👏 कहर मोर्चा 👏
योगी ने उत्तर प्रदेश मे ग्राम प्रधान इलेक्शन ना कराकर गावों की विकास को रोक दिया है. पिछड़ा आयोग क्यों देरी से गठित किया गया. जिसके वजह से ग्राम चुनाव मे देरी हो गया. कही हार के डर के वजह से इलेक्शन को टाला तो नहीं जा रहा है. @JanataParty_Raj@ShravnKumarGaud
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में गुर्जर समाज सिर्फ एक वोट बैंक नहीं, बल्कि निर्णायक शक्ति है।
जिस दिन गुर्जर समाज अपने सम्मान और हिस्सेदारी के लिए एकजुट होकर राजनीतिक फैसला करेगा, उस दिन सत्ता के समीकरण बदल सकते हैं।
2027 सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक ताकत पहचानने का अवसर है।
एकजुट गुर्जर समाज, मजबूत नेतृत्व और सम्मानजनक भागीदारी—यही भविष्य की राजनीति की असली कुंजी है।
Reference to various media
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@PMOIndia@nitin_gadkari@HardeepSPuri@janataparty_org
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’’द ट्रोजन हॉर्स ऑफ बिहार’’
ट्रॉय शहर को दस वर्षों तक ग्रीक सेना हरा नहीं सकी। अंततः वे लकड़ी के एक घोड़े को युद्धभूमि में छोड़कर चले गए। शहरवासियों ने जीत की खुशी मनाई और उस घोड़े को शहर के भीतर लाकर चौराहे पर खड़ा कर दिया।
उन्हें क्या मालूम था कि उस घोड़े के भीतर ग्रीक सैनिक छिपे हुए हैं। रात होते ही वे बाहर निकले, शहर के द्वार खोल दिए। ग्रीक सेना भीतर आई और शहर पर कब्ज़ा कर लिया।
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सारा काम निकल जाने के बाद लकड़ी के उस घोड़े को जला दिया गया। नीतीश कुमार भी आज कुछ उसी अंतिम चरण में दिखाई देते हैं।
एक दौर में लालू, पासवान और दूसरे साथियों से राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ चुके नीतीश ने अपनी प्रासंगिकता और सत्ता बचाए रखने के लिए बिहार की राजनीति में सांप्रदायिक राजनीति को अपना चेहरा और वकार सौंप दिया।
दरअसल बिहार में उन्होंने वही काम किया, जो जेपी आंदोलन ने पूरे भारत की राजनीति में किया।
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हालाँकि जेपी आंदोलन केवल कांग्रेस विरोध नहीं था। वह भारतीय लोकतंत्र में एक नैतिक और वैचारिक हस्तक्षेप था। “संपूर्ण क्रांति” का विचार भ्रष्टाचार, केंद्रीकरण और सत्ता के दुरुपयोग के खिलाफ व्यापक राजनीतिक चेतना था।
अपने मूल स्वरूप में यह आंदोलन राजनीति को केवल सत्ता का खेल नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मानता था। लेकिन इसकी एक बुनियादी विडंबना भी थी।
इसमें समाजवादी, गांधीवादी और वामपंथी विचारधारा के साथ-साथ जनसंघ के नेता भी शामिल थे।
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गांधी हत्या के बाद जो सांप्रदायिक और नस्लवादी विचारधारा राजनीतिक रूप से अछूत और बदनाम हो चुकी थी, इस आंदोलन ने उसे मुख्यधारा की राजनीति में प्रवेश दिला दिया।
इनके बीच सहयोग और राजनीतिक लेन-देन की परंपरा स्थापित हो गई। नीतीश कुमार इसी राजनीतिक परंपरा की उपज हैं।
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1990 के दशक में बिहार की राजनीति लालू प्रसाद यादव के प्रभुत्व में थी। उनकी राजनीति सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों के सशक्तिकरण पर आधारित थी। इस प्रभुत्व को चुनौती देने के लिए एक व्यापक राजनीतिक गठबंधन की आवश्यकता थी।
पुराने समाजवादी जॉर्ज फर्नांडिस और नीतीश कुमार ने समता पार्टी के माध्यम से बीजेपी के साथ गठबंधन किया। यही गठबंधन आगे चलकर एनडीए की धुरी बना।
