Rajputs mustn't just assert themselves but also demand their share, their rights, their ownership over Rajput-built UNESCO sites, ownership over Rajput-built hospitals & schools just like Sikhs, Muslims, Jains have.
Above all, Rajputs must re-militarise themselves like Sikhs. Why should my enemy own my heritage.
Learn how Sikhs deal with these scums
@kArthEEkYV @RajputraRising It may come as a shock to you that nowhere Ravan's son or even Angad called as Rajaputra. Not a single such mention, whereas Rama and Lakshamana were called as Rajaputra many times.
Major Shaitan Singh's role is not limited to those hours of the battle, it started from the day he reached Rezang La... He relocated the 3" Mortar section according to his experience, which fired 993/1000 bombs in the battle and I believe it claimed most chinese lives. He got the defences prepared at tactical locations, including the flanks which thwarted the Chinese in initial attacks. For your knowledge I'll tell you, he was the only officer in 13 KUMAON with prior experience of service in Ladakh and knowledge of mountain warfare. During the battle he made sure that whatever resources they had could be utilised. He was in contact with his platoons and obviously he did not order or offer a retreat which you guys claim.
All the officers in Ladakh had pistols, so did Major Shaitan Singh, PVC. But according to survivors he had a LMG by his side at the end. Just to prove your agenda you cannot tarnish the image of a National Hero.
All those who died in the battle trusted their commander and on his command they sacrificed their lives the survivors never disrespect him, because they know what he did and how he did!
Film makers take creative liberty, it has always been done; in Border, in Haqeeqat, in LOC Kargil and in Shershah too!
भगवान श्री राम के अनुज श्री लक्ष्मण जी के वंशज, विदेशी invaders के प्रबल विरोधी और गुर्जर प्रदेश के गौरव एवं प्रतिहार क्षत्रिय वंश के सम्राट मिहिर भोज जी की जयंती पर कोटि-कोटि नमन! देश, धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता! #RAJPUTSAMRATMIHIRBHOJPARIHAR
सूर्यवंश के दैदीप्यमान नक्षत्र, इक्ष्वाकु, रघु, दिलीप की परंपरा के संवाहक, मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के अनुज महाराज लक्ष्मण जी के विशुद्ध वंशज, गुर्जर प्रदेश के अधिपति, राजपूत प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज जी की जयंती पर उन्हें शत-शत नमन ॥
#मिहिरभोजमहोत्सव
#RajputSamratMihirbhojPratiharJyanti
#राजपूत_सम्राट_मिहिरभोज_प्रतिहार_जयंती
भगवान श्री लक्ष्मण जी के वंशज, अरब आक्रमणों के विरुद्ध अजेय प्रतिरोध के प्रतीक, गुर्जर प्रदेश के गौरव एवं प्रतिहार वंश के परम सम्राट मिहिर भोज जी की जयंती पर कोटि-कोटि नमन।
वे भारतीय सभ्यता की ढाल और आक्रमणकारियों के लिए काल स्वरूप थे।भारतीय संस्कृति की रक्षा हेतु उनका अद्वितीय शौर्य, दूरदर्शिता और त्याग सदैव स्मरणीय रहेंगे।
उनकी गौरवशाली विरासत हमें राष्ट्रपथ पर अग्रसर होने की अमिट प्रेरणा देती है। #RAJPUTSAMRATMIHIRBHOJPARIHAR
सितंबर 2024 में बून्दी के 9वें शासक राव श्री सूरजमल जी की ऐतिहासिक छतरी और मंदिर का ध्वस्त होना समाज की भावनाओं को गहरी ठेस पहुँचाता है।
इस पावन धरोहर का शीघ्र पुनर्निर्माण किया जाए ताकि हमारी आस्था और स्वाभिमान सुरक्षित रह सकें।
साथ ही बून्दी- कोटा हवाई अड्डे का नामकरण राव श्री सूरजमल जी के नाम पर किया जाए, जिससे भावी पीढ़ियाँ उनके बलिदान और हाड़ौती की गौरवशाली परंपरा से प्रेरणा ले सकें।
यह कोई मांग नहीं, बल्कि समाज का न्यायसंगत अधिकार है।
अतः तत्काल ठोस कार्रवाई हो।
जय राव श्री सूरजमल जी 🙏
जै जै हाड़ौती 🚩
#राव_सूरजमल_हाड़ा #छतरी #Bundi #Kota #Hadauti
स्वर्णनगरी जैसलमेर के 870वें स्थापना दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।
जैसलमेर का गौरवमयी इतिहास, भव्य स्थापत्य कला, समृद्ध लोक परंपराएं और अनुपम संस्कृति, सम्पूर्ण विश्व में हमारी विशिष्ट पहचान हैं।
आइए, हम सब मिलकर पूर्वजों की विरासत को सम्मान दें और आपसी प्रेम व भाईचारे से समाज को और अधिक सशक्त बनाएं। जैसलमेर सदैव समृद्धि के पथ पर अग्रसर रहे और नित नई ऊँचाइयों को छुएं।
माँ स्वांगिया जी व श्री लक्ष्मीनाथ जी से प्रार्थना है कि वे हम सभी के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का संचार करें।
Maharana of Mewar has spoken on this matter, and there should now be no doubt in anyone’s mind that @ncert has failed in its duty to present accurate historical facts.
