The only problem with Baba Saheb is that he did tremendous work for people who either do not support him or hate him from the core of their hearts. Take the example of Savarna women: he liberated them from the oppression of Hindu religion, gave them freedom, dignity, and rights. But can you find any example of them supporting Ambedkar’s ideas?🙏🏿��🏾🥰
मैं एक विस्तृत वीडियो बनाने की कोशिश कर रहा हूँ जिसमें बहन @Mayawati जी और BSP के कार्यकाल के दौरान किए गए महत्वपूर्ण कार्यों को शामिल किया जाएगा। वह चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं और अपने कार्यकाल में उ���्होंने कई अहम कदम उठाए, जिनका पर्याप्त प्रचार नहीं हो पाया। जातिवादी मीडिया की वजह से उनके खिलाफ गलत धारणाएँ अधिक फैलाई गईं, लेकिन उनकी उपलब्धियों पर उतनी चर्चा नहीं हुई। हालांकि, इस विषय पर ऑनलाइन बहुत कम विश्वसनीय सामग्री उपलब्ध है। यदि कोई बुद्धिजीवी या विशेषज्ञ मेरे इस प्रयास में मदद कर सके, तो यह बेहद सराहनीय होगा।
ईरान में चावल को बिरिंज कहते हैं. बिरिंज में मांस मिलते ही बिरयानी बन गया.
बिरयानी हवा में उड़कर भारत नही आई. मुग़ल अपने साथ वास्तुकला संस्कृति, भाषा संस्कृति और भोजन संस्कृति भारत लेकर आए.
इसी भोजन संस्कृति के पिटारे में बिरयानी भी थी.
वेज बिरयानी नाम की कोई चीज नही है. वेज बिरयानी एक धोखा है. वो पुलाव है.
असली बिरयानी वही है जिसमें मांस हो. बिरयानी कोई बहुत प्रसिद्ध या लाजवाब भोजन नही था. ना ही शाही भोजन था.
बिरयानी दरअसल मुग़ल सैनिकों का भोजन था. चावल में मांस मिलाकर इसे आसानी से पकाया जा सकता था. मुग़ल सैनिक केवल चावल लेकर चलते थे. जिन इलाकों को जीतते वहां के पशुओं को काटकर चावल में मिलाकर बिरयानी बना लेते.
बिरयानी खा खा कर मुग़लों भारत पर 200 सालों तक शासन किया. बुलंद दरवाजा, ताज महल और लाल क���ला बनाया.
बिरयानी का नशा भारतीयों को भी लग लग गया. अब तो बिरयानी झटपट नही, आराम से, ढेर सारे मसालों के साथ कम आंच पर धीरे धीरे पकाई जाती है.
बच्चों को मिडडे मिल में मटन बिरयानी खिलाना अनिवार्य करना चाहिए. पश्चिम में पाकिस्तान और पूरब में चीन से लड़ने के लिए मटन बिरयानी खाना जरूरी है.
Photo : Royal Mughal Kitchen
In UP and Punjab many open category people are getting jobs through fake SC ST caste certificate
Open category folks are gulping jobs but the current narrative is to pitch one SC ST against another SCST castes via subclassification
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ।
जब बात अपनी पर आ जाये।
अमेठी में SDM प्रीती तिवारी जी के मूड ख़राब होने पर,
जब लखनऊ से आयी एक महिला पत्रकार का मूड ख़राब हो गया।
किसी लड़की का जिक्र आने पर आम तौर पर मैं यह सवाल करती ही हूँ कि लड़की क्या कर रही है। मुझे यह सुनने की बड़ी इच्छा होती है कि लड़की कुछ काम कर रही है। वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर है। नौकरी, व्यापार, कमाने के लिए कुछ-न-कुछ काम करती है। वह फलाँ की पत्नी है, फलाँ की माँ है, यह उसका परिचय नहीं। मुझे यह सुनने में जरा भी अच्छा नहीं लगता कि वह तो कुछ नहीं करती, या कि वह तो हाउस वाइफ�� है, वगैरह-वगैरह। हरेक वयस्क लड़की को, जैसे भी हो, आत्मनिर्भर होना चाहिए। दूसरों पर निर्भर लड़कियों पर मुझे बड़ी दया आती है। जो लड़कियाँ आत्मनिर्भर होने का प्रयास नहीं करतीं, उन पर मुझे कभी-कभी गुस्सा भी आता है। जीवन तो एक ही है और एक बार ही मिला है। बाधा-विपत्तियाँ तो आएँगी ही, तो फिर जिम्मेदारी लेकर उनमें क्यों न कूद पड़ें? ठगी जाएँगी-एक बार, दो बार, तीन बार। लड़कियों की राहों को कोई आसान नहीं ब���ाता। उन्हें ख़ुद ही पत्थर हटाने पड़ते हैं।
― तसलीमा नसरीन
बेशरम (उपन्यास)
#RajkamalBooks #साथजुड़ेंसाथपढ़ें
यह किसी मॉडल की तस्वीर नही है. इनका नाम रुचिका शर्मा है, ये इतिहासकार हैं. रुचिका शर्मा का कहना है चाणक्य काल्पनिक चरित्र है. चाणक्य का कोई इतिहास में प्रमाण नही है.
रुचिका शर्मा के अनुसार ब्राह्मणों ने अपने वर्च���्व के लिए चाणक्य जैसे काल्पनिक चरित्र को मौर्य साम्राज्य के इतिहास में फिट कर दिया.
पहली बार ब्राह्मण तबके के किसी इतिहासकार ने चाणक्य को मिथक कहा है. सक्रिय रुचिका शर्मा.
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इतिहासकार और भाषा वैज्ञानिक डॉ राजेन्द्र प्रसाद सिंह कई वर्षों से कह रहे हैं : चाणक्य इतिहास का मिथ है.
ज्ञात सबूतों के आधार पर कहा जाएगा कि सम्राट अशोक के दरबार का सबसे बड़ा लेखक और सलाहकार चपड़ थे..
चाणक्य तो मिथक ���ै.
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फिर सवाल आता है क्या केवल ब्राह्मणों ने अपने वर्चस्व के लिए चाणक्य को गढ़ा ?
ईसा पूर्व मौर्य साम्राज्य के समय जाति वर्ण अव्यवस्था का विकास नही हुआ था. मौर्य साम्राज्य और नंद वंश मूलतः बौद्ध साम्राज्य थे.
ब्राह्मण इतिहासकारों ने अपनी जाति की मौजूदगी दर्ज कराने के लिए एक काल्पनिक चरित्र चाहिए था ताकि अपने वर्चस्व के साथ जाति वर्ण अव्यवस्था को भी मौर्यकालीन साबित किया जा सके.
क्या राजा के दरबार में एक मामूली साधु राजा को आंखें दिखा सकता है. राजा हाथी से उसका सर नह�� कुचल देता.
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कुबलई, द ग्रेट खान
कुबलई खान बौद्ध सम्राट थे। उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाया और इसे मंगोलों के लिए राष्ट्रीय धर्म बना दिया।
मंगोलों को बौद्ध धर्म की जानकारी के लिए कुबलई खान ने अनेक बौद्ध ग्रंथों का मंगोल भाषा में अनुवाद कराया।
कुबलई खान ने 1260 ई. में बूढ़े, अनाथों और बीमारों को आर्थिक सहा���ता देने की राजाज्ञा निकाली थी और 1271 ई. में बीमारों के लिए चिकित्सालय बनवाए।
चीन का विख्यात बौद्ध व्हाइट स्तूप कुबलई खान ने 1279 ई. में बनवाया था।
मार्कोपोलो ने कुबलई खान के जमाने ��ें मंगोलिया की यात्रा की और लिखा कि सम्राट बीस हजार गरीबों को प्रतिदिन दान दिया करते थे।
मार्कोपोलो ने यह भी लिखा कि कुबलई खान ने श्रीलंका से बुद्ध के दाँत अवशेष मंगवाए थे।
दुनिया के इतिहास में बौद्ध सम्राट कुबलई खान के बाद उससे बड़ा साम्राज्य सिर्फ अंग्रेज ही स्थापित कर पाए, दूजा कोई नहीं।
—प्रो राजेंद्र प्रसाद सिंह के फ़ेसबुक वाल से सभार
महान हॉकी खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न मिलना लगभग तय था. 82 सांसदों ने समर्थन पत्र भी दिया था.
सिलेक्शन कमिटी में उनका नाम सबसे ऊपर था. लेकिन आखरी समय में उनका नाम हटाकर क्रिकेट खिलाड़ी ��चिन तेंदुलकर पर सहमति बनी.
फेरवारी 2014 को UPA सरकार ने ब्राह्मण सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया.
मई 2014 में ही UPA का लोकसभा चुनाव में सूपड़ा साफ हो गया.
BJP ने भी मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न सम्मान से महरूम रखा है.
मेजर ध्यानचंद ब्राह्मण या अन्य अगड़ी जातियों से होते तो उन्हें पहले ही भारत रत्न सम्मान मिल गया होता. लेकिन इतना जरूर कहना चाहूंगा मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न मिले य��� नही मिले, मेजर ध्यानचंद हर सम्मान से ऊंचे हैं.