नेहरू ने नेपाली पीएम_गिरिजाप्रसाद_कोइराला की 1951 में नेपाल को भारत में मिलाने की पेशकश को क्यों ठुकरा दिया?
व्हाट्सएप_यूनिवर्सिटी के ग्रेजुएट्स द्वारा नेहरु जी पर अक्सर कई बेसिर पैर के इलज़ाम लगते आये हैं,पहले सभी इसे इग्नोर कर देते थे, किन्तु विगत वर्षो में इस यूनिवर्सिटी के विद्वानों द्वारा अति होने पर हम जैसे कई लोगों ने इनको पकड़ पकड़ कर सच्चाई बतानी शुरू की है, वैसे उससे कोई फर्क तो पड़ता नहीं इन्हें क्युकी गुरू दक्षिणा में इन्होने अपना जो भी २-४ ग्राम दिमाग था , वह यूनिवर्सिटी के संस्थापकों के चरणों में अर्पित कर दिया है.
आइये एक और झूठ के बारे में बात करें.
◆ये कहते हैं कि नेहरु जी ने १९५१ में नेपाल के भारत में विलय की मांग को ठुकरा दिया था!
◆बीपी कोइराला नेपाल के पहले लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री थे।
उन्होंने उस समय के कई नेपाली राजनीतिक नेताओं (जो अधिनायकवादी राणा परिवार के शासन के खिलाफ लड़ रहे थे) के साथ, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया और व्यक्तिगत रूप से नेहरू, गांधी और उस समय के कई अन्य भारतीय नेताओं के साथ मित्रता रखते थे।
संघियों को शायद जानते भी नहीं होंगे
◆उनकी पार्टी (नेपाली कांग्रेस) द्वारा देश का पहला आम चुनाव जीतने के बाद वे 1959 में प्रधान मंत्री बने। लेकिन उन्हें राजा महेंद्र (त्रिभुवन के बेटे और उत्तराधिकारी) द्वारा निर्वाचित होने के दो साल बाद सेना के तख्तापलट में पद से हटा दिया गया था।
◆जेल से छूटने के बाद, उन्होंने इस जीवन का अधिकांश समय भारत में निर्वासन में गुजारा और वहाँ से लोकतंत्र के लिए संघर्ष का नेतृत्व किया।
◆बीपी कोइराला ने कभी नेपाल को भारत में विलय की पेशकश नहीं की।
यह काम नेपाल के राजा त्रिभुवन का था, जिसने (नई दिल्ली में नेहरू द्वारा उनके सम्मान में आयोजित एक पार्टी में) नशे में नेहरूजी को कहा आओ हमें भी जीत लो या मिला लो (भयभीत था )।
◆नेहरू ने बस इसे हंसी में उड़ा दिया और फिर कभी इस विषय का उल्लेख नहीं किया। होश में आने के बाद राजा ने कभी इस बारे में कहा ही नहीं ।
◆गिरिजा प्रसाद कोईराला (या जीपी कोइराला) 1951 में सिर्फ 26 साल के थे और उस समय नेपाली कांग्रेस के मध्य स्तर के नेता थे। इसलिए, उन्होंने नेहरू को नेपाल की पेशकश नहीं की
◆बीपी कोइराला 1959 में प्रधान मंत्री चुने गए और 1961 में एक सेना तख्तापलट में राजा महेंद्र द्वारा निष्कासित कर दिए गए
◆1951 में वह वंशानुगत राणा प्रधानमंत्री मोहन शमशेर जेबी राणा के नेतृत्व वाली सरकार में सिर्फ 9 महीने के लिए गृह मंत्री थे।
◆104 साल पुराने राणा परिवार के शासन का अंत हो गया था और राजा की शाही कार्यकारी शक्ति को बहाल कर दिया गया था, जिसका श्रेय काफी हद तक नेहरू को जाता है।
◆नेपाल भारत की किसी रियासत या किसी प्रकार की जागीर नहीं था। भारत या नेहरू का कोई दावा नहीं था। इसके अलावा अंग्रेज चाहते थे कि नेपाल एंग्लो-नेपाल युद्ध में हारी हुई जमीने भारत से मांग ले, जो वहाँ के शासक ने नेहरु पटेल के भय से कभी नहीं किया.
