Sir aap aao aage…
Aapki union ne Sunday Banking ka bhi virodh kiya. Aur kisi ki himmat nhi huyi.
Koi kare ya na kare
Bankpediaa community will support you. Jo possible hoga digitally, we will do that.
Baki to mujhe bankers ka bhi pta hi hai…
बैंक वाले क़ाबिल होते हैं, परीक्षा पास करके वहाँ पर पहुँचे हैं तो उनकी सैलरी आदि पर बात करने का हक़ तो वैसे भी नहीं है आपको।
दूसरी बात छुट्टी की तो अपनी पर्सनल सरकारी मिली हुई छुट्टी में से वो नहीं आ रहा है या किसी काम से गया हो कहीं पर तो क्या दिक़्क़त है आपको? आपका काम कोई और करता ही है।
तीसरी बात जैसे हर कोई अपनी बात रखने और आंदोलन का अधिकार रखता है वैसे ही वो लोग भी रखते हैं। उन्हें भी छुट्टी, ट्रांफसर, टारगेट का दबाव आदि सब पर करने का अधिकार है।
आप सबको हर कोई निकम्मा ही तो लगता है सिवाय अपने आप के। आप ख़ुद तो कुछ करोगे बस दूसरे को गाली दो, बुराई करो। कोई बैंकर दोस्त हो तो एक बार बात करके देखना फिर समझ आ जायेगा।
Atleast itni sharam to karo
on moral grounds sare Union leaders under UFBU resign kare
Ek Officer jiski Sunday banking ke karan death ho gayi, uski responsibility le.
Ye to minimum hai.... Itna to karo uncle ji @ChVenkatachalam
Unions under UFBU are so shameless
Leaders of these unions are so shameless
Na to inhone abhi tak koi press conference ki
Na inhone deceased union bank of india employee ke liye condolences show ki
Even apne page par post tak nahi kiya
Take some responsibility. Be a Man
IBA is genius.
Pehle Sunday ko sab bank walo ko office bula lia. 😀
Fir strike cancel karwa di.
Ab sunday bhi working. And Monday bhi working. 😀😀
Bank unions hi bank walo ka bablu bna dia.
Bank guys pls yaar mei kya video bna ke help karu aapki unions ka commitment nhi sure hai toh.
DEATH OF BANKERS
Neha Gupta, a Scale-II officer at Vashi Regional Office, Navi Mumbai, Union Bank of India, died in a road accident.
Venkata Prasad, Branch Manager of Ranipet EAB Branch of Union Bank, Kancheepuram Region, Chennai, too died in a road accident.
Both on Sunday. Prasad on his way to office & Gupta on her way home from office. @UnionBankTweets
बैंक कर्मचारी भी किसी के बेटे-बेटी हैं, किसी के पति-पत्नी हैं, किसी के माता-पिता हैं।
वे काम से भागना नहीं चाहते।
वे बस इतना चाहते हैं कि नौकरी करते-करते उनकी जिंदगी खत्म न हो जाए।
लगातार बढ़ता काम , स्टाफ की कमी , टारगेट का दबाव, लंबे working hours और ट्रांसफर का तनाव इन सबका असर सिर्फ कर्मचारी पर नहीं, उसके पूरे परिवार पर पड़ता है।
इसलिए बैंक कर्मचारियों की मांगें बिल्कुल साफ हैं 👇
• 8 घंटे की शिफ्ट और तय working hours लागू हों।
• ऑफिस के बाद अनावश्यक कॉल, WhatsApp और काम का दबाव बंद हो।
• स्टाफ की पर्याप्त भर्ती हो, ताकि मौजूदा कर्मचारियों पर अतिरिक्त बोझ न पड़े।
• टारगेट तय करते समय मानवीय और व्यावहारिक मानक अपनाए जाएं।
• टारगेट पूरा न होने पर अपमान, धमकी या अनावश्यक मानसिक दबाव की व्यवस्था खत्म हो।
• ट्रांसफर नीति पारदर्शी हो और परिवार/स्वास्थ्य जैसी परिस्थितियों का ध्यान रखा जाए।
• कर्मचारियों को उनकी छुट्टियां और साप्ताहिक अवकाश वास्तव में मिलें।
• मेंटल हेल्थ काउंसलिंग और confidential support system हर बैंक में उपलब्ध हो।
• लगातार ओवरटाइम को सामान्य व्यवस्था बनाने के बजाय उसका उचित रिकॉर्ड और नियमन हो।
• कर्मचारियों की शिकायतों के लिए स्वतंत्र grievance mechanism हो, जहां बिना डर शिकायत की जा सके।
और समाज से भी एक छोटी-सी अपील है कि
बैंक कर्मचारी सिर्फ आपकी पासबुक , लोन, कैश या UPI की समस्या हल करने वाला व्यक्ति नहीं है।
वह भी एक इंसान है।
उसे भी थकान होती है।
उसे भी तनाव होता है।
उसे भी अपने परिवार के साथ समय बिताना है।
इसलिए अगली बार किसी बैंक कर्मचारी को चाय पीते या लंच करते देखकर मज़ाक बनाने से पहले एक बार सोचिए ....
हो सकता है उस 15 मिनट के ब्रेक के पीछे 10 घंटे की थकान छिपी हो।
बैंक कर्मचारियों को सहानुभूति नहीं,
सम्मानजनक काम का माहौल और लागू होने वाली ठोस व्यवस्था चाहिए। 🙏
मेरी बेटियाँ अकीरा और अलंकृता मेरे दिल के सबसे करीब हैं…
घर लौटकर चाहे कितनी भी थकान हो, कितनी भी उलझनें दिमाग में चल रही हों—इन दोनों को देखते ही सब जैसे कहीं गायब हो जाता है। घर में इनकी आवाज़, इनकी हँसी और इनका पूरे समय lively रहना ही शायद मेरे लिए “घर” का असली मतलब है।
छोटी वाली तो और भी कमाल है… 😊
मेरे sessions में बैठी रहती है—शायद मैं क्या बोल रहा हूँ, उसका आधा भी समझ नहीं आता होगा 😄, लेकिन बस पापा के पास बैठना है। और मेरे लिए उसका चुपचाप वहाँ बैठे रहना भी बहुत बड़ी खुशी है।
और बड़ी वाली… वो मेरी बेटी होने के साथ-साथ मेरी सबसे बड़ी प्रशंसकों में से एक है।
मैं क्या कर रहा हूँ, क्या बोल रहा हूँ, कहाँ जा रहा हूँ—उसकी आँखों में मेरे लिए जो गर्व और विश्वास दिखाई देता है, वह मुझे खुद को और बेहतर बनाने की वजह देता है।
जिंदगी में हम बहुत कुछ कमाने और हासिल करने के पीछे भागते रहते हैं… लेकिन दिन के आखिर में एहसास होता है कि असली दौलत तो घर में हमारा इंतज़ार कर रही होती है।
मेरी दोनों बेटियाँ मेरे लिए वही दौलत हैं।
मेरी खुशी, मेरा सुकून और मेरी सबसे प्यारी कमजोरी।
Happy Daughters’ Day, मेरी बच्चियों।
पापा तुम दोनों से बहुत-बहुत-बहुत प्यार करते हैं। ❤️
सरकारी बैंक प्राइवेट बैंकों से मुकाबला करते हुए बड़ा मुनाफा कमा रहे हैं , लेकिन कुछ मूर्खों को आज भी लगता है कि बैंक वाले “कुछ काम नहीं करते”, बस AC में बैठते हैं और शाम को घर चले जाते हैं।
भाई , सरकारी बैंक में भीड़ सिर्फ बैंक कर्मचारियों की वजह से नहीं होती।
यहाँ किसान , बुजुर्ग , महिलाएँ और ग्रामीण इलाकों से आने वाले बहुत से ग्राहक बैंकिंग की बेसिक प्रक्रियाओं से परिचित नहीं होते। ऐसे में बैंक कर्मचारी सिर्फ अपना काम नहीं करते, उन्हें फॉर्म भरने , प्रक्रिया समझाने, ऑनलाइन काम कराने और छोटी-छोटी बैंकिंग दिक्कतें सुलझाने में भी मदद करनी पड़ती है।
इसके अलावा लोन , रिकवरी, KYC, ऑडिट, सरकारी योजनाएँ, पेंशन , जनधन , डिजिटल बैंकिंग और रोज़ की पब्लिक डीलिंग सबकी जिम्मेदारी इन्हीं पर होती है।
एक दिन बैंक की कुर्सी पर बैठकर देख लेना भाई,
सिर्फ पैसे नहीं गिने जाते , लोगों की समस्याएँ और गुस्सा भी संभालना पड़ता है।
इसलिए बैंक कर्मचारियों को “कुछ काम नहीं करते” कहने से पहले उनके काम का पूरा हिसाब देख लिया करो।
Her (Neha Gupta) husband is in defence so at present no family member is there and children are with neighbours.
This black Sunday ruined a beautiful family forever.
#BlackSunday
बैंक कर्मचारियों की यूनियन ने सप्ताह में दो दिन अवकाश की मांग को लेकर अगले तीन दिन हड़ताल की घोषणा की है।
मैंने कल इसी मुद्दे पर यह वीडियो बनाया था। कमेंट में बड़ी संख्या में बैंक कर्मचारियों ने अपनी परेशानी और काम के दबाव के बारे में लिखा।
वीडियो यहां भी लगा रहा हूं, ताकि उनकी बात सरकार और आम लोगों तक भी पहुंचे-और हम उस दबाव को भी समझें, जिसके बीच बैंक कर्मचारी हर दिन काम करते हैं।
बैंक कर्मचारी हड़ताल पर हैं। कारण पूछने पर यही लगा कि जिस बैंक की नौकरी को अच्छी नौकरी में गिना जाता था, उसकी हालत बदतर हो गई है। टारगेट के नाम पर कर्मचारी देर शाम तक रोके जाते हैं, छुट्टी नहीं दी जाती है,
तनाव रोज़ का हिस्सा है। काम करने की जगह भी अच्छी नहीं है। ऐसा लगता है कि बैंकर को सज़ा दी जा रही है कि उन्होंने बैंक की नौकरी क्यों की। लोगों ने बताया कि अत्यधिक तनाव के कारण बीमारियाँ होने लगी हैं।
एक बैंकर ने यह भी बताया-
सुबह 8:00 बजे घर से निकलने वाला बैंकर रात को 8:00 या 9:00 बजे के बाद ही घर लौट पाता है, क्योंकि एनपीए (NPA - गैर-निष्पादित परिसंपत्ति) को रोकने का भारी दबाव होता है। हर खाते की मंथली ईएमआई (EMI) होती है, और यदि वह 90 दिनों तक जमा न हो, तो खाता एनपीए हो जाता है। ऐसे में रीजनल ऑफिस से ब्रांच हेड पर दबाव आता है कि यह खाता आज किसी भी हाल में एनपीए नहीं होना चाहिए। पहले केवल महीने की आखिरी तारीख को एनपीए रोकने का दबाव होता था, लेकिन अब हर सिंगल डे (प्रतिदिन) यह प्रेशर रहता है।
रात के 9:00 बज रहे होते हैं और रीजनल ऑफिस से फोन आता है कि "किसी भी तरह इस खाते को बचाइए।" थक-हारकर जब ब्रांच हेड को लगता है कि उसे अब घर जाना चाहिए, तो वह अपनी जेब से 2,000, 4,000 या 10,000 रुपये तक की ईएमआई खुद भर देता है। बाद में ग्राहक वह पैसा लौटाता नहीं है, जिससे बैंक मैनेजर के अपने पैसे डूब जाते हैं।
बैंक में दिनभर कई तरह के मानसिक तनाव झेलने पड़ते हैं। आपको रिकवरी के लिए फील्ड में निकलना होता है। वहाँ कोई ग्राहक आपको ब्लैकमेल करता है कि "मेरे घर मत आओ, नहीं तो मैं पैसा जमा नहीं करूँगा, सिर्फ़ फोन पर बात करो।" फोन पर बात करने के दौरान ग्राहक कभी-कभी अभद्र और गाली-गलौज वाली भाषा का प्रयोग करते हैं। उस तनाव में यदि मैनेजर के मुँह से गलती से भी कोई गलत बात निकल गई, तो ग्राहक उसकी कॉल रिकॉर्डिंग करके ब्लैकमेल करने लगता है।
कृपया बैंकर की बात सुनें । कोई रास्ता निकालें।
Dear Comrades,
The fight for Five-Day Banking must not be seen merely as a struggle for implementation of an agreement that has remained pending for more than 30 months. This is a fight for our existence, our dignity, our families and our fundamental right to a humane working life.
Public Sector Bank employees serve far more customers than our private-sector counterparts. Even with private banks accounting for a substantial share of the banking market, it is overwhelmingly the Public Sector Banks and their employees who carry the burden of Government-sponsored schemes, financial inclusion, social-sector banking and the last-mile delivery of public policy.
We work for institutions owned by the people and for a Government that expects us to reach every citizen. We have never shied away from that responsibility. But those who expect us to serve the nation must also recognise one simple truth:
We are not robots. We are not machines. We are not AI tools. We are human beings.
We have families waiting for us, children who need our time, parents who need our care, and lives beyond targets, reviews, late-night meetings and relentless workplace pressure.
We are not asking for privilege. We are asking for dignity, balance and justice.
The growing culture of excessive working hours, constant pressure and an increasingly toxic work environment cannot become the new normal. Five-Day Banking is one important step towards restoring humanity to our workplaces.
Save the banker. Save the banking family. Respect the commitment already made.
Five-Day Banking is not a luxury.
It is not an unreasonable demand.
It is a just demand whose time has come.
Let us stand together, for ourselves, for our families and for the generations of bankers who will come after us.
Five-Day Banking is For Dignity. For Family. For a Humane Workplace.
March ahead with courage and unity for the three-day strike from 28th to 30th September and make it a resounding success. No fear, no threat and no intimidation can weaken our collective resolve. Officers and employees stand together , we are all strikers in this historic struggle.
General Secretary
AIBOC
अब एक समाचार 'सूत्रों' के नहीं, 'उच्च पदस्थ सूत्रों' के हिसाब से फैलाया जा रहा है कि सरकार UGC रोलबैक नवंबर के मध्य में करेगी। यह कोई समाचार नहीं है, यह वही धूर्तता है जो इनके प्रवक्ताओं के मुँह में माइक देने पर ये कहते हैं कि 'विषय कोर्ट में है'।
ध्यान रहे हमारी तीन माँगें हैं:
1. UGC रोलबैक
2. मोदी एक्ट में समुचित संशोधन
3. वर्तमान आरक्षण में समीक्षा
कोई एक माँग से कुछ नहीं होने वाला। संघर्ष चलता रहेगा। 5 महीना लगे, 2 साल लगे, 10 साल लगे।