"हमें घंटा फर्क नहीं पड़ता कि बिल्ली काली है या सफेद. सवाल सिर्फ ये है कि वह चूहे पकड़ती है या नहीं!"
सभी विचारधाराओं को गड्ढे में डालकर चीन के प्रमुख नेता डेंग शियोपिंग ने विकास को एकमात्र लक्ष्य बना दिया. साफ कह दिया कि अमीरी आएगी, तब तो बंटेगी. इसलिए पहले अमीरी आए.
चीन ने 1978 में इस रास्ते पर चलना शुरू किया और 1992 आते आते उसने दुनिया को हिला दिया. इससे पहले चीन और भारत लगभग बराबर चल रहे थे.
1978 से 1990 तक भारत समाजवादी विचारधारा में उलझा रह गया. इस दौर में हम नेहरू को ढोते रहे. हमारी बुनियाद कमजोर हो गई.
भारत का बदलना 1991 में शुरू हुआ. तब तक हम काफी पिछड़ चुके थे.चीन ने ढेर सारा मार्केट कब्जा कर लिया था.
भारत विचारधाराओं से 2014 में जाकर मुक्त हुआ है. हालांकि लेफ्ट का असर राजकाज से अभी भी पूरी तरह गया नहीं है. विश्वविद्यालय और विचार-विमर्श में लेफ्ट आज भी भारत की सबसे प्रमुख विचारधारा है. पर्यावरणवादी आज भी विकास में बाधक हैं.
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का अंत करीब है. इसके साथ ही कांगेस वहां की प्रमुख विपक्षी पार्टी बन जाएगी. यूपी और बिहार में भी कांग्रेस तभी बढ़ेगी जब सपा और आरजेडी का अंत हो जाएगा. कांग्रेस का वोट बीजेपी ने नहीं लिया है. कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों ने निपटाया था.
मुसलमान वोटर हर राज्य में एक ही पार्टी चला सकते हैं. वो या तो कांग्रेस होगी या कोई क्षेत्रीय दल.
गांधी ने नेहरू को पीएम बनाने की जिद न की होती तो ये होता. सरदार पटेल प्रधानमंत्री और उस दौर के सबसे बड़े अर्थशास्त्री बाबा साहब आंबेडकर वित्त मंत्री.
दोनों गैर-वामपंथी. मार्क्सवाद विरोधी. दोनों विकासवादी.
नेहरू को बहुमत नहीं था. 1947 में उनको बागडोर नहीं सौंपना था.
अगर सरदार पटेल पहले प्रधानमंत्री होते तो क्या होता?
कांग्रेस में बहुमत नेहरू के पक्ष में न होने के बावजूद, गांधी द्वारा जिद करके नेहरू को प्रधानमंत्री बना देना "इतिहास की सबसे बड़ी भूल" थी.
इसकी कीमत अर्थव्यवस्था ने चुकाई, बता रहा हैं राज्यसभा के उप सभापति @harivansh1956 जी.
गांधी ने गलत जिद कर दी थी. काश कांग्रेस वर्किंग कमेटी के बहुमत की राय मानी जाती और सरदार पटेल प्रधानमंत्री होते. सरकार पटेल की आर्थिक नीतियों को पढ़ा जाना चाहिए. पटेल विकासवाद के रास्ते पर ले जाना चाहते थे. नेहरू 2% ग्रोथ के वामपंथी रास्ते पर ले गए. जड़ों में मट्टा डाल दिया.
कई जिलों के आंकड़े हैं कि मोदी की स्कीम के लाभार्थियो में मुसलमान 30% से ज्यादा है. कांग्रेस के लंबे शासन में उनमें गरीबी और जहालत ज्यादा आ गई तो उनको ज्यादा मिल गया. किसी ने कुछ नहीं कहा. मोदी की योजनाएं किसी से भेदभाव नहीं करतीं.
If you are trained only in Western philosophy, you may struggle to understand Modi. Before boxing @narendramodi into a Western ideological category revisit John Rawls.
Modi's "universal secular welfarism" may be more Rawlsian than many liberals care to admit.
https://t.co/oiN2Brb6bm
नरेंद्र मोदी भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास की सबसे सेक्युलर अर्थात सबसे धर्मनिरपेक्ष सरकार चला रहे हैं.
