समाजवाद का झंडा उठाते-उठाते कब परिवारवाद हो जाता है, पता ही नहीं चलता।
नेताजी लोकसभा चुनाव हारे। चिंता नहीं राज्यसभा का दरवाज़ा खुल गया।
बेटवा मंत्री बने। फिर MLC भी हो गए।
न मेरिट की ज़रूरत। न जनता का जनादेश। बस सही घर में पैदा होना काफी है।
जिस समाजवाद ने कहा था "हर हाथ को काम, हर खेत को पानी" उसी की छाया में आज का नारा है :
"हर बेटे को पद, हर दामाद को टिकट।"
Gen Z देख रही है। समझ रही है। और याद रख रही है।
जय परिवारवाद। जय समाजवाद। 🙏
- मदन मोहन झा, राजनीतिक विश्लेषक
#परिवारवाद #DynasticPolitics #Socialism #IndianPolitics #GenZ
🚨 पंजाब कांग्रेस आत्मघाती रास्ते पर?
अगर पंजाब हार गई… तो क्या कांग्रेस पूरे देश में AAP को फिर से खड़ा कर देगी?
मन को समझा लिया था…
वक्त के साथ खुद को भी ढाल लिया था.
दोस्तों ने भी समझा लिया था…
कि अब पंजाब कांग्रेस पर कुछ नहीं लिखूंगा.
लेकिन क्या करें…
राजा साहब के कुछ फैसले और कुछ बयान ऐसे हैं…
जो जाते जाते फिर कलम उठाने पर मजबूर कर गए.
आज यह पोस्ट किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं…
बल्कि पंजाब कांग्रेस के भविष्य की चिंता में लिख रहा हूं.
क्योंकि 2027 सिर्फ पंजाब का चुनाव नहीं होगा.
यह कांग्रेस और AAP, दोनों के लिए करो या मरो की लड़ाई होगी.
सबसे पहला सवाल पंजाब कांग्रेस हाईकमान और राजा वड़िंग साहब से…
• आपने लगभग तीन महीने तक नेताओं से फीडबैक लिया.
• जिला स्तर तक राय ली गई.
• बदलाव की चर्चाएं पूरे पंजाब में होती रहीं.
• लेकिन आखिर में मौजूदा नेतृत्व को ही बरकरार रखा गया.
अगर बदलाव करना ही नहीं था…
तो तीन महीने तक यह पूरी कवायद क्यों चली?
और अगर बदलाव की जरूरत महसूस हुई थी…
तो फैसला बीच रास्ते में क्यों रुक गया?
अब सबसे बड़ा सवाल सिद्धांत का…
• आपने कहा सांसदों के बेटों को टिकट नहीं मिलेगा.
• एक परिवार से एक ही टिकट होगा.
• दूसरे दलों से आए नेताओं को टिकट नहीं मिलेगा.
अगर यही कांग्रेस का नया सिद्धांत है…
तो क्या यह हर नेता पर समान रूप से लागू होगा?
राजकुमार वेरका भी दूसरे दल से कांग्रेस में आए थे.
फिर उन्हें वर्किंग प्रेसिडेंट क्यों बनाया गया?
और आपकी पत्नी को विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस का उम्मीदवार बनाया गया.
उस समय “एक परिवार, एक टिकट” का सिद्धांत किस रूप में लागू था?
अगर नीति बदल गई है…
तो कार्यकर्ताओं को साफ साफ बताया जाना चाहिए.
यहीं से सबसे बड़ी राजनीतिक बहस शुरू होती है…
2027 कोई सामान्य चुनाव नहीं है.
यह प्रयोग करने का चुनाव नहीं है.
यह पंजाब बचाने का चुनाव है.
अगर कांग्रेस मजबूत और जीतने वाले उम्मीदवारों की जगह केवल प्रतीकात्मक राजनीति करेगी…
तो 117 सीटों पर मुकाबला कौन लड़ेगा?
चुनाव आदर्शों से नहीं…
जीतने की क्षमता, संगठन और जनता के भरोसे से जीते जाते हैं.
अब बात विपक्ष की भूमिका की…
पंजाब में मुद्दों की कभी कमी नहीं रही.
• कानून व्यवस्था पर लगातार सवाल उठे.
• बढ़ते कर्ज पर बहस हुई.
• कर्मचारी संगठनों के आंदोलन हुए.
• शिक्षकों, परिवहन कर्मचारियों और अन्य वर्गों के विरोध प्रदर्शन चर्चा में रहे.
• पुलिस कार्रवाई को लेकर भी कई बार सवाल उठे.
• सिद्धू मूसेवाला की हत्या ने पूरे पंजाब को झकझोर दिया.
इन सभी मुद्दों पर जनता सड़क पर दिखी…
लेकिन क्या कांग्रेस उसी ताकत से जनता के साथ सड़क पर दिखाई दी?
