने पापा की बड़ी-बड़ी कारों की बातें करते हैं, तब मैं चुप रहता हूँ।
क्योंकि मेरे पापा के पास कार नहीं है... लेकिन उन्होंने मुझे अपने कंधों पर बैठाकर पूरी दुनिया दिखा दी है।
कुछ दिन पहले मेरी गलती से उनका चश्मा टूट गया था। मैंने सो��ा था कि वह मुझे बहुत डाँटेंगे।
लेकिन उन्होंने कहा— 'कोई बात नहीं बेटा, पुराना ही तो था।'
दो दिन बाद मैंने देखा कि वह बिना चश्मे के ही काम पर चले गए।
उनकी आँखें बार-बार सिकुड़ रही थीं, फिर भी उन्होंने नया चश्मा नहीं बनवाया।
मेरे जन्मदिन पर उन्होंने मुझे साइकिल दिलाई।
मैं बहुत खुश था।
लेकिन उसी रात मैंने माँ को कहते सुना— 'तुमने अपनी दवाई फिर नहीं खरीदी?'
पापा हँसकर बोले— 'अरे, हल्का-सा दर्द ही तो है... ठीक हो जाएगा।'
मुझे तब समझ आया कि मेरी साइकिल उनकी दवाई से ज़्यादा महँगी थी।
अब मैं बड़ा होकर डॉक्टर नहीं, अफसर नहीं... सबसे पहले अपने पापा का बेटा बनना चाहता हूँ।
ताकि एक दिन मैं उनसे कह सकूँ—
'पापा... अब आपकी बारी है।'
'अब आप अपनी दवाई भी लेंगे, नया चश्मा भी बनवाएँगे, नए जूते भी पहनेंगे और पहली बार बिना खर्च गिने अपनी पसंद की मिठाई भी खाएँगे।'
अगर भगवान सच में कहीं हैं, तो मैं उनसे बस एक ही दुआ माँगूँगा—
'अगले जन्म में भी मुझे यही ��ापा देना... क्योंकि दुनिया में सबसे अमीर इंसान वही होता है, जिसके सिर पर पिता का हाथ होता है।'"
निबंध पढ़ते-पढ़ते माँ की आँखों से आँसू बहने लगे।
उन्होंने पहली बार अपने पति की ओर देखा।
उन्हें याद आया कि सचमुच पिछले कई वर्षों से उन्होंने कभी अपने लिए कुछ नहीं खरीदा।
हर त्योहार पर बच्चों के कपड़े आए...
पत्नी की साड़ी आई...
घर का सामान आया...
लेकिन उनके हिस्से में हमेशा वही पुरानी शर्ट, वही घिसे ह���ए जूते और वही मुस्कान आई।
प्रिंसिपल की आँखें भी नम थीं।
उन्होंने धीमे से कहा—
"हम बच्चों को पढ़ाते हैं, लेकिन आज आपके बेटे ने हम सबको जीवन का सबसे बड़ा पाठ पढ़ा दिया।"
घर लौटते समय माँ ने रास्ते में पति का हाथ पकड़ लिया।
पति हैरान होकर बोले, "क्या हुआ?"
पत्नी रोते हुए बोली—
"आज तक मैं यह गिनती रही कि तुमने मुझे क्या नहीं दिया... लेकिन कभी यह नहीं देखा कि तुमने अपने हिस्से का कितना कुछ छोड़ दिया।"
उस शाम कई सालों बाद पूरा परिवार एक साथ बैठा।
न कोई शिकायत थी...
न कोई ताना...
सिर्फ़ अपनापन था।
बेटा दौड़कर आया और अपने पापा से लिपट गया।
पिता ने उसे सीने से लगाया, लेकिन इस बार उनकी आँखों के आँसू किसी ने छिपाने नहीं दिए।
कहते हैं, माँ घर का दिल होती है... लेकिन पिता वह खामोश दीवार होते हैं, जिन पर पूरा घर टिका होता है।
जो पिता अपनी इच्छाओं का गला घोंटकर बच्चों के सपनों को साँस देते हैं, उन्हें जीवन में रहते हुए सम्मान दीजिए... क्योंकि उनके जाने के बाद सबसे ज़्यादा चुभती है उनकी वही खामोशी, जिसे हम कभी समझ पाते === लक्ष्मी मिश्रा
🚩🚩श्रीगोवर्द्धनमठ पुरी में आज २६-०९-२०२६ को अनन्तश्री विभुषित ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय पुरीपीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती महाराज जी के कर कमलों द्वारा स्वास्तिक चित्रित सूर्य अंकित केशरिया ध्वज उत्तलन हुआ।
सत्य सनातन धर्म की जय हो !
