*बाड़मेर में इंसाफ की गुहार।*
दलित परिवार से ताल्लुक रखने वाले स्व. श्री जैसाराम जी मेघवाल की मौत के बाद उनके परिजन बाड़मेर अस्पताल की मोर्चरी के बाहर न्याय मांगते हुए आंदोलित हैं।
@RajCMO से आग्रह है कि सरकार इस संवेदनशील मामले को गंभीरता से ले और पीड़ित परिवार के साथ त्वरित न्यायोचित कार्रवाई सुनिश्चित करे।
*न्याय मिलना चाहिए, चुप्पी नहीं चलेगी।*
@BhajanlalBjp@RajGovOfficial@PoliceRajasthan
DNT जनजातियों के आरक्षण को लेकर सरकार को अल्टीमेटम, 26 जून को जयपुर में होगा महापड़ाव 🔥
लोक सुराज के तत्वाधान में DNT समाज ने सरकार को दिया चेतावनी, आरक्षण नहीं दिया तो उग्र आंदोलन होगा।
#हक_चाहिए_आरक्षण_चाहिए_बराबरी_चाहिए#LokSuraaj#rajasthan
11 फरवरी को जयपुर चलो, DNT आरक्षण का सपना पूरा करो! 🔥
DNT समाज के लिए 10% आरक्षण की मांग को लेकर विधानसभा घेराव में शामिल हों।
हमारा हक, हमारा अधिकार, DNT आरक्षण अबकी बार!
#DNT#Rajasthan
विमुक्त, घुमंतु और अर्ध घुमंतु जनजातियों की दर्दनाक कहानी!
देश की 10% जनसंख्या, लेकिन संविधान में आरक्षण से अलग क्यों?
आजादी के 75 साल बाद भी क्यों नहीं टूटी सरकारों की कुंभ करनी नींद?
क्या ये समुदाय देश के नागरिक नहीं हैं? 🤝
क्या ये समुदाय विकास के हकदार नहीं हैं? 📈
11 फरवरी 2026 को जयपुर चलो, विधानसभा का घेराव करो! 🚨
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*आरक्षण नहीं तो वोट नहीं: आगामी नगर निकाय और पंचायत चुनाव का करेंगे बहिष्कार - गोपाल केसावत*
विमुक्त, घुमंतु एवं अर्ध घुमंतु (DNT) समुदाय की बदहाली को लेकर एक प्रेस वार्ता का आयोजन किया जा रहा है। प्रेस वार्ता में DNT समुदाय के प्रतिनिधि अपनी समस्याओं और मांगों को मीडिया के सामने रखी ।
भारत के विमुक्त, घुमंतु एवं अर्ध घुमंतु (DNT) आदिम समुदाय का गौरवशाली इतिहास और संस्कृति रही है। अपनी बहादुरी और लड़ाका प्रवृत्ति के कारण ये समुदाय औपनिवेशिक ब्रिटिश सत्ता से सीधे- सीधे टकराये थे। इसलिए इन्हें ब्रिटिश सत्ता ने 1871 में क्रमिनल ट्राइब्स एक्ट (जरायम पेशा कानून) के तहत ‘जन्मजात अपराधी’ घोषित कर दिया था। भारत की स्वतंत्रता के पांच साल बाद इन समुदायों को 31 अगस्त सन 1952 के दिन विमुक्त (de-notified) किया गया।
रेनके आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 1871 के क्रमिनल ट्राइब्स एक्ट में अंग्रेजों ने 198 आदिम समुदायों को ‘जरायमपेशा’ घोषित किया था। तब से अब तक टूटते- बिखरते हुए ये समुदाय 1200 से अधिक हो गए हैं, जिनकी आबादी भारत की लगभग 10 फीसदी है। इनमें राजस्थान में करीब 32 समुदाय हैं। देश में कुल 1262 जनजातियां आज भी आरक्षण से वंचित है।
पुश्तैनी काम-धंधों की विविधतता के अलावा इन सभी समुदायों का इतिहास और संस्कृति हज़ारों सालों से कमोबेश समान रहा है। विदेशी शासन द्वारा थोपे गए जरायमपेशा कानून की वज़ह से वह जीवन शैली तहस नहस कर दी गई है।
ब्रिटिश राज के साथ यह सब चौपट हो गया। पशुपालन, ढोलक- बांसुरी, खिलौने, मूर्तियाँ, टोकरियाँ, बाँस का फर्नीचर आदि बनाने एवं नृत्य, संगीत जैसे पुश्तैनी धंधों पर दूसरे लोगों ने कब्ज़ा करना आरंभ कर दिया है। नटकला, कठपुतली नचाना, भांड, बहुरुपिया, मदारी, सपेरागिरी, जादूगरी, जड़ीबूटी, सींगी पद्यति से खून की सफाई वगैरा का अब ज़माना ही नहीं रहा है।
मजबूर होकर ये लोग कूड़ा बीनने, बाल मजदूरी, भिक्षावृत्ति और ज़िस्मफरोशी के दलदल में फँसते जा रहे हैं। घूमंतू एवं अस्थायी डेराबंद जीवनशैली के कारण इनकी शिक्षा का कोई प्रबंध नहीं होता। प्रसव क्रिया अभी भी परंपरागत दाईयों पर निर्भर है। बिजली, पानी, स्वास्थ्य, वृद्ध पेंशन, बच्चों को आंगनवाड़ी जैसी सुविधा नहीं मिलती। कथित स्वच्छ भारत के मिशन दूर की बात है। यहां तक कि अंतिम संस्कार की जगह न होने के कारण ये लोग मृत देह को लेकर 3-3 दिन इधर से उधर भटकते रहते हैं। केरल को छोड़कर एक भी ऐसा राज्य नहीं है जहां इनको श्मशान भूमि दी गई हो।
इनके पास न जीने के लिए कोई ठिकाना और न ही मरने के बाद कोई ठौर है। विडम्बना यह है कि आजाद भारत में प्रशासन, विशेषकर पुलिस प्रशासन और तथाकथित सभ्य समाज द्वारा उनके साथ आज भी जन्मजात अपराधियों जैसा सलूक किया जाता है।
