मन और बुद्धि की शुद्धता के लिए आप थोड़ी देर तक रोज शांत होकर, दुनिया का चिंतन,संकल्प विकल्प छोड़कर बैठ जाइए। जब आपको शांति से बैठने में आनंद आने लगेगा। तब मन और बुद्धि की शुद्धता अपने आप हो जाएगी। जितना - जितना शुद्ध वस्तु का चिंतन होगा, उतना उतना अशुद्ध की ओर से आपका मन हटता जाएगा.!!
श्रीराम 👏
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कलि के प्रभाव की विचित्र विडंबना को देखिये कि आज के समय में ये बड़े-बड़े पीठों पर अवस्थित महानुभाव भी अब इसके इतने प्रभाव में आ गए हैं कि इन्हें सत्ता की लोलुपता और अपने यश और कीर्ति की कामना ऐसा रूप ले चुकी है कि ये कब अपने पद की गरिमा के प्रतिकूल जा के कौन सा ऐसा कृत्य करेंगे कोई नहीं जानता।
प्राचीन समय में राजा लोग जब संत एवं गुरू चरणों को आमंत्रित करते थे तो अर्घ्य पाद्यादि का दान इत्यादि देकर उनका सम्मान एवं सेवा करते थे।एक समय ये है कि जब ये पीठाधीश ये भी भूल जाते हैं कि हम जो कर रहे हैं वा हमारे पद की गरिमा के अनुरूप होगा भी या नहीं या ये समाज के लिए कैसा संदेश देने वाला होगा।
मैंने कभी श्री अयोध्या जी के एक महापुरुष का चरित्र सुना था जिन्हें सब लोग “पण्डित जी” के नाम से जानते थे वो विरक्त संत थे पर उनकी विद्वत्ता के कारण सारा संत समाज उन्हें पण्डित जी के नाम से संबोधित करता था।उनके चरित्र में ऐसा सुनने को आता है कि एक बार उनके आश्रम से संबंधित किसी ज़मीन के विवाद के कारण उनपर केस हो गया और केस के अंतिम समय में जब न्यायाधीश को उसका निर्णय सुनाना थे तो उन्होंने कहा कि महाराज जी को कोर्ट में आकर अपनी बात कहनी पड़ेगी तब आगे का निर्णय किया जाएगा। बात को महाराज जी तक पहुँचाया गया उसके बाद जो महाराज जी ने कहा वो देखिए आप,
उन्होंने कहा कि मैं एक विरक्त भेष लिये हुए त्रिकाल संध्या करने वाला संत उस व्यक्ति के सामने जो मात्र समाज के निर्णय मात्र करता है वो मेरे सामने कुर्सी पर बैठ के मुझसे प्रश्न करता रहेगा और मैं वहाँ उस कटघरे में खड़े होके उसके प्रश्नों का उत्तर देता रहूँगा क्या ये मेरे राघवेंद्र जो कि समस्त चराचर न्यायाधीश हैं उनके प्रति मेरी निष्ठा का अपमान नहीं होगा, क्या ये मैं जिस पद पर आसीन हूँ उस पद की गरिमा का अपमान नहीं होगा। ऐसा कह कर के महाराज जी ने कहा ज़मीन जाए तो चली जाए पर मैं वहाँ नहीं जा सकता और उन्होंने सब छोड़ दिया।
नमन है मेरा उस महापुरुष की अपने इष्ट के प्रति निष्ठा को और अपने पद के प्रति उस गरिमा को 🙌
अब आप आज के इस समाज को देखिए जो संदेश तो ये देता है कि महाजनो येन गतः स पन्थाः पर क्या ये स्वयं उसका आचरण कर पा रहे हैं ?
समग्र विश्व के सबसे बड़े आध्यात्मिक महोत्सव में इन महानुभावों का ये कृत्य समाज को क्या संदेश दे रहा है?