🚩🚩
देवताओं ने वह दुर्दिन भी देखे जब अमरावती असुरों के अधिग्रहण में चली गई। वर्षों पूर्व अंतरिक्ष वैज्ञानिक से सुना कि जो घटनाएँ (जैसे नेबुला स्टार) अपवाद मानी जाती हैं, वह वास्तव में सामान्य होती हैं।
भारत में धर्मविमुख शासन से भयभीत नहीं होना चाहिए। पुराणों में ऐसे प्रसंग हैं...
कुमार स्कन्दगुप्त का भारत
हूण जाति की नृशंसता इतनी थी कि चीन से लेकर महान रोमन साम्राज्य तक काँप उठे थे। इस अकेली बर्बर जाति का आतंक इतना था कि उसने उस समय के किसी भी बड़े साम्राज्य को रौंदे बिना नहीं छोड़ा।
चीन का विशाल साम्राज्य तो इतना भयाक्रांत हुआ कि उसने हूणों से लड़ने का विचार ही छोड़ दिया और रक्षात्मक होकर खुद को ऊँचे ऊँचे सैकड़ों किलोमीटर की दीवार से घेर लिया।
जब चीन आत्मसमर्पित हुआ तो ये हूण अपनी एक टुकड़ी के साथ यूरोप की ओर दौड़ पड़ा। "आटिला" नाम के उसके सेनापति ने पोलैंड को मिट्टी में मिला दिया फिर एक एक कर यूरोप के बाकी देशों में खून की नदियाँ बहा दी। इन हूणों के कारण विशाल रोमन साम्राज्य मिट्टी में मिल गया तो इस विजयोन्माद में उन हूणों की टुकड़ी ने भारत का भी रुख किया और गांधार प्रदेश पहुँच गये।
वहां विजय प्राप्त कर जब वो सिंध को निगलने आगे बढ़े तो वहां उसे रोकने के लिए वैदिक सूर्य कुमारगुप्त का महान प्रतापी राज्य खड़ा था।
कुमारगुप्त ने इन बर्बर हूणों के समूल नाश के लिए किसी और सेनापति को न भेजकर अपने पुत्र राजकुमार स्कंद को भेजा। हूणों की विशाल और बर्बर टोली को स्कंद ने रौंद दिया और जन वो हूणजयी होकर पाटलिपुत्र लौटे तो वहां उनके स्वागत में वृद्ध पिता कुमारगुप्त ने अश्वमेध यज्ञ किया।
फिर ��ुमारगुप्त के स्वर्गवासी होने के बाद स्कंद भारत के सम्राट बने।
स्कंद के शासन के उत्तरार्ध में हूणों ने फिर से अपनी शक्ति संकलित की और "खिंखिल" नाम के सेनापति के नेतृत्व में फिर से भारत पर हमलावर हो गया। भारत की सेना शुरुआत में जब परास्त होने लगी तो स्कंद स्वयं ही सेना का संचालन करने पश्चिम भारत की ओर चल पड़े। उधर वो युद्ध में हूणों से जूझ रहे थे और इधर उनके धूर्त भाई पुरुगुप्त ने सत्ता पर छल स��� कब्जा कर लिया।
सत्ता हड़पे जाने की सूचना महाराज स्कंद को पहुँचा तो उनके सामने दो रास्ते थे।
एक था कि वापस जाकर अपने सौतेले भाई से वापस सत्ता छीन लें और दूसरा ये कि हूणों को युद्ध में धूल चटाये।
महान सम्राट विक्रमादित्य के पौत्र और हिन्दू धर्मध्वजा रक्षक सम्राट स्कंद ने दूसरा विकल्प चुना और युद्ध भूमि में वीरगति को प्राप्त हुये।
दूसरा विकल्प इसलिये चुना क्योंकि अगर वो सत्ता की सोचते और लौट जाते तो बर्बर हूणों क�� कारण न जाने कितने लोगों को अपनी जान देनी पड़ती, न जाने कितनी ललनाओं की इज़्ज़त लूटी जाती और न जाने कितने देवालय टूटते।
पहले अपनी सत्ता और फिर अपने प्राण की बलि देकर स्कंद ने सबको बचा लिया और मृत्यु पाकर अमर हो गये।
