संसदीय विपक्ष को इस असमंजस से निकल जाना चाहिये कि ये युवा किसी के कहने पर दिल्ली आ गये. कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के बड़े नेताओं को इन आंदोलनकारी युवाओं से फौरन संवाद स्थापित करना चाहिये, इनके साथ मिल कर आंदोलन को व्यापक बनाना चाहिये.
सड़क पर जो छात्र हैं उनका कोई नेता नहीं है.
@TheVijayMallya Vijay bhai, kal subah 11 baje SBI ki karol bagh branch mein ek chhoti si party rakhi hai jeet ki khushi mein. Thodi der ke liye aa jana please.
To the Principal, staff and students of Miranda College, Delhi University, you need to respect the Chief Guest you invite for your events. I was there for a no show! I have posted the videos and pix here so that you learn that tardiness equals to disrespect. No staff and 4-5 students. Flow chart & evidence posted
झोली भरकर घर लौट आया हूँ।
इसमे एक ट्रॉफी है। एक प्रशस्ति पत्र, साथ मे पचास हजार का चेक। और गांधी जी जुड़ी आधा दर्जन किताबें..
सोचता हूँ, सबसे ज्यादा कीमती क्या है?
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कोई नोबल प्राइज नही मिला है।
पर इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के उस हॉल में मौजूद सभी- अपने आपमे नोबल शख्स थे। मंच पर साइंटिस्ट गौहर रजा थे। साथ आनंद वर्धन (फाउंडर, पब्लिक मीडिया) और सिद्धार्थ वरदराजन (द वायर)
कार्टूनिस्ट मंजुल, (जो पूरे दिन भर मेरे साथ, बेनाम ऐतिहासिक जगहो पर घूमने के शगल मे, साथ थे, और पति पत्नी के फोटोग्राफर बने रहे) के साथ ही हॉल में प्रवेश किया। लेट थे, कार्यक्रम शुरू हो चुका था।
पीछे की सीट पर पर प्रोफेसर अपूर्वानंद दिखे।
प्रमाण किया वहीं बैठ गए। उधर आयोजक मंडल से ज्ञानेश जी ने नोटिस किया और आगे आकर बैठने सन्देश भेजा।
हम सकुचाते हुए फ्रंट रो में गए। खाली सीट पर नाम की तख्ती थी। पुलित्जर विजेता, सना मट्टू के बगल में बिठा दिया गया।
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तब मंच पर अब राहुल देव बोल रहे थे। उन्होंने ही चुने जाने की खबर दी थी। वे पुरस्कार के उद्देध्य, ज्यूरी औऱ कैटगरीज के बारे में बता रहे थे। शायद उन्होंने मुझे देखा न था। तमाम प्रशंसा के साथ मेरी बात की, नाम लिया- पूछा कि कहां बैठा हूँ।
उठा, हाथ जोड़े। घूम कर हॉल की ओर भी नमस्कार किया। और इस क्षण में सिहर गया।
सारे बेबाक, खुर्राट, मूर्धन्य, प्रतिभाशाली, और पत्रकारिता की दुनिया के जाने माने लोग, जिन्हें जिन्हें दशकों से स्क्रीन पर ही देखा था।सच कहूं तो हर शख्स के तेज के ताप से जलता महसूस किया।
लेकिन बीच मे वे भी दिखे, जिनका स्नेह लगातार मिला है। डॉक्टर राकेश पाठक, दयाशंकर जी, अभिषेक जी, सीपी राय, अनुमा आचार्य, और तमाम लोग बड़े अपनत्व से निहार रहे थे। थोड़ी जान में जान आयी।
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कार्यक्रम बढ़ा। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की अध्यक्ष मैडम बरुआ ने बोला। फिर सिद्धार्थ जी बोले। इसके बाद सम्मान शुरू हुए। सबसे पहले मंजुल जी को सम्मानित हुए। फिर सना मट्टू को, फिर अफरीदा हुसैन।अंत मे मेरा नम्बर आया।
और एक सरप्राइज था।
मैडम सुप्रिया श्रीनेत, जिन्हें अभी तक मैंने नही देखा, ने मंच पर जॉइन किया। प्रोत्साहन भरे शब्द कहे मेरे लिए। वह सुनना कानो के लिए अच्छा था, लेकिन नर्वसनेस भी बढ़ती जा रही थी।
अंततः आनंद बर्धन साहब ने शॉल पहनाई। गौहर रजा ने ट्रॉफी दी। नर्वस देख, कान कुछ शब्द भी कहे। सिद्धार्थ वरदराजन ने सर्टिफिकेट फोल्डर और किताबो का बंच दिया। मुझसे स्पीच का आग्रह किया गया।
कुछ मिनट, कुछ तो भी बोला मैने।
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इसके बाद करन थापर को, लाइफटाइम अचीवमेंट को अवार्ड दिया गया। अमेरिकन जर्नलिस्ट, और अवार्डी-सुश्री लीडिया ने ऑनलाइन उद्बोधन किया।
फिर डिनर था। राजीव जादौन सहित बहुतेरे मित्र मिले। अनुमा जी के परिवार से मिला। भीड़ में कुछ के साथ मैंने सेल्फी ली- कुछ ने मेरे साथ..
