पैटर्न पहचानिए, सवाल अपने आप उठेंगे!
2016: अवॉर्ड वापसी और असहिष्णुता अभियान
2017: उत्तर प्रदेश सहित चार राज्यों के चुनाव
2021: किसान आंदोलन
2022: उत्तर प्रदेश सहित चार राज्यों के चुनाव
2026: CJP के विरोध-प्रदर्शन
2027: उत्तर प्रदेश सहित चार राज्यों के चुनाव
हर बार उत्तर प्रदेश के चुनावों से पहले विरोध की राजनीति तेज़ और चुनावों के बाद कथित तौर पर ठंडी क्यों पड़ जाती है?
क्या ये महज़ संयोग है, या आंदोलनों के पीछे कोई राजनीतिक समय-सारिणी भी काम करती है?
लोकतंत्र में विरोध का अधिकार सबको है, लेकिन जनता को यह पूछने का अधिकार भी है कि मुद्दे चुनावी मौसम के साथ ही क्यों गरमाते हैं और फिर अचानक ठंडे क्यों पड़ जाते हैं?
सवाल पूछिए, समयरेखा देखिए और निष्कर्ष निकालने से पहले प्रमाण माँगिए।
राहुल गांधी जी, 13 करोड़ वोट कटने का दावा है, तो उनमें से 13 लाख प्रभावित मतदाताओं की पहचान करके उनके मामलों का सत्यापन क्यों नहीं करते? उनके हस्ताक्षर और दस्तावेज़ जुटाकर ठोस याचिका दाखिल कीजिए।
कांग्रेस के पास कार्यकर्ताओं की फौज और संसाधनों की कमी नहीं है। 13 लाख लोगों को दिल्ली लाना जरूरी नहीं, उनके सत्यापित मामलों को अदालत तक पहुँचाना जरूरी है।
सड़क पर प्रदर्शन करके आरोप लगाना आसान है, लेकिन अदालत में प्रमाण देना पड़ता है। नाम हटना और जानबूझकर वोट काटना अलग बातें हैं।
लोकतंत्र बचाने का दावा है तो आँकड़ों को प्रमाण में बदलिए, हस्ताक्षरों को कानूनी लड़ाई का आधार बनाइए। जनता को तमाशा नहीं, जवाब चाहिए!
कई साल पहले मोदी जी ने कहा था, “जब कहीं से मोदी के खिलाफ जोर-जोर से आवाजें आने लगें, तो समझ लेना कि मोदी ने किसी की चाबी टाइट की है।”
फिलहाल FCRA बिल और ट्रेड डील पर भारत के हितों से समझौता न करने के फैसले ने कई लोगों की चाबी टाइट कर दी है!
इसीलिए चारों तरफ शोर है, विरोध है और अराजकता का माहौल बनाने की कोशिशें हैं। सवाल सीधा है, आखिर मोदी सरकार के इन फैसलों से किसके हितों को चोट पहुँची है?
कहीं यह पूरा हंगामा उन्हीं ताकतों के इशारे और पैसे पर तो नहीं हो रहा, जिनकी मनमानी पर मोदी सरकार ने लगाम लगाई है?
शोर कितना भी मचा लें, एक बात तय है: मोदी झुकने वालों में से नहीं हैं, और भारत के हितों से समझौता करने वालों में से भी नहीं!
जाने-माने वकील हरीश साल्वे के चौंकाने वाले खुलासे और बीजेपी के गंभीर आरोपों ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया है.. क्या वाकई भारत के खिलाफ कोई बड़ी विदेशी और अंदरूनी साजिश रची जा रही है?
हरीश साल्वे ने चेतावनी दी है कि नेपाल-बांग्लादेश की तर्ज पर भारत में भी Regime Change मॉडल थोपने की कोशिश हो रही है.. पश्चिमी देशों की नाराज़गी और विरोध-प्रदर्शनों के लिए मिल रही विदेशी फंडिंग इस बात का बड़ा सबूत है कि देश की तरक्की कुछ ताकतों को हज़म नहीं हो रही...
