अमित शाह जी अब तक अयोध्या राम मंदिर क्यों नहीं गए ?
यह सवाल पूछा जा रहा है। जिस व्यक्ति की नानी ने राम मंदिर का विरोध किया था वह अब अमित शाह जी से राम मंदिर अयोध्या जाने की टिकट दिखाने को कह रहा है।
उसे क्या पता कि माननीय पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी जी भी पूरे श्रीरामजन्मभूमि आंदोलन में अयोध्या नहीं गए थे। 2020 में भूमिपूजन से पहले पीएम नरेन्द्र मोदी जी भी पीएम बनने के 6 साल तक रामजन्मभूमि नहीं गए थे। पर कारण तुम्हें समझाना मुश्किल है। क्योंकि यह धर्म को जीने वाले ही समझ पाते हैं। फिर भी बता देता हूँ,
अटलजी ने यह संकल्प दशकों पहले लिया था कि जब तक श्रीरामजन्मभूमि पर श्रीरामलला के मन्दिर का निष्कंटक मार्ग प्रशस्त नहीं कर दूंगा तब तक श्रीरामलला को मुँह नहीं दिखाऊंगा। मेरी जानकारी के अनुसार पूरे जन्मभूमि आंदोलन में अटलजी एक बार भी अयोध्या नहीं गए थे।
6 दिसम्बर 1992 से पहले अटलजी ने अनेक प्रसिद्ध ऐतिहासिक भाषण दिए (iykyk) और कारसेवकों ने ऐतिहासिक कार्य भी किए। प्रधानमंत्री बनने के बाद 2003 में श्रीरामजन्मभूमि के पुरोधा महंत श्री रामचन्द्रदास परमहंस जी महाराज के साकेतगमन पर अयोध्या में श्रद्धांजलि देने अटलजी गए थे पर श्रीराममंदिर न बना पाने की गठबंधनी मजबूरी की तिलमिलाहट, पर अटल संकल्प के कारण रामलला के दर्शन करने नहीं गए।
संजीवनी न ला सके तो कौन श्रीरामभक्त भगवान श्रीराम को मुँह दिखा पाएगा, पर भगवान श्रीराम के प्रताप पर भक्त संजीवनी न ला सके ऐसा भी असंभव ही है।
हिन्दुओं की यह परंपरा रही है कि अपने पितृपुरुषों के संकल्प को अपना संकल्प मानकर निर्वाह करते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीजी भी अटलजी के निश्छल संकल्प को कैसे भूलते कि श्रीरामजन्मभूमि का मार्ग प्रशस्त किए बिना रामलला विराजमान को मुँह दिखाना मृत्यु के समान है!
हिन्दुओं के पीढ़ियों के संघर्ष को सफलता तक न पहुँचा देना शर्म के अथाह सागर में गड़ जाने के समान है! संकल्प के विखण्डित हो जाने जैसे अपमान के समान है! इसलिए करोड़ों हिंदुओं की ऐतिहासिक आशा पूर्ण करने हेतु अटलजी के संकल्प की पालना में प्रधानमंत्री मोदीजी भी तब तक श्री रामलला के पास नहीं गए जब तक कि श्रीरामजन्मभूमि पर केवल और केवल श्रीराममंदिर का मार्ग प्रशस्त न हो गया।
पूर्वजों के संकल्प और आदेश को शिरोधार्य करना, यह हिन्दुओं के रक्त में है। भगवान् श्रीराम ने पिता दशरथ जी के वचन की पूर्ति हेतु वनवास स्वीकार किया तो भगवान् श्री कृष्ण ने मथुरा का राज्य पितरों की परोक्ष आज्ञा से इसलिए स्वीकार नहीं किया क्योंकि उनके पुरखे यदु से महाराज ययाति से मथुरा का राज्याधिकार छीन लिया था।
सगर पुत्रों को तारने हेतु धरती पर गंगा के अवतरण के लिए सगर, अंशुमान, दिलीप, भगीरथ पीढ़ियों तक हज़ारों वर्षों तक तपस्या करते रहे। पितरों के संकल्प पूरे करने और उनके उद्धार के लिए तप की यह सनातनी परंपरा निराली है। महाराणा प्रताप ने मेवाड़ को स्वतंत्र कराने तक पत्तलों में ही खाना स्वीकार किया। महान पुरुषों को अक्सर ऐसे कठोर संकल्प लेने पड़ते हैं।
ऐसे लाखों हिन्दू हैं जिन्होंने मन्दिर निर्माण के बाद ही अयोध्या जाएंगे का प्रण ले रखा था, क्योंकि श्रीरामजन्मभूमि पर मिट्टी के टीले और टेंट में श्रीरामलला को देखना हिंदुओं को अपने अस्तित्व पर चोट और भयंकर अपराधबोध व पीड़ा से भर देता था, अपमान का यह दंश उनकी हृदय में एक स्थायी आतंक भर देता था। उनके मुँह से बरबस निकल पड़ता था,
"हर पीर फकीर है कोठी में और राम हमारे तम्बू में।
आखिर अब तक क्यों प्राण हमारे हरे नहीं शिवशम्भु ने!"