This MS Paint map even includes places like Jaisalmer where the Marathas never even set foot.
Government and NCERT must take urgent cognisance of this issue and correct the mistake without delay.
कक्षा 8 की NCERT की सामाजिक विज्ञान विषय पाठ्यपुस्तक (Unit 3, पृष्ठ संख्या 71) में दर्शाए गए मानचित्र में जैसलमेर को तत्कालीन मराठा साम्राज्य का भाग दर्शाया गया है, जो कि ऐतिहासिक रूप से भ्रामक, तथ्यहीन और गम्भीर रूप से आपत्तिजनक है।
इस प्रकार की अपुष्ट और ऐतिहासिक साक्ष्यविहीन जानकारी न केवल NCERT जैसी संस्थाओं की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाती है, बल्कि हमारे गौरवशाली इतिहास और जनभावनाओं को भी आघात पहुंचाती है। यह विषय केवल एक पाठ्यपुस्तक की त्रुटि नहीं, बल्कि हमारे पूर्वजों के बलिदान, संप्रभुता और शौर्य गाथा को धूमिल करने का प्रयास प्रतीत होता है।
जैसलमेर रियासत के संदर्भ में उपलब्ध प्रामाणिक ऐतिहासिक स्रोतों में कहीं भी मराठा आधिपत्य, आक्रमण, कराधान या प्रभुत्व का कोई उल्लेख नहीं मिलता। इसके विपरीत, हमारी राजकीय पुस्तकों में भी स्पष्ट उल्लेखित है कि जैसलमेर रियासत में मराठाओं का कभी भी, कोई दखल नहीं रहा।
माननीय शिक्षा मंत्री श्री @dpradhanbjp जी, संपूर्ण जैसलमेर परिवार की ओर से मैं आपका ध्यान इस ज्वलंत विषय की ओर आकृष्ट करना चाहता हूँ कि NCERT द्वारा की गई इस प्रकार की त्रुटिपूर्ण, दुर्भावनापूर्ण और एजेंडा-प्रेरित प्रस्तुति को गंभीरता से लेते हुए तत्काल संशोधन करवाया जाए।
यह केवल एक तथ्य संशोधन नहीं, बल्कि हमारी ऐतिहासिक गरिमा, आत्मसम्मान और राष्ट्रीय पाठ्यक्रम की सत्यनिष्ठा से जुड़ा विषय है। इस विषय पर त्वरित एवं ठोस कार्रवाई की अपेक्षा है। @ncert
"जोधपुर एयरपोर्ट का नामकरण जोधपुर के महाराजा उम्मेद सिंह के नाम पर किया जाएगा, क्योंकि उन्होंने इस एयरपोर्ट की स्थापना की थी। अतः यह उचित है कि एयरपोर्ट को उन्हीं के नाम से सम्मानित किया जाए। जो लोग इसका नाम किसी और के नाम पर रखने की मांग कर रहे हैं, उन्हें यह तथ्य समझना चाहिए कि इस ऐतिहासिक योगदान को सम्मान देना हम सबकी ज़िम्मेदारी है।"
@gssjodhpur@DS_Khimsar@RavindraBhati__@BhajanlalBjp@dineshbohrabmr
