पीडीए के ‘प्रेम, दया, अपनापन’ का सौहार्दपूर्ण सकारात्मक संदेश हर दिन नये लोगों को जोड़ रहा है।
भ्रष्ट भाजपा के पाप का घड़ा जनता अपने वोट से तोड़ेगी।
भाजपा जाएगी फिर कभी नहीं आएगी!
ये बेहद गंभीर मामला है कि डिटेन की गई नेहा बोरा कहाँ हैं, इसकी कहीं कोई ख़बर नहीं है। एक नारी को रात में डिटेन करके कहाँ ले जाया गया है, पुलिस इसका ख़ुलासा करे। राष्ट्रीय महिला आयोग तत्काल इस अति संवेदनशील प्रकरण का संज्ञान ले।
नेहा बोरा को तुरंत रिहा किया जाए!
गरीब बीमारी से लड़े या दवाई के दाम से? जिस दवाई की जरूरत जिंदगी बचाने के लिए है, उसी के लिए हजारों रुपये खर्च करने पड़ें, तो ये कैसी व्यवस्था है?
फार्मा कंपनियों की मनमानी और दवाइयों पर बेहिसाब मुनाफे के खेल पर सरकार को सख्त व्यवस्था लाना ही होगा। दवाई कोई लग्जरी नहीं, इंसान की जरूरत है। गरीब को इलाज से दूर करने वाली व्यवस्था किसी भी नैतिक आधार पर सही नहीं हो सकती!
दवाई के नाम पर आम आदमी को मारना बंद करो!
जो बात आज राम भगवान को लेकर बोली गई है वो बर्दाश्त के बाहर है।
मैं उसे यहां लिख भी नहीं सकता हूं।😥
मैं उस मुख्यमंत्री का नाम भी नहीं लेना चाहता लेकिन अगर यही बात किसी और राज्य के मुख्यमंत्री ने बोली होती तो अबतक राई का पहाड़ बना दिया जाता।
लगता है स्क्रिप्ट लिखने वाला राम और रावण में अंतर ही नहीं ढूंढ पाया और पढ़ने वाला उसी को सच मान बैठा। यही होता है जब मुख्यमंत्री का चेहरा कोई और हो और फैसले कोई और ले रहा हो।
राज्यसभा की बात करनेवाले उप्र के मुख्यमंत्री जी में अगर रत्ती भर भी लाज-शर्म-हया हो तो भाजपा द्वारा बनाए गए सिक्किम के विवादित ‘राज्यपाल’ के बारे में बोलें।
उत्तराखण्ड की बेटी के प्रति उप्र के मुख्यमंत्री जी का भी तो कोई दायित्व बनता है या नहीं। उत्तराखण्ड छोड़ आए तो क्या नैतिकता भी छोड़ आए हैं।
देखते हैं उप्र के मुख्यमंत्री जी की आवाज़ किसी बच्ची के साथ हुए पाप के ख़िलाफ़ निकलती है या भयभीत होकर उनकी घिग्घी बंध जाती है। हमारी उनसे अपील है कि यदि उनमें अंश मात्र भी धर्म है तो वो एक आरोपी को राज्यपाल बनाने के फ़ैसले का घोर विरोध करें। ये उनको सीधी चुनौती है, नहीं तो वो सदैव के लिए मौन धारण कर लें। फिर तो यही माना जाएगा कि इसमें उनकी ख़ामोश सहमति भी शामिल है।
दिल्ली का ड्रोन-दूरबीन तो सिक्किम तक नहीं देख पा रहा है देखते हैं उप्र के मुख्यमंत्री जी का बुलडोज़र वहाँ तक पहुँचाता है या नहीं।
आज पूरे देश की हर बेटी और उनके माँ-बाप भाजपा के इस फ़ैसले से बेहद आक्रोशित हैं कि भाजपा ने घोर निंदनीय निर्णय लेते हुए अपने दल के एक ऐसे व्यक्ति को सिक्किम का राज्यपाल बनाया है जिसके घिनौने कुकृत्यों की वजह से एक बच्ची के साथ अन्याय हुआ और उसकी हत्या भी कर दी गई।
भाजपा बेशर्म अपराधियों का गिरोह है।
उत्तराखण्ड की बेटी के साथ न्याय हो!
लूटनेवाले लुट गये।
ये समाचार सुनकर तो महाराष्ट्रवाले कुबेर तो डर के मारे ‘यूपी’ ही नहीं आएंगे।
ये है उप्र में अपराधियों के ख़िलाफ़ ज़ीरो हो गये ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ के दावे का सच।
मुखिया ही माफ़िया है!
भाजपा राज में स्वतंत्रता सेनानियों का सम्मान करना किसी ‘दूसरे स्वतंत्रता आंदोलन’ लड़ने से कम नहीं है।
लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी की जयंती पर कोटि-कोटि नमन!
जिन भाजपाइयों के वैचारिक पूर्वजों ने देश के दुश्मनों के लिए मुख़बिरी की हो, वो स्वतंत्रता सेनानियों का सम्मान क्या करेंगे।
जब विपक्ष का पड़ा भारी दबाव
रातों रात हो गया बंदोबस्त साफ़
ये है लुढ़कना लोटा-सी सरकार
कभी इस घाट तो कभी उस घाट
जिसके गलत मंसूबे और ख़्याल
सोच संकीर्ण और कुंठित विचार
नकारात्मकता भरी है ये सरकार
जिसकी पहचान एकरंगी लिबास
आजकल वो ही ‘रखवाले’ हैं
जिनकी सोच पर लगे ताले हैं
जिन जय प्रकाश नारायण जी ने स्वतंत्रता का आंदोलन लड़ा, आज भाजपा राज में वो ही क़ैद से कर दिये गये हैं।
दुनिया में किसी भी दुर्दांत तानाशाह तक ने शायद कभी किसी महापुरुष की जयंती के अवसर पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने पर, इस तरह की पाबंदी नहीं लगाई होगी।
भाजपाई तो अंग्रेजों से भी गये गुजरे हैं।
मित्राचार भेंट!
उप्र की आंवला लोकसभा सीट से दो बार के सांसद श्री धर्मेंद्र कश्यप जी से मिलकर ‘पीडीए आंदोलन’ को और भी समर्थ, सशक्त और सक्रिय बनाने के लिए संयुक्त प्रयासों पर चर्चा हुई।
पीडीए ही हर ‘पीड़ित, दुखी, अपमानित’ को मान-सम्मान और स्थान दे सकता है।
BIG BREAKING | यूपी में SIR पर बड़ा विवाद, मुख्य निर्वाचन अधिकारी की सफाई भी सवालों के घेरे में
85,854 मतदाताओं के नाम हटाने के लिए सॉफ्टवेयर से फॉर्म-7 जनरेट होने की पुष्टि, लेकिन बिना कारण दर्ज आवेदन, डिजिटल हस्ताक्षर और समयसीमा के बाद आए 1.10 लाख अनुरोधों पर गंभीर सवाल।
उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष प्रगाढ़ पुनरीक्षण
(SIR) को लेकर सामने आई खोजी रिपोर्ट ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा की सफाई के बाद विवाद और गहरा गया है। निर्वाचन कार्यालय ने आरोपों को भ्रामक और निराधार बताया है, लेकिन अपनी प्रेस विज्ञप्ति में यह स्वीकार किया है कि 85,854 मतदाताओं को अपात्र घोषित किए जाने के बाद उनके नाम हटाने के लिए सॉफ्टवेयर में फॉर्म-7 जनरेट करने की व्यवस्था थी।
मामला सिर्फ फॉर्म-7 जनरेट होने का नहीं, बल्कि बिना कारण दर्ज किए मतदाताओं के नाम हटाने, अधिकारियों के डिजिटल हस्ताक्षर, आवेदन की कानूनी समयसीमा और एक ही व्यक्ति द्वारा बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम कटवाने की कोशिश से जुड़ा है।
खोजी पत्रकारिता संस्थान द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने चुनाव आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध 4.3 लाख से अधिक फॉर्म-7 का विश्लेषण कर दावा किया कि निर्वाचन रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों और सहायक निर्वाचन रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों की ओर से दर्ज 87,127 विलोपन अनुरोधों में से 85,854 में नाम हटाने का कोई स्पष्ट कारण दर्ज नहीं था। यानी अधिकारियों से जुड़े करीब 98.5 प्रतिशत अनुरोधों में कारण का विवरण नहीं मिला।
रिपोर्ट में एक और गंभीर आरोप है कि चुनाव आयोग के ERONET सॉफ्टवेयर से ये फॉर्म अपने आप जनरेट हुए और उन पर संबंधित अधिकारियों के डिजिटल हस्ताक्षर भी मौजूद थे। रिपोर्ट के अनुसार, चार निर्वाचन अधिकारियों ने बताया कि सुनवाई के दौरान किसी मतदाता को अपात्र घोषित करते ही सॉफ्टवेयर उनके नाम से फॉर्म-7 तैयार कर देता था।
इससे एक बुनियादी सवाल उठता है कि जब अधिकारी ही किसी मतदाता की पात्रता का फैसला कर रहा था, तो उसी अधिकारी के नाम से मतदाता को हटाने का आवेदन भी क्यों तैयार हो रहा था? क्या निर्णय लेने वाला अधिकारी ही आपत्ति दर्ज करने वाला भी बन गया था?
मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने इस प्रक्रिया को कानूनी बताते हुए कहा है कि संबंधित अधिकारियों ने स्वतः संज्ञान लेकर जांच की, नोटिस जारी किए और सुनवाई के बाद अपात्रता का निर्णय लिया। इसके बाद फॉर्म-7 केवल रिकॉर्ड सुरक्षित रखने के उद्देश्य से जनरेट किया गया, ताकि भविष्य में पता चल सके कि मतदाता का नाम कब और क्यों हटाया गया।
लेकिन इसी सफाई से एक महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने आता है। यदि फॉर्म-7 बनाने का उद्देश्य नाम हटाने का कारण सुरक्षित रखना था, तो खोजी रिपोर्ट में सामने आए 85,854 फॉर्म में कारण दर्ज क्यों नहीं था? क्या अपात्रता के कारण अलग आदेशों में दर्ज हैं और क्या वे आदेश सार्वजनिक जांच के लिए उपलब्ध कराए जाएंगे?
विवाद यहीं समाप्त नहीं होता। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि निर्धारित समयसीमा समाप्त होने के बाद भी व्यक्तियों द्वारा दाखिल 1,10,476 मतदाता विलोपन अनुरोध स्वीकार किए गए। इसके अतिरिक्त अधिकारियों से जुड़े 87,127 अनुरोध 15 मार्च से 2 अप्रैल के बीच दर्ज होने की बात सामने आई है।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी का पक्ष है कि आवेदन दाखिल करने की समयसीमा और पहले से लंबित मामलों की सुनवाई तथा निस्तारण की समयसीमा अलग-अलग हैं। लेकिन व्यक्तिगत आवेदकों के 1,10,476 अनुरोधों में से कितने समयसीमा से पहले दाखिल हुए थे और कितने बाद में, इसका स्पष्ट विवरण सामने आना आवश्यक है।
सबसे संवेदनशील आरोप समुदाय विशेष के मतदाताओं को निशाना बनाए जाने का है।
खोजी रिपोर्ट के मुताबिक तरबगंज और पीलीभीत विधानसभा क्षेत्रों में फॉर्म-7 के जरिए नाम हटवाने के अनुरोधों का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा मुस्लिम मतदाताओं से संबंधित था। तरबगंज में 'रेशमा' नाम से एक ही दिन, एक ही बूथ के 188 मतदाताओं के खिलाफ आपत्तियां दाखिल किए जाने का दावा किया गया।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने कहा है कि इन दोनों विधानसभा क्षेत्रों में रिपोर्ट में उल्लिखित सभी संबंधित फॉर्म-7 निरस्त कर दिए गए थे। यह महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण है, लेकिन सवाल यह भी है कि इतनी बड़ी संख्या में एक ही नाम से आवेदन किसने और किस आधार पर दाखिल किए? क्या आवेदकों की पहचान की जांच हुई और गलत या दुर्भावनापूर्ण आवेदन पाए जाने पर क्या कार्रवाई की गई?
रिपोर्ट में 198 ऐसे मामलों का उल्लेख है जिनमें एक व्यक्ति के नाम से 10 से अधिक फॉर्म-7 दाखिल हुए और कुल 4,740 मतदाताओं के नाम हटवाने का प्रयास हुआ। निर्वाचन कार्यालय ने इन आंकड़ों को सीमित बताते हुए तर्क दिया है कि प्रदेश में लाखों आवेदनों के मुकाबले ऐसे मामलों की संख्या बहुत कम है।
लेकिन सवाल सिर्फ यह नहीं है कि ऐसे मामले कितने थे। सवाल यह है कि जिन 4,740 मतदाताओं के नाम हटवाने की कोशिश हुई, उन आवेदनों की प्रामाणिकता और उनके पीछे की मंशा की क्या जांच हुई?
मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने अपनी सफाई में खबर प्रकाशित करने वाले पत्रकारों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि पत्रकारों ने 8 अक्टूबर को दोपहर 3:32 बजे सवाल भेजकर शाम 7 बजे तक जवाब मांगा और अगले दिन सुबह खबर प्रकाशित कर दी। निर्वाचन कार्यालय ने इसे आयोग की छवि खराब करने की कोशिश बताया है।
लेकिन पत्रकारों को जवाब देने के लिए पर्याप्त समय न मिलने का मुद्दा और मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया की वैधता दो अलग प्रश्न हैं। पत्रकारों की मंशा पर सवाल उठाने से रिपोर्ट में सामने आए डिजिटल रिकॉर्ड, आवेदन की तारीखों और फॉर्म में दर्ज कारणों की स्वतंत्र जांच की आवश्यकता समाप्त नहीं होती।
इस पूरे मामले में सबसे अहम बात यह है कि निर्वाचन कार्यालय ने फॉर्म-7 जनरेट करने की प्रक्रिया स्वीकार की है, जबकि खोजी रिपोर्ट उस प्रक्रिया की वैधता, पारदर्शिता और दुरुपयोग की आशंका पर सवाल उठा रही है।
उत्तर प्रदेश में 3.26 करोड़ मतदाताओं को नो-मैपिंग और तार्किक विसंगतियों के आधार पर नोटिस जारी किए गए थे। इतने व्यापक पुनरीक्षण के दौरान प्रत्येक मतदाता को सुनवाई का अवसर मिलना, अपात्रता के कारणों का रिकॉर्ड उपलब्ध होना और विलोपन संबंधी निर्णयों का सत्यापन संभव होना बेहद महत्वपूर्ण है।
अब आवश्यक है कि चुनाव आयोग 85,854 मामलों के अपात्रता आदेश, संबंधित फॉर्म-7, सॉफ्टवेयर लॉग, डिजिटल हस्ताक्षर की प्रक्रिया और समयसीमा के बाद दर्ज बताए गए अनुरोधों का पूरा विवरण सार्वजनिक करे।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने पूरी प्रक्रिया को कानूनसम्मत बताया है। हालांकि उपलब्ध खोजी रिपोर्ट और निर्वाचन कार्यालय की सफाई के बीच मौजूद तथ्यात्मक विवादों का अंतिम समाधान मूल रिकॉर्ड और स्वतंत्र सत्यापन से ही संभव होगा।
सवाल है कि जब मामला लाखों मतदाताओं के संवैधानिक मतदान अधिकार और मतदाता सूची की विश्वसनीयता का है, तो क्या चुनाव आयोग प्रत्येक विवादित विलोपन का कारण और संबंधित आदेश सार्वजनिक करेगा?
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PM Nehru sent 22,000 troops in 1962 War against China.
PM Vajpayee sent 30,000 troops in 1999 Kargil War against Pakistan.
PM Modi deployed 26,000 CAPF personnel against his own citizens to stop them from asking Election Commissioner resignation.
Why?🤔
RSS - BJP की शाखाओं में यही सिखाया जाता हैं , लड़कियों के कपड़े फाड़ों, यही हैं इन गुंडों - मवालियों का महिला सम्मान |
RSS-BJP के नाम पर गुंडागर्दी करने वालों को समझना होगा—महिलाओं का अपमान किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा , सरकार जल्द से जल्द इन्हें पकड़ कर जेल भेजे और कठोर कार्रवाई करें ।
नारी का अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान 🇮🇳
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