माता-पिता के निधन पर 13 दिन सवैतनिक शोक अवकाश की मांग!
राज्यसभा सांसद डॉ. दिनेश शर्मा ने माता-पिता के निधन पर सरकारी व निजी क्षेत्र के कर्मचारियों को 13 दिन का अनिवार्य सवैतनिक शोक अवकाश देने की मांग उठाई है।
सभी घरेलू #LPG उपभोक्ताओं को बायोमेट्रिक आधार प्रमाणीकरण (e-KYC) कराना अनिवार्य है।
e-KYC प्रक्रिया निःशुल्क, सरल और सुविधाजनक है।
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@HardeepSPuri@Secretary_MoPNG@IndianOilcl@BPCLimited@HPCL
जिस संस्था पर राज्य के लाखों युवाओं के भविष्य की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है, वही आज भ्रष्टाचार के आरोपों में आकंठ डूबी होने की खबरों से घिरी हुई है।
#RPSC पेपर लीक मामले में ईडी की चार्जशीट में जो खुलासे हुए हैं, वे बेहद गंभीर हैं। आरोप है कि RPSC के सदस्य बनने के लिए बाबूलाल कटारा के साथ 1.20 करोड़ रुपये की डील हुई और दो किश्तों में 40 लाख रुपये तक का लेन-देन किया गया।
इतनी बड़ी रकम कोई दान नहीं, बल्कि एक तरह का इन्वेस्टमेंट है-जिसकी कई गुना वसूली पेपर लीक, इंटरव्यू में सेटिंग और चयन प्रक्रिया में हेरफेर के ज़रिये की जाती है।
सोचिए, जब चयन प्रक्रिया के शीर्ष पर बैठे लोग ही सौदेबाज़ी में शामिल हों, तो निष्पक्ष परीक्षा और मेरिट की बात कैसे की जा सकती है?
देखना है कि वर्तमान सरकार इस व्यवस्था की कितनी सफाई कर पाती है, और असली दोषियों को क्या सजा देती है।
पहली बात तो ये कि यह कविता एक सांस में पढ़ जाइए!!
और दूसरी बात ये कि इसके रचनाकार का नाम मुझे पता नहीं है-फेसबुक/व्हाट्सऐप से मेरे पास आई है, इसलिए लिखने वाले क्रेडिट आकर ले जाएँ।
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हम ज़्यादा खाते हैं — इसलिए बीमार हैं
दिन में तीन बार खाना
मानव इतिहास के सबसे बड़े धोखों में से एक है।
कोई डॉक्टर यह साफ़-साफ़ नहीं कहेगा।
कोई मेडिकल पाठ्य-पुस्तक इसे स्वीकार नहीं करेगी।
क्योंकि यह झूठ
अनेक उद्योगों को ज़िंदा रखता है।
इस भ्रम को समझने के लिए
हमें 1750 से पहले लौटना होगा।
अंग्रेज़ों से पहले।
घड़ी के शासन से पहले।
उस समय से पहले
जब भोजन आज्ञाकारिता बना दिया गया।
भारत समय से नहीं — सूर्य से खाता था
भारत ने कभी
घड़ी देखकर खाना नहीं खाया।
यहाँ भोजन होता था—
सूर्य के अनुसार,
ऋतु के अनुसार,
श्रम के अनुसार,
और सबसे महत्वपूर्ण—भूख के अनुसार।
अधिकांश भारतीय
एक ही मुख्य भोजन करते थे।
कभी-कभी दो।
तीन कभी नहीं।
भोजन प्रायः
देर सुबह या दोपहर में होता था।
सूर्यास्त के बाद
भारी भोजन लगभग नहीं होता था।
उपवास कोई दंड नहीं था
उपवास
सज़ा नहीं था।
वह संस्कृति था।
वह जैविक बुद्धि था।
वह आध्यात्मिक अनुशासन था।
एकादशी।
प्रदोष।
नवरात्रि।
चातुर्मास।
ऋतु-आधारित व्रत।
भूख से डर नहीं था।
भूख का सम्मान था।
भोजन स्थानीय था — जीवन से जुड़ा था
खाद्य पदार्थ
ताज़ा थे।
स्थानीय थे।
ऋतु के अनुरूप थे।
मोटे अनाज—
