आज 11 जून 2025, मेरे पिता स्व॰ राजेश पायलट जी की 25वीं पुण्यतिथि पर उनका पुण्य स्मरण करते हुए उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करता हूं।
उनकी जनसेवा, सच्चाई और साहस मेरे लिए सदैव प्रेरणास्रोत रहेंगे। उन्होंने किसानों, युवाओं सहित हर वर्ग के लिए सम्मान और सशक्तिकरण का संकल्प लिया था — वे अपने विनम्र व्यवहार, कड़ी मेहनत और देश के प्रति समर्पण से हर दिल में अपनी जगह बना पाए।
उनको मेरी भावभीनी श्रद्धांजलि एवं कोटि-कोटि नमन।
#राजेश_पायलट_अमर_रहे
सामाजिक क्रांति के पथ प्रदर्शक, विचारक, महान स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार, साहित्यकार, अहिंसावादी जनांदोलन के भीष्म पितामह, राजस्थान केसरी विजय सिंह पथिक जी की जयंती पर उनको शत शत नमन 🙏
पथिक जी ने 30 पुस्तक लिखी है, 2 पुस्तक का हिंदी में अनुवाद किया & 6 अख़बारों का सम्पादन किया है
और इंदिरा गांधी ने ऐसे बना दिया राजेश पायलट का रिश्ता राजस्थान से
आज राजेश पायलट की पुण्यतिथि है। वे हमारे बीच होते तो अस्सी बरस के होते। कल्पना करिए कि अस्सी साल के राजेश पायलट कैसे लगते और किस तरह के भाषण दे रहे होते।
एक बेहद निर्धन परिवार में पले-बढ़े राजेश्वरप्रसाद इतने ब्रिलिएंट स्टूडेँट थे कि उन्होंने उस सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज में एडमिशन ले लिया, जहाँ से नूरूद्दीन अहमद, अमिताव घोष, गोपाल कृष्ण गांधी, सुचेता कृपलानी, राजमोहन गांधी, रामचंद्र गुहा, निर्मल वर्मा, गोपीचंद नारंग जैसी शख़्सियतें निकलीं।
राजेश पायलट का मूल नाम राजेश्वरप्रसाद था और उन्होंने भरतपुर संसदीय क्षेत्र का टिकट मिलने के बाद संजय गांधी की सलाह पर यह नाम बदला था।
राजेश पायलट के जीवन की कहानी बहुत ही दिलचस्प और प्रेरणादायी है। ख़ासकर उन युवक-युवतियों के लिए, जिनके पास पैसा नहीं है और वे इसके बावजूद राजनीति में आकर देश के लिए कुछ करना चाहते हैं।
लेकिन दु:खद है कि राजेश पायलट के प्रेरक जीवन को किसी अच्छे राजनीतिक लेखक ने शब्दों में नहीं पिरोया है। उनकी एक हृदयस्पर्शी जीवनी कुछ साल पहले उनकी सहधर्मिणी रमा पायलट ने लिखी थी, जिसमें कई दिलचस्प घटनाएं और जीवन के दु:खदर्द और संकटों को बहुत ही शालीन तरीके से पिरोया गया है। लेकिन एक पत्नी अपने पति के बारे में लिखे तो उसकी अपनी आंतरिक और बाहरी सीमाएं होती हैं।
आज हम ऐसे युग में हैं, जब नैतिक रूप से गिरे हुए लोगों को प्रेरक और सफल रूप से प्रस्तुत किया जाता है और लोग उनके संपर्क में होने से गर्व महसूस करते हैं। यही वजह है कि आज राजनीति, कला, संंस्कृति और मीडिया की वीथिकाओं में पतनशीलता भी गर्वीले एहसास के साथ टहलती है।
राजेश पायलट जीवन की धूल चाट कर बड़े हुए थे। उस धूल में गोधूलि के उन कणों का अंबार था, जिनसे किसी भी खेतिहर और पशुपालक परिवार के जीवन का सुनहरा भविष्य बनता है।