#UmaidSinghAirportNow #JodhpurMangeUmaidSinghAirport #HonorUmaidSingh
पिछली पोस्ट में हमने नागौर के Super Saiyan जाटों के इतिहास के बारे में जाना।
आइए आज बात करते है पूर्ववर्ती बीकानेर रियासत (बीकानेर, चुरू, हनुमानगढ़, गंगानगर) के शूरवीर जाट यौद्धाओं के बारे में:
राठोड़ों के जांगल देश फतेह से पूर्व यह इलाका विभिन्न राजपूत वंशों द्वारा शासित हुआ करता था जिनमे भाटी, सांखला, मोहिल और चायल प्रमुख थे। इसी इलाके के उत्तर पूर्व में जाटों की भी एक बड़ी आबादी थी। गोदारा, सारण, कसवां, बेनीवाल और पूनिया जाट इस इलाके में बसे हुए थे एवं जो भी राजपूत वंश मजबूत होता था उसे टैक्स दिया करते थे।
पांडू गोदारा शेखसर गांव का चौधरी था। मस्तमौला स्वभाव का होने के कारण उसकी ख्याति जाटों के कई गांवों में फैली हुई थी। एक दिन भादंग के चौधरी पूला सारण की बीवी मलकी ने पांडू की तारीफ कर दी। इस पर क्रोधित होकर नशे में चूर पूला ने उसकी पिटाई कर कह दिया की जाकर उसी के पास रह ले।
जब यह बात पांडू को पता लगी तो उसने तुरंत अपने पुत्र को हुक्म दिया की जाकर मलकी को उठा ला।
बाद में जब पूला को पता लगा की उसकी मलकी तो गोदारा के साथ फरार हो चुकी है तो उसे अपमान महसूस हुआ। परंतु वह इस बात से भली भांति परिचित था की पांडू के ऊपर राव बीका का हाथ था इसलिए राजपूतों से निपटने के लिए जाटों ने राजपूत का ही सहारा लेने की सोची और सिवानी के नरसिंह तंवर को अप्रोच किया गया।
लॉन्ग स्टोरी शॉर्ट, राव बीका ने नरसिंह तंवर को वन टू वन duel में पराजित कर मार दिया। जाटों के पैर उखड़ गए और सभी जाट खापो ने खून की एक बूंद बहाए बिना एक झटके में बीका के सामने आत्मसर्पण कर दिया।
तो ये था बीकानेर के जाट वीरों और उनके आखिरी महान शासक महाराजधिराज पांडु का दुखद इतिहास जिसे सामंतवादी राठौड़ों ने दबा दिया।
इस कहानी के प्रायोजक है B-Tex super मतलब दाद खाज खुजली खल्लास।
The Jat Delal family of Rohtak remained loyal to the Mughals, and so the Mughals granted them Kuchesar estate to provide security for the Jat borderlands. No-one. could say the Mughals were anti-Jat if the biggest zamindars outside Delhi were themselves jats.
"जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी!"