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नीतीश कुमार के पास समाजवादी राजनीति की वैचारिक विरासत थी और बीजेपी के पास संगठनात्मक शक्ति। यह जुगलबंदी धीरे-धीरे सफल होती गई।
2005 में नीतीश के नेतृत्व में सरकार बनी और उन्हें “सुशासन” की राजनीति का प्रतीक माना जाने लगा। सड़क निर्माण, कानून-व्यवस्था में सुधार, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण की योजनाएँ लागू की गईं।
लेकिन इसी अवधि में एक और प्रक्रिया भी चल रही थी। बीजेपी, जो बिहार में सीमांत राजनीतिक शक्ति थी, नीतीश की भागीदारी में अपनी सामाजिक और राजनीतिक पकड़ मजबूत करती चली गई।
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गठबंधन सरकारों ने उसे शासन का अनुभव, संगठनात्मक विस्तार और राजनीतिक वैधता प्रदान की। आगे के वर्षों में बार-बार बदलते गठबंधनों में भी नीतीश का लौट-लौटकर बीजेपी के पास जाना यह दिखाता है कि उनका राजनीतिक “कम्फर्ट ज़ोन” अन्य दलों की तुलना में बीजेपी के साथ अधिक रहा।
नीतीश की रणनीति थी कि वे बीजेपी के साथ गठबंधन करके भी अपनी वैचारिक पहचान बनाए रख सकते हैं। लेकिन दीर्घकालिक परिणाम अलग निकले।
बीजेपी आज राज्य की राजनीति में केंद्रीय भूमिका निभा रही है। इस प्रकार जिस राजनीतिक व्यवस्था में वह सहयोगी थी, वही व्यवस्था उसकी शक्ति विस्तार का मंच बन गई।
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इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ा नुकसान बिहार की समाजवादी राजनीति को हुआ। राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण की विचारधारा पर आधारित राजनीति कभी बिहार की मुख्यधारा हुआ करती थी।
समय के साथ वह छोटे-छोटे दलों में टूट गई। समाजवाद का स्थान चुनावी समीकरण और जातीय गठबंधनों ने ले लिया है। दूसरी ओर बीजेपी ने राष्ट्रवाद, कल्याणकारी योजनाओं और मजबूत संगठनात्मक ढाँचे के सहारे व्यापक सामाजिक गठबंधन तैयार कर लिया है।
परिणामस्वरूप बिहार की राजनीति का वैचारिक संतुलन पूरी तरह बदल चुका है।
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नीतीश की विरासत अभी पूरी तरह तय नहीं हुई है। उन्होंने बिहार को स्थिरता और कुछ सकारात्मक बदलाव भी दिए।
लेकिन तमाम सुशासन के तमगों के बावजूद इतिहास नेताओं को केवल उनके शासन से नहीं, बल्कि उनके राजनीतिक निर्णयों के दीर्घकालिक परिणामों से भी आंकता है।
इतिहास यह दर्ज करेगा कि नीतीश कुमार का सबसे बड़ा असर उनकी सरकारें नहीं थीं, बल्कि वह राजनीतिक प्रक्रिया थी जिसके माध्यम से बिहार की राजनीति धीरे-धीरे सांप्रदायिक दलदल में बदल गई।
और यदि ऐसा हुआ, तो इतिहास उन्हें उसी रूपक से याद करेगा—
बिहार का ट्रोजन हॉर्स
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सत्ता को लंबा करने की राजनीति में सांप्रदायिकता को भीतर पालते हुए नीतीश ने ऐसे सामाजिक समीकरण बो दिए हैं जिनके परिणाम लंबे समय तक दिखाई देंगे।
जब इतिहास की यह कथा पूरी होगी, तब शायद बिहार का यह ट्रोजन हॉर्स—मुंह पर समाजवाद की राख मले—
राज्यसभा की तलहटी में पड़ा दिखाई देगा।
उन्होंने मेरे जीवन से सत्तर दिन जबरन छीने और मुझे राजनीतिक जेल यात्रा करनी पड़ी।
उनके पास पुलिस थी
उनके पास जेल भी थी
उनके पास मीडिया का भोंपू भी था जो उनके कहे अनुसार कहानियां सुना रहा था
लेकिन उनके पास सत्य नहीं था, वो अपने लगाए गए तमाम भारी भरकम आरोपों में से सत्तर ग्राम सच्चाई भी पेश नहीं कर पाए!!