जिस व्यक्ति ने गायें नहीं पालीं, वह नहीं जानता कि जीवन और उसमें गोधूलि की क्या महत्ता है। जो गाय नहीं पालते और गाय को सिर्फ़ और सिर्फ़ पवित्र पशु मानते हैं, उन्हें गोधूलि की महत्ता स्वप्न में भी पता नहीं चल सकती।
मेरे अपने पिता और माँ गाएँ और भैंसें तो पालते ही थे; लेकिन उनका पारिवारिक काम पीढ़ियों से घोड़े पालने का था। गायों और भैंसों का सारा दूध घोड़ों को पिलाया जाता था और खेत से आने वाले जौ और चने घोड़ों को ही खिलाए जाते थे।
मैं समझ सकता हूँ कि राजेश पायलट के जीवन में गौ पालन से लेकर सेेंट स्टीफ़न तक जाने के दौरान कैसी चुनौतियां रही होंगी। रमा पायलट ने इसके कई कोमल और हृदयस्पर्शी संस्मरण अपनी पुस्तक में लिखे हैं।
राजेश पायलट तूफ़ानों से लड़े, कई बार गिरे और बार-बार खड़े हुए। वे मिट्टी से सोना खोदने वाले और इस्पात मोड़ने वाली शख़्सियत साबित हुए थे।
एक अकल्पनीय क़ामयाबी पाने वाले राजेश्वर प्रसाद ने जब वायु सेना से पायलट की असाधारण नौकरी छोड़कर राजनीति में आना चाहा और इस दौरान इंदिरा गांधी से हुई मुलाकातों की बातें इंदिरा गांधी और संजय गांधी का एक अलग ही चेहरा प्रस्तुत करती हैं। वे क्या लोग थे, जिनसे मिलना इतना आसान था।
राजेश पायलट इंदिरा गांधी से आशीर्वाद लेने गए और कहा कि वे प्रधानमंत्री चौधरी चरणसिंह के ख़िलाफ़ बागपत चुनाव लड़ना चाहते हैं तो उन्होंने उन्हें नौकरी न छोड़ने और बाद में किसी दिन अपनी पत्नी को भेजने के लिए कहा।
रमा पायलट जब इंदिरा गांधी से मिलने गईं तो वे उनकी मॉडर्न वेशभूषा देखकर एकबारगी अवाक् रह गईं और उन्हें पहचान नहीं पाईं। इंदिरा गांधी ने समझा था कि गुर्जर परिवार के इस युवक की पत्नी की वेशभूषा ठेठ ग्रामीण होगी।
इंदिरा गांधी के हस्तक्षेप के बावजूद 1980 में राजेश पायलट को बाग़पत से टिकट नहीं मिला। इसकी एक लॉजिकल वजह भी थी। इस सीट पर रामचंद्र विकल की दावेदारी थी, जो गुर्जर ही थे और आर्यसमाज के बहुत बड़े सुधारक रहे थे। महात्मा गांधी की हत्या ने विकल को इतना झकझोर दिया था कि उन्होंने अपना पूरा जीवन काँग्रेस को समर्पित कर दिया था। उन्होंने काफ़ी भूमि भी निर्धनों को दे दी थी। लेकिन चरणसिंह के सामने वह चुनाव विकल बुरी तरह हार गए थे।
बागपत का टिकट घोषित होने के बाद निराश राजेश पायलट और रमा पायलट अपने स्कूटर से एयरपोर्ट पर जाकर हैदराबाद उड़ान भरती इंदिरा गांधी से मिले तो उन्होंने मुस्कुराकर दोनों को देखा और हुँम्ममम के साथ अभिवादन का जवाब देकर चली गईं। उसी शाम संजय गांधी ने राजेश पायलट को टेलीफ़ोन करके बुलवाया और इसके बाद जो हुआ, उसने राजस्थान की राजनीति की एक नई इबारत लिख दी।
आज अगर सचिन पायलट जैसा नेता राजस्थान में है तो उस शाम की वजह से है, जब राजेश पायलट को भरतपुर चुनाव लड़ने के लिए भेजा गया। राजेश पायलट और उनकी पत्नी रमा के लिए भरतपुर एक नया इलाक़ा था और इसका नाम भी ठीक से उन्होंने नहीं सुना था।