भगवान राम वाल्मीकि रामायण में कहते हैं कि मां और मातृभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ होती हैं।
लेकिन आप कल्पना कर सकते हैं उन लोगों की निकृष्टता का, जो अपनी ही मातृभूमि को अपशब्द कहने वाले एक जाहिल व्यक्ति को अपनी कौम का रहनुमा मान लेते हैं।
वो भी उस भूमि के लिए, जिसकी वीरता और शौर्य की गाथाएं विदेशी तक गाते हैं।
नागौर का इतिहास – जब राजपूत लड़े, पर जाट खामोश रहे
परिचय: नागौर, राजस्थान का एक प्राचीन और रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण क्षेत्र रहा है। यहां लंबे समय तक तुर्क शासन कायम रहा। प्रश्न यह उठता है कि जब यह इलाका जाट बाहुल्य था, तब इनकी बड़ी जनसंख्या इस विदेशी शासन को क्यों नहीं हटा सकी? दूसरी ओर, राजपूतों ने बार-बार अपनी सैन्य शक्ति से नागौर को चुनौती दी और कई बार कब्जा भी किया।
मुस्लिम शासन की शुरुआत और विस्तार: नागौर पर मुस्लिम सत्ता की शुरुआत 12वीं सदी के अंत में दिल्ली सल्तनत के समय हुई। बाद में यह क्षेत्र तुग़लक़, खिलजी और फिर मुगलों के अधीन आया। इस पूरे काल में कई हिंदू विरोधी नीतियाँ चलीं, जिससे आम जनता पर भी असर पड़ा।
राजपूतों का संघर्ष: राजपूतों ने कभी नागौर की सत्ता को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। राणा कुम्भा (15वीं सदी) जैसे शक्तिशाली शासकों ने इस क्षेत्र पर आक्रमण किए और कई बार किले पर अधिकार भी किया। राठौड़ राजाओं ने भी समय-समय पर मुगलों या मुस्लिम नवाबों से संघर्ष कर यह क्षेत्र जीता। मेड़ता और आस पास का इलाका ज्यादातर समय राजपूतों के अधिकार में रहा वही गौड़वाटी (आज का परबतसर, कुचामन, मारोठ क्षेत्र) में पहले गौड़ राजपूतों ने और बाद में मेड़तिया राठौड़ों ने अपने सैन्य बल से आम जनता को बाहरी आक्रमणकारियों से सुरक्षित रखा।
गिरी सुमेल का मशहूर युद्ध जिसमें आठ हजार राजपूतों की फौज ने अस्सी हज़ार अफगानों को लगभग मात दे ही दी थी वह आज के जैतारण कस्बे के निकट हुआ था। यह इलाका बिलाड़ा, पीपाड़ और भोपालगढ़ जैसे जाट मेजॉरिटी क्षेत्रों के नजदीक है। तब वहां के तथाकथित शूरवीर जाट योद्धा इस जंग में शामिल होने क्यों नहीं आए जबकि शेरशाह की फौज का रास्ता डीडवाना से होते हुए मेड़ता और उसके आगे गिरी सुमेल था । आज के राजनीतिक डिस्कोर्स में ये इलाके जाट बाहुल्य बताए जाते है। जब शेर शाह की फौज इस इलाके से गुजर रही थी तो हड़मान बेनीवाल के बाप दादा क्यों घाघरा पहन कर बैठे हुए थे।
महाराजा जसवंत सिंह की मृत्यु के बाद राव दुर्गादास के नेतृत्व में मारवाड़ के राजपूतों ने औरंगजेब के खिलाफ सैन्य विद्रोह किया। तीस साल तक चले इस विद्रोह में मुगल फौजदारों के ज्यादातर थाने उन कस्बों में थे जहां आसपास अच्छी जाट आबादी है। लेकिन इन तीन दशकों के इतिहास में हमे इन जाटों द्वारा मुगलों के खिलाफ किए गए एक भी विद्रोह का प्रमाण नहीं मिलता जबकि इसी इलाके के राजपूत छापामारी पद्धति से युद्ध कर लगातार मुगलों से लोहा लेते रहे। हालात ये हो गए थे कि मुगल थानेदारों को इन्हीं राजपूत विद्रोहियों को आगे से टैक्स देना पड़ता था ताकि उनके इलाके में उपद्रव ज्यादा नहीं फैले।
जाट कहते है कि राजपूतों ने चुपचाप अंग्रेजों के सामने घुटने टेक दिए। लेकिन ये धूर्त लोग जानबूझकर यह मेंशन करना भूल जाते है कि अंग्रेजों से संधि से पहले कोई पचास साल तक मारवाड़ (खासकर आज के नागौर जिले का इलाका) मराठों की मार झेलता रहा। इन मराठे लुटेरों ने सबसे ज्यादा इन जाट किसानों की महिलाओं के साथ ज्यादती की, लेकिन मजाल है ये नामर्द इसके खिलाफ एक आवाज़ भी उठा सके।
कहां थे जाट जब मारवाड़ के राजपूत जयप्पा सिंधिया से लड़ रहे थे, जब घोड़े पर सवार मतवाले राठौड़ फ्रांसीसी जनरल De Boigne की तोपों के सामने headlong cavalry charge कर वीरगति प्राप्त कर रहे थे।