◆ 1816 में एंग्लो नेपाल युद्ध में गढवाल , कुमाऊँ और दार्जिलिंग अंग्रेज़ो ने नेपाल से जीतकर भारत मे मिलाया था। आज़ादी के बाद प्रधानमंत्री नेहरू और गृहमंत्री पटेल से मांगने की हिम्मत नहीं की नेपाल ने।
◆इसके अलावा,यदि नेहरू नेपाल को लेना चाहते तो , वे आसानी से ऐसा कर सकते थे। उसे बस इतना करना था कि भारतीय सेना को नेपाल में भेज दिया जाता और नेपाल को बिना किसी लड़ाई या न्यूनतम प्रतिरोध के मिला दिया जाता।
जैसा इंदिरा गांधी ने सिक्किम में कर दिखाया था, तुम लोग तो ३७० के एक अनुच्छेद को हटा कर कश्मीर को भारत में विलय करवा दिया ये ढिंढोरा पिटते रहो
#VijayShukla
1896 में कलकत्ता में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। इस अधिवेशन की अध्यक्षता रहीमतुल्लाह सयानी ने की थी। रहीमतुल्लाह सयानी की अध्यक्षता वाले इस अधिवेशन में ही पहली बार वंदे मातरम् गाया गया था।
बाद में रेडियो के दौर में इनके पोते की वो कालजयी आवाज ("भाइयों-बहनों, मैं हूं आपका प्यारा दोस्त अमीन सयानी") आजाद भारत की सबसे लोकप्रिय आवाज बन गई थी।
इसलिए जो अज्ञानी और कुपढ़ लोग वंदे मातरम् को लेकर एक वर्ग विशेष के खिलाफ नैरेटिव सेट करते रहे हैं वे अपना इतिहास ज्ञान दुरुस्त कर लें।
@girirajsinghbjp दादा आ जाओ किसी दलित बस्ती में और दलित के साथ बैठ कर भोजन कर लो तो मान जाएंगे कि आप असली वाले सनातनी हो। मेरी तरफ से आपको चंपारण कि हांडी मटन फ्री।
@SanjayJhaBihar झा जी आप को तो शर्म आनी चाहिए। यह बात बताइएगा किसी महादलित के यहां बिहार में पण्डित जी कोई पूजा पाठ कराने क्यों नही जाते है। और किसी पैसे वाले दलित के यहां जाते भी है तो भोजन नहीं करते क्या जवाब है आपके पास?
@Ashok_Kashmir यह आदमी आज सांसद लालू जी के पुत्र के कारण बना हुआ है जब चुनाव से पहले फ्लाइट में मुलाकात हुई थी दोनों की उसी दिन तय हो गया। बिहार मे तेजस्वी यादव कभी अखिलेश यादव नहीं हो सकते हैं। और जो लोग पिछड़ा वर्ग और सेकुलरिज्म के नाम पर राजद को सपोर्ट करते हैं उन्हें मुंह की खानी होगी।
@MediaHarshVT@IGuruPrakash@RahulGandhi त्रिपाठी जी आप पर तरस आता है। आप घर पे लोगो को क्या कहते होंगे की आज बीजेपी के लिए इतना झूठ बोला और आमदनी 100 रुपए की हुई।
@girirajsinghbjp सावन खत्म है तो चले मटन चावल खाने दादा।
कभी तो आदमी की तरह जीवन जियो वैसे नेहरू जी आपको याद किए हैं और एडवीना वाली फोटो लेके बुलाए है।
प्रिय @RahulGandhi जी ,
आज हम जिस कुरुक्षेत्र में खड़े हैं उस कुरुक्षेत्र के आप अर्जुन हैं, जिसके रथ की बागडोर श्रीकृष्ण के हाथ में होनी चाहिए, लेकिन आज आपके रथ के चारों ओर अनेक शल्य दिखाई देते हैं, ऐसे शल्य, जो सारथी होने का भ्रम पैदा करते हैं, पर जिनकी दिशा आपके रथ को विजय की ओर नहीं, संशय और आत्ममुग्धता की ओर ले जाती है।