अयोध्या के बहुत से ठाकुरों ने 500 वर्ष तक चमड़े के चप्पलों का त्याग कर दिया। सुना एक माताजी 30 साल से केवल फलाहार पर रहीं थीं। कोई दशकों तक पत्थर ही गढ़ता रहा। कोई दशकों तक पवित्र जल इकट्ठे करता रहा। हज़ारों एक आह्वान पर प्राण दे देने से नहीं हिचकते थे। कितने ही हजारों ने अपने प्राण बलिदान दे दिए थे 500 साल में।
कितने ही सन्तों ने मोक्ष को किनारे रखकर आजीवन केवल राममन्दिर के लिए ही तपस्या की। कितनों ने अपने जीवन आहूत कर दिए। कहीं विजय मन्त्र के करोड़ों अखण्ड जप होते थे तो कहीं अखण्ड रामायण पाठ चलते रहे। कोई जन्मभूमि के बारे में सोचकर श्रीराम! भरी उच्छवास लेकर दो आँसू ही गिरा देता था। उन सबकी आँखों में खुशी के दो आँसू 22 जनवरी 2024 को ही चमके थे।
तो माननीय गृहमंत्री अमित शाह जी यदि अभी तक अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि पर राममन्दिर के दर्शन करने नहीं गए, तो फिर इसका सीधा सा अर्थ है कि उनके मन में कोई बहुत बड़ा संकल्प है। और उस संकल्प को पूरा करने के बाद ही वे रामलला के दर्शन करने जाएंगे। वीरों की सोच ऐसी ही होती है, कदम कदम पर भीषण संकल्पों वाली।
हमारे गृहमंत्री श्री अमित शाह जी तो 20 साल से विदेश भी नहीं गए, तो क्या अब इसपर भी सवाल उठाओगे? आज जब हर कोई किसी भी बहाने से विदेश घूमने का मौका नहीं चूकता, उस समय भारत के गृहमंत्री विदेश न गए हों, यह एक बहुत बड़ी बात है। क्योंकि उनके मन में कुछ महत्वपूर्ण संकल्प हैं, उनके कार्य करने का तरीका बिल्कुल अलग है, ध्येयनिष्ठ, तीर के निशाने की तरह सटीक। अगर वो विदेश नहीं गए, तो इसमें बहुत बड़ा और राष्ट्रीय महत्त्व का ही कारण होगा।
तो जब केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह जी अयोध्या में रामलला के दर्शन करने जाएंगे तो धूमधाम से जाएंगे और अपना वह संकल्प पूरा करके ही जाएंगे और उसे श्रीरामलला के श्रीचरणों में ही चढ़ाएंगे। जय श्री राम।
― @MuditUpdates
#RamMandir #Ayodhya #AmitShah @AmitShah@AmitShahOffice
"Tamils have nothing to do with sanatan dharma"..