ज्वार, बाजरा, रागी।
कंद-मूल।
दालें।
देशी घी, दूध।
वन-आधारित भोजन।
चावल और गेहूँ
देवता नहीं थे।
रोग थे।
लेकिन मेटाबोलिक रोग नहीं थे।
मोटापा दुर्लभ था।
मधुमेह लगभग अदृश्य था।
हृदय रोग जीवन-शैली नहीं बने थे।
शरीर दुबले थे।
मांसपेशियाँ कार्यशील थीं।
किसानों के शरीर
जिम के बिना सिक्स-पैक थे।
फिर अंग्रेज़ आए
और उन्होंने
सिर्फ़ भूमि पर क़ब्ज़ा नहीं किया।
उन्होंने
समय को उपनिवेश बनाया।
भोजन को उपनिवेश बनाया।
चयापचय (Metabolism) को उपनिवेश बनाया।
उन्हें चाहिए थे
अनुमानित मजदूर।
अनुमानित घंटे।
अनुमानित उत्पादकता।
इसलिए उपवास हटाना पड़ा।
अनियमित भोजन हटाना पड़ा।
भोजन की स्वायत्तता खत्म करनी पड़ी।
धीरे-धीरे, चुपचाप
एक नया ढाँचा खड़ा किया गया—
सुबह = नाश्ता
दोपहर = भोजन
रात = रात का खाना
यह स्वास्थ्य मॉडल नहीं था।
यह कर वसूली का मॉडल था।
अगला वार: खाद्य संप्रभुता की हत्या
हर भारतीय घर
कभी एक खाद्य इकाई था।
स्व-संरक्षित।
स्व-निर्भर।
स्व-पोषित।
इसे नष्ट करना ज़रूरी था।
विविध अनाज हटाए गए।
चावल और गेहूँ थोपे गए।
क्यों?
आसान भंडारण।
आसान परिवहन।
आसान कर।
आसान नियंत्रण।
रसोई बाज़ार बन गई।
खेती नक़दी फसल बनी।
खाना निर्भरता बन गया।
1947 आया — आज़ादी आई, पर व्यवस्था नहीं बदली
सरकार ने
अंग्रेज़ी मॉडल को देखा
और मुस्कुराई—
“कितनी शानदार कर मशीन है!”
फिर आई
हरित क्रांति।
1950–60 का दशक।
गेहूँ और चावल
सीमेंट की तरह जम गए।
MSP का नशा दिया गया।
मोटे अनाज ग़ायब हो गए।
विविधता मर गई।
किसान संप्रभु नहीं रहे।
वे आपूर्तिकर्ता बन गए।
फिर दूसरा उद्योग फूटा — बीमारी
कार्बोहाइड्रेट-भारी आहार आए।
और साथ आए—
मधुमेह।
उच्च रक्तचाप।
हृदय रोग।
मोटापा।
बीमारियाँ अनुमानित थीं।
मरीज़ स्थायी थे।
बीमा फला-फूला।
अस्पताल बढ़े।
दवाइयाँ फूटीं।
सरकार फिर मुस्कुराई—
भोजन कर।
दवा कर।
अस्पताल कर।
बीमा कर।
नागरिक
बैटरियाँ बन गए।
खाओ।
काम करो।
दवा लो।
कर दो।
दोहराओ।
काग़ज़ों में उम्र बढ़ी — जीवन नहीं
लोग अधिक नहीं जी रहे।
वे केवल
ज़्यादा समय तक ज़िंदा रखे जा रहे हैं।
गोलियों पर।
इंजेक्शन पर।
रिपोर्ट्स पर।
स्वस्थ रहने के लिए नहीं—
कर देने के लिए ज़िंदा।
यह स्वास्थ्य नहीं है।
यह सभ्यतागत पतन है।
और हम अब भी
इस मैट्रिक्स में फँसे हैं।
असल प्रश्न यह नहीं है…
“आप बीमार क्यों हैं?”
असल प्रश्न है—
जब आप दिन में तीन बार खाते हैं,
तो लाभ किसे होता है?
💥 बड़ा खुलासा: राजस्थान में विधायक निधि के दुरुपयोग पर भाजपा विधायक #रेवंतरामडांगा कैमरे पर 40% कमीशन मांगते पकड़े गए।50 लाख के काम के बदले 20 लाख की डिमांड, बेटे ने 10 लाख लिए। 🚔 कांग्रेस और निर्दलीय विधायक भी फंसे।यह भ्रष्टाचार का गंभीर मामला है, जांच होनी चाहिए! #ReventaramDanga #MLAफंड #भ्रष्टाचार #RajasthanPolitics
@BhajanlalBjp@hanumanbeniwal@INCRajasthan
प्रदेश शैक्षिक सम्मेलन* का आयोजन 19 एवं 20 दिसंबर 2025 को -सम्मेलन स्थल:- आदर्श स्टेडियम, बाड़मेर*(राज.)