#12YearsOfSeva@narendramodi@RajputAditi@ndtvindia
पूरा पॉडकास्ट एनडीटीवी इंडिया के यूट्यूब चैनल पर.
देश मे कैंसर मरीजों के लिए जरूरी कीमो दवाओं की भारी कमी से मरीज परेशान है.दवाइयाँ का रेट आसमान पर है.अगर यह दवाइयाँ समय पर ना मिली तो लाखों लोग अपने जीवन की उम्मीद खो देंगे. देश मे हर साल 14लाख नये कैंसर मरीज डाइग्नोस हो रहे हैं. 25 लाख लोग इस बीमारी के साथ जी रहे हैं.माननीय प्रधान मंत्री @narendramodi, और माननीय स्वास्थ्य मंत्री @JPNadda कृपया संज्ञान लेकर देश मे कीमो की दवा के प्रोडक्शन मे जो भी दिक्कते हैं उन को दूर कर इन लाखों कैंसर मरीजों मे जीवन की उम्मीद जिंदा रखें.
An empty DTC bus at 9 PM. Not because there are no passengers—hundreds were waiting at bus stops along the route. The driver simply wouldn't stop. Route 356STL Dwarka Cluster Depot 22 buses are notorious for this.
The only reason I managed to board was because, as I saw the driver not slowing down at my stop, so I pulled out my phone and started recording with flash. The driver immediately stopped.
For many Delhi residents, these are the everyday hurdles involved in something as basic as boarding a public bus, especially the old orange ones. Operator contracts need stricter infractions clauses for not stopping.
हे नीच प्राणी, हर महीने आप जाने कितने फेक न्यूज फैलाते हैं. माननीय कानून मंत्री के बारे में आप कह रहे हैं कि वे लंदन में बैडमिंटन खेल का उद्धाटन करेंगे. जबकि उस दिन वे बीकानेर में दिन भर विभिन्न सार्वजनिक कार्यक्रमों में रहे.
भारतीय लोकतंत्र उदार है इसलिए आप जेल में नहीं हैं.
ममता बनर्जी की केवल एक हार से उनकी पार्टी का बंटाधार हो गया है। सीधा कुल 28 सांसदों में से 20 सांसदों ने अलग दल बनाकर मान्यता के लिए लोकसभा अध्यक्ष को अर्जी दी है। बाकी 1 या 2 को छोड़कर अन्य भी लाइन में है। इसके साथ ही 20 सांसदों ने एनडीए में शामिल होने की घोषणा कर दी है।
इससे नरेंद्र मोदी सरकार पर;
1.चंद्रबाबू नायडू का प्रेशर खत्म हुआ।
2.नीतीश कुमार का जो बचा खुचा प्रेशर था वो भी खत्म।
वर्ष 2024 के चुनाव में मेंने एक लेख लिखा था जो फेसबुक ही नही बल्कि ट्विट्टर व्हाट्सएप्प पर काफी ज्यादा वायरल हुआ था, जिसमे मेने बताया था कि सपा मुस्लिम को आश्वासन दे रही है कि बस एक दो साल में सरकार गिर जाएगी, फिर हम बना लेंगे, जबकिं नरेंद्र मोदी सरकार पूरे पाँच साल चलेगी। क्यों चलेगी। पूरा ब्यौरा दिया था। जिसमे ममता व केजरीवाल के सांसदों का भी जिक्र था। नरेंद्र मोदी के स्वतंत्र रूप से जो 32 कम सांसद है। उनकी पूर्ति आराम से कर लेंगे और धीरे धीरे कर भी ली। इस पूर्ति से;
1.ममता बनर्जी की पार्टी के 20 सासंद पूरे कर रहे है।
2.केजरीवाल की पार्टी के सांसद राज्यसभा में पूर्ति कर रहे है।
दोनो ही पार्टियो को;
"बंगाल व नई दिल्ली में मुस्लिम ने 90% से ऊपर वोट दिया"
अब इस वोट का मजा भाजपा लेगी। इनडायरेक्ट ही सही लेकिन लेगी।
अब;
1.ममता बनर्जी की एक हार से पार्टी खत्म होने के कगार पर कुछ समय बाद दिखेगी।
2.केजरीवाल की पार्टी भी एक तरह से नई दिल्ली में खत्म है। जिस दिन आप पार्टी में भागवत मान ने अलग गुट बना दिया, पंजाब में भी खत्म हो जाएगी।
अब हम इस स्तिथी में बसपा की तरफ ध्यान लाते है।
बहनजी 2012 से लगातार हार रही है। हर चुनाव हार रही है। 1 शीट तक पर आ गयी। लोकसभा में शून्य हो गई। लेकिन;
"पार्टी अभी भी मजबूती के साथ खड़ी है। नींव मजबूत है। टूटने की नौबत कभी नही आई। एक बार भी 2012 के बाद किसी ने बसपा के टूटने की आवाज तक नही सुनी"
कारण?