उनकी मंशा थी जैसे तैसे करके इस बंदे का नामांकन खारिज कराओ और इसको जेल भेज दो ताकि हमारा बंदा निर्विरोध राज्यसभा पहुंच जाए!
वो अपने मिशन में उस समय कामयाब हुए।
Note ---
लेकिन अब मैं लौट आया हूं, अपने सत्तर दिनों का हिसाब मांगने जो उन्हें अब देना होगा!!
कल चंडीगढ़ हाईकोर्ट ने मेरी इलेक्शन पिटिशन याचिका को स्वीकार करते हुए नोटिस जारी करने का हुक्म दिया है।
उन्होंने मुझ पर क्रिमिनल FIRs फ्रॉड धोखाधड़ी के आरोपों के साथ दर्ज कराई थी,, बदले में राज्यसभा चुनाव को रद्द घोषित किए जाने की मांग के साथ नवनीत चतुर्वेदी हाईकोर्ट जा पहुंचे है।
#नवनीत_चतुर्वेदी
#Punjab #Rajyasabha #RajyaSabhaElection
#NavneetChaturvedi
पंजाब राज्यसभा चुनाव को null and void घोषित किया जाए यह चुनावी याचिका पंजाब से राज्यसभा चुनाव प्रत्याशी नवनीत चतुर्वेदी ने पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट में EP -2/2025 दाखिल की है,जहां पिछली सोलह जनवरी को जस्टिस संजय वशिष्ठ ने इस याचिका को सुनवाई के योग्य पाया, कुछ टेक्निकल डिफेक्ट रिमूवल के बाद इस याचिका पर अगली सुनवाई छ फरवरी को हुई जहां हाईकोर्ट ने नवनीत चतुर्वेदी को सुनते हुए इस याचिका को स्वीकार किया और ट्राइडेंट ग्रुप के राजिंदर गुप्ता जो आम आदमी पार्टी से राज्यसभा के लिए निर्विरोध जीते उन्हें नोटिस जारी करने का आदेश हुआ है, अगली तारीख 13 मार्च को राजिंदर गुप्ता अपना जवाब पेश करेंगे।
क्या होती है चुनाव याचिका --Representation of people act 1951
Under section
100(1)(c)-- improper rejection of nomination that itself says if it happens entire election will be null and void
Under section 123(2) --use of corrupt practices and undue pressure
Under section 36(5)- not given opportunity to remove the objections/defects
नवनीत चतुर्वेदी ने हाईकोर्ट को बताया कि स्क्रुटनी से एक दिन पहले विधानसभा से उनका नामांकन फॉर्म लीक किया गया और पंजाब सरकार को यह पता चला कि किस किस विधायक ने उन्हें समर्थन दिया है, बाद में उसी शाम स्क्रुटनी से पहले तीन घंटे में उनके खिलाफ कई FIR दर्ज हुई, उन FIR में दो वह भी शामिल है जिन विधायकों का नाम और हस्ताक्षर भी उनके नामांकन में दर्ज नहीं था उनसे भी मुकदमा दर्ज करवाया गया।
स्क्रुटनी से पहले पंजाब सरकार को विधानसभा और चुनाव आयोग के जूरिडिक्शन से बाहर जाते हुए पंजाब के अलग अलग शहरों में मुकदमा दर्ज करने का कोई अधिकार नहीं था ,यह सब करते हुए पंजाब सरकार ने एक माहौल बनाया ताकि अगले दिन सुबह स्क्रुटनी के वक्त नामांकन खारिज किया जा सके, ताकि उनका कैंडिडेट निर्विरोध जीत सके। ये सेक्शन 123(2) corrupt practice and undue interference or pressure की श्रेणी में आता है।