में आयोजित होगा। शिक्षकों की मांगों को राजस्थान की बॉर्डर से राजधानी तक बुलंद किया जाएगा__विपिन प्रकाश शर्मा राजस्थान प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षक संघ
📱 "मेरा मोबाइल, मेरा डेटा!" — शिक्षिका ने जो कहा, वो आज हर सरकारी कर्मचारी की आवाज़ है! 🙌
मध्य प्रदेश के एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका ने ई-अटेंडेंस ऐप डाउनलोड करने से इंकार किया।
उनका जवाब साफ और सटीक था —
> “यह मेरा फोन है, मेरा डेटा है, थर्ड पार्टी ऐप को एक्सेस नहीं दूंगी!”
यह सिर्फ एक शिक्षिका की बात नहीं — यह लाखों सरकारी कर्मचारियों की निजता और अधिकार की लड़ाई है।
और कानून भी इसी बात को सही ठहराता है। ⚖️
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🔹 1. संवैधानिक अधिकार: निजता यानी मौलिक अधिकार
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक K.S. Puttaswamy बनाम Union of India (2017) फैसले में निजता (Privacy) को अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मौलिक अधिकार घोषित किया गया है।
फोन का डेटा — लोकेशन, फोटो, कॉन्टैक्ट्स — “संवेदनशील निजी जानकारी” है।
👉 बिना सहमति किसी थर्ड पार्टी ऐप को एक्सेस देना कानूनी उल्लंघन है।
सरकारी काम के नाम पर निजी डेटा पर जबरदस्ती नहीं हो सकती!
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🔹 2. आईटी एक्ट 2000 की धारा 43A: डेटा की सुरक्षा का दायित्व
किसी भी ऐप या संस्था को यूजर का डेटा संभालने में उचित सुरक्षा प्रक्रिया अपनानी होती है।
अगर डेटा लीक या दुरुपयोग हुआ — तो जिम्मेदारी उसी की होगी।
📜 ऐप डाउनलोड करने से पहले लिखित सहमति जरूरी है, और कोई भी यूजर कभी भी अपनी सहमति वापस ले सकता है।
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🔹 3. SPDI रूल्स 2011: बिना अनुमति डेटा साझा करना गैरकानूनी
संवेदनशील पर्सनल डेटा को किसी थर्ड पार्टी से साझा करने से पहले यूजर की अनुमति अनिवार्य है।
ऐसे ऐप्स में लोकेशन ट्रैकिंग और लाइव फोटो सिस्टम प्राइवेसी रिस्क बढ़ाते हैं —
इसलिए शिक्षिका का इनकार सिर्फ जायज़ नहीं, बल्कि कानूनी रूप से भी सही है।
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🔹 4. अदालती रुख: महिलाओं की प्राइवेसी सर्वोपरि
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 2025 में कहा —
> “अटेंडेंस सिस्टम ऐसा हो जो महिला शिक्षकों और छात्राओं की निजता से समझौता न करे।”
यानी, प्राइवेसी कोई विलासिता नहीं, बल्कि अधिकार है।
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🔹 5. वास्तविकता: डेटा लीक की आशंका और विरोध की लहर
शिक्षक संघों ने ई-अटेंडेंस ऐप पर गंभीर सवाल उठाए हैं —
❗ बग्स, गलत लोकेशन रिकॉर्डिंग, डेटा लीक की आशंका
❗ अज्ञात नंबरों से कॉल्स, विदेशी सर्वर की भूमिका की शिकायतें
ऐसे में यह शिक्षिका नहीं डरी — उन्होंने कानूनी और नैतिक हक की लड़ाई लड़ी।
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👩🏫 शिक्षक राष्ट्रनिर्माता हैं — उनकी प्राइवेसी की रक्षा सरकार का कर्तव्य है।
अटेंडेंस के लिए तकनीक हो, लेकिन निजता की कीमत पर नहीं!
आवाज़ उठाइए, ताकि हर कर्मचारी सुरक्षित महसूस करे।
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