“स्वरलोक” की माँ “सुरलोक” की मह���यात्रा के लिए प्रस्थान कर गईं।हमारी मंगल-ध्वनियों,हमारी भाव-गंगोत्री को गीत करने वाला कंठ,परम विश्रांति की गोद में सो गया।सरस्वती माँ की आवाज़ अपनी पुण्य-काया को त्यागकर,परमसत्ता के धाम चली गई।स्वरों की ममतामयी माँ तुम हमारे लोककंठ में थीं,ह��� रहोगी