राजनीति में इन्सान भले कितना भी बूढ़ा हो जाए, वह सत्ता का मोह कभी छोड़ नहीं सकता। वह अपने जीवन की पूरी नेक कमाई लुटा देना पसंद करता है; लेकिन अपने जीवन के अस्ताचल में सम्मान से कभी विदाई नहीं लेना चाहता और अपने जीवन के अर्जित पुण्यों और ख्यातियों को उसी रथ के पहिए से ख़ुद कुचल डालता है, जिस पर सवार होकर वह कभी राजनीति के नभ में सूर्य की तरह अवतरित हुआ था।
राजनीति का सूर्य अब अब नया रथ लेकर तैयार था और एक नए चेहरे को ला रहा था।
अपने युवा काल में संसद में गरजने और अपने तर्कों से सरदार पटेल जैसे नेता को भारतीय संविधान सभा में पराभूत करने वाले राजबहादुर के साथ भी यही समस्या हुई कि वे राजनीति से समय पर संन्यास नहीं ले पाए और काँग्रेस हाईकमान के लिए बड़ी समस्या बन गए। आख़िर हाईकमान को टिकट काटनी पड़ी तो राजस्थान से कोई नेता तैयार नहीं हुआ। वह इलाक़ा ब्रजेश्वरसिंह और नत्थीसिंह जैसे नेताओं के दबदबे से आक्रांत था।
राजेश पायलट राजेश्वर प्रसाद के रूप में जयपुर पीसीसी आए तो पीसीसी चीफ जगन्नाथ पहाड़िया ने पहचाना नहीं।
राजेश पायलट ने भरतपुर से उम्मीदवार होने के बारे में कहा तो पहाड़िया और दूसरे नेताओं ने उपहास किए।
लेकिन जब एक सामान्य जगन्नाथ को सीएम पहाड़िया बनाने वाले संजय गांधी ने ही फ़ोन किया तो पहाड़िया कुछ पसीजे और उन्होंने अपनी गांधी टोपी संभालते हुए पायलट को बैठने के लिए कहा।
वैसे राजस्थान की राजनीति में नए और नौजवानों के प्रति असहिष्णुता का भाव बहुत गहरा है।
पहाड़िया भी जब पहली बार सीएम बने थे तो उनके दलित होने की वजह से बहुत उपहास किया गया और जातिवादी वर्चस्व वाला सवर्णवाद उनकी राजनीतिक बलि लेने को कामयाब हो गया।
राजेश पायलट ने नामांकन भरा तो उसे किसी चूक से रद्द करवाने और नामांकन पत्र में कोई गंभीर त्रुटि रखवा देने वाले काम भी शुरू हो गए। राजेश पायलट को संजय गांधी ने इन सब बातों के बारे में समय पर नहीं चेताया होता तो उस दौर के काँग्रेसी पायलट को बहुत पहले वापस भेज देते। लेकिन गांधी-नेहरू परिवार इस सबको लेकर हमेशा ही सजग रहा है। उस समय उनकी कुचालों कामयाब हो जातीं तो शायद जनता दल के नेता नत्थीसिंह निर्विरोध ही चुनाव जीत जाते।
लेकिन जैसा कि कहते हैं, वह जन मारे नहीं मरेगा। नहीं मरेगा। जो जीवन की आग जला कर आग बना है। ऐसा राजेश पायलट के साथ ही नहीं, बहुत सी शख़्सियतों के साथ होता है। भले वे किसी भी दल या विचार में हों या किसी भी क्षेत्र में।
राजेश पायलट को आम कार्यकर्ताओं ने चुनाव जितवाया और राजस्थान की एक धारा में बहती राजनीति को बदल दिया।
1984 में भरतपुर नवलकिशोर शर्मा आ गए तो पायलट दौसा शिफ़्ट किए गए। वे भाजपा के नाथूसिंह के मुक़ाबले भारी मतों से विजयी हुए।
1989 में काँग्रेस की प्रदेश लीडरशिप ने ऊटपटांग निर्णय लिए और पायलट को वापस भरतपुर और नवलकिशोर शर्मा दौसा शिफ़्ट हुए और कई सीटें हारे। इसमें भरतपुर भी हारे और दौसा भी।