पाटलिपुत्र का महान वैभवशाली सम्राट अपनी राजधानी से हजारों किलोमीटर दूर पंजाब में बलिदान हुये पर बलिदान होने से पहले उन्होंने हूण सेनापति "खिंखिल" को भारत की सीमा से मीलों दूर खदेड़ दिया और धर्म तथा राष्ट्र की सुरक्षा सुनिश्चित की।
स्कंद का व्यक्तित्व चरित्र और राष्ट्रीय चरित्र उन सबके लिए पाथेय है जो सत्ता को सब कुछ समझते हुये राष्ट्र और धर्म की सुरक्षा से मुँह मोड़ लेते हैं पर दुर्भाग्य कि भारत में किसी ने इतिहास से न तो कभी कुछ सीखा और न सीखेंगे।
और ये हो भी क्यों न क्योंकि आज भारत में कितने हैं जिन्हें महान सम्राट स्कंद की ये गाथा याद है और अगर नहीं है तो फिर किसी और से ये उम्मीद करना कि उनका चरित्र स्कंद के चरित्र का अनुगमन करेगा हास्यास्पद ही हैं।
Courtesy shivananda mishra
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26/11 का मुंबई रेलवे स्टेशन पाकिस्तान से आया कसाब और उसका साथी...प्लेटफॉर्म पर घूमते हुए पर घूमते लोगों को मार रहे थे
....गोलियों की आवाज़ और 50 से ज्यादा लोगों की मौत.... ये घटना सभी याद रखते हैं
लेकिन उस शख्स को बहुत कम लोग याद करते हैं, जिसकी आवाज़ ने सैकड़ों अनजान लोगों को गोलियो�� की दिशा में जाने से रोक दिया....., #विष्णु_दत्ताराम_झेंडे।
26 नवंबर 2008 की रात वह छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (CST) के अनाउंसमेंट केबिन में ड्यूटी पर थे। यह प्लेटफॉर्म के ऊपर बना एक कांच का कमरा था, जहाँ से पूरे स्टेशन का काफी हिस्सा दिखाई देता था।
ड्यूटी खत्म होने में ज्यादा वक्त नहीं बचा था कि अचानक उन्हें तेज धमाके और गोलियों की आवाज़ सुनाई दी। उन्होंने देखा कि लोग जान बचाकर भाग रहे हैं। दो आतंकवादी देश के सबसे व्यस्त रेलवे स्टेशनों में से एक में घुस चुके थे और सामने आने वाले लोगों पर गोलियां चला रहे थे। उस स्टेशन पर ही 50 से ज्यादा लोगों की जान जाने वाली थी।
लेकिन विष्णु झेंडे ने ऊपर से एक ऐसी चीज देख ली, जिसे शायद बाकी लोग नहीं देख पा रहे थे। लोकल ट्रेनें लगातार स्टेशन पर आ रही थीं। हर ट्रेन से सैकड़ों यात्री उतरने वाले थे—सीधे उन्हीं प्लेटफॉर्मों पर, जहाँ आतंकवादी गोलियां चला रहे थे। उनके पास सिर्फ एक माइक्रोफोन था, जिसकी आवाज़ पूरे स्टेशन के प्लेटफॉर्म तक पहुंच सकती थी। उन्होंने फैसला किया कि वे इसका इस्तेमाल करेंगे।
भले ही इसका मतलब था कि उन्हें छिपने के बजाय उसी जगह पर रहना होगा, जहाँ से आतंकवादी उन्हें देख सकते थे। उन्होंने बार-बार हिंदी और मराठी में अनाउंसमेंट करना शुरू किया। लोगों से कहा कि वे मुख्य कॉनकोर्स की तरफ न जाएं। पीछे के रास्तों से स्टेशन से बाहर निकलें और गोलियों की दिशा से दूर रहें। उनकी आवाज़ सुनकर सैकड़ों लोगों ने अपना रास्ता बदल लिया।
वे स्टेशन से बाहर निकल गए—उस जगह जाने के बजाय जहाँ गोलियां चल रही थीं।
आतंकवादियों को समझ आ गया कि ये अनाउंसमेंट कहाँ से हो रही हैं। वे उनके केबिन के ठीक नीचे तक पहुंच गए।
एक आतंकवादी ने ऊपर की तरफ गोली चलाई।
विष्णु झेंडे नीचे झुक गए, इंतजार किया और जैसे ही मौका मिला, फिर माइक्रोफोन उठाकर ल���गों को चेतावनी देने लगे। उनके पास न कोई हथियार था, न कोई सुरक्षा कवच। उनके पास था तो बस एक माइक्रोफोन और यह समझ कि खतरा कहाँ है। वह कोई कमांडो नहीं थे। वह कोई पुलिस अधिकारी नहीं थे।
वह रेलवे के एक सामान्य अनाउंसर थे, जो उस रात अपनी ड्यूटी कर रहे थे। लेकिन जब आतंकवादी लोगों की जान लेने आए, तो उन्होंने अपने पास मौजूद एकमात्र हथियार—अपनी आवाज़—का इस्तेमाल किया।
26/11 में बंदूकें चलाने वाले आतंकवादियों के नाम इतिहास में दर्ज हैं। लेकिन उसी स्टेशन पर सैकड़ों लोगों को गोलियों के रास्ते से दूर करने वाली वह आवाज़ भी याद रखी जानी चाहिए। वह आवाज़ थी—विष्णु दत्ताराम झेंडे की।
आईआईटी बॉम्बे के फैकल्टी मेंबर प्रोफेसर सूर्यनारायण के समर्थन में अब उतरने वालों की भीड़ सैकड़ों से ऊपर चढ़ कर हजारों की हो चुकी है |
अगर आपको भी लगता है कि एससीएसटी एक्ट का दुरुपयोग कर सामान्य रूप से अपनी जिम्मेदारी निभाने वाले आदमी को शिकार बनाया जाता है |
तो कुछ समय निकाल कर सोशल मीडिया के माध्यम से प्रोफेसर के समर्थन में उतरी इस भीड़ का समर्थन कर देना | अन्यथा किसी का भी जी���न सिर्फ दो शब्दों की शिकायत में बदला जा सकता है |
जिस पीएम ,सीएम को हिंदू हिंदुवादी ठहराएं हुए हैं उनका आदर्श गोरी गजनी खिलजी औरंगजेब हैं ये संघ भाजपा नेताओं कि करतूत को हिंदू आसानी से समझने में विफल हैं ऐसे में हिंदू अपने धर्म संस्कृति समाज के रक्षार्थ लड़ पाएंगे या मजहब रिलिजन में कन्वर्जन के लिए लाईन लगायेंगे ?😥😥😨😨
पाकिस्तान से भाग कर आये हिन्दू,जिनके पास वैध कागज़ हैं, दिल्ली के आदर्शनगर में झुग्गी डालकर रहते आये थे, केजरीवाल और अब भाजपा सरकार ने बिजली नहीं दी... कि एक बल्ब तक जला सकें...एक पंखा लगाकर रात म��ं चैन से सो सकें... लोग मजदूरी करते हैं,चाय बेचते हैं... जैसे तैसे अपनी ज़िंदगी की गाड़ी खींच रहे थे ये लोग..... इसमें से अधिकांश परिवार पाकिस्तानियों के हाथ अपनी बहू-बेटियां गवां कर दिल्ली में आये थे....
अब दिल्ली की भाजपा सरकार ने आदर्शनगर से इन्हें मार-कूट कर भगाना शुरू कर दिया है... झुग्गियां तोड़ा जाना शुरू हो चुका है... 2000 हिन्दू सनातनी कहाँ जाएं ? मुस्लिम झुग्गी वाले मय बिजली पानी कनेक्शन... आधार कार्ड और बैंक खातों के साथ ठाठ से रह रहे हैं, लोकल राजनीतिक और मज़हबी सपोर्ट भी है... AC तक लगे हैं मुस्लिम झुग्गियों में...
भाजपा सरकार की इस ध्वंसात्मक कार्यवाही रोकने हिंदुओं का कोई नेता सामने नहीं आ रहा है !