महाभारत में शल्य कौरवों की ओर से कर्ण का सारथी बना था। वह स्वयं महारथी था, किंतु सारथी बनकर उसने कर्ण का मनोबल तोड़ने को ही अपना सबसे बड़ा अस्त्र बना लिया। युद्धभूमि में वह बार-बार अर्जुन की प्रशंसा करता और कर्ण को उसकी सीमाओं का बोध कराता रहा। कर्ण के हाथों में धनुष था, लेकिन उसके मन में संशय बोया जा रहा था। अंततः जिस क्षण उसका रथ धरती में धँसा, युद्ध का निर्णायक क्षण सामने था।
लेकिन, याद रखिये राहुल, आप कर्ण नहीं हैं। आप अर्जुन हैं।
और अर्जुन होने का अर्थ केवल गांडीव उठाना भर नहीं है। अर्जुन होने का अर्थ है, युद्धभूमि के बीच खड़े होकर यह पहचानना कि शत्रु आपका सबसे बड़ा संकट नहीं है , सबसे बड़ा अवरोध विरोधी नहीं, वह आवाज है जो आपके योद्धा को लगातार कमजोर कर रही है।
आज आप जिस कुरुक्षेत्र में खड़े हैं आपके सामने प्रश्न मुँह बाए खड़ा है कि
क्या आप अपने रथ की दिशा स्वयं पहचानेंगे?
क्या आप अपने बाण को स्वयं लक्ष्य तक ले जा पायेंगे?
क्या आपको रथियों की जरूरत नहीं पड़ेगी जो लक्ष्यों को साध सकें ?
इसलिए राहुल आजके कुरुक्षेत्र में , नई राजनीति है, नई महाभारत है और नए शल्य हैं। कुछ बाहर से आए हुए हैं, कुछ आपके अपने शिविर में बैठे हैं। इस कुरुक्षेत्र में आपका प्रतिपक्ष सिर्फ विरोधी दल नहीं है। आपका सामना आपके अपने शाल्यों से भी है, जो आत्ममुग्धता से इतने लबरेज हैं कि उन्हें नैतिकता से बढती दूरी का अंदाजा नहीं लग पा रहा है और जिसका परिणाम यह है कि जनता से उनका संवाद लगातार टूट रहा है । जो यह जान नहीं पा रहे हैं कि वो बारात के घोड़े बनते जा रहे हैं और गौरतलब रहे कि बारात के घोड़ों से युद्ध नहीं लड़े जाते। इनका लक्ष्य एक ही है आपको आपके वास्तविक लक्ष्य से भटका देना, आपके बाण को लक्ष्य तक न पहुँचने देना ।
यही वह क्षण है जब आपको कृष्ण और शल्य में अंतर करना होगा।
जैसा कि कृष्ण कहते हैं “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
इस कुरुक्षेत्र में विजय पाने के लिए सबसे जरूरी है कि बाण को लक्ष्य तक पहुँचाने की क्षमता बलवान हो ।
इसलिए अपने रथ की क्षमता पहचानिए।
इसलिए अब आपको केवल रथ का सारथी ही नहीं, रथ की संरचना भी बदलनी होगी।
आपको अपने संगठन को उठाना है।
अपने नेताओं से कहिए कि वे अपने कुर्तों पर सलवटें लेकर लौटें।
जिस नेता के कुर्ते पर गाँव की धूल नहीं है, जिसकी चप्पल ने खेत की मेड़ नहीं देखी, जिसने मजदूर के घर की चौखट पर बैठकर चाय नहीं पी, जिसने किसान की फसल का हाल नहीं पूछा, जिसने दलित बस्ती में रात नहीं बिताई, जिसने बेरोजगार युवक की आँखों में झाँककर उसका भविष्य नहीं पूछा वह अपने क्षेत्र की राजनीति की रपट कैसे लिख सकता है? वह शल्य है कृष्ण नहीं ।
इसलिए दिल्ली से रिपोर्ट मत माँगिए।
गाँव से रिपोर्ट माँगिए।
हर सांसद से कहिए अपने क्षेत्र में जाए।
हर विधायक से कहिए अपने क्षेत्र में जाए।
हर प्रदेश पदाधिकारी से कहिए अपने संगठन के सबसे आखिरी कार्यकर्ता तक जाइए।
और लौटकर बताये
कितने किसान कर्ज में हैं?