विधानसभा सचिव जो कि रिटर्निंग अधिकारी भी थे उन्हें मुझे section 36(5) के तहत इस विवाद की स्थिति में 24-48 घंटे का नोटिस देना चाहिए था ताकि मैं अपने पक्ष में एविडेंस प्रस्तुत करता कि हस्ताक्षर जेनुइन है!! लेकिन सिर्फ सरकार के दबाव और मीडिया narrative जो इन बोगस FIR के माध्यम से बनाए गए,उस आधार पर नामांकन खारिज किया गया, और राजिंदर गुप्ता निर्विरोध जीते। लेकिन मेरा नामांकन बहुत ही जल्दी में दस मिनट के अंदर खारिज किया गया और मुझे आज तक नामांकन रिजेक्शन का ऑफिशियल कॉपी भी नहीं दी गई है।
पूरे प्रकरण में अल्टीमेट बेनिफिशरी राजिंदर गुप्ता है अतः section 82 RP act के तहत Respondent सिर्फ winner candidate ही बन सकता है।
रिटर्निंग अधिकारी ने सिर्फ विधायकों के मौखिक लिखित बयान के आधार पर और उपरोक्त FIRs को आधार मानते हुए मेरा नामांकन रद्द किया, जबकि उनके पास कोई साइंटिफिक आधार नहीं था कि हस्ताक्षर जेनुइन है या नहीं, मैने 70 दिन जेल में निकाले इसके बाद भी अभी तक यह तय नहीं है कि साइन असली थे या नहीं तो रिटर्निंग अधिकारी ने कैसे मात्र दस मिनट में तय कर लिया कि साइन फर्जी थे!! यह कैसे improper summary inquiry under section 36(2) बनता है। इस स्थिति में मुझे 24-48 घंटे का समय देना चाहिए था जो कि नहीं दिया गया।
Section 100(1)(c) के अंतर्गत मै इस चुनाव को रद्द करने की मांग करता हूं क्योंकि मेरा नामांकन रद्द गलत तरीके से हुआ है, यदि कोई नामांकन अवैध तरह से नियमों का उल्लंघन करते हुए रद्द किया जाता है तो पूरा चुनाव null and void घोषित होगा और fresh election किया जाना चाहिए।
Note --
पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट में चुनाव याचिकाएं बड़ी दुर्लभ होती है, मुश्किल से साल में सिर्फ एक या दो इतनी ही लगती है, इस इलेक्शन पिटिशन को दाखिल करने में 45 दिन की समय अवधि होती है , मै जेल में था भला कैसे दाखिल कर सकता था, इसमें याचिकाकर्ता को निजी तौर पर उपस्थित होना पड़ता है यह याचिका सिर्फ वकील अपने से नहीं लगा सकता, रजिस्ट्रार के सामने petitioner को उपस्थित होना पड़ता है।
इस केस में मेरी अर्जी पर विशेष सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने यह दलील स्वीकार किया कि याचिकाकर्ता जेल में है अतः वो निजी तौर पर उपस्थित नहीं हो सकता, अतः न्याय के प्राकृतिक सिद्धांत के तहत उसको मौका मिलना चाहिए फिलहाल यह याचिका वकील के माध्यम से पेश है जब मैं बाहर आऊंगा जेल से तब ये तमाम प्रोसीजरल डिफेक्ट रिमूवल कर दूंगा।
माननीय उच्च न्यायालय ने यह दलील स्वीकार करते हुए नवनीत चतुर्वेदी को मौका दिया कि वो अपनी लड़ाई लड़े।
#NavneetChaturvedi
#Punjab #Rajyasabha #Election #Highcourt
कल रोपड़ (पंजाब ) में एडवोकेट लखबीर सिंह जी से मिलना हुआ, दूसरी तस्वीरो में आप इन्हें अखिलेश यादव और राहुल गांधी के साथ भी देख सकते है।
लखबीर जी मान्यवर कांशीराम जी के भांजे है, इनकी माताजी श्रीमति स्वर्ण कौर कांशीराम जी की बहन है।