क्या पूरे पंजाब को जोड़ने वाला कोई बड़ा आंदोलन खड़ा हो पाया?
क्या सरकार पर राज्यव्यापी राजनीतिक दबाव बनाया जा सका?
अगर जवाब “नहीं” है…
तो समीक्षा सिर्फ संगठन की नहीं…
नेतृत्व की भी होनी चाहिए.
यहीं कांग्रेस सबसे बड़ा मौका गंवाती दिखाई देती है…
आज AAP सरकार पर सत्ता विरोधी माहौल की चर्चा होती है.
लेकिन कांग्रेस उस माहौल का राजनीतिक लाभ उठाती हुई दिखाई नहीं देती.
दूसरी तरफ…
चरणजीत सिंह चन्नी के समर्थन में लगातार नारे सुनाई देते हैं.
उनकी जनसभाओं में भीड़ और जमीनी पकड़ की चर्चा होती है.
यानी पार्टी के भीतर भी अलग अलग राजनीतिक संकेत दिखाई दे रहे हैं.
और यही किसी भी संगठन के लिए सबसे खतरनाक स्थिति होती है.
अब बात पूरे देश की राजनीति की…
अगर कांग्रेस पंजाब हारती है…
तो नुकसान सिर्फ पंजाब तक सीमित नहीं रहेगा.
कांग्रेस के कई नेताओं ने समय समय पर आरोप लगाया है कि जिन राज्यों में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला होता है, वहां AAP के मैदान में उतरने से विपक्षी वोटों का बंटवारा होता है.
गुजरात
गोव
उत्तराखंड
ऐसे राज्यों को लेकर कांग्रेस के भीतर यह राजनीतिक तर्क बार बार सामने आता रहा है.
अगर AAP पंजाब बचा लेती है…
तो राष्ट्रीय राजनीति में उसका मनोबल फिर बढ़ेगा.
और कांग्रेस के सामने चुनौती और कठिन हो सकती है.
अब फैसला हाईकमान को करना है…
अनिश्चितता सबसे बड़ा दुश्मन होती है.
कार्यकर्ता भ्रम में रहेगा…
तो जनता भरोसा नहीं करेगी.
राजनीति में पद से नहीं…
परिणाम से नेतृत्व तय होता है.
बैठकों से नहीं…
जनआंदोलनों से विपक्ष मजबूत बनता है.
और इतिहास गवाह है…
राजनीति में सबसे महंगा फैसला अक्सर “कोई फैसला नहीं” होता है.
पंजाब की गलियों में आज एक ही सवाल गूंज रहा है…
“जो पार्टी अपना घर नहीं संभाल पा रही…
वो पंजाब क्या संभालेगी?”
क्या कांग्रेस हाईकमान समय रहते निर्णायक फैसला लेकर पूरे संगठन को एकजुट करेगा…
या फिर यही अनिर्णय 2027 में पंजाब कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनावी कमजोरी बन जाएगा?
Prashant Kishor drops a bombshell on Manoj Tiwari: Deliver justice in the Bharat Tiwari case or quit Bihar politics💥
राजनीति के मंगरुआ,रिंकिया के पापा मनोज तिवारी ने जो घटिया राजनीति की है,उसको अगली बार बिहार की जनता सड़क पर दौड़ाएगी और कोई बचा नहीं पाएगा!
नचनिया हो नाचते रहो🤣
"मनोज तिवारी को चुनौती देता हूं, भरत तिवारी के परिवार को न्याय दिलाकर दिखाओ"
◆ News24 के साथ खास बातचीत के दौरान @PrashantKishor ने कहा
@SauravKu_News24 | Prashant Kishor | #PrashantKishor
कांग्रेस पार्टी में राहुल गाँधी के अलावा तमाम जनरल सेक्रेटरी ( कुछ को छोड़कर) का पार्टी में पिछले कुछ सालों में क्या योगदान है,यह एक बार
पार्टी को आकलन करनी चाहिए! खुद के लिए राज्यसभा लॉबी करना,गुटबाजी को हवा देना और अपने-अपने हितों पर टिके रहने के अलावा
पार्टी में क्या पॉजिटिव योगदान है इसका अगर ईमानदार आकलन हो तो अधिकतर महासचिव भूतपूर्व हो जाएंगे! पार्टी की सबसे कमजोर कड़ी आज की तारीख में यही "जनरल सेक्रेटरी" हैं!