दूसरी तरफ, बीजेपी ने भी कांग्रेस और उसके इकोसिस्टम पर देश के लोकतंत्र को खतरे में डालने का गंभीर आरोप लगाया है.. प्रशांत भूषण के कथित बयानों को लेकर भी सियासत गरमा गई है...
जब देश लगातार आगे बढ़ रहा है, तो ऐसी ताक़तें क्यों सक्रिय हैं? क्या ये देश के खिलाफ कोई गहरी साज़िश है?
#gyaneshkumar
#regimechange
#harishsavey
@BJP4India@INCIndia@AamAadmiParty@CJP_for_India
सुप्रीम कोर्ट में राहुल गांधी की याचिका, क्या यह उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक भूल साबित होगी? 🤔
राहुल गांधी की याचिका में दो प्रमुख माँगें बताई जा रही हैं:
1️⃣ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की माँग।
2️⃣ SIR की प्रक्रिया पर रोक लगाने की माँग।
अब गेंद राहुल गांधी के पाले से निकलकर सुप्रीम कोर्ट के पाले में पहुँच गई है। सुनवाई के बाद अदालत जो भी निर्णय देगी, उसे स्वीकार करना होगा। फिर विरोध का अगला मुद्दा क्या होगा?
अब तो सुप्रीम कोर्ट को भी सतर्क रहना चाहिए! अगर फैसला राहुल गांधी की मर्ज़ी के मुताबिक नहीं आया, तो क्या अगला नैरेटिव न्यायपालिका के ख़िलाफ़ गढ़ा जाएगा? क्या फिर किसी न्यायाधीश के इस्तीफ़े की माँग उठेगी? दिलचस्प मोड़ आ गया है, क्योंकि अब मामला राजनीतिक मंच से निकलकर अदालत तक पहुँच चुका है।
भाई, आप लोग ख़ुद समझदार हैं, ज़रा बताइए कि SIR की प्रक्रिया को कानूनी आधार पर रोकने का ठोस कारण क्या है?
और एक बात अब तक समझ से परे है। एक संवैधानिक पद पर बैठे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को विपक्ष के नेताओं ने सार्वजनिक रूप से 'गद्दार', 'वोट चोर' और न जाने कितनी उपाधियाँ दे डालीं। सवाल यह है कि अगर ज्ञानेश कुमार भी पलटकर मानहानि का मुक़दमा कर दें और कहें कि अब केवल बयान नहीं, कानूनी कार्रवाई चाहिए, तो फिर क्या होगा?
आरोप लगाना आसान है, लेकिन आरोपों की जवाबदेही से बचना इतना आसान नहीं होना चाहिए।
लोकतंत्र में अदालत का दरवाज़ा खटखटाना अधिकार है, लेकिन फैसला अपने पक्ष में न आने पर संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना कौन-सी लोकतांत्रिक मर्यादा है?
अब इंतज़ार कीजिए। अदालत को निर्णय देने दीजिए। फिर देखिए, फैसले का सम्मान होता है या विरोध का एक नया अध्याय शुरू होता है!
बैरीकेट चढ़ गया तो PM बना दो 😂
ठंड से नहीं डरता तो PM बना दो 😂
गांधी परिवार का चिराग है PM बना दो 😂
हाफ टी शर्ट पहन कर संसद आता है PM बना दो 😂
99 चुनाव हार गया 😂
लेकिन PM बना दो 😂😂😂
सारे खबरें और हरकतों को देखकर यही नतीजा निकलता है कि 10 अक्टूबर को देश में गृह युद्ध की साजिश रची गई थी और इस गृह युद्ध से हमें मोदी जी और अमित शाह जी ने बचाया है ।
मोदी जी ,अमित शाह जी हम आपके बहुत आभारी रहेंगे देश की जनता देख रही है कैसे राहुल गांधी ,केजरीवाल और तिलचट्टे हमारे संप्रभुता को खतरे में डालना चाह रहे थे ।
अब आपको कोई भी सबूत मिले सीधे अंदर करें इन्हें अनिश्चित काल के लिए इनसे इनका चुनाव लड़ने का हक खत्म करें।ये देश के लिए खतरा है
दिल्ली दंगों में हमने देखा ,किसान दंगों में हमने देखा इन लोगों के स्वार्थ के लिए मासूम लोगों को दिक्कत हुई बहुतों की जिंदगी खत्म हो गई
आप लोगों ने देश को बचाया है।
आभार 🙏
राहुल गांधी की राजनीति है या किसी की लिखी हुई फ्लॉप स्क्रिप्ट का बार-बार मंचन? 🤔
दिल्ली में चार-पाँच दिन तक ‘वोट चोरी’, ईवीएम और लोकतंत्र की दुहाई; चेन्नई पहुँचते ही वही मुद्दे गायब और शुरू हो गया ‘उत्तर बनाम दक्षिण’ का राग!
