डॉ. @ShahMeenesh , अध्यक्ष, एनडीडीबी ने एनडीडीबी के प्रबंधन में संचालित @SanchiDairy के भोपाल सहकारी दुग्ध संघ @bsds_sanchi द्वारा शुरू की गई विभिन्न नई पहलों का शुभारंभ किया। यह पहल मध्य प्रदेश में डेयरी सहकारी इकोसिस्टम को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इन पहलों में 12 नए मिल्क टैंकर, एक मोबाइल मिल्क टेस्टिंग लैबोरेटरी तथा डेयरी उत्पादों के वितरण के लिए 2 इलेक्ट्रिक वाहन शामिल हैं। इसके साथ ही भोपाल डेयरी के फैक्ट्री गेट पर सांची स्मार्ट पार्लर का भी उद्घाटन किया गया, जिससे उपभोक्ताओं को गुणवत्तापूर्ण एवं सुरक्षित सांची दूध तथा विभिन्न प्रकार के दुग्ध उत्पाद सुविधाजनक रूप से उपलब्ध हो सकेंगे। इस अवसर पर डॉ. संजय गोवानी, निवर्तमान प्रबंध संचालक, मध्य प्रदेश स्टेट को-ऑपरेटिव डेयरी फेडरेशन @SanchiDairy , श्री प्रितेश जोशी, प्रबंध निदेशक, भोपाल दुग्ध संघ तथा अन्य वरिष्ठ अधिकारियों भी उपस्थित रहें ।
इस अवसर पर एनडीडीबी के अध्यक्ष ने कहा कि डेयरी क्षेत्र को अधिक दक्ष और उपभोक्ता-केंद्रित बनाने के लिए आधुनिक परिवहन, वैज्ञानिक गुणवत्ता परीक्षण तथा पर्यावरण-अनुकूल वितरण प्रणालियां महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने डेयरी सहकारी प्रणाली में दुग्ध उत्पादकों और उपभोक्ताओं, दोनों के हितों को केंद्र में रखते हुए आधुनिक तकनीक का अधिकतम उपयोग करने के महत्व पर भी जोर दिया।
भोपाल दुग्ध संघ की प्रगति की जानकारी साझा करते हुए श्री प्रितेश जोशी ने बताया कि पिछले वर्ष की तुलना में दुग्ध संकलन में लगभग 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। उन्होंने बताया कि नए मिल्क टैंकर बढ़े हुए दुग्ध संकलन के सुरक्षित परिवहन में सहायक होंगे। साथ ही, मोबाइल मिल्क टेस्टिंग लैबोरेटरी के माध्यम से उपभोक्ता जागरूकता के प्रति संघ की प्रतिबद्धता को भी रेखांकित किया।
भारत सरकार के एनपीडीडी योजना एवं एनपीडीडी घटक बी JICA @jica_direct_en के अंतर्गत एनडीडीबी के सहयोग से विकसित ये पहलें डेयरी सहकारी इकोसिस्टम को सुदृढ़ करने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण को दर्शाती हैं, जिसमें दुग्ध उत्पादकों को सशक्त बनाने, दुग्ध संकलन में सुधार करने से लेकर गुणवत्ता, दक्षता और बेहतर बाजार पहुंच सुनिश्चित करने तक सभी पहलुओं को शामिल किया गया है। बढ़ते दुग्ध संकलन और उपभोक्ताओं की बढ़ती मांग के साथ, ये निवेश भोपाल दुग्ध संघ की अधिक सुदृढ़ता बढ़ाने तथा उत्पादकों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए बेहतर मूल्य सुनिश्चित करने में सहायक होंगे।
Today I boarded coach B-4 of trn no 22210 from NZM rly stn Delhi at 22:00 hrs. PNR No 2159637924. Gold chain i was wearing was snatched from inside the coach. FIR no. 80058643 dated 18/7/26 lodged at RPF PS NZM. @RailMinIndia@RailwaySeva@rpfnr_@RPF_INDIA@AshwiniVaishnaw
राजस्थान के नए सीएस वी. श्रीनिवास साहब ने शनिवार को दिल्ली के कुछ फ़ोटोज़ शेयर किए हैं, जिनमें हमारे प्रदेश के आईएएस दिख रहे हैं। ये फ़ोटो आईएएस के दिल्ली और जयपुर के भेद को साफ़ बताते हैं और मार्सेल प्रूस्त की उस बात को सही साबित करते हैं कि छोटी ताक़त से बड़ी ताक़त की ओर उन्मुख होते ही मनुष्य नैसर्गिक रूप में आता है और बड़े शक्ति केंद्र से छोटे शक्ति केंद्र की ओर लौटते हुए उसका हृदय विकल होने लगता है।
इन फ़ोटोज़ ने मेरी वे यादें ताज़ा कर दीं, जब मैं रिपोर्टिंग के लिए जयपुर से दिल्ली गया था और दो साल बाद दिल्ली से जयपुर आया था। आईएएस वही थे; लेकिन दिल्ली में और तरह दिखते थे और जयपुर में बिलकुल और तरह।
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आईएएस एक ही होता है; लेकिन जयपुर में वह किसी और तरह दिखता है और दिल्ली में बिलकुल अलग। कम आईएएस ऐसे हैं, जो बाघ की तरह इस जंगल में भी वही अदा और उस वनांचल में भी वैसी ही उसी शक्ति-बोध के साथ रहते हैं। वरना आम तौर पर जयपुर में खोया-खोया, गंभीर, भीतर ही भीतर बंद और दिल्ली में खुला-खुला, प्रफुल्ल और आत्मविश्वास ही नहीं, ऊर्जा से भी लबरेज़। वी. श्रीनिवास के ट्विटर हैंडल के फ़ोटाे आप ध्यान से देखिए। यही तो कहते हैं।