सुप्रीम कोर्ट के दो वकीलों से मिलना खूब रहा। मुझे पढ़ते है, पसंद करते हैं, और कभी जरूरत पड़े तो उसके लिए कार्ड दे गए हैं।
हालात के मद्देनजर, दोनों कार्ड पत्नी के पास सुरक्षित रखवा दिए हैं। इस्तेमाल, कभी करना हुआ, तो वही करेंगी।
हम तो भीतर होंगे।
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डिनर के बाद वापसी थी। लेकिन चेरी ऑन द केक बाकी था। जब आयोजको से इजाजत लेने गया, वहां सुप्रिया जी मौजूद थी।
खुद अपनी गाड़ी में हमे होटल तक छोड़ा। उस आधे घण्टे की राइड में, मैनें काग्रेस के उद्धार का कोई भी आइडिया देने से गुरेज किया। बस उस फियरलेस फायरब्रांड नेत्री के अनदेखे, बेहद हँसमुख, ग्रेसफुल पहलू का आनंद लिया।
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तो झोली भरकर आया हूँ।
ट्रॉफी है, प्रशस्ति पत्र, चेक, किताबें.. और सोचता हूँ, सबसे ज्यादा कीमती क्या है?
सम्मान-पुरस्कार बहुत मिले हैं- अपने प्रोफेशनल फील्ड में। जो जानते हैं-वो जानते है। लेकिन, पत्रकार, प्रोफेसर, वैज्ञानिक न होते हुए भी- इस फील्ड के तमाम लोगो ने मुझ एमेच्योर, नोबडी को इतनी मोहब्बत से नवाजा- किसी झोली में नही समायेगा।
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तो कोई नोबेल नही मिला मुझे। मगर बहुत से नोबल लोग मिले हैं। उनकी मुस्कान, हाथ पकड़ना, साथ खड़ा होना, और साथ खड़ा होने की इजाजत देना..
इस बड़प्पन और सराहना से निहाल हूँ। यही कमाई है। यही सबसे कीमती है।
द पब्लिक मिडीया, और सभी आयोजनकर्ताओ, ज्यूरी, उपस्थितों का आभार।
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और मुझे पढ़कर, सराहकर, मुझ पर विश्वास जताकर, उस मंच तक धकेलने वाली, फेसबुक- ट्विटर की मेरी मित्र मंडली में शामिल, आप सभी का भी।
शुक्रिया!
❤️
@SupriyaShrinate@gauharraza9@AnumaVidisha@DrRakeshPathak7@MANJULtoons@AuthorAVS@svaradarajan@Apoorvanand__@RahulDev718370@DayashankarMi@ABHISHEKJOURNO2@p_indianews
His name was Manjunath Shanmugam.
He was an IIM Lucknow graduate.
He got a job with Indian Oil Corporation as a sales officer.
His territory was Uttar Pradesh.
He found that petrol pump dealers were adulterating fuel and cheating customers.
He reported it. He sealed the pumps.
On November 19 2005 a petrol pump owner shot him dead outside his office.
He was 27 years old.
The killers were convicted. Sentenced to life imprisonment.
His parents did not get compensation for 15 years.
His college created the Manjunath Shanmugam Trust in his name to fight corruption.
Some men die because they refused to look the other way.
India forgets them too quickly.
बहुत बड़ी राहत की खबर: आखिरकार सोनम वांगचुक जोधपुर जेल से 170 दिन बाद होंगे रिहा
गृह मंत्रालय ने कहा: सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत मिली शक्तियों का इस्तमाल करते हुए सोनम वांगचुक की हिरासत को फ़ौरन रद्द करने का फैसला किया है.
केंद्र सरकार का फैसला ऐसे समय में हुआ है जब सुप्रीम कोर्ट में वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमो की उस याचिका पर सुनवाई हो रही है जिसमें वांगचुक की हिरासत को चुनौती दी गई है. मामले की अगली सुनवाई मंगलवार को है.
नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) बहुत कड़ा और खतरनाक कानून है. कोर्ट से लगातार रिपोर्ट आ रही थीं कि उन पर लगे आरोप आधे अधूरे और सच से बहुत दूर हैं.
👉🏾 सवाल है फिर सोनम कर क्यों लगा NSA? और इतना गंभीर आरोप लगा तो क्यों हटा लिया गया? सरकारें इसका इस्तेमाल सिर्फ़ राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरों के लिए नहीं, बल्कि राजनीतिक विरोधियों, एक्टिविस्टस और आलोचकों को चुप कराने के लिए करती हैं. इसमें बिना औपचारिक आरोप के 12 महीने तक की हिरासत की इजाज़त है. इस कानून पर नए सिरे से सोचा जाना चाहिए और न्यायालयों को ज़ोरदार और असरदार तरीके से इसमें दखल देना चाहिए
दूसरा, ज़ोर-ज़ोर से TV पर 'गद्दार है सोनम', 'देशद्रोही है सोनम' चिल्लानेवालों की क्या कोई सजा होगी या उन्हें कोई निर्देश दिया जायेगा?
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सच परेशान हो सकता है, पराजित नहीं.
खाड़ी देशों में जो ईरान के हमले हुए हैं, वह उन देशों से अमेरिकी/इज़रायली हमले का जवाब है. खाड़ी देशों से होने वाले अमेरिका और इज़रायल से होने वाले तीन तरह के हमलों का जवाब ईरान ने नहीं दिया है: स्कूल, अस्पताल और रिहायशी इलाक़े.
सभ्यता का कुछ मतलब होता है.