इन समुदायों की बदहाली को ठीक करने के उद्देश्य से अब तक छ: आयोग गठित किये जा चुके हैं। किंतु कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकले हैं। रैनके आयोग की रिपोर्ट (2008) तथा इदाते आयोग की रिपोर्ट (2018) को संसद के पटल पर भी नहीं रखा गया है। सन 2019 में इन समुदायों के उत्थान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर बोर्ड का गठन भी कर दिया गया है। इससे पूर्व 2013 में राजस्थान में घुमंतु जाति कल्याण बोर्ड का गठन भी किया गया था। किंतु सारे प्रयास कागजी साबित हुए हैं।
सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इन समुदायों में से अधिकांश का कोई स्थायी ठिकाना नहीं है। इसलिए इन्हें आधार कार्ड, बी.पी.एल कार्ड, राशन कार्ड, जाति प्रमाण पत्र, वोटर कार्ड जैसे दस्तावेज़ बनाने में कई बाधाओं का सामना करना होता है। इस वज़ह से इन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलता।
इन सारी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विमुक्त, घुमंतु एवं अर्ध घुमंतु (DNT) समुदाय एकजुटता से सरकार के सामने खड़ा होकर सवाल करता है कि क्या वह हमें भारत का नागरिक मानती है? क्या वह एक नागरिक के रूप में हमारी मानवीय गरिमा को स्थापित करना चाहती है? और क्या वह हमें मुख्यधारा के समाज की तरक्की का हिस्सेदार बनाना चाहती है?
आज जयपुर स्थित पिंक सिटी प्रेस क्लब में गोपाल केसावत पूर्व मंत्री राष्ट्रीय संस्थापक अध्यक्ष लोक सुराज रेनके और आरते आयोग की रिपोर्ट को लागू करवाने एवं विमुक्त घुमंतु अर्ध घुमंतू जनजातियों को 10% अलग से आरक्षण देने के मुद्दे को लेकर 21 सूत्री मांगों को लेकर प्रेस वार्ता का आयोजित कर प्रेस मीडिया को संबोधित किया और आगामी 11 फरवरी 2026 शहीद स्मारक जयपुर में विधानसभा का घेराव करने का आव्हान किया मीडिया को संबोधित करते हुए गोपाल केसावत ने बताया सरकार ने अगर हमारे आरक्षण की मांग को स्वीकार नहीं किया तो आगामी नगर निकाय एवं पंचायत चुनाव का बहिष्कार किया जाएगा।
@BhajanlalBjp@gopalkesawat@RajCMO@Viveksbarmeri@Zinda_Avdhesh
#Jaipur: विमुक्त, घुमंतु एवं अर्ध घुमंतु समुदाय की मांगों को लेकर घेराव
21 सूत्री मांगों को लेकर 11 फरवरी को विधानसभा का होगा घेराव, लोक सुराज के संस्थापक गोपाल केसावत ने कहा....
#RajasthanWithFirstIndia@dineshdangi84
केंद्रीय बजट 2026: निराशा और अधूरी उम्मीदें
केंद्रीय बजट 2026 ने आम जनता, खासकर युवाओं को एक बार फिर निराश किया है। वित्त मंत्री की घोषणाएं भले ही आकर्षक हों, लेकिन स्पष्ट रोडमैप के अभाव में यह समझ पाना मुश्किल है कि युवाओं के लिए रोजगार के अवसर कितने और किस स्तर पर उपलब्ध होंगे।
रोजगार: कागज़ों की घोषणाएं या वास्तविकता?
सरकार की पिछली रोजगार संबंधी घोषणाओं की समीक्षा आज तक पारदर्शी रूप से सामने नहीं लाई गई है। कितने रोजगार सृजित हुए और कितने कागज़ों में ही सीमित रह गए—ऐसे में underemployment की समस्या के बीच युवा अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं।
महंगाई: आम आदमी की परेशानी बढ़ी
आम आदमी पहले से ही महंगाई से परेशान है—फिर भी महंगाई नियंत्रण के लिए कोई सशक्त और ठोस उपाय इस बजट में दिखाई नहीं देते। महिलाओं के आर्थिक स्वावलंबन को लेकर योजनाओं का अभाव साफ दिखाई देता है।
किसानी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था: उपेक्षित और अनदेखा
खेती-किसानी के लिए भी अपेक्षित प्राथमिकता नहीं दी गई है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने के दावे किए जाते हैं, परंतु सरकार की उदासीनता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
राज्यों की उपेक्षा: राजस्थान और छत्तीसगढ़ का दर्द
राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों, जहाँ भाजपा की सरकारें हैं, वहाँ भी नई बड़ी परियोजनाओं की घोषणाओं का अभाव निराशाजनक है और जनता के साथ धोखे जैसा प्रतीत होता है।
बजट: चुनावी या वास्तविकता?
यह एक चुनावी बजट है—वास्तविकता में संतुलित विकास की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया और यह आने वाले दिनों में केवल चुनावी घोषणाओं तक सीमित रह गया है। केंद्र का बजट पुरानी बोतल में नई शराब पड़ोसन जैसा है—ऊंट के मुंह में जीरा बजट है—युवाओं को निराश, मध्यम वर्ग को झुनझुना में थमा दिया।
#Budget2026