कांशीराम जी संस्थापक बहुजन समाज पार्टी का मूल पैतृक गाँव ख्वासपुरा पंजाब के रोपड़ जिले में है , लखबीर जी कांशीराम चैरिटेबल फाउंडेशन के सचिव है।
नीले झंडे और हाथी चुनाव चिह्न वाली बहुजन समाज पार्टी अब बहन मायावती की प्राइवेट मलकियत बन चुकी है, कांशीराम जी और उनके परिवार का अब यहाँ कोई स्थान शेष नहीं है।
लेकिन कांशीराम जी का नाम और लीगेसी इतनी बड़ी है कि आज भी लखबीर जी का नाम आने पर अखिलेश यादव और राहुल गांधी जैसे बड़े नेता इनके आगे सहजता से उपलब्ध हो जाते है।
note—
आगामी राज्यसभा चुनावों के मद्देनजर मैं यह अपील करूँगा कि भाई लखबीर सिंह को कांग्रेस पार्टी हरियाणा या हिमाचल या अन्य किसी भी राज्य से मनोनीत करे और यदि उन्हें वास्तव में दलित हितों की चिंता है और दलित वोट बैंक पर नज़र है तो कांग्रेस को मायावती की काट ढूँढनी ही पड़ेगी , इससे अच्छा मौक़ा नहीं मिलेगा कि भाई लखबीर सिंह को राज्यसभा में भेजा जाये। लखबीर सिंह जी दूसरे बड़े नेताओं जैसे कांग्रेस को सौ पचास करोड़ तो नहीं दे सकते क्यूंकि बड़े साधारण आदमी है ये , लेकिन एक नैरेटिव जरूर कांग्रेस स्थापित कर सकती है
दलितों में खास जाटव समाज का जो वोट एकमुश्त हाथी अर्थात बसपा को मिलता है और बसपा वोट कटुआ बन कर भाजपा के लिए रास्ता साफ़ कर देती है , यदि कांग्रेस वास्तव में कुछ करना ही चाहती है तो उसको बसपा का रास्ता रोकना होगा और बसपा में मायावती से बड़ा ब्रांड कांशीराम जी है उनकी लीगेसी को आगे यदि बढ़ाया जाये तो जनता को भी लगेगा दलित समाज में भी यह संदेश जाएगा कि कांग्रेस ने बजाय बड़े नेताओं धनपशुओ को छोड़ कर वास्तव में दलित समाज को आगे बढ़ाने का काम किया है।
भाई लखबीर सिंह जी का नाम मैं प्रस्तावित करता हूँ
पंजाब में दलित वोट सबसे ज़्यादा है, उसके बाद यूपी में है और तक़रीबन सभी राज्यो में है।
बहन जी की छवि भाजपा की बी टीम वाली स्थापित हो चुकी है , दलितों को नया नेतृत्व देने की जिम्मेदारी मुख्य विपक्षी दल की है यदि उसने सत्ता में आना है तो !!
#नवनीत_चतुर्वेदी
#DalitRights #rajyasabha #BSP #KanshiRam #Punjab #NavneetChaturvedi
Sir
@JM_Scindia
Many of loyal customers of
@BSNLCorporate are
closing their Sims due to
Penal recharge.
Sir please plan a sim active tarrif
For long term loyal customers.
Even with small talktime / no data.
@PMOIndia@HMOIndia@BJP4India
सही बात ,
वैसे अब समय आ गया है कि पुरे देश के लिए एक जाति वर्गीकरण हो, जातियों की एक राष्ट्रीय सुची जो कि पुरे देश में मान्य हो, यह जातिगत जनगणना से पहले हो सके तो बेहतर है ।
एक सुची सवर्ण जातियों की भी जारी हो।
@PMOIndia@HMOIndia@janataparty_org
आदरणीय @DmBhilwara
आज से शीत लहर बढे हुए प्रकोप को देखते
हुए पाँचवीं कक्षा तक बच्चों का शीतकालीन
अवकाश सात दिनों के लिये बढाने का
आदेश पारित करें ।
🙏🏻🙏🏻🙏🏻