आख़िर वह कौनसी बात है, जो राजस्थान में आते ही आईएएस के भीतर की सारी ऊर्जा का स्रोत सोख लेती है और सूखी ऊर्जा के इसी स्रोत के साथ जब आईएएस दिल्ली लौटता है तो ऐसा प्रतीत होता है कि वह रेगिस्तान से नख़लिस्तान में आ गया है। अभी वह जेठ-आषाढ़ के समय का वृक्ष था और अब वह सावन-भादों की बारिशों में नहाया हरा-भरा अलग छटा का वृक्ष।
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राजस्थान और दिल्ली के बीच व्यक्तित्व का यह अंतर मनुष्य की आत्मा में दो समानान्तर रागों की तरह क्यों बजता है? यह असल में व्यक्ति का नहीं; सिस्टम और सिचुएशन की छुपी हुई संगति और विसंगति का खेल है। वैसे यह फ़र्क़ जितना सरल-सा दिखता है, उतना ही गहरा है। मानो एक ही आबोहवा दो सरकारों की काया में दो विरोधी ऋतुएँ रच रही हों।
यह सही है कि जैसे आबोहवा मनुष्य और समाज को गढ़ती है, ठीक वैसे ही हम वही होते हैं, जो मंच हमें बनने देता है। व्यक्तित्व दो ध्रुवों पर टिका होता है। एक, आइडेंटिटी कि मैं स्वयं को क्या मानता हूँ और दूसरे रेप्युटेशन कि लोग मुझे किस रूप में पढ़ते, देखते और समझते हैं।
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जयपुर में आईएएस की रेप्युटेशन एक रिस्क-अवर्स, फाइल-ड्रिवन, पॉलिटिकली-ट्रैप्ड नौकरशाह की होती और रहती है। लगातार बदलते आदेश, स्थानांतरण की तलवार, स्थानीय राजनीति, बेसिर-पैर के आधारहीन आरोप-प्रत्यारोप और हर कदम पर टिके मनुष्य रूपी चुग़ल कैमरों की नज़र और कानों के कमज़ोर लीडर्स; ये सब मिलकर उसके चारों ओर कई अदृश्य किले खड़े कर देते हैं।
हम देखते हैं, वह कम बोलता है, कम मुस्कुराता है, अपने भीतर के रंगों को छिपाकर चलता है। मानो किसी अनजान महादेश की यात्रा में अपना असली पासपोर्ट भीतर छिपाकर रख आया हो। यह उसकी सुरक्षा-रणनीति है, जितनी पुरानी, उतनी ही विश्वसनीय।
लेकिन दिल्ली पहुँचते ही पूरा परिदृश्य बदल जाता है। वहाँ जाते ही वही अधिकारी अचानक देश की धड़कन का हिस्सा बन जाता है, जिसे अभी तक राज्य के एक विभाग में भी हाशिए पर रखा गया था, अचानक वह देश की तक़दीर लिखने लगता है। पावर-नेटवर्क, कैबिनेट नोट्स, नेशनल मीडिया, अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल; मानो किसी शांत नदी को एकाएक समुद्र का विशाल विस्तार मिल गया हो। वहाँ सिस्टम उससे चरम पर होता है। आपके कामों की बेहतरीन विज़िब्लिटी, संबंध-साधना की उच्च कोटि की माँग; यह सब मिलकर उसे कुछ और ही बना देते हैं। और वह जैसे किसी बंद खिड़की के पीछे रखे पौधे को पहली बार धूप मिली हो, अपना उन्मुक्त, ऊर्जावान, प्रफुल्ल चेहरा बाहर ले आता है। ठीक वैसे ही जैसे जेठ-आषाढ़ में सूखे वृक्ष को हम पहली ही बारिश के बाद एक अलग ही खिले रूप में देखते हैं।
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मैं कई बार सोचता हूँ कि यह भावनात्मक बुद्धिमत्ता भी मनुष्य को पावर स्ट्रक्चर में लाकर कितना बदल देती है। दिल्ली में जाते ही आईएएस का खेल बदल जाता है। सोशल-अवेयरनेस, रिलेशनशिप-मैनेजमेंट और वर्क-कल्चर आदि का उपयोग कला की तरह करना पड़ता है। हाथ मिलाना, सहज हँसना, तीव्र; लेकिन कोमल दृष्टि-मिलन, हल्की-फुल्की बातचीत; ये सब उसके काम का हिस्सा बन जाते हैं, व्यक्तित्व का नहीं। जैसे कोई अभिनेता अपने वास्तविक मन को गहराई से भीतर रखकर मंच पर एक नई आकृति गढ़ रहा हो।
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राजस्थान में भूमिका भिन्न है। यहाँ उसे विजिलेंस, ऑडिट, कानून और फाइलों की कठोरता निभानी पड़ती है। लीडरशिप का हाल यह है कि वह लोगों के बीच हंसी ठिठोली करते और जुमलेबाज़ियां बनाते, गाय का भैंस के नीचे और भैंस वाला गाय के नीचे करते-करते राजनीतिक सीढ़ियां चढ़कर आई हुई होती है।
बेहतरीन होने के बावजूद हमारे टॉप राजनीतिक नेतृत्व का हाल यह है कि उनके लिए प्रशासनिक कुशलता