आखिर राहुल गांधी की यह कैसी राजनीति है? इनकी स्क्रिप्ट लिखता कौन है? और सबसे बड़ा सवाल, क्या राहुल को खुद भी कभी अपनी राजनीति पर विचार करने की फुर्सत मिलती है?
राहुल जी, जरा अपने आसपास भी नजर डालिए। कहीं कोई ऐसा ‘भीतरी भेदी’ तो नहीं, जो आपके नाम पर आपकी ही सियासी लंका में आग लगाने की पटकथा लिख रहा है? जो बार-बार गलत नंबर डायल करवाकर आपको ऐसी राजनीतिक कॉल पर लगा देता है, जिसका हर अगला संवाद आपकी विश्वसनीयता को और कमजोर कर देता है!
दिल्ली में चुनाव पर सवाल, चेन्नई में क्षेत्रीय अस्मिता का उबाल। जहाँ राजनीतिक सुविधा दिखे, वहाँ मुद्दा बदल जाए! चुनावी प्रक्रिया पर सवाल हैं तो हर जगह एक जैसे मानदंड होने चाहिए। परिसीमन पर चिंता है तो तथ्यों के साथ बहस होनी चाहिए, न कि उत्तर-दक्षिण के बीच अविश्वास की दीवार खड़ी की जाए।
अमित शाह संसद में दक्षिणी राज्यों को नुकसान न होने देने और सीटें बढ़ाने की बात कह चुके हैं। ऐसे में आशंकाओं का समाधान तथ्यों और संवैधानिक प्रक्रिया से होना चाहिए, राजनीतिक भय से नहीं।
राहुल जी, एक सलाह है। कभी शौचालय में बैठे-बैठे ही अपनी राजनीतिक पटकथा पर थोड़ा मंथन कर लिया कीजिए! कम-से-कम इतना तो समझ आएगा कि हर बार नया मुद्दा उठाने से पहले पुराने आरोपों का हिसाब भी देना पड़ता है। 😏
नेतृत्व का मतलब सिर्फ माइक पकड़ना नहीं, अपनी बुद्धि से सही-गलत पहचानना भी है। अगर हर बार कोई दूसरा आपकी सोच की दिशा तय कर रहा है, तो फिर सवाल उठेगा कि राजनीति आप कर रहे हैं या कोई और आपको मोहरा बनाकर खेल रहा है?
और अगर बार-बार की राजनीतिक गलतियों के बाद भी आत्ममंथन का बल्ब नहीं जलता, तो समस्या स्क्रिप्ट लिखने वाले से ज्यादा उसे बिना सोचे-समझे स्वीकार करने वाले की है।
लोकतंत्र में विपक्ष जरूरी है, लेकिन विपक्ष की विश्वसनीयता भी जरूरी है। देश को जोड़ने की बात करने वाले नेता अगर अपनी राजनीति में ही देश को बाँटने वाले मुद्दे चुनें, तो जनता आखिर उन पर भरोसा क्यों करे?
राहुल जी, अगली बार माइक पकड़ने से पहले स्क्रिप्ट पढ़ने के साथ थोड़ा खुद भी सोच लीजिए। कहीं ऐसा न हो कि लेखक अपनी फीस लेकर निकल जाए और राजनीतिक नुकसान का पूरा बिल आपके नाम कट जाए! 😏
Last week હું ચણિયાચોળી લેવા માર્કેટમાં ગઈતી,ત્યાં જોઈને હું surprised થઈ ગઈ. 80% ચણિયાચોળી સ્લીવલેસ or સ્પેગેટી ટોપવાળી બ્લાઉઝ ડિઝાઇન હતી,અને એમાં પણ મોટાભાગની બેકલેસ હતી.