कितने नौजवान काम खोज रहे हैं?
कितने स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं?
कितने अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं?
किस बस्ती में पानी नहीं पहुँच रहा?
कहाँ जाति के कारण किसी का रास्ता रुका हुआ है?
कहाँ महिला स्वयं सहायता समूह टूट रहे हैं?
कहाँ मजदूर शहर से लौटकर फिर गाँव में बेरोजगार बैठा है?
किस बूथ पर आपका कार्यकर्ता अकेला है?
किस बूथ पर विपक्ष का संगठन आपसे मजबूत है?
और सबसे कठिन प्रश्न
आपके अपने संगठन का नेता अपने क्षेत्र में जनता से कितना जुड़ा हुआ है?
मैं तो चाहता हूँ कि संगठन की अगली बैठक दिल्ली में मत रखिये । किसी गाँव में रखिये ।
पहले नेताओं को उनके क्षेत्रों में भेजिए।
उन्हें कहिए चार दिन अपने क्षेत्र में रहकर आइए। फिर बैठक होगी।
और लौटते समय उनके पास कोई चमकदार PowerPoint न हो।
उनके पास लोगों की आवाज हो।
किसान की शिकायत हो।
महिला की कहानी हो।
युवक का सवाल हो।
मजदूर की पीड़ा हो।
कार्यकर्ता की नाराज़गी हो।
और यदि संभव हो तो कुर्ते पर कुछ सलवटें भी हों।
क्योंकि जिस संगठन के नेता अपने कपड़ों की सिलवटों से भी डरने लगें, वे जनता की जिंदगी की सिलवटों को कैसे समझेंगे?
गांधी की राजनीति की असली शक्ति यही थी कि वह राजनीति को जनता के जीवन में ले जाते थे।
उनका सत्याग्रह किसी वातानुकूलित सम्मेलन कक्ष में पैदा नहीं हुआ था।
चंपारण की मिट्टी में पैदा हुआ था।
खेड़ा के खेतों में पैदा हुआ था।
अहमदाबाद के मिल-मजदूरों के बीच पैदा हुआ था।
और दांडी की सड़क पर नमक के साथ इतिहास में उतर गया था।
प्रदेश अध्यक्ष से केवल यह मत पूछिए कि कितनी बैठकें हुईं।
पूछिए कितने गाँव गए?
हर सांसद से यह मत पूछिए कि कितनी प्रेस कॉन्फ्रेंस कीं।
पूछिए कितने किसानों के घर गए?
हर युवा नेता से यह मत पूछिए कि सोशल मीडिया पर कितने लाख views आए।
पूछिए कितने युवाओं के बीच बैठकर उनकी बेरोजगारी सुनी?
हर महिला नेता से यह मत पूछिए कि कितने भाषण हुए।
पूछिए कितनी महिलाओं के साथ बैठकर उनके वास्तविक प्रश्न लिखे?
और हर संगठन पदाधिकारी से सबसे कठिन प्रश्न पूछिए
आपके क्षेत्र का सबसे गरीब व्यक्ति आपको जानता है या नहीं?