भरतपुर में जनता दल के विश्वेंद्रसिंह जीते तो दौसा में भाजपा के नाथूसिंह। 1991, 1996, 1998 और 1999 में पायलट दौसा से फिर जीते। उनका निधन साल 2000 में आज ही के दिन हुआ और उप चुनाव में 2000 में रमा पायलट जीतीं। 2004 में सचिन पायलट ने पहला चुनाव लड़ा और वे भी जीते। साल 2009 के चुनावों में पुनर्सीमांकन में यह सीट आरक्षित हो गई।
इसके बाद की कहानी संभवत: राजस्थान के सब लोगों को पता है।
राजेश पायलट को राजनीति में आने की तब सूझी जब कृषि मंत्रालय के हेलीकॉप्टर से किसानों की फ़सलों पर पेस्टीसाइड का छिड़काव कर रहे थे।
मुझे याद है, मैं घमूड़वाली में छठी कक्षा में था तो वे घमूड़वाली, बींझबायला और 36 एलएनपी के बीच के इलाके़ में हेलीकॉप्टर से पेस्टीसाइड छिड़काव के लिए वे आए थे तो हमारा पूरा स्कूल वहीं आ गया था। उस समय उन्होंने बहुत बच्चों से हाथ मिलाया, बातचीत की और सबसे अच्छा पढ़कर आगे बढ़ने का एक पूरा लेक्चर ही दे दिया था। उन्होंने सबको हेलीकॉप्टर के बारे में बताया।
राजेश पायलट ने जब हेलीकॉप्टर से किसानों की फ़सलों पर से उड़ान भरी तो उन्होंने देखा कि किसानों के हालात कितने बदतर हैं। ये हालात कैसे सुधरें और इसी जन्म में, इस जीवन में कैसे सुधरें तो इसका रास्ता राजनीति से होकर ही आता है।
जिन लोगों ने खेती नहीं की, पशुपालन नहीं किया और जिन्होंने सिर्फ़ बेचना और ख़रीदना ही सीखा है, उस संस्कृति से निकले लोग अगर राजनीति में भी जाएंगे और सत्ता भी हासिल करेंगे तो किसानों की समृद्धि को सुसंस्कृत राह पर लाने के बजाय इसे मौत की राह पर डालकर मुनाफ़े की चमक दिखाएंगे।
हिंदुस्तान के किसान को तब मान मिलता है जब लहलहाते खेतों में अनाज के साथ गीत भी उपजते हैं। जहाँ क्लेश मिटते हैं और जहाँ फूल खिलते और त्राण मिलता है, जहाँ वृक्षों की कटाई पाप होती है और इन्सान की धड़कनें जाति, धर्म और काला-गोरा देखने के बजाय हृदय में ऐसे ज्ञान उपजता है, जिससे जीवन में साम्य भाव की रोशनियां झरती हैं।
राजेश पायल को किसान और जवान से बहुत प्रेम था और उनकी राजनीति उस राह पर एक अंतिम गंतव्य तक पहुंचती, उससे पहले वे एक दु:खद दुर्घटना में चले गए।
राजस्थान की राजनीति में विभिन्न दलों में लोकतांत्रिक युग में जो बेहतरीन नेता हमें मिले हैं, उनमें राजेश पायलट एक थे। दमकते नक्षत्र सी उस शख़्सियत को सुप्रसिद्ध कवि केदारनाथ अग्रवाल की इन पंक्तियों के साथ असीम प्रणाम :
हम जिएँ न जिएँ दोस्त
तुम जियो एक नौजवान की तरह,
खेत में झूम रहे धान की तरह,
मौत को मार रहे बान की तरह।
हम जिएँ न जिएँ दोस्त
तुम जियो अजेय इंसान की तरह
मरण के इस रण में अमरण
आकर्ण तनी
कमान की तरह!
#RajeshPilot #SachinPilot @SachinPilot
कर्नल किरोड़ीसिंह बैसला को क्यों सही तरीक़े से लोगों ने याद नहीं किया?