Meanwhile..
These are the numbers of temples in Tamil Nadu (red dots)..
And half of them are Shiva, Vishnu and Shakti temples.
An admiral who became Navy Chief through back door despite a warship sinking under his watch, drowning over thirty officers and sailors in peace time. Can anything be more shameful?
There are places where history meets the eternal…
Tulsi Ghat, Varanasi isn’t just another ghat on the banks of Maa Ganga.
It is revered as the sacred place associated with Goswami Tulsidas Ji, where tradition holds that he composed the Hanuman Chalisa and large parts of the Ramcharitmanas.
Even today, many devotees believe this divine place is blessed by the eternal presence of Prabhu Shri Ram, Mata Sita, and Hanuman Ji.
May this divine darshan from Tulsi Ghat, Varanasi reach every Sanatani.
Jai Siya Ram Jai Hanuman…!🔥❣️🙏
You will not see a Christian calling Jesus his "ancestor"; Jesus for them is always god... But a Christian (says he's agnostic) reduces Murugan to just an "Ancestor" by stripping away the divinity. This is a very well known playbook!
🚨 JAPANESE LADY : "A small group of only 224 Pakistanis in Hokkaido have taken over the entire area.
They have created a "no-go zone" for Japanese. We Japanese can't go there 😳
They chase you out if you're Japanese"
Same Story everywhere !!
@capt_mishra@abhijeet_dipke कप्तान साहब यह नया आंदोलनजीवी तो हूबहू वही तिकड़म आजमाने लगा जो इसका धूर्त पहला आंदोलनजीवी कजरी आजमाता था।
और वही धूर्त ही इसका सूत्र है, इसमें कोई शक नहीं।😀
A security camera captured two Belgian Malinois puppies playing while their owner wasn't home.
They are just "hangin' out". Humpin and hanging.
Well judging by how the other dog wanted to join the other dog already hanging off the rag, they didn't want to miss out on the fun.
हमारा हिन्दू चिंतन कहता है कि हम इस संसार के अकेले उपभोगकर्ता नहीं हैं, बल्कि ईश्वर ने जो भी जीव रचे हैं, वृक्ष रचे हैं, नदियाँ, सागर, झील और पहाड़ बनाएं हैं, सबका ईश्वर की इस धरती पर समान अधिकार है।
हमको अधिकार नहीं कि हम जल को प्रदूषित कर दें, पहाड़ों को तोड़ दें, नदियों की राह मोड़ दें और वृक्षों को काट डाले।
रामकथा में महर्षि मतंग बाली से नाराज ही इस कारण हुये थे कि उसने दुंदुभी नामक असुर का मृत शव उठाकर इतनी जोर से फेंका था कि आश्रम क्षेत्र के कई वृक्ष उखड़ गए थे।
भगवान राम के द्वारा जटायु को पिता तुल्य सम्मान देते हुए उसका अग्नि संस्कार करना या फिर एक और प्रसंग जिसमें आता है कि श्रृंगवेरपुर के राजा निषाद गुह जब राम जी से मिलने आते हैं तो उनके लिये कई तरह के उपहार, भोजन सामग्री, शैय्या, वस्त्र वगैरह लाते हैं पर राम उनसे कहते हैं कि मैं चूँकि तापस भेष में हूँ तो मैं आपकी इन सामग्रियों का उपयोग नहीं कर सकता।
आपके लाये उपहारों में मुझे केवल ये घास-फूस आवश्यक प्रतीत होते हैं, इन्हें आप मेरे घोड़ों को खिला दो तो आपके द्वारा मेरा सत्कार भी पूर्ण माना जायेगा। इसके बाद राम कहते हैं कि अगर आप इन घोड़ों को तृप्त कर दोगे तो मैं समझूँगा आपने मेरा पूजन कर दिया है।
हम हिंदू पशुओं और पक्षियों के प्रति, नदियों और तालाबों के प्रति इन्हीं भावनाओं को लेकर बड़े होते हैं।