यही आपकी नई राजनीतिक कसौटी होनी चाहिए।
आज आपके आसपास जो सारथी बने घूम रहे हैं
वे आपका मनोबल नहीं तोड़ेंगे।
वे आपको अतिरिक्त आत्मविश्वास देंगे।
वे आपको बताएँगे कि जनता आपके साथ है।
वे बताएँगे कि आपका भाषण ऐतिहासिक था।
वे बताएँगे कि आपका ट्वीट वायरल हो गया।
वे बताएँगे कि आपकी लोकप्रियता बढ़ रही है।
लेकिन कोई यह नहीं बताएगा कि फलाँ गाँव में आपका बूथ कमेटी अध्यक्ष छह महीने से पार्टी के संपर्क में नहीं है।
कोई यह नहीं बताएगा कि फलाँ विधानसभा में आपका कार्यकर्ता संगठन छोड़ चुका है।
कोई यह नहीं बताएगा कि फलाँ जिले में पार्टी का नेता जनता से कट चुका है।
यही वह शल्य है जिससे आपको सबसे सावधान रहना है।
आज यह जरूरी है कि आप कांग्रेस को फिर से जनता के बीच ले जाएँ इसलिए राहुल जी ,
यदि कांग्रेस को पुनर्जीवित करना है तो केवल चेहरों को बदलना पर्याप्त नहीं होगा।
राजनीतिक संस्कृति बदलनी होगी।
संगठन में पद से अधिक परिश्रम का मूल्य होना चाहिए।
दिल्ली से निकटता से अधिक गाँव से निकटता का मूल्य होना चाहिए।
टीवी पर दिखाई देने से अधिक जनता के बीच दिखाई देने का मूल्य होना चाहिए।
और संगठन में ऊपर जाने की सीढ़ी यह नहीं होनी चाहिए कि कौन किसके कितना निकट है।
सीढ़ी यह होनी चाहिए
किसने कितने लोगों के बीच काम किया?
किसने कितने संघर्ष खड़े किए?
किसने कितने कार्यकर्ताओं को तैयार किया?
किसने अपने क्षेत्र की कितनी वास्तविक समस्याएँ पार्टी के सामने रखीं?
यही गाँधी के स्वराज का जंतर-मंतर है ।
कांग्रेस को जीत का आश्वासन देने वाले शल्यों की आवश्यकता नहीं है।
उसे काम करने वाले अर्जुनों की आवश्यकता है।
ऐसे अर्जुन जो अपने-अपने क्षेत्र में उतरें।
ऐसे अर्जुन जिनके कुर्तों पर सलवटें हों।
ऐसे अर्जुन जिनके जूतों पर गाँव की मिट्टी हो।
ऐसे अर्जुन जिनकी डायरी में जनता के नाम और समस्याएँ लिखी हों।
और ऐसे अर्जुन जो दिल्ली लौटकर यह कह सकें
यह मेरे क्षेत्र की वास्तविक स्थिति है। अब बताइए, हम क्या करेंगे?
राहुल जी ,
आपसे केवल अपने रथ की बागडोर सँभालने की अपेक्षा नहीं है।
आपको अपने रथ में बैठे लोगों को बदलना है।
जो सारथी दिशा नहीं जानते, उन्हें हटाइए।
जो केवल स्तुति करते हैं, उनसे सावधान रहिए।
जो सत्य बताते हैं, उन्हें अपने पास रखिए।
और संगठन को उन लोगों के हाथ में दीजिए जो जनता के बीच से आते हैं और जनता के बीच वापस जाने को तैयार हैं।
क्योंकि भारत दिल्ली की सड़कों पर नहीं, भारत उन पगडंडियों पर मिलता है जहाँ नेता का कुर्ता सलवटदार होता है और जनता की आवाज साफ।
इसलिए, हे राहुल
अपने नेताओं से कहिए अपने क्षेत्रों में जाइए। कुर्तों पर सलवटें लाइए। गाँवों की धूल लेकर लौटिए। जनता की रपट लेकर लौटिए। और फिर कांग्रेस की अगली दिशा तय कीजिए।
तभी आपका संगठन सचमुच बदलेगा।
तभी आपका रथ सही दिशा में चलेगा।
अब युद्ध केवल सत्ता से नहीं है। युद्ध संगठन की जड़ता से भी है।
और इस युद्ध में पहला सुधार आपको अपने ही रथ से शुरू करना होगा।
@kanhaiyakumar बिहार आंदोलनरत है और आप सोशल मीडिया पर बात रखने से ना आपका भला है और ना कांग्रेस पार्टी को। राजनीतिक पारी लंबी खेलनी है तो बिहार का मैदान खाली है अपनी जगह बना सकते है। इसके लिए जमीन पर पांव रगड़ने होंगे समझे।
@kanhaiyakumar बिहार आंदोलनरत है और आप सोशल मीडिया पर बात रखने से ना आपका भला है और ना कांग्रेस पार्टी को। राजनीतिक पारी लंबी खेलनी है तो बिहार का मैदान खाली है अपनी जगह बना सकते है। इसके लिए जमीन पर पांव रगड़ने होंगे समझे।
@bharatsuraj01@VISHWAJ44555076@RahulGandhi जो सबसे पुराना घर हो उसे ही पहले ठीक किया जाता है। और बाइनरी मे सवाल वही करते है जो छिपे हुए संघी होते है। शुरुआत सुधार की हमेशा अपने घर से होती है तो बिना कहे लाज शर्म से पड़ोसी भी सुधर जाता है। गांधी को पढ़े अक्ल के ताले खुल जाएंगे।
अर्धसत्य की दुकान मंडल जी! नेहरू सिर्फ 1937 में अध्यक्ष नहीं थे,1929 के लाहौर अधिवेशन के भी अध्यक्ष थे जब पूर्ण स्वराज की मांग की गई,तो क्या पूरा श्रेय नेहरू को दे देंगे लाहौर अधिवेशन का?
