"हम सूखी मछली और हड्डियां तमिल ब्राह्मणों के घर में फेंक देते थे!
ब्राह्मण महिलाओं के नदी की तरफ जाने वाले रास्ते में कांटे बिछा देते थे!"
-ये कहना है तमिल मुरुगन मूवी के लेखक का
और फिर लोग कहते हैं ऊंची जाति वाले शोषक और अत्याचारी होते हैं!
जबकि सच्चाई तो ये है👇
दिल्ली में जनरल आबादी 55 प्रतिशत है और @SanjayAzadSln
की पार्टी की पूरी राजनीति ही दिल्ली बेस है
यूपी सरकार के आंकड़े के अनुसार इस समय नौकरी में ओबीसी 39 प्रतिशत है इस हिसाब से UP में ओबीसी अपने आरक्षण से 12 प्रतिशत
ओवर रिप्रेजेंटेड है यानी ओबीसी वेकेंसी सिर्फ 15 प्रतिशत निकलनी चाहिए
पर सरकार ने ज्यादा निकाली है फिर भी ये शराब चोर पार्टी का घोटाले बाज
टिकट ब्लैकिया
जनरल के खिलाफ नफरत फैला रहा है
दिल्ली के सवर्णों जागो उठो दिल्ली में इन चोरों को खत्म कर दो
हमारा वोट लेकर ये हमें ही म्याऊं कर रहे👇👇
@VijayName29@priti134 भाई ,सबसे पुरानी सभ्यता संस्कृति हमारी। सारी दुनिया ने हमारी नकल की, लेकिन तुम्हारे जैसे लोगों की गुलामी वाली मानसिकता ऐसी है कि अपने अच्छे लोगों को बुरा कहोगे और दूसरे खराब लोगों की चरण वंदना करोगे। इसमें आपकी गलती नहीं, यह अधकचरा ज्ञान का परिणाम है
SSP मेरठ अविनाश पांडे ने आज पूरे प्रकरण पर खुलकर सफाई दी और कहा कि जिस लड़की की हत्या हुई थी, उस मामले में सभी गिरफ्तारियां हो चुकी थी। परिवार वाले भी संतुष्ट थे, लेकिन फिर इसमें कुछ गुंडे शामिल हो गए। इनमें से एक अमरोहा का जिला बदर भाटी है, जिस पर SC/ST एक्ट का मुकदमा भी चल रहा है। दूसरा नोएडा का रवि गौतम है, जिस पर पहले से ही चार मुकदमे चल रहे हैं। इसके अलावा एक-दो अन्य आपराधिक तत्व भी थे, जो परिजनों को भड़काकर कुछ नाबालिग बच्चों को लेकर वहां धरना-प्रदर्शन कर रहे थे।
मेरा उत्तर प्रदेश पुलिस से निवेदन है कि इन गुंडों के खिलाफ अब सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए।
@Uppolice@meerutpolice
Hello @AAPUttarPradesh क्या EWS वालों को ज्यादा पद दिए गए हैं ??
अगर नहीं दिए गए हैं तो फिर EWS को बदनाम क्यों कर रहे हो ??
