चुनाव आयोग के भीतर क्या चल रहा था कि दो चुनाव आयुक्तों को दस महीनों में चौदह बार लिखित आपत्तियाँ दर्ज करनी पड़ीं?
इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में सामने आई बातें पढ़िए। सवाल किसी विपक्षी पार्टी ने नहीं, आयोग के अपने दो आयुक्तों - सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोश - ने उठाए थे।
• आयोग की मंज़ूरी के बिना उसी के नाम पर पत्र और आदेश किसने जारी किए?
• नए IT सिस्टम की जानकारी आयुक्तों को मीडिया से क्यों मिली?
• मतदाता सूची के डेटाबेस का नियंत्रण केंद्रीकृत क्यों किया जा रहा था?
• नए मतदाताओं के फॉर्म 6 में बदलाव पर ‘अनधिकृत और गैरकानूनी’ होने की आपत्ति क्यों उठी?
• ज़मीनी अधिकारियों की सिस्टम तक पहुँच रोकने का अधिकार किसने दिया?
ज्ञान��श कुमार, जब आपके साथी आयुक्त ही फैसलों पर सवाल उठा रहे थे, तो उन आपत्तियों का क्या हुआ? क्या आयोग की सामूहिक ज़िम्मेदारी केवल काग़ज़ पर रह गई है?
भाजपा सरकार भी बताए - इन आरोपों की स्वतंत्र जाँच और जवाबदेही की माँग पर उसका रुख़ क्या है?
इन्हें महज़ अंदरूनी मतभेद कहकर नहीं टाला जा सकता। इन फैसलों का संबंध जनता के नाम, उसके वोट और निष्पक्ष चुनाव से है। संबंधित रिकॉर्ड सामने आएँ, स्वतंत्र जाँच हो और ज़िम्मेदारी तय हो।
जनता से हर दस्तावेज़ माँगने वाला चुनाव आयोग अपने फैसलों का हिसाब भी जनता को दे!
Gyanesh Kumar is the enemy of India.
More than 12 crore names have reportedly been deleted from electoral rolls.
That is roughly 12.4% of the 97 crore registered electorate around the 2024 Lok Sabha election.
The gap between the BJP-led NDA and the opposition was just 2%.
Gyanesh Kumar isn’t conducting elections, he is scripting them.
पिछले 10 महीनों में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने एसआईआर प्रक्रिया के विभिन्न पहलुओं पर कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज की. 1/2
पूरी ख़बर: https://t.co/duQ5TY0nIs
दिल्ली में VIP वोटरों के नाम जोड़ने के लिए अलग से अभियान चला रहा चुनाव आयोग : रिपोर्ट
रिपोर्टर्स कलेक्टिव की एक रिपोर्ट के अनुसार , दिल्ली के विशेष गहन संशोधन (SIR) में मतदाताओं को ‘सामान्य’ और ‘VIP’ श्रेणियों में बांटा जा रहा है। आम नागरिकों को नोटिस मिल रहे हैं और सुनवाई में पात्रता साबित करनी पड़ रही है, जबकि मंत्री, उनके परिवार, जज, अधिकारी, सेलिब्रिटी और अन्य को VIP चिह्नित कर अलग सुविधा दी जा रही है।
अधिकारियों को व्हाट्सऐप पर अनौपचारिक निर्देश दिए गए कि VIP का नाम न कटे, वरना आयोग को शर्मिंदगी हो सकती है। BLO ऐप में ‘मार्क VIP’ मॉड्यूल जोड़ा गया है, जिससे बूथ अधिकारी किसी भी मतदाता को VIP सिफारिश कर सकते हैं। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का नोटिस बिना सुनवाई कुछ घंटों में निपटा दिया गया, जबकि उसी क्षेत्र के आम वोटर कतार में खड़े थे।
कुछ क्षेत्रों में VIP के लिए नोटिस ही नहीं निकाले ��ए। BLO घर जाकर दस्तावेज ले आते हैं; गार्ड से भी काम चल जाता है। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम में ऐसा विशेषाधिकार नहीं है। आयोग की नियमावली कुछ विशिष्ट लोगों को चिह्नित करने की बात करती है, लेकिन बिना सत्यापन के अंतिम सूची में जगह सुनिश्चित करने की अनुमति नहीं देती।
दिल्ली में 1.45 करोड़ मतदाताओं में से आधे से अधिक नाम हटाए गए या संदिग्ध बताए गए। जांच का निष्कर्ष है कि VIP को प्राथमिकता मिल रही है, जबकि ���म वोटर अपनी जगह बचाने के लिए प्रक्रिया से गुजर रहे हैं।
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