सचमुच ये तर्क बचकाना है कि प्रशांत किशोर को जानबूझकर जिता दिया। दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक दल का अध्यक्ष होने घर में इतनी बड़ी बे'इज़्ज़ती नहीं मोल लेगा।
भाजपा के साथ चिराग पासवान, जीतन राम माँझी और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टियाँ थीं। फिर भी हार हुई है। ये केवल एक विधानसभा सीट की बात नहीं है, हार की चर्चा इसीलिए हो रही है क्योंकि ये नितिन नवीन की सीट थी और ऊपर से पुराना गढ़।
UGC विरोधी आक्रोश, NEET प्रश्नपत्र-लीक से निकले कॉकरोच आंदोलन के बाद केंद्रीय मंत्री का इस्तीफा और फिर बाँकीपुर की हार ये बताती है कि बंगाल-असम की बड़ी जीत के बाद उस हिंदी पट्टी में भाजपा की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है जो दशकों से उसका गढ़ रहा है।
प्रशांत किशोर शिक्षित हैं, अच्छी बातें करते हैं, दक्षिण से लेकर उत्तर तक की राजनीति को समझते हैं और भाजपा के विरोध में खड़े हर एक नेता से उनके अच्छे कनेक्शंस भी हैं। ममता बनर्जी और उद्धव ठाकरे जैसे क्षत्रपों को भाजपा ने ख़त्म किया, लेकिन विजय से लेकर प्रशांत किशोर जैसे ऐसे नए चेहरे भी उभरे हैं जो Gen Z को पसंद आने वाली बातें करते हैं। वही जेन जी, जिसका रवैया फ़िलहाल भाजपा के गले की फाँस बना हुआ है। जिसे ख़ुश करने के लिए स्वयं प्रधानमंत्री को रील पर रील बनानी पड़ रही है। विधानसभा में प्रशांत किशोर को सुनने को लोग बेचैन हैं।
दतिया और बांकीपुर उपचुनाव में मिली करारी शिकस्त के बाद देश के सियासी गलियारों में भारी खलबली मच गई है। दिल्ली से लेकर पटना और मध्य प्रदेश तक शीर्ष नेताओं के बीच मंथन का दौर शुरू हो गया है। एक तरफ दिल्ली में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने पहुंचे हैं और बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन हार के हर पहलू का विश्लेषण कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ भोपाल में मुख्यमंत्री आवास पर दतिया चुनाव की जिम्मेदारी संभालने वाले तमाम दिग्गज नेताओं के साथ हार के कारणों की मैराथन समीक्षा बैठक जारी है।
प्रशांत ने मनोज तिवारी के राजनीति पे थूक दिया 🔥
प्रशांत किशोर –
फर्जी एक आदमी है जिसका नाम है मनोज तिवारी,पहले नाच गाना करता था,अब सांसद बन गया है, दलाली का काम शुरू कर दिया है उस आदमी ने...
जब पत्रकार Abhinav Pandey ने प्रशांत किशोर जी से पूछा मैंने आज तक कोई उपचुनाव का नतीजा इतना ज्यादा high-level पर चर्चित होते नहीं देखा है, जैसा कि बाँकीपुर का है, आपको ऐसा क्या लगता है ?
Prashant Kishor जी:-
बाँकीपुर कोई साधारण सीट नहीं है
ये दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के मौजूदा अध्यक्ष की सीट है, भजपा यह सीट हारी है
बीजेपी यहां पिछले 30 सालों से नहीं हारी थी
2015 में जब कांग्रेस, JD(U) और RJD एक साथ थे, तब भी बीजेपी यहां 30,000 वोटों से जीती थी
यह वह चुनाव है जँहा भजपा के मुख्यमंत्री बनने के बाद पहला उपचुनाव हुआ है।
मनोज तिवारी फ्रॉड आदमी है। मैं कैमरे पर कह रहा हूँ कि आओ और भरत तिवारी के परिवार को न्याय दिलवाओ और अगर नहीं दिलवा सकते तो शपथ लो कि जीवन में बिहार की धरती पर आकर इस तरह की गन्दी राजनीति नहीं करोगे।
किसी के बच्चे की मौत हुई है और चंद वोट के लिए उसकी माँ को खराब हालत में सम्राट चौधरी से मिलाना और समाज में मैसेज देना कि इनका समझौता हो गया है, इससे घिनोना अपराध कुछ हो नहीं सकता है।
इस घटना के बाद मनोज तिवारी से घिन आती है कि लोग इस स्तर पर उतर कर राजनीति कर रहे हैं।
- प्रशांत किशोर
दतिया में नरोत्तम के बूथ पर बीजेपी हारी
बांकीपुर में राष्ट्रीय अध्यक्ष के बूथ पर भी हारी।