મને વિચાર આવ્યો કે શું આ બધું કોઈ ચોક્કસ વ્યૂહરચનાના ભાગરૂપે ધીમે ધીમે સામાન્ય બનાવવામાં આવી રહ્યું છે?..1
हाँ, मोदी डर गया!
क्योंकि वो ना तो इंदिरा गांधी की तरह देश में आपातकाल लगा सकता है।
ना कांग्रेस की तरह 1984 में सिखों का कत्लेआम करवा सकता है।
ना ही वो राहुल गांधी की तरह विदेशों में देश विरोधी बातें कर सकता, ना ही सेना का अपमान कर सकता है।
ना ही वो सोनिया गांधी की तरह बाटला हाउस में मरे आतंकियों के लिए रो सकता है।
ना ही वो सपा की तरह कारसेवकों पे गोली चलवा सकता है।
ना ही वो TMC की तरह बांग्लादेशी घुसपैठियों से हिंदुओं पे अत्याचार करवा सकता है।
ना ही वो PDP और JKNC की तरह कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़ने पे मजबूर कर सकता है।
ना ही वो RJD की तरह बिहार में किडनैपिंग का धंधा और नौकरी के बदले जमीन लेकर भ्रष्टाचार करवा सकता है।
ना ही वो केजरीवाल की तरह करोड़ों का शीशमहल बना जनता के पैसों को लूट सकता है।
अरे वो तो हीरा बा का लाल है, जो इन सब विपक्षी दलों की ऐसी राजनीति को खत्म कर सबका साथ, सबका विकास कर, सबका विश्वास बन गया है, तभी तो इनकी आँखों में चुभ रहा है।
पर देश 🇮🇳 मोदी के साथ खड़ा था, खड़ा है और अंतिम साँस तक मजबूती से खड़ा रहेगा!
કોંગ્રેસના સમર્થનમાં આખી જિંદગી સુપ્રીમ કોર્ટમાં અલગ અલગ કેસ લડનાર પૂર્વ કેન્દ્રીય મંત્રી & વકીલ કપિલ સિબ્બલે કહ્યુ કોગ્રેસ ખોટા રસ્તે જઈ રહી છે, વોટચોરીના સબૂત નથી કોંગ્રેસ પાસે.!!
હવે શું કોંગ્રેસ તેને પણ અંધભક્ત જાહેર કરશે???
ચનચાઓ જ જવાબ આપે !!!
હવે કપિલ સિબલ સંઘી ?
ડોફાઓ મરીજાવ ઢાકણી મા પાણી લઇને
> 10 વર્ષ માં દેશ ક્યાંથી ક્યાં પહોંચી ગયો એ દેખાતું નથી અને તમને પ્રેસ કોન્ફરન્સ ની પડી છે? કામ બોલે છે સાહેબ, ફોટા પડાવવાથી દેશ નથી ચાલતો.
> #ModiHaiToMumkinHai#IndiaFirst
कॉक्रोचों ने ₹50,000 का बांड साइन किया है कि वे एक साल तक शांति भंग नहीं करेंगे।
ध्रुव राठी ने भी पुलिस को लिख कर दिया है कि वह आगे से किसी प्रदर्शन का हिस्सा नहीं बनेगा।
सभी ने कोर्ट के आगे नाक रगड़कर शर्तें स्वीकार की हैं।
अब क्रांति का नहीं, लोकतंत्र का दौर है।
काँग्रेस के इन राज्यों में इतने साल से CM नहीं है
- तमिलनाडु में 59
- बंगाल में 49
- सिक्किम में 42
- उत्तर प्रदेश में 37
- बिहार में 36
- गुजरात में 30
- ओडिशा में 26
- नागालैंड में 23
- महाराष्ट्र में 12
काँग्रेसी बताए 50 साल से 'वोट चोरी' ज्ञानेश कुमार करवा रहे है क्या?
