लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।।
इसी शहर में कई साल से मिरे कुछ क़रीबी अज़ीज़ हैं
उन्हें मेरी कोई ख़बर नहीं मुझे उन का कोई पता नहीं।।
अजीब शख़्स है नाराज़ हो के हँसता है
मैं चाहता हूँ ख़फ़ा हो तो वो ख़फ़ा ही लगे।।
ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं
पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है।।
यहाँ लिबास की क़ीमत है आदमी की नहीं
मुझे गिलास बड़े दे शराब कम कर दे ।।
कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी,
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता।।
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।।
घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें,
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए।।
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो।
कभी तो शाम ढले अपने घर गए होते,
किसी की आँख में रह कर सँवर गए होते।।
अजीब चराग़ हूँ दिन-रात जलता रहता हूँ,
मैं थक गया हूँ हवा से कहो बुझाए मुझे।।
जिसे भी देखिए वो अपने आप में गुम है,
ज़ुबाँ मिली है मगर हमज़ुबाँ नहीं मिलता।।
अलविदा बशीर बद्र साहब
❤️❤️❤️
अनपढ़ लोगों से कहीं अधिक जिम्मेदारी पढ़े-लिखे लोगों की होती है कि वे समाज को सही दिशा दिखाएँ।
अगर किसी राजनीतिक दल, नीति या विचारधारा को वे देश और समाज के लिए हानिकारक मानते हैं,
तो उनका कर्तव्य है कि तथ्यों और तर्कों के आधार पर लोगों को सही और गलत का अंतर समझाएँ।
कुछ पढ़े-लिखे लोग यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करते हैं कि, "जो हाल सबका होगा, वही हमारा भी होगा।"
लेकिन उन्हें समझना चाहिए कि "सबका हाल" कोई अमूर्त बात नहीं है। उसमें आपके माता-पिता की सेहत, भाई-बहनों की शिक्षा और रोजगार, आपके बच्चों का भविष्य, आपकी आजीविका और आपके परिवार की सुरक्षा भी शामिल है।
समाज में जागरूकता फैलाना, गलतियों की ओर ध्यान दिलाना और बेहतर विकल्पों पर चर्चा करना एक जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य है।
केवल यह कह देना कि "जो होगा, सबके साथ होगा" अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होने का बहाना नहीं हो सकता।
मैं सब ले जाऊंगा अपनी मृत्यु पर अपने साथ... अपना प्रेम, उसका साथ, अपना मौन, उसकी आवाज़, अपना दुःख, पीड़ा, उदासी और उसके लिए सहा वियोग, मैं ले जाऊंगा सारे भाव अपने साथ और जल जाऊंगा प्रतीक्षा की अग्नि में एक दिन...!!!
तुम्हें सुनने के बाद
मैं मौन होना चाहता हूँ,
ताकि तुम्हारा कहा
भीतर उतार सकूँ।
और फिर,
जब भी मैं बोलूँ,
वो मैं से बदलकर "हम" हो जाए,
मैं चाहता हूं
तुम्हारी आवाज़ की गूँज
मेरे हर शब्द में नज़र आए।