गालिब है हवालात में, प्रेमचंद के साथ में
मुंह में कपड़ा ठूसा हुआ है, हथकड़ियां हैं हाथ में।
शायर-लेखक जब बिकने लगे, सब छोड़ कसीदे लिखने लगे,
ये दोनों बेहूदा हुए, बाकी लोगों से जुदा हुए।
- गौरव त्रिपाठी
[अभिव्यक्ति की आज़ादी और हिंदी] @gaathiwrites
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'...जो भी नौजवान हैं मैं उनसे यही कहना चाहता हूं कि आप बेशक मिली जुली भाषा में लिखें पर अगर आप कह रहे हैं कि आप हिंदी में लिख रहे हैं तो हिंदी के शब्द भण्डार को बढ़ा लीजिए इससे आपका ही फायदा है।
- @pratapsomvanshi
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'हिंदुस्तान का साहित्य कोई सनसनीखेज़ साहित्य नहीं है बल्कि एक ऐसा साहित्य है जो गंभीर मसलो/ गंभीर मुद्दों से उपजा है...' - मनोज झा
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बचपन में मैं भाई-बहन की पुरानी किताबे पढ़ना पसंद नहीं करता था क्योंकि मुझे नई किताबो की खुशबु उतनी ही पसंद है जितनी उन किताबो के अंदर छपे शब्द :)
- मनोज झा
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जो भूमि देवताओं की परम पावन विरासत है,
जहां सत्यम शिवम सुंदरम और हर क्षण मुहूर्त है,
धर्म-कर्म, संस्कृति, सभ्यता व काव्य का मंदिर,
हमें जिस पर है गर्व वो भारत है।
[कविशाला संवाद 2021: मोहब्बत, हिन्दी और शायरी]
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'मैं व्यस्त हूँ परन्तु अस्त-व्यस्त नहीं - जितेंद्र कुमार सोनी'
[कविशाला संवाद 2021: हिंदी और भारतीय प्रशासनिक सेवा]
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@kavishala@manojkjhadu@KavishalaSamvad यह बात बहुत सोचने वाली है कि किसी भी सोच का मूल,( चाहे वह किसी भी क्षेत्र से संबंधित हो, जिसमें आपने न्यूटनऔर जेम्स वॉट की बात की) अपनी भाषा ही होती है , ये सत्य हम "सब"को समझना चाहिए कि हम अपनी (जिसकी जो भी हो) भाषा से कट न जाएं वरना हमारा सोच भी सीमित होने की आशंका बढ़ सकती है।
हिंदी पखवाड़ा | कविशाला संवाद: 'भाषा विमर्श'
कविशाला संवाद में राज्यसभा सदस्य मनोज झा के साथ वार्तालाप!
आज: 28 सितम्बर 2021, मंगलवार - सायं 7:00 बजे
कविशाला ट्विटर, फेसबुक, वेबसाइट और यूट्यूब पर सीधा प्रसारण!
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