वो स्वतंत्रता आंदोलन की कांग्रेस थी मोदी जी की भाजपा नहीं, उस समय निर्णय सबकी सहमति से होता था।
पूरा सच ये रहा👇( दो पोस्ट का थ्रेड)
पार्ट 1 :
निर्णय कांग्रेस वर्किंग समिति का था जिसमे नेता जी सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आज़ाद, जे.बी. कृपलानी, नरेंद्र देव सभी प्रमुख लोग शामिल थे। यहां तक कि 1934 में कांग्रेस से इस्तीफा दे चुके गांधी जी भी उस बैठक के समय मौजूद थे। किसी भी सदस्य ने निर्णय का विरोध नहीं किया था क्योंकि निर्णय गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर की लिखित सलाह पर हुआ था।
गुरुदेव ने सलाह दी ही क्यों थी? इसलिए दी क्योंकि मांगी गई। मांगी क्यों गई? इसलिए क्योंकि वंदे मातरम पर मुस्लिम लीग और जिन्ना की साम्प्रदायिक राजनीति को बेअसर किया जा सके। सलाह मांगने का सुझाव किसने दिया? नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने। राय मांगने गया कौन? जवाहर लाल नेहरू क्योंकि वो अध्यक्ष थे उस समय।
जिन्ना उस समय वंदे मातरम पर कम्युनल राजनीति क्यों कर रहा था जबकि वंदे मातरम तो उस समय से गाया जा रहा था जब जिन्ना कांग्रेस में हुआ करता था? उत्तर है गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 के तहत हुए प्रांतीय चुनावों में मुस्लिम बहुल ज्यादातर सीटों पर भी कांग्रेस जीत गई थी इसलिए जिन्ना के सामने राजनीतिक अस्तित्व का संकट आ गया था। यही कारण है 1937 से ही जिन्ना ने वो घोर साम्प्रदायिक रूप अपनाया जो उसकी आज की पहचान है। 1937 से पहले वंदे मातरम पर कोई गंभीर विवाद नहीं था और सिर्फ 1923 के काकीनाडा अधिवेशन में मौलाना मोहम्मद अली जौहर द्वारा आपत्ति वाली घटना के अलावा कभी विरोध भी नहीं हुआ था और उस बार भी आपत्ति के बावजूद गाया गया था। मौलाना कट्टर थे लेकिन कांग्रेस सबका मंच था।
कांग्रेस के अधिवेशनों मे वंदे मातरम गाया जाता था लेकिन हर बार ही पूरा गाया जाता हो इसका प्रमाण नहीं है, सिर्फ 1905 के बनारस अधिवेशन में पूर्ण वंदे मातरम् के सार्वजनिक गायन का प्रमाण है। वंदे मातरम मात्रभूमि के प्रति भावना की अभिव्यक्ति था, कोई आनंदमठ पूरा पढ़ने की जरूरत नहीं थी बल्कि आनंदमठ उपन्यास तो अंग्रेजो के खिलाफ संघर्ष का प्रतिनिधित्व भी नहीं करता था। आनंदमठ संन्यासी विद्रोह पर आधारित उपन्यास है जिसका कथानक 1760 से 1800 के बीच बंगाल में हुए वास्तविक संन्यासी विद्रोह के इतिहास से भिन्न है। वास्तविक संन्यासी विद्रोह ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ था जबकि आनंद मठ का संन्यासी विद्रोह मुस्लिम शासन के खिलाफ है।