दिल्ली में चल रही कांग्रेसी नौटंकी पर दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस शिव नारायण ढींगरा ने करारा सवाल उठाया।
उनके अनुसार:
“यह पूरा हंगामा मतदाताओं की तरफ से नहीं हो रहा है। यह उन राजनीतिक दलों की तरफ से हो रहा है, जो चुनाव नहीं जीत पाए।”
😎 अगर किसी मतदाता को शिकायत है, तो उसके समाधान की व्यवस्था मौजूद है। मतदाता सूची से नाम गलत तरीके से हटाया गया है, तो चुनाव आयोग के समक्ष शिकायत की जा सकती है।
लेकिन SIR का ही विरोध करना और यह कहना कि SIR नहीं होना चाहिए, इसका मकसद सिर्फ चुनाव आयोग को अपना काम करने से रोकना है।
SIR चुनाव आयोग को संसद की ओर से सौंपा गया कानूनी दायित्व है। आयोग को समय-समय पर मतदाता सूची संशोधित करनी है, मृत व्यक्तियों के नाम हटाने हैं और नए पात्र मतदाताओं के नाम जोड़ने हैं।
कानून का उद्देश्य यह भी सुनिश्चित करना है कि भारत का गैर-नागरिक मतदान का अधिकार प्राप्त न करे।
जब शिकायत के लिए व्यवस्था है और मतदाता सूची का संशोधन कानूनी दायित्व है, तो SIR से इतनी परेशानी क्यों?
आखिर मतदाता सूची की शुद्धता से समस्या है या फिर चुनाव आयोग को अपना काम करने देने से? 😎
पिछली बार बस से नहीं उतरे थे भाई साहब.. इस बार जानबूझकर प्लेन में ही डीटेन हो गए...
जब बेंगलुरु में दो दिन पहले प्रोटेस्ट खत्म हो चुका था तो आज की फ्लाइट से दिल्ली क्यों आना था...
ताकि पुलिस को पता रहे कि कब आ रहे हैं और कहां मिलेंगे...
ताकि जंतर-मंतर जाना ही ना पड़े।
झूठ फैलाओ.. पब्लिक को उकसाओ.. खुद ऐन वक्त पर कट लो.. यही इनका हिसाब है।
मोदी से पहले भारत में सरकारें बदलती थीं, सत्ता के पीछे बैठा सिस्टम नहीं!
कांग्रेस के दौर में सत्ता बदलने का मतलब अक्सर सिर्फ चेहरे बदलना था। राजनीतिक कुनबों, दरबारियों और रसूखदारों का प्रभाव कायम रहता था। देश लोकतंत्र था, लेकिन सत्ता पर कुछ परिवारों का स्थायी दावा दिखाई देता था।
2014 में सरकार बदली, 2019 के बाद व्यवस्था की जड़ों को चुनौती मिली। रक्षा उत्पादन, तकनीक, बुनियादी ढाँचे और वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती भूमिका ने पुराने राजनीतिक समीकरणों को बदलना शुरू किया।
2024 में भाजपा की सीटें घटीं, लेकिन सरकार बनी और उसका एजेंडा रुका नहीं। यही वह बिंदु है जहाँ सत्ता की राजनीति और व्यवस्था बदलने की राजनीति आमने-सामने खड़ी हैं।
कांग्रेस हो या सपा, टीएमसी या कोई अन्य दल, सवाल सीधा है: अगर लोकतंत्र पर इतना भरोसा है, तो पार्टियों के भीतर परिवारवाद का ताला क्यों नहीं टूटता? नेतृत्व जनता और कार्यकर्ताओं से तय होगा या परिवार की विरासत से?
पुरानी व्यवस्था के लाभार्थियों को बदलाव असहज लग सकता है, लेकिन लोकतंत्र किसी की निजी जागीर नहीं। विपक्ष का काम सरकार को चुनौती देना है, मगर हर चुनावी हार को साजिश बताना और हर संस्थागत प्रक्रिया पर सवाल उठाना अपने आप में प्रमाण नहीं बन जाता।
याद रखिए, 2024 सिर्फ सीटों का हिसाब नहीं था। वह संदेश था कि सत्ता सीमित हो सकती है, लेकिन जनादेश से निकली राजनीति का रास्ता बंद नहीं किया जा सकता।
भारत किसी खानदान की बपौती नहीं, और लोकतंत्र किसी का पुश्तैनी कारोबार नहीं!