पांच से भी ज्यादा दशकों तक मराठों एवं पिंडारियों के आतंक से परेशान मारवाड़ नरेश के पास आखिर में अंग्रेजों से संधि के अलावा और कोई विकल्प शेष नहीं बचा था। और ये संधि उन्होंने अपनी सुरक्षा के लिए नहीं की (इतिहास गवाह है कि राजपूत हमेशा युद्ध को प्राथमिकता देता आया है), ये संधि उन्होंने इसलिए कि ताकि उनके बेचारे जाट किसान चैन से अपनी खेती कर सके।
लेकिन फिर भी अगर बेनीवाल के पूर्वजों को इतनी ही समस्या थी तो कर देते अंग्रेजों के खिलाफ गदर। इतिहास गवाह है कि नागौर में किसान आंदोलन की ढंग से शुरुआत ही नहीं पाई। उल्टा जाटों के बड़े नेता जोधपुर महाराजा से प्रार्थना कर उनसे नागौर में जाट हॉस्टल बनवाने के लिए पैसे की मांग करने हेतु उन्हें चापलूसी भरी चिट्ठियां लिख रहे थे।
आज उन्हीं चापलूसों की अमलदार औलादें राजपूतों के खिलाफ जहर उगलती रहती है।
तो फिर अब सवाल उठता है कि जाट कहाँ थे?
सत्य तो यह कि जब पूर्वी मारवाड़ का राजपूत सदियों से बाहरी आक्रमणकरियों से लड़ रहा था तब यहां का जाट किसान उनकी जी हजूरी कर बढ़िया मलाई लूट रहा था। जाट खुद गर्व से स्वीकार करते है कि अलाउद्दीन खिलजी के राज में उनकी चांदी हो रखी थी। इसका ज्वलंतशील उदाहरण है जायल में मायरा भरे जाने वाली वो कहानी जिसमें इन्होंने खिलजियों की कृपा से करोड़ों का भात भरा था।
“When Maharana Pratap raised his Khanda, it flashed not for a Kshatriya’s glory alone—but for a Bhil’s arrow, a farmer’s sweat, for a Sur’s right to refuge, and the right of every soul to stand unbent under Mewar’s sky.”
May his memory forever ignite our hearts to fight not just for victory, but for justice; not for one, but for all.
Where the Bhil’s arrow flies, the farmer’s voice rises, and Hakim Khan’s blade shines beside the Khanda, there strides the spirit of Mewar.
Jai Maharana!
On this Sacred Day of Buddha Purnima: A Tribute to the Enlightened One
Today, under the calm radiance of the full moon, we bow in deep reverence to Siddhartha Gautama—the Buddha whose birth, enlightenment, and Mahaparinirvana are commemorated on this day. A Divine Being who walked this world with boundless compassion and unmatched wisdom, the Buddha did not ask for worship—he invited understanding, inner peace, and awakening.
Over 2,500 years ago, he left behind a life of privilege not for ascetic glory, but to uncover the root of suffering and the path to true freedom.
The Buddha taught us:
That life is marked by Dukkha (suffering), but it is not without hope.
That suffering arises from tanha (craving, attachment, and ignorance).
That release is possible—through Nirvana, the cessation of suffering.
That the way lies in the Noble Eightfold Path—a guide to ethical living, mental discipline, and liberating insight.
His teachings are not commands—they are invitations. He did not demand belief—he encouraged questioning. He walked as a Divine Being among us, embodying the very ideals he spoke of: compassion without condition, awareness without judgment, and peace beyond form.
On this holy occasion, let us not merely offer flowers or incense, but offer our intention to live as he lived mindfully, kindly, and wisely. Let each thought be guided by compassion, each word be rooted in truth, and each step taken in awareness.
May the presence of the Buddha illuminate our hearts and bring peace to all beings.
“Appo deepo bhava — Be a light unto yourself.”
Happy Buddha Purnima!!