उत्तर भारत में सबसे ताक़तवर आंदोलन करने वाले नेताओं में कर्नल किरोड़ीसिंह बैसला रहे हैं।
उनकी पुण्यतिथि 31 मार्च थी; लेकिन उन्हें उस तरह याद ही नहीं किया गया, जिस तरह इस शख़्सियत को याद किया जाना चाहिए था।
ये गुर्जर आंदोलन के दिनों से कुछ पहले की बात है। मैं भारतीय जनता पार्टी की बीट देखता था और वह पगड़ीधारी कई बार इस पार्टी के ऑफ़िस में दिख जाता था।
लेकिन उस दिन मैं उस अलग से लगने वाले इस इन्सान की तरफ़ खिंचा चला गया। वजह थी उनके सामने रखी एक किताब।
यह पुस्तक नेपोलियन की बायोग्राफ़ी थी। फ़िलिप ड्वायर की लिखी "नेपोलियन : दॅ पाथ टु पावर'।
एक पगड़ीधारी और लाठी वाला कद्दावर किसान सा दिखता आदमी और वह भी अंगरेज़ी की किताब पढ़े और धोती भी खांटी अंदाज़ में बांधे तो सहसा आकर्षण का विषय हो ही जाता है।
यह जिज्ञासा आधुनिक परिवेश की मेरी या मेरे जैसे लोगों की उस कुंठा से उपजती है कि आख़िर कोई धोती-पगड़ी वाला ठेठ ग्रामीण किसान कैसे अंगरेज़ी की बेहतरीन पुस्तक पढ़ सकता है।
उन्होंने बताया था कि युवा नेपोलियन उनका नायक है और वे उन्हें सेना के शुरुआती समय से ही पढ़ते रहे हैं।
कर्नल किरोड़ीसिंह बैसला से यह पहली मुलाकात थी।
उस संक्षिप्त सी मुलाकात में उन्होंने जो बताया, वह उनके मानीखेज़ व्यक्तित्व के बारे में बहुत कुछ कहता था। प्रजा की, देश की, राजसत्ता और खूब सारी ऐसी ही बातें।
खेत का खलिहान ही हमारा सिंहासन है, वाले दर्शन को मानने वाले किरोड़ीसिंह बैसला इस प्रदेश की ऐसी शख़्सियतों में एक रहे हैं, जिन्होंने आंदोलन को भिक्षा और दयनीयता से निकालकर आत्मसम्मान से इतना लबरेज़ बनाया कि राजसिंहासन उनके सामने बार-बार झुका।
राजस्थान की राजनीति की क्षितिज-रेखा को बींधते आंदोलन की एक भयानक सुहावनी इमारत गढ़ने वाले लोगों में उनका शुमार सदैव ही रहेगा।
एक पीड़ित और उपेक्षित समाज ने वर्षों अँधेरे में रहकर अपना दर्द बयां किया तो उसे कर्नल बैसला ने आसमान की बुलंदी में पहुंचा दिया और समाज की दुखती देह का दर्द दूर करने की कोशिश की।
वे फ़िराक़ गोरखपुरी की पंक्तियों "सूरज-चांद अंगड़ाई लेंगे और तारे अपनी गति बदलेंगे' वाले दर्शन को अपने भीतर बसाए हुए आंदोलनकारी थे।
उन्होंने अपने तपेतपाए सैनिक जीवन के अनुभवों को जनआंदोलनों से जोड़ा और आरक्त आंदोलन से एक नई इबारत लिखी।
जो अफ़सर और राजनेता अपने घर आए लोगों को निरीह बनाकर रखते हैं और उनसे मिलने का समय तक नहीं देते, उन्हें बैसला ने लोकतंत्र का नया पाठ पढ़ाया।
जो आम आदमी को मिलने का समय नहीं देते हैं, घर और दफ़्तर के बाहर दिनों चक्कर लगवाते हैं और मिलें तो दुत्कार कर भगा देते हैं, उन्हें उन्होंने याचक की मुद्रा में लाकर आम लोगों के बीच रेल की पटरियों पर बुला लिया।
इस सदी के महान कवि विनोद कुमार शुक्ल का कहना है कि एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर। नदी जैसे लोगों से मिलने नदी किनारे जाऊंगा। कुछ तैरूंगा और डूब जाऊंगा।
बैसला ने अपनी तरह के एक नए आंदोलन को जीवंत किया और बताया कि लोक की ताकत क्या होती है।
उन्होंने सत्ता की उफनती और मदोन्मत्त नदी को रेल की पटरियों पर बुलवाया और कहा कि इसमें पहले डूबकर देखो तो फिर तैरने की बात सोचना।
एक बार तो उन्हें मनाने ऐसे श्री-श्री साधु को आना पड़ा, जिनके लिए सितारे पलक-पाँव पावड़े बिछाते हैं, लेकिन उनकी 'आर्ट ऑव लिविंग' रेल पटरियों पर बैठे फौजी की 'आर्ट ऑव वॉर' के सामने सुदर्शन क्रिया करने लगी!