पहली बात समझ को EWS आर्थिक रूप से गरीब के लिए है न कि ScSt की तरह सिर्फ अमीरों के लिए।
दूसरी बात अभी UP जैसी राजनीति जमीन पर इतनी हल्की बातें मर करो, और सब ओपन सीटें हैं, करो न कंपटीशन अगर है हिम्मत तो।
@manish_r_patna@PMishra_Journo भरत तिवारी भ्रष्टाचार के लिए लड़ाई लड़ रहा था। भरत तिवारी अपने लिए लड़ाई नहीं लड़ रहा था ,वह गरीब पिछड़े वर्ग और हरिजनों की लड़ाई लड़ रहा था। जबकि यहां खुल्लम-खुल्ला गुंडागर्दी हो रही थी। कोर्ट ने बेल दिया था और पुलिस से बदतमीजी की जा रही थी, रोड को जामकर एंबुलेंस को रोका गया
आजकल प्रत्येक मामले में जाति का एंगल घुसेड़ना फैशन हो गया है। मेरठ में दलित समाज की लड़की ललिता गौतम की हत्या मामले में सियासत जोरों पर है। पुलिस की मानें तो परिजन पुलिस कार्रवाई से संतुष्ट थे। लेकिन बाहरी तत्वों ने अराजकता फैलाने के लिए उन्हें भड़काया। जबकि आरोपी और पीड़िता दोनों PDA समाज से ही आते हैं।
ये जातिगत राजनीति, हमारे समाज को कहीं का नहीं छोड़ेगी।
@VijayName29@priti134 बेवकूफ हो आप !रामायण महाभारत के पहले भी विज्ञान था और रामायण महाभारत के बाद भी विज्ञान रहेगा क्योंकि विज्ञान की उत्पत्ति ही रामायण महाभारत से हुई है । थोड़ा सा पढ़ लिख लेने का मतलब यह नहीं है कि हम अपने उत्पन्न- कर्ता अपने बाप का ही विरोध करने लगे। अल्प ज्ञान में यही सब होता है
शरीर से मांस का एक-एक कतरा गल चुका था। पसलियां बाहर आ गई थीं। हिलने-डुलने तक की ताकत नहीं बची थी।
जब अंग्रेजों ने देखा कि यह 25 साल का लड़का टूट नहीं रहा, तो उन्होंने जबरदस्ती नाक में नली ठूंसकर दूध पिलाने की कोशिश की। वह नली खाने की नली की जगह फेफड़ों में चली गई।
दूध फेफड़ों में भर गया। वो तड़पते रहे, खून की उल्टियां करते रहे, लेकिन अनशन नहीं तोड़ा।
13 सितंबर 1929 को लाहौर जेल में एक क्रांतिकारी ने अपने प्राण त्याग दिए। 63 दिन... जी हाँ, 63 दिन तक बिना अन्न का एक दाना खाए।
इतिहास के पन्नों में अक्सर हम भगत सिंह की फांसी की बात करते हैं, लेकिन उस साथी को भूल जाते हैं जिसने भगत सिंह की बाहों में दम तोड़ा था।
आज हम बात कर रहे हैं 'यतींद्र नाथ दास' की, जिन्हें दुनिया 'जतिन दा' के नाम से जानती थी।
पेशे से वो बम बनाने में माहिर थे, लेकिन उनका हथियार बना उनका अपना शरीर।
वो चाहते तो माफी मांग सकते थे, खाना खा सकते थे। लेकिन मांग सिर्फ एक थी - "भारतीय राजनीतिक कैदियों के साथ जानवरों जैसा सलूक बंद करो।"
अंग्रेजों को लगा कि भूख इसे तोड़ देगी। लेकिन उन्हें नहीं पता था कि यह शरीर मिट्टी का नहीं, फौलाद का बना है।
जब जतिन दा की हालत बिगड़ने लगी, तो अंग्रेजों ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। जेल के डॉक्टर और सिपाहियों ने उन्हें दबोच लिया। नाक से नली डाली। दर्द से वो चीखते रहे, लेकिन उनका संकल्प नहीं डिगा।
उनकी शहादत की खबर जब बाहर आई, तो पूरा देश रो पड़ा था।
कहा जाता है कि जब उनका शव लाहौर से कलकत्ता ले जाया जा रहा था, तो हर स्टेशन पर हजारों लोग फूल लेकर खड़े थे। कलकत्ता में उनकी अंतिम यात्रा में 6 लाख से ज्यादा लोग शामिल हुए।
सुभाष चंद्र बोस ने खुद उनके पार्थिव शरीर को कंधा दिया था।
लेकिन आज? आज कितने लोग उस 63 दिन की तपस्या को याद करते हैं?