रविशंकर प्रसाद के बूथ पर बीजेपी हारी,
मंत्री रामकृपाल यादव के बूथ पर हारी।
दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी एक अकेले प्रशांत से हार गई
समय सुधरने का हैं।सुधरेंगे तो मैदान में रहेंगे नहीं तो होइए वही
प्रशांत किशोर क्या चीज है इस ट्वीट से समझिये,
स्टालिन पूर्व मुख्यमंत्री बधाई दे रहा है, सोचिये कोई विधायक को बधाई क्यो देगा, एक्टर विजय फोन पर बधाई दिया होगा, बहुत लोग बधाई दिए होंग।
उनके चाहने वाले देश विदेश हर जगह है, कारण पूरे देश के विपक्ष को लगता है प्रशांत किशोर भारतीय राजनीति का चमकता हुआ सितारा है। यह सिर्फ एक विधायक का चुनाव नही था बल्कि प्रशांत जी के खुद के राजनीतिक स्ट्रेटजी का भी परीक्षा था।।
प्रशांत किशोर सिर्फ विधायक बनने के लिए चुनाव नही लड़ रहे थे, उन्हें चुनौती मिला था बड़ा रणनीतिकार तो चुनाव जीतकर दिखाओ, बिहार 2025 के बाद बहुत आलोचना और ताना सुनने पड़ा था, लेकिन प्रशांत जी जिद्दी थे, बिहार बदलने की जिद्द ने उन्हें संघर्ष पथ पर चलने को मजबूर कर दिया।।
घमंड टूटा,अरे बीजेपी घमंड टूटना भी नहीं चाहिए
रामकृपाल अब तो जान गए होंगे कि प्रशांत किशोर कहां के हैं, कौन है ,क्या है ,कितना ताकतवर है, कि अभी भी बाकी है ।आप सब जान गए होंगे प्रशांत किशोर के बारे में ,बोलते हैं कि कौन है हम नहीं जानते हैं अब तो जान गए होंगे आपभी...
जनता का जनादेश किसी की बपौती नहीं होता। 40 वर्षों का राजनीतिक गढ़ भी तब बदल जाता है, जब जनता बदलाव का मन बना लेती है। यदि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अपनी सीट हार रहे हैं, तो यह जनता के मूड का स्पष्ट संकेत है—लोकतंत्र में सबसे बड़ा फैसला जनता ही सुनाती है।
प्रशांत बांकीपुर उपचुनाव जीत गए. इंटरनेट पर इस वक्त पूरा बिहार प्रशांत किशोर की जीत के रंग में रंगा हुआ है. सोशल मीडिया उनकी तस्वीरों और रीलों से पटा हुआ है. पटना से लेकर दिल्ली तक हर गली, चौक-चौराहे पर लोग प्रशांत किशोर की इस जीत पर चर्चा कर रहे हैं. सब कुछ न कुछ लिख रहे हैं. मानो जैसे समूचा बिहार प्रशांत की जीत के इंतजार में बैठा था.
इस बीच बांकीपुर जीत के ऐलान के बाद अपने प्रशंसकों और समर्थकों का अभिवादन करते प्रशांत किशोर की ये तस्वीर मेरे ज़हन में अटक गई है. क्या खूबसूरत और ऐतिहासिक तस्वीर है ये!
इसको इस लिहाज से समझिए कि प्रशांत बांकीपुर उपचुनाव जीतें, ये कमोबेश सब चाह रहे थे लेकिन कोई ये आसानी से मानने को तैयार था नहीं कि बांकीपुर में प्रशांत बीजेपी को धंसा देंगे. इसलिए नहीं कि उन्हें प्रशांत की चुनावी क्षमता पर संदेह था बल्कि इसके उलट सबको बीजेपी पर इस बात का अटूट विश्वास था कि नहीं कुछ तो बीजेपी आखिर-आखिर में मतगणना में ही खेला कर देगी. मतदान के रोज पटना पुलिस और प्रशासन के रवैये को देखकर ये विश्वास और प्रबल हो गया था. जिनसे भी बात होती थी सब यही कहते थे कि प्रशांत लड़ें तो बढ़िया हैं लेकिन चुनाव जीतने से रहे !
बताइए, जिस राजनैतिक और चुनावी ढांचे के भीतर वोटों की हेराफेरी और शासन के दमन की बात कहते हुए एक आम वोटर की जुबान ऐसे अभ्यस्थ हो जाए कि जैसे अब सब सत्ता और सिस्टम के ही अधिनस्थ है, वहां बांकीपुर जैसी सीट पर बीजेपी के तीन दशकों की राजनैतिक दरबारी को अस्त करने वाले प्रशांत किशोर की ये तस्वीर ऐतिहासिक है कि नहीं?
यूं तो मैं जानता हूं कि Low Angle Shot हमेशा फ्रेम में दिख रहे Subject को Majestic लुक ही देता है. ये तस्वीर Majestic भी है और Aesthetic भी. प्रशांत की राजनीति के सफेद कुर्ते से लेकर संघर्ष के शिकन में सिकुड़ चुके उनके चेहरे पर, विजय गुलाल का निशान Majestic भी है और Aesthetic भी.