बैसला के भीतर गोल्ड्सवर्थी के सीज़र की परंपरा के किस्सों की अनुगूंज थी।
उन्होंने युवा नेपोलियन की जीवनी पढ़ी और चर्चा करके छोड़ दी हो, ऐसा नहीं था। उन्होंने उसे अपने भीतर उतारा। आत्मसात किया। उसी तरह जैसे सरदार भगतसिंह ने ऑगस्ट वयाँ को किया था।
नेपोलियन ने महज तीस साल में सत्ता को अपने हाथ में करके असंभव को संभव कर दिखाया था।
बैसला के लिए भी आंदोलन न तो सुगम था और न अपरिहार्य; लेकिन उन्होंने राजस्थान के शासन तंत्र और प्रशासन तंत्र के भीतर के मिथकों को एक-एक कर कुचल दिया।
वे एक जोशो-जुनून से लबालब भरे नेता थे और उनका जुनून जिस उम्र में उभरा, वह इस प्रदेश के युवा नेताओं के लिए बहुत ही रश्क करने वाला है।
बैसला एक गहरे आंदोलनकारी थे। अपने समय के राजनेताओं के बारे में उनका दृष्टिकोण हैरानीजनक तटस्थ और विवेकशील ढंग से परिपक्व था।
उन्होंने तड़ीबाज़ राजनेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों के छक्के छुड़ाए और अपनी शर्तों पर नए नियम और नए कायदे-कानून बनवाए।
शासन को झुकाकर नए रंग और नए ढंग बनवाए।
उनकी ताकत का आलम यह था कि अपने आंदोलन वाले इलाकों के कई जिलों में वे कलेक्टरों और जिला स्तरीय अधिकारियों की बैठकें लिया करते थे और राज्य सरकार ने इसके लिए बाकायदा एक आदेश निकाला था।
भले उनका यह समय कम रहा; लेकिन जितना भी रहा, वह ऐसा था कि समाज के लोगों को लगता था अब पाप कटेगा, संताप हटेगा और जीवन बदलेगा।
बैसला ने अपने तरीके के अपने आंदोलनों से अपनी एक अलग छवि गढ़ी।
युवा नेपोलियन की कामयाबियों को अपने भीतर बसाते हुए बैसला ने राजस्थान के आधुनिक आंदोलनों के इतिहास में अपने आपको एक आकर्षक और नए दृष्टिकोण वाले नेता के रूप में स्थापित किया।
हम देखते हैं कि प्राय: सभी आंदोलनकारी हर समय सिस्टम को 'अब्यूज' करते हैं; लेकिन बैसला ने बहुत नफ़ासत से इस जंग खाए सिस्टम के नट-बोल्ट कसे और उसे 'अब्यूज' के बजाय 'यूज' किया।
राजस्थान में जन आंदोलनों के अकूत कुएं, झरने, नदियां और बावड़यां हैं; लेकिन एक गहरी सूखी नदी से अथाह जल हासिल कर लेने वाला अंदाज़ सिर्फ़ उन्हीं के पास था। उन्हें न कोई मुख्यमंत्री झुका पाया और न कोई सुप्रीम पावर।
यह उन्होंने जन आंदोलनों से हासिल किया था; लेकिन जैसे ही वे राजनीति में गए, प्रदेश के लोक हृदय के क्षितिज पर दमकते उनके व्यक्तित्व ने अपनी दुर्लभ आभा को एकबारगी कुछ धूमिल कर दिया था।
बैसला के व्यक्तित्व की एक अनूठी प्रतिमा लोगों के हृदय में बनी हुई है। उनके आंदोलनों को लेकर सहमतियां-असहमतियां बनी रहेंगी; लेकिन उनके आंदोलन ने पिरामिड की सी उम्र पाई है।
जन आंदोलनों के सामने बल्लियां लगाती है, शूल बिछाती है और तरह-तरह के मुकदमे दर्ज़ करती है; लेकिन बैसला ने रेल की पटरियों पर बैठकर सत्ता के शक्ति केंद्रों के तौरतरीकों को बुलबुले की हैसियत में ला दिया।
सरकारी तंत्र और राजसत्ता में बैठे राजनेता महीनों-वर्षों तक शांतिपूर्वक चलने वाले धरनों प्रदर्शनों पर ध्यान नहीं देते हैं। यह हर दिन हर सरकार और हर विचार में देखने वाला सच है।
बैसला ने एक नई इबारत लिखी और बताया कि नवोदित तृणों के स्पर्श से भी सरकारों और प्रशासन तंत्र की रीढ़ को बिना माथा झुकाए अमरबेल जैसा लचीला बनाकर घुटनों पर लाया जा सकता है।
और वह भी तब जब लोकतांत्रिक सभ्यता के खंडहरों में जन आंदोलनों की परंपरा धराशायी होकर सिसक रहे समय में लहूलुहान होकर अपने ही ज़ख्म चाटने को विवश हो।
#KiroriSinghBaisla #कर्नल_बैंसला #कर्नल_किरोड़ीसिंह_बैंसला
सनातन धर्मरक्षक आदिवराह चक्रवर्ती परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर महान गुर्जर प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज जी की जयंती पर सभी को हार्दिक शुभकामनायें 🚩🙏
#GurjarSamratMihirBhoj
A King Of Highest Order
.@amitmalviya - You have the wrong dates, wrong facts…
Yes, as an Indian Air Force pilot, my late father did drop bombs. But that was on erstwhile East Pakistan during the 1971 Indo-Pak war and not as you claim, on Mizoram on the 5th of March 1966.