मरते वक्त जतिन दा ने कहा था, "मैं कोई साधु नहीं हूँ, मैं बस एक साधारण इंसान हूँ जो अपने देश की गरिमा के लिए मरना चाहता है।"
आजादी चरखे से आई या बिना खड्ग-ढाल के, यह बहस का विषय हो सकता है। लेकिन यह सच है कि आजादी की नींव में जतिन दा जैसे नौजवानों की गल चुकी हड्डियां गड़ी हैं।
हमें यह आजादी खैरात में नहीं मिली, इसके लिए किसी ने अपनी जवानी के 63 दिन भूखे रहकर कुर्बान किए हैं।
हर भारतीय का कर्तव्य है कि वो जाने कि जिस हवा में वो सांस ले रहा है, उसकी कीमत क्या थी।
इस जानकारी को साझा करें ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि असली 'हीरो' कौन थे।
यह पोस्ट केवल उन भूले-बिसरे नायकों को नमन करने के लिए है....Read News
बलिया: मेरठ के SSP अविनाश पांडे के थप्पड़ कांड पर बोले ओमप्रकाश राजभर कहा-
'' SSP ने जो काम किया है अच्छा किया है। जिनको पीटा गया दलित नहीं वह अपराधी है। अपराधी को फूल माला नहीं पहनाया जाएगा, जो लोग जाति से जोड़कर कह रहे हैं। वह लोग समाज को खोखला कर रहे हैं।''
#Ballia #OmPrakashRajbhar @oprajbhar
@SurajKrBauddh हम तुम्हें आंख का अंधा कहीं या दिमाग का अंधा। स्वर्ण का प्रोटेस्ट रैली रोड पर रुकता नहीं है और सीधे गुजर जा रहा है जबकि तुम लोग रोड पर एक जगह जमा होकर, रोड बंद कर अपने ही लोगों को पिटवाते हो, जिनके चंदा के पैसे खाते हो
क्या खड़गे जी,
पूरा डेटा बताओ ना!
आधा डेटा दिखाकर विक्टिम कार्ड कबतक खेलोगे??
ये रहा पूरा डेटा:
NCRB 2022 के अनुसार दिन में 86 रेप होते हैं!
मतलब 12 दलितों में, तो बाकी 74 गैर-दलित महिलाओं के होते हैं!
कुल रेप=31516 (rate=4.7)
दलित विक्टिम=4241 (rate=2.1)
और ये रहा प्रूफ👇
हम आपकी तरह हवा में बातें नहीं करते!!
अगर यह व्यक्ति किसी दलित जाति से होता, तो अब तक उत्तर प्रदेश विधानसभा से लेकर संसद तक इस आत्महत्या की गूंज सुनाई देती। नकली दलित रोहित वेमुल्ला की मूर्ति तक लग गई
78 वर्षीय राजाराम गोस्वामी पिछड़ी जाति से थे और SC/ST एक्ट के एक मामले के कारण पिछले 24 वर्षों से मानसिक उत्पीड़न झेलते रहे। अंततः उन्होंने आत्महत्या कर ली।
सुसाइड नोट में उन्होंने लिखा, "मुझे गंदा पानी पिलाया गया। पीने से मना किया तो बीच सड़क पर मेरे कपड़े उतार दिए गए। लाठियों से पीटा गया और मुझे ही जेल भेज दिया गया।"
उन्होंने यह भी लिखा, "24 वर्षों से इस दंश को झेल रहा हूं। मानसिक रूप से इतना टूट चुका हूं कि अब जीना नहीं चाहता।"
ललितपुर, उत्तर प्रदेश। 78 वर्षीय रिटायर्ड शिक्षक राजाराम गोस्वामी ने जहर खाकर जीवन का अंत कर लिया। मृत्यु से पहले लिखे सुसाइड नोट ने पूरे प्रशासन और समाज की चुप्पी को ललकार दिया है।
उन्होंने पूर्व IPS अधिकारी एलवी एंटोनी देवकुमार सहित सात लोगों को अपनी मौत का जिम्मेदार बताया। 2022 में उनके विरुद्ध दर्ज SC/ST एक्ट का केस, जो अभी भी अदालत में चल रहा था, उनकी मानसिक शांति छीन चुका था। 16 जुलाई को सुनवाई तय थी, लेकिन उन्होंने इंतजार न कर इस अन्याय भरे जीवन से मुक्ति चुन ली।
