@Profdilipmandal GDP + रोजगार + वास्तविक आय + महंगाई + ग्रामीण मांग + MSME + निवेश + खपत
सबको साथ देखना पड़ेगा।
वरना “अच्छे आंकड़े चुनो और देश की अर्थव्यवस्था शानदार घोषित कर दो” —
यह इकोनॉमिक टेस्ट नहीं, मार्केटिंग टेस्ट है।
@RealpushprajX *(इसमें हर समय जाति देख कर फैसला होता है)*
मनुस्मृति में आधुनिक अर्थों में “रेप” (बलात्कार) के लिए एक ही निश्चित सजा नहीं दी गई है। उसमें यौन अपराधों के लिए दंड अपराध की प्रकृति, स्त्री की स्थिति/जाति और अपराधी की स्थिति के आधार पर अलग-अलग बताए गए हैं।
@rajkumarbhatisp मौकापरस्त — जहाँ फायदा दिखे, वहीं विचारधारा बदल ले।
सुविधावादी विचारक — जो सुविधा के हिसाब से विचार बनाता है।
विचारधारा का मौसम वैज्ञानिक — हवा का रुख देखकर अपना रुख बदलने वाला। 😄
“विचारधारा नहीं बदली, बस फायदे की दिशा बदल गई।”
@AcharyaPramodk ग़ुलामी की बात करने वालों से बस इतना सवाल है—आख़िर किसके सामने किसकी ग़ुलामी? धर्म और स्वाभिमान किसी एक परिवार की जागीर नहीं हैं। राजनी���ि में सवाल पूछना लोकतंत्र है, लेकिन हर असहमति को ‘ग़ुलामी’ का तमगा देना खुद सोच की ग़ुलामी जैसा लगता है।
@CommonBS786OM “सवाल पूछेंगे, जव���ब लेंगे—
जनता की आवाज़ बनकर सिस्टम हिलाएँगे!
🧠 खाली दिमाग नहीं, सवालों से लैस दिमाग—
यही है हमारी पहचान: दिमागी नक्सल पार्टी!”
नारा:
🔥 “न डरेंगे, न रुकेंगे—सिस्टम से सवाल करेंगे!”
@RajatSharmaLive पत्रकार का काम यह तय करना नहीं कि विपक्ष किसे “नीचा दिखाना” चाहता है; पत्रकार का काम यह पूछना है कि जंतर-मं��र पर पुलिस कार्रवाई क्यों हुई, किसके आदेश पर हुई और उसकी जवाबदेही किसकी है।
@CommonBS786OM बिट्टू भईया आज आपको रफ शब्दो का इस्तेमाल करते हुवे देखना अजीब लगा
और पता नहीं अजीब से भी अलग
अच्छा ही लगा वो धूर्त इंसान इसी के या यु कहो तो इससे भी थर्ड क्वालिटि का चुतिया है
@MediaHarshVT रील और फोटोशूट का असली बादशाह कौन है, ये पूरा देश देख चुका है! 🚨🤣
50 कैमरे, 100 एंगल, परफेक्ट लाइटिंग और हर पोज़ पर तालियाँ बजाने वालों को सब "विज़न" लगता है। लेकिन वही काम कोई दूसरा कर दे, तो अचानक उसे "रीलबाज़ी" और "ड्रामा" बता दिया जाता है।
@MediaHarshVT वाह रे दोहरे मापदंड! अपने पसंदीदा नेता का फोटोशूट दिखे तो "ऐतिहासिक क्षण", और दूसरे का दिखे तो "रिलबाजी "। पत्रकारिता नहीं, यह तो खुली पक्षधरता है!