"बहनजी की योग्यता। कुशलता। अनुभव। व जब देखा कि इस समय हालात पक्ष में नही है। चुप रहो। लेकिन अपना कैडर, नींव बचाकर रखो"
इसलिए;.."
"चुनाव कोई से भी हो। डर बसपा का रहता है क्योंकि पता है कि हाथी कभी भी उठकर जंगल में तहस नहस मचा सकता है"
जबकिं;
"ममता बनर्जी व केजरीवाल को उधोगपतियों ने भर भरकर बॉन्ड के माध्यम से पैसा दिया। इतना दिया कि बसपा के चुनाव खर्च से कई गुणा ज्यादा ममता व केजरीवाल को मिला। फिर भी एक हार से ही दोनो का अस्तित्व संकट में आ गया"
जबकिं हम 5 से 6 चुनाव 2012 के बाद हार चुके है। हर हार के बाद भी अस्तित्व बरकरार रखा। आप राजनीति को जितना आसान समझते है, उससे कई गुणा ज्यादा टेढ़ी है। आजकल के नौशिखिया एससी युवा जो अभी अभी निक्कर से पेंट में आये है, वो सोचते है कि कुर्ता पजामा पहना बाहर निकले, भारत की जनता उनके सत्कार के लिए खड़ी है। सन्गठन चलाना कोई आसान काम नही है और उसमे भी अस्तित्व बचाकर रखना।
समझे?
विकास कुमार जाटव
पूरी कायनात एनडीए को लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत की ओर धकेल रही है. 2014 और 2019 में जो नहीं हुआ, वह अब पहली बार होता दिख रहा है. इसमें सबसे बड़ा योगदान राहुल गांधी का है जो अभी पिछले महीने तमिलनाडु से दो दर्जन एमपी देकर गए हैं. और बंगाल तो बहुत डेंजरस है. कुछ भी हो सकता है.
नरेंद्र मोदी हिंदू-मुसलमान करके नहीं जीतते हैं. हिंदू-मुसलमान से चुनाव नहीं जीता जा सकता. बाबरी मस्जिद गिरने के बाद जब सांप्रदायिक तापमान सबसे अधिक था, तब बीजेपी 1993 में यूपी और एमपी समेत लगभग हर जगह हारी थी.
बल्कि मेरा आकलन है कि जहां भी हिंदू-मुसलमान तापमान ज्यादा होता है, वहां बीजेपी अक्सर हारती है.
नरेंद्र मोदी ने भारत को बदल दिया है और भी बदलाव जारी हैं. वे विकसित भारत बना रहे हैं, इसलिए जीत रहे हैं.
उन्होंने एक महिला वोटबैंक बनाया है. उसकी भी विश्लेषक अनदेखी करते हैं.
मोदी युग में हिंदू-मुसलमानों की एक ही बड़ी हिंसा हुई है. दिल्ली दंगा, जिसमें 50 लोग मारे गए. उसमें भी बहुत बड़ी साजिश थी. अन्यथा ये शांतिकाल है.
The government of India is blocking my posts on Instagram that criticizes Homeopathy based on a directive from the Homeopathy Council. This is very shameful of the government...protecting pseudoscience and it's practitioners from scientific scrutiny.
This is the post: https://t.co/ZtIKlYF6sK