He was commissioned into the IAF only on 29th October 1966!
(Certificate attached)
Jai hind and a happy Independence Day 🇮🇳
स्व. श्री राजेश पायलट जी दिनांक 29 अक्टूबर, 1966 को भारतीय वायु सेना में कमीशन हुए थे।
यह कहना कि उन्होंने 5 मार्च 1966 में मिज़ोरम में बमबारी करी थी - काल्पनिक है, तथ्यहीन है और पूर्ण तरह भ्रामक है।
हाँ, 80 के दशक में एक राजनेता के रूप में मिज़ोरम में युद्ध विराम करवाने और स्थाई शांति संधि स्थापित करवाने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका ज़रूर निभाई थी।
स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएँ, जय हिन्द 🇮🇳
पथिक राजस्थान के क्रांतिकारी आंदोलनों, जन-जागरण गतिविधियों और पत्रकारिता के स्तंभ के रूप में हमेशा सिरमौर रहेंगे। ये आजादी के योध्दा ही नहीं, प्रदेश की और देश की पत्रकारिता के आधार स्तंभों में एक रहे हैं।
पथिक जी की पुण्यतिथि पर मेरा लेख।
शुक्रिया @tribhuvun सर।
"यश-वैभव, सुख की चाह नहीं, परवाह नहीं जीवन न रहे; यदि इच्छा है तो यह है-जग में स्वेच्छाचार दमन न रहे।"
- विजय सिंह पथिक
महान स्वाधीनता सेनानी, बिजौलिया किसान आंदोलन के नायक, उत्कृष्ट कवि-पत्रकार और लेखक 'राजस्थान केसरी वीर विजय सिंह पथिक जी' की जयंती पर कोटिशः नमन! 💐🙏
पर रहें। स्वर्गीय राजेश पायलट की कहानी जर्रे से आफताब बनने की दास्तान है। यह दास्तान समाज के संघर्षशील नौजवानों के लिए प्रेरणा पुंज से कम नहीं है।
जयंती पर उनकी स्मृतियों को नमन! 💐🙏
दुनिया में वही शख़्स है ताज़ीम के क़ाबिल
जिस शख़्स ने हालात का मुंह मोड़ दिया है!
'जय जवान-जय किसान' के नारे को साकार करने वाले स्वर्गीय राजेश पायलट की ज़िन्दगी में न जाने कितने उतार-चढ़ाव आए। लेकिन वे हर मोड़ से हंसकर गुजर गए। आसमान की ऊंचाइयों को चुनौती दीं। कामयाबी की नई इबारत लिखी। कामयाबी के इस सफर में उन्होंने हमेशा इस बात का ख्याल रखा कि उनके कदम जमीन
An Intellectual of Highest Order, Astute Thinker, Proficient Reader, Prolific Writter, Visionary, Socialist,Freedom Fighter, Revolutionoary.
" Prince Of Martyr "
" Son Of Nation "
Revolutionary salute to the legend Bhagat Singh on his birth anniversary.
#BhagatSingh#भगत_सिंह
समाज में शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक एवं राजनीतिक चेतना के संवाहक श्रद्धेय स्व. श्री कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला जी की जंयती पर उन्हें कृतज्ञ नमन ! 💐 🙏
समाज सुधार व शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान अविस्मरणीय है।
#KiroriSinghBainsla