@Willaimbihari67@manishkrsingh04 इन लोगों का बुद्धि नहीं खुलने वाला है, बिहार जैसे देहाती प्रदेश में रहने के कारण ग्रामीण भूमिहार का बुद्धि भी अर्धविकसित रह गया है, ये क्या बोलते हैं और क्या करते हैं इन्हें खुद भी पता नहीं रहता। इनका कोई deepthinking या rational world view नहीं है।
2-4% समझदार लोग रोते रहेंगे
@kshatriyaBihari Commentary tumhare upar bhi bahut hua hai.
Indian empire census 1931 (अंतिम), 1921, 1911 हर जगह बाभन (भूमिहार ब्राह्मण) लिखा हुआ है, न कि वह जो बिहार सरकार का है।
क्या बनना चाहते हैं और नहीं है उससे न मुझे मतलब है न सरकार को होना चाहिए, विरोध केवल नाम के साथ छेड़-छाड़ का है।
Finally, someone raised their voice for the GC 🚨
- This is Indian actress Trisha Chaudhary
- She posted against reservation
- She said "It's funny to talk about fair competition when there is 50% reservation"
- It really takes guts to take a stand for the general category these days
- But after receiving too many hateful messages in her DMs, she removed the story
- CJP and its bots have really taken over Instagram. They aren't even sparing celebrities
Anyways, she is the real queen. I hope more people speak up for the general category 🙏
कल जिन पुलिसवालों ने बिना नेम टैग के छात्रों पर बर्बरता से लाठियां बरसाई थीं, आज उनका सामना कन्हैया कुमार से हो गया। जब बिना नेम टैग वाले पुलिसकर्मी कन्हैया कुमार को डिटेन करने पहुंचे, तो कन्हैया ने उन्हें अच्छे से उनका कर्तव्य याद दिला दिया।
#kanhaiyakumar#rahul_gandhi
बिहार पुलिस बहुत बढ़िया काम कर रहे हो
कार्यवाही करनी है तो रुद्र प्रताप कुशवाहा पे करो और यहां पे गलत टिप्पणी प्रशांत किशोर पे की जा रही है ना कि सम्राट चौधरी पे और टिप्पणी रुद्र प्रताप कुशवाहा ने की है तो उसे गिरफ्तार करो और थोड़ी शर्म
@bihar_police@PatnaPolice24x7@samrat4bjp
धोबी का कुत्ता अथवा धोबी का कुतका?
कुछ बरसों से बार-बार अनेक लोगों द्वारा कहा जा रहा है “धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का” कहावत ठीक नहीं है, और सच्ची कहावत है “धोबी का कुतका न घर का न घाट का”। कई लोकप्रिय हिन्दीभाषी अभिनेता और पत्रकार भी डटकर यह कह चुके हैं, जिससे अनेक लोग इस बात को मानने लगे हैं।
सच यह है “धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का” ही सच्ची कहावत है। हितोपदेश में एक धोबी के कुत्ते की कथा आती है और सम्भवतः यह कहावत वहीं से आई है। सोलहवीं/सत्रहवीं शताब्दी में गोस्वामी तुलसीदास ने कवितावली में “धोबी कै सो कूकर न घर को न घाट को” ऐसा प्रयोग किया है। सत्रहवीं शताब्दी में निपट निरंजन ने अपने काव्य में “धोबी का कुत्ता रहा, घर का न घाट का” ऐसा प्रयोग किया है। “धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का” के विविध रूपों के अनेक पुस्तकों और कोशों में प्रमाण हैं।
इसके विपरीत “धोबी का कुतका न घर का न घाट का” ऐसी कहावत न किसी ऐताहिसिक साहित्यिक कृति में है और न किसी कोश में। ऐसी कहावत कभी थी ही नहीं, यह केवल सामाजिक संचार शोधशाला (Social Media Research Institute) और काहो विश्वविद्यालय (WhatsApp University) की उपज है।
यह उत्तर प्रदेश के सरयूपारीण ब्राह्मणों के बीच प्रचलित एक प्रथा है, जिसमें पुरुष अपने जनेऊ उतार; सूअर पर सवार हो कर दौड़ लगाते हैं, ये प्रथा मूलतः बलिया एवं गोरख़पूर ज़िले की है।
लोग बताते हैं की मुसलमान आक्रांताओं के ज़ुल्म से बचने के लिए इन्होंने यह प्रथा शुरू की थी।
#India
हिंदू धर्म की कैसी विडंबना है, की कुछ ब्राह्मण शूद्रों के बारे में इतना बुरा सोच रखते हैं जबकि उनकी उत्पत्ति खुद शूद्रों से हुई है।
ऐतिहासिक स्रोत बताते हैं कि कैसे कुर्मियों, अहीरों और भाटों जैसी शूद्र समझी जाने वाली जातियों को जनेऊ (यज्ञोपवीत) देकर सरयूपारीण ब्राह्मण बनाया गया