1937 में दो स्टैंजा के गायन का औपचारिक फैसला मुस्लिम लीग से समझौते के लिए नहीं उसकी कम्युनल राजनीति की धार भोथरी करने के लिए था और वो चर्चा भी नेहरू ने नहीं शुरू की थी।
मुस्लिम लीग की हरकतों को देखते हुए लीग के लखनऊ अधिवेशन से पहले ही 28 सितंबर 1937 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने सरदार वल्लभ भाई पटेल को पत्र लिखकर वंदे मातरम् को लेकर पैदा हो रहे विवाद और आपत्तियों का उल्लेख किया था और उम्मीद की थी कि कांग्रेस वर्किंग कमेटी इस विषय पर स्पष्ट रुख अपनाए। यानि मुस्लिम लीग जनता में नफ़रत फैला रही थी।
इसके 17 दिन बाद 15 अक्टूबर 1937 को मुस्लिम लीग का लखनऊ अधिवेशन हुआ था जिसमें जिन्ना ने कांग्रेस की नीतियों और वंदे मातरम् के सार्वजनिक प्रयोग पर आपत्ति की थी।
उसके अगले दिन 16 अक्टूबर 1937 को सुभाष चंद्र बोस जी ने गुरुदेव टैगोर को पत्र लिख कर पूछा था कि कांग्रेस को वंदे मातरम् पर क्या रुख अपनाना चाहिए?
उसके अगले दिन 17 अक्टूबर 1937 को नेता जी ने नेहरू को पत्र लिखा और सुझाव दिया कि नेहरू इस विषय पर टैगोर जी से स्वयं चर्चा करें।
20 अक्टूबर 1937 को नेहरू ने इलाहाबाद से सुभाष बाबू को उत्तर में लिखा कि वंदे मातरम पर हंगामा “to a large extent a manufactured one by the communalists” था। उन्होंने लिखा कि कांग्रेस को सांप्रदायिक राजनीति के सामने झुकना नहीं चाहिए, लेकिन जहाँ वास्तविक शिकायत हो उसे संबोधित करना चाहिए। नेहरू ने नेता जी को को बताया कि वे 25 अक्टूबर की सुबह कलकत्ता पहुँचेंगे, ताकि रविन्द्र नाथ टैगोर जी और दूसरे नेताओं से बात कर सकें।
26 अक्टूबर 1937 को रवीन्द्रनाथ टैगोर जी ने नेहरू को लिखा कि वंदे मातरम् के प्रारंभिक हिस्से में मातृभूमि की सुंदरता और कल्याणकारी स्वरूप की अभिव्यक्ति से कोई समस्या नहीं थी लेकिन पूरे गीत को आनंदमठ के संदर्भ के साथ पढ़ने पर मुस्लिम संवेदनाएँ आहत हो सकती हैं।
(दूसरा हिस्सा रिप्लाई में पढ़ें)
उत्तराखंड की किच्छा विधानसभा सीट पर वोटर लिस्ट से नाम हटाने के लिए 4,857 आपत्तियां दर्ज हुईं. इनमें से 4,855 आपत्तियां अकेले BJP के बूथ लेवल एजेंट राजेश तिवारी ने दर्ज कराईं है. सभी मतदाता मुस्लिम हैं.
ऐसा ही दूसरी जगहों पर भी हुआ है.
https://t.co/JLkeoVN1gU
पिछले 10 मिनट में दस बार सुन चुका हूँ…
नागालैंड के Wangnao Yato ने राष्ट्रीय गान के साथ अपनी आवाज़ का जो समां बाँधा वो अद्भुत है!
एक बार आप भी सुनिए फिर और लूप में डाल कर सुनते रहेंगे
Love you Wangnao Yato, Love you Nagaland 🇮🇳