खराब सड़क पर सवाल पूछने पर तमाचा मारकर क्वालिटी टेस्ट करवाते दिल्��ी के उप मुख्यमंत्री प्रवेश वर्मा,
प्रवेश वर्मा को कान पकड़ कर माफ़ी मांगनी चाहिए और मुख्यमंत्री न बनने का गुस्सा आम आदमी पर न निकालो
SP रामपुर महोदय, महोदय पहले से चल रही आनलाइन छुट्टी की व्यवस्था को आपके द्वारा मैनुअल कर देना माननीय मुख्यमंत्रीजी के आदेश की अव��ेलना है, इससे पुलिसकर्मियों का मनोबल टूटता है। @myogiadityanath @dgpup @Uppolice @rampurpolice @adgzonebareilly
PAC जवान सिर्फ ड्यूटी करने वाली मशी�� नहीं हैं।
घंटों की कठिन ड्यूटी के बाद अगर जवानों को रहने की उचित व्यवस्था, स्वच्छ भोजन और मूलभूत सुविधाएँ भी न मिलें, तो यह सिर्फ अव्यवस्था नहीं, बल्कि जवान के सम्मान और मनोबल का सवाल है।@Dgpacup @Uppolice @co10pacup @myogiadityanath
SP मऊ महोदय, चिरैयाकोटSHO द्वारा: रात की ड्यूटी के बाद मात्र 35 मिनट के नोटिस पर 12 बजे मीटिंग! 5 मिनट देरी से पहुंचे कर्मियों (जिसमें 5-6 माह की गर्भवती महिला भी हैं) की रपट लिख प्रताड़ित किया जा रहा है यही है मानवता। @Uppolice@adgzonevaranasi@maupolice@digazamgarh@UPGovt
#बलिया
🌼🌼💐💐 ऐसा कोई दिन नहीं जा रहा जिस दिन कोई पुलिस वाला मर नहीं रहा हो कहीं आत्महत्या तो कहीं दुर्घटना। डीजीपी को फुर्सत नहीं कि अपने फोर्स के जवानों से बात करें..😡😡😡😡😡.
जिम्मेदारी कोन लेगा?
#लार्ड_मेकाले 1861 से 2026 तक भारतीय भारतीय सिपाही, दीवान, दरोगा और इंस्पेक्टर की जान का दुश्मन बना हुआ
अरे इतनी बेरहमी और अत्याचार अंग्रेजी अफसर ही तो करते थे आप मतलब भारतीय Indian Police Service Association हो
@dgpup@Uppolice@myogioffice@UPGovt
आज उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी,
इस दौरान एक पत्रकार ने सवाल पूछा तो उसका जवाब भी नहीं दिया,
बाकी आप समझ सकते हैं कि इस महिला पत्रकार के ऊपर क्या बीत रही होगी,
डरना नहीं हम तुम्हारे साथ हैं।
सवालों से भागते योगी आदित्यनाथ
BJP वालों को सवालों से बहुत डर लगता है। कभी मोदी भागने लगते हैं, कभी योगी भागने लगते हैं।
काम ही ऐसे किए हैं, डरना तो बनता है।
क्या ये खबर एक लोकतांत्रिक देश के प्रारूप का प्रतीक है ?
क्या डेमोक्रेसी में एक अविधिक सोशल मीडिया पालिसी के द्वारा हजारों पीड़ित क���्मचारियों की आवाज को दबाना लोकतंत्र का परिचय है ?
क्या अनुशासन का अर्थ केवल शाब्दिक है या सालों से जिस अनुशासनहीनता के कारण विभागीय अनियमितताएं हैं उस अनुशासनहीनता को नजरअंदाज करने के लिए ऐसे आदेश और पॉलिसीज़ बनाकर संविधान का मज़ाक़ नहीं बनाया जा रहा ?
विभागीय जाँच किसकी सवाल उठाने की ?
अनप्रोफेशनल वर्किंग कल्चर का ?
अराजपत्रित कर्मचारियों के जीवन मूल्यों से सालों से हो रहे खिलवाड़ के ���िए सक्षम न्याय और नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत को मूक कर देना ?
संविधान और अनुशासन एक दूसरे के पूरक हैं लेकिन इसका अर्थ ये नहीं कि जीवन की स्वतंत्र आवाज को दबाया जाए !
देश में इसपर सार्थक बहस की आवश्यकता और समाधान ��वश्यक है !
न्यायालय के तमाम आदेशों में क्रीमी लेयर को फटकार पड़ती है जिसका खामियाजा भी भुगतना केवल निचले कर्मचारियों को है ?
देश की पुलिसिंग वेलफेयर के मामले में ध्वस्त है !
भेदभाव के अनुच्छेदों से संविधान की सार्थकता है या संविधान की समानता उसके अनूपूरक प्रारूप से तय होगी ये बड़ा सवाल है ?
आर्टिकल ३३ की व्याख्या अपनी सुविधानुसार लागू होगी या समानता और निष्पक्षता के अनुसार ?