सुसाइड नोट में राजाराम जी ने जो लिखा, वह किसी भी संवेदनशील इंसान के रोंगटे खड़े कर देगा।
“मुझे गंदा पानी पिलाया गया, मना करने पर सड़क पर कपड़े उतारे गए, लाठियों से पीटा गया और अंत में जेल भेज दिया गया।” 24 वर्षों से इस मानसिक और शारीरिक यातना को सहते हुए वे पूरी तरह टूट चुके थे। एक बार फिर उन्होंने लिखा कि तत्कालीन SP एंटोनी ने खुद थाने में बैठकर झूठा मुकदमा दर्ज कराया। एक जीवन भर ज्ञान का दीपक जलाने वाले शिक्षक को इस क्रूर कानून ने अपमान की ऐसी गहराई में धकेल दिया कि उन्होंने सांस लेना भी गवारा नहीं समझा।
यह घटना ब्राह्मण समाज पर SC/ST कानून के दुरुपयोग की भयावह तस्वीर पेश करती है। कानून का उद्देश्य कमजोरों की रक्षा करना था, परंतु आज यह निर्दोषों, खासकर ब्राह्मणों के खिलाफ एक घातक हथियार साबित हो रहा है। छोटी-सी शिकायत पर बिना ठोस सबूत या प्रारंभिक जांच के केस दर्ज हो जाते हैं। गिरफ्तारी, जेल, अदालती चक्कर और सामाजिक तिरस्कार का सिलसिला शुरू हो जाता है।
ब्राह्मण परिवारों में बुजुर्गों की इज्जत लुट रही है, युवाओं के भविष्य अंधकारमय हो रहे हैं और महिलाएं घर-घर अपमान सह रही हैं।
ब्राह्मण समुदाय, जो सदियों से विद्या, संस्कृति और नैतिक मूल्यों का प्रतीक रहा है, आज व्यवस्था की इस कुटिल चाल का सबसे बड़ा शिकार बन गया है। राजनीतिक स्वार्थों के कारण कानून को संतुलित बनाने की मांगों को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है। झूठे मुकदमों पर सख्त कार्रवाई, प्रारंभिक जांच की अनिवार्यता और निर्दोषों की सुरक्षा जैसे प्रावधान आज भी दूर की कौड़ी बने हुए हैं।
राजाराम गोस्वामी की मौत एक चेतावनी है। यह बताती है कि अगर समय रहते सुधार नहीं हुए तो और कितने निर्दोष बुजुर्ग इस आग में जलकर खाक हो जाएंगे। ब्राह्मण समाज अब चुप रहने को तैयार नहीं। पीढ़ियों से चली आ रही सेवा और त्याग की परंपरा को कुचलने की साजिशों का सामना करने का समय आ गया है।
सरकार और समाज को समझना होगा कि न्याय सभी के लिए समान होना चाहिए। एक वर्ग की रक्षा के नाम पर दूसरे वर्ग को कुचलना न तो न्याय है और न ही सामाजिक सद्भाव। राजाराम जी की आत्मा को शांति मिले और उनका बलिदान व्यर्थ न जाए।
* Suicide Note of Retired Brahmin Teacher Rajaram Goswami *
जज साहब..
" ललितपुर में तैनात एसपी एलबी एंटोनी देव कुमार क्रूर, अत्याचारी अधिकारी रहा है..
दिन के 2 बजे मुझे स्कूल से बुलवाया..
मेरी जाति पूछी और बोला कि तू छुआछूत मानता है..
एसपी एंटनी ने कहा, तू बसोर का पानी पिएगा!! मैंने कहा, सफाई से पानी मिलेगा तो पी लेंगे.. फिर एक गंदे से गिलास में मिट्टी या गोबर घुला पानी पीने को दिया..
मना करने पर बीच सड़क पर मेरे सारे कपड़े उतारे गए.. मुझे लाठियां मारीं.. मेरे साथ कई लोगों के कपड़े उतरवाए और उन्हें भी पीटा..
फिर सभी को जेल भेज दिया..
एसपी एंटनी ने निर्दोष लोगों पर झूठा मुकदमा दर्ज कराया था..
मैं अपने इस अपमान से बेहद दुखी और व्यथित हूं.. अब मैं जीना नहीं चाहता.."