अमृत भारत एक्सप्रेस (14663/14664) का बीबीगंज (BIGJ) स्टेशन पर 2 मिनट का ठहराव दिया जाए। इससे हजारों यात्रियों, छात्रों, मजदूरों और व्यापारियों को बड़ी सुविधा मिलेगी।
रेल प्रशासन से जनहित में जल्द निर्णय लेने की अपील।
#Bibiganj@RailMinIndia@AshwiniVaishnaw@gm_nfr@drm_kir
मैंने निराशा को चुना,क्योंकि अंत मे निराशा ही हाथ लगती है, निराशा को सहर्ष स्वीकार कर के साथ चलने का हुनर सीख लिया है अब,खैर!...आप अपनी ओर से कितनी भी कोशिश कर लें,बुरा अनुभव मिलेगा ही मिलेगा,सबकुछ स्वीकार करने का साहस रखें और वर्तमान में जिए बिना किसी की परवाह किये...!
जुड़ाव असल में आत्माओं और भावनाओं के बीच होता है जहाँ दो दिल बिना किसी शर्त,बिना किसी बंधन के एक-दूसरे को महसूस करते हैं विवाह तो सिर्फ संसार का बनाया हुआ एक ढांचा है,एक औपचारिकता रिश्ते तो तब ही सच्चे होते हैं जब उन्हें मन स्वीकार करे,जब आत्माएँ एक-दूसरे की भाषा समझ लें...!
तुम सिर्फ़ मेरे जीवन का हिस्सा नहीं हो; तुम मेरा जीवन हो। सच कहूँ तो, तुम्हारे आने से पहले मैं यह जानता ही नहीं था कि मैं कौन हूँ और मुझे कहाँ जाना है। मेरे जीवन की दिशा भटक चुकी थी, और मैं शायद एक ऐसे रास्ते पर था जो मुझे मेरी असली पहचान से दूर ले जाता। पर फिर, तुम मेरे जीवन में एक रोशनी की किरण की तरह आई।
तुमने मुझे वह आईना दिखाया जिसमें मैंने खुद को पहली बार एक बेहतर और सच्चा इंसान बनते देखा। तुम्हारे अटूट विश्वास और बिना शर्त के प्यार ने मुझे बदल दिया है।
- @chastemonk
सच कहूँ तो, तुम्हारे बिना मैं बिल्कुल अधूरा हूँ। तुम्हारे बिना मेरी जिंदगी उस किताब की तरह लगती है जिसके पन्ने कोरे हैं, या उस संगीत की तरह जिसमें कोई धुन नहीं है। जब तुम साथ नहीं होते, तो वक्त जैसे ठहर सा जाता है और हर खुशी अधूरी सी लगती है। तुम सिर्फ़ मेरा प्यार नहीं, बल्कि मेरी आदत, मेरा सुकून और मेरे जीने की वजह बन गए हो।
मेरी हर सुबह तुम्हारे ख्याल से शुरू होती है और हर रात तुम्हारी यादों पर खत्म। तुम्हारे साथ बिताया हर एक पल मेरे लिए किसी खजाने से कम नहीं है। तुम्हारी हंसी में मेरी दुनिया बसती है और तुम्हारी आँखों में मुझे मेरा कल दिखाई देता है।
- @chastemonk
मुझे शायद इसलिए कोई ज़्यादा नहीं पढ़ता,
क्योंकि अगर कोई एक बार मुझे पढ़ने बैठ जाए
तो पूरा दिन सिर्फ मेरे शब्दों में उलझा रहता है
और जब सब कुछ पढ़ भी लेता है,तो आख़िर में फैसला यही निकलता है क्या ही वाहियात पढ़ लिया इससे अच्छा तो कहीं घूम ही आते कम से कम दिमाग तो शांत रहता...!
वास्तविकता यही है कि सफल प्रेमी की ज़िंदगी चाय की गर्माहट में सिमट जाती है,और असफल प्रेमी शराब और सिगरेट के धुएँ में खुद को ज़िंदा रखता है,ख़ैर!...मैं तो इन सब कायदे-क़ानूनों से परे,किसी बेफिक्र नदी की तरह अपनी ही रफ़्तार में बह रहा हूँ न बंधन,न रोक,न पछतावा लापरवाही का जीवन....!
बाहर दिसंबर अपने पूरे शबाब पर है। दरवाज़े के शीशों से टकराती हुई ये ठंडी हवाएँ और दूर तक फैला सफ़ेद कोहरा मुझे हमेशा एक ही बात याद दिलाता है—कि दुनिया चाहे कितनी भी ठंडी और धुंधली क्यों न हो जाए, तुम्हारे पास एक ऐसी पनाह है जो हमेशा गर्म रहती है। और वो पनाह है—तुम्हारा सीने का आलिंगन।
जब मैं तुम्हारे क़रीब आता हूँ, और तुम्हारे सीने से लगकर आँखें बंद कर लेता हूँ, तो बाहर का सारा शोर, सारी ठंडक, वहीं थम जाती है। ऐसा लगता है, जैसे मैं एक सुरक्षित द्वीप पर हूँ, जहाँ प्रेम के सिवा और कुछ नहीं है। तुम्हारी धीमी, स्थिर साँसों का संगीत, मेरे कानों में बजने वाली सबसे मधुर धुन है। मुझे उस पल एहसास होता है कि तुम सिर्फ़ मेरे प्रिय नहीं हो, तुम मेरी शांति का केंद्र हो।
दिसंबर की रातें कितनी भी लंबी क्यों न हों, तुम्हारी बाहों का घेरा उन्हें छोटा और प्यारा बना देता है। तुम्हारा प्यार मेरे लिए उस अलाव की तरह है, जिसे मैंने अपनी आत्मा में जला रखा है।
तुम मेरे लिए सिर्फ़ एक मौसम नहीं हो, तुम हर मौसम का ख़ूबसूरत एहसास हो। यह ठंड बीत जाएगी, पर तुम्हारे सीने से मिली यह गर्माहट, यह सुकून, हमेशा मेरे साथ रहेगा।
- @chastemonk
साल का आख़िरी महीना, दिसंबर, हमेशा मेरे दिल को छू लेता है। बाहर जो ये शीतल, ठंडी हवाएँ चल रही हैं, और जो ये गहरा कोहरा हर चीज़ को ढक रहा है, ये सब मिलकर एक अलग ही माहौल बनाते हैं—एक ऐसा माहौल जिसमें मुझे सबसे ज़्यादा तुम्हारी याद आती है, और तुम्हारी ज़रूरी महसूस होती है।
मगर इन सर्द रातों में, मुझे सबसे ज़्यादा सुकून कहाँ मिलता है, जानती हो? तुम्हारे सीने के आलिंगन में। जब मैं तुम्हारी बाँहों में सिमटकर, तुम्हारे दिल की धीमी और स्थिर धड़कन सुनता हूँ, तो मुझे लगता है जैसे मैंने दुनिया की हर अशांति से पनाह ले ली है।
- @chastemonk
सबकी अपनी ज़िंदगी है, अपने अपने ज़ख़्म, अपनी-अपनी अधूरी कहानियाँ। कोई भी किसी की पीड़ा का पूरा बोझ नहीं उठा सकता और सच कहें तो चाहता भी नहीं। यहाँ जो भी है, वो बस चंद पल का ठहराव है, कुछ लम्हों की गुफ़्तगू, जो एक-दूसरे के ज़ख़्मों पर हल्की-सी पट्टी तो रख देती है, मगर घाव भरती नहीं।
हम सब भीतर से कहीं न कहीं खाली हैं, थके हुए हैं, बुझे हुए हैं। लेकिन बाहर की दुनिया को दिखाने के लिये चेहरे पर मुस्कान चिपकाए रखते हैं, जैसे सब कुछ ठीक है। एक बनावटी मज़बूती का नाटक चलता रहता है जैसे सबने कोई मुखौटा पहन रखा हो और उस मुखौटे के पीछे जाने की किसी को इजाज़त नहीं।
लोग तंज करते हैं, एक-दूसरे पर अपनी थकान, असुरक्षा और भीतर के डर को थोपते हैं। कोई ‘कमज़ोर’ न कहलाए इसलिए, कोई ‘बेकार’ न समझा जाए इसलिए हम सब एक-दूसरे के सामने मज़बूत बनने का ढोंग करते हैं, जबकि भीतर ही भीतर खुद से भी हार चुके होते हैं।
कोई किसी का नहीं होता, ये कड़वा सच अब धीरे-धीरे सब समझ चुके हैं, मगर फिर भी किसी अपने की उम्मीद में ज़िंदगी को ढो रहे हैं। क्योंकि शायद इंसान उम्मीद के बिना मर जाता है और झूठी उम्मीद के सहारे जीता रहता है।
हम सब लड़ रहे हैं अपने भीतर के शोर से, अपने ही सवालों से, अपनी ही उलझनों से और हर रोज़ एक नई हार को ‘नॉर्मल’ कहकर फिर उठ खड़े होते हैं...ताकि दूसरों को लगे कि हम ‘ठीक’ हैं। 🌸
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
@Raghvendra_101
सच कहूं तो अब रातों में ही सुकून है। जैसे दिन का पूरा शोर, सारी उधेड़बुन, सारे चेहरे, सारे सवाल अंधेरा होते ही अचानक किनारे हो जाते हैं। रात अपने साथ एक अजीब-सी उदासी तो लाती है, लेकिन उसी के भीतर कहीं एक शांत-सा ठिकाना भी होता है। जहाँ कोई आवाज़ नहीं, कोई उम्मीद नहीं, कोई जवाब नहीं, बस मैं हूँ और मेरा कमरा है।
ये चार दीवारें मेरे लिए दुनिया बन चुकी हैं। लोग कहते हैं कि अकेलापन काटने लगता है, लेकिन मुझे लगता है कि अकेलापन भी एक कला है, इसे धीरे-धीरे सीखा जाता है और बड़े धैर्य से निभाया जाता है। मैंने इस कमरे की ख़ामोशियों को समझना सीख लिया है। यहाँ हर चीज़ अपनी जगह पर जमी रहती है। मेरी किताबें, मेरा बिस्तर, मेरी मेज़ और वो खिड़की जिससे रात की ठंडी हवा अंदर आती है और मुझे याद दिलाती है कि बाहर की दुनिया भले बड़ी है, पर मेरा सुकून सिर्फ़ यहीं है।
दिन में बहुत कुछ होता है लोग मिलते हैं, बातें होती हैं, कभी-कभी हँसी भी छूटती है। लेकिन भीतर का शोर वहीं का वहीं रहता है। रात आते ही वो शोर धीरे-धीरे कम होने लगता है, जैसे किसी ने भीतर बजती तेज़ आँधी का वॉल्यूम धीरे-धीरे कम कर दिया हो। जब पूरा शहर थककर सो जाता है, तभी मेरे अंदर की जागती हुई बेचैनियाँ थोड़ी शांत होती हैं। मुझे लगता है कि रातें मुझे समझती हैं, दिन की तरह मुझसे कोई उम्मीद नहीं रखतीं।
रातों में मैं अपने असली रूप में होता हूं जहां न मज़बूत बनने की ज़रूरत, न खुश दिखने की, न किसी को कुछ साबित करने की। ये कमरा मुझे जैसे मेरी चुप्पियों, मेरी थकान, मेरे डर, मेरी छोटी-छोटी खुशियों के साथ स्वीकार कर लेता है। कभी-कभी मैं बस लेटकर छत को देखता रहता हूँ और पाता हूं कि अंधेरे में भी एक भाषा होती है बहुत कोमल, बहुत धीमी, लेकिन पूरी तरह सच्ची।
इन रातों ने मुझे खुद से मिलवाया है। उन्होंने मेरी रफ्तार धीमी की है, मेरे अंदर की पीड़ा को जगह दी है। जब बाहर की दुनिया मेरे लिए बहुत भारी हो जाती है, ये छोटा-सा कमरा मेरे लिए एक बंदरगाह बन जाता है जहाँ मैं अपनी सारी थकान उतार देता हूँ, जहाँ किसी को फर्क नहीं पड़ता कि मैं कैसा दिख रहा हूं या किससे जूझ रहा हूं। यहाँ सिर्फ़ मैं और मेरी साँसों का धीमा-सा उतार-चढ़ाव है।
मैंने महसूस किया है कि सुकून कोई बड़ी चीज़ नहीं होता; वो बस दो-तीन पलों का मेल है। जब दिल शांत हो, दिमाग थका हुआ न हो और कमरे की हवा थोड़ी ठंडी हो, और ये रातें मुझे वही देती हैं। एक छोटी-सी राहत, एक ठहराव, एक मौका कि मैं फिर से अपने भीतर लौट सकूँ और बिना किसी शोर के खुद को समझ सकूँ।
कभी-कभी सोचता हूँ कि शायद ये रातें ही मेरी सबसे ईमानदार रिश्तेदार हैं। दिन चमकदार है, लेकिन झूठा; रात अंधेरी है, लेकिन साफ़। मैं उन अंधेरों में खुद को ज्यादा साफ़ देख पाता हूँ। शायद इसलिए अब मुझे रातें डराती नहींं, वे मुझे अपनी तरह से संभालती हैं।
ये रातें, मैं और मेरा कमरा यही मेरी दुनिया है।छोटा-सा, खामोश, लेकिन मेरे हिस्से का सुकून यहीं छिपा है। 🖤
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
@Raghvendra_101
वक्त बीतता चला जा रहा है, मंज़िल हमसे दूर होती चली जा रही है, देखते-देखते यह साल भी खत्म हो गया, पूरे साल सोचते ही रह गए कि क्या करूं, क्या न करूं – अजीब विडंबना है।
अब दिल के अंदर एक अजीब-सी खामोशी घर कर गई है; सपने तो बहुत थे, पर हिम्मत हर मोड़ पर लड़खड़ा गई। हर रात सोचा, “कल से सब बदल दूंगा,” मगर हर सुबह वही उलझन, वही डर, वही अधूरा-सा मैं जाग उठता रहा। लगता है जैसे ज़िंदगी मेरी उँगलियों के बीच से रेत की तरह फिसलती रही और मैं बस मुट्ठी भींचता ही रह गया।
आज इस साल के आख़िरी मोड़ पर खड़े होकर दिल काँप जाता है कि कहीं यूँ ही पूरी ज़िंदगी सोचते-सोचते न बीत जाए। मन चीखकर कहता है – या तो अब उठ, या फिर हमेशा के लिए ख़ुद को खो दे; क्योंकि अगला साल नहीं, अगला क़दम तय करेगा कि मैं ज़िंदा हूँ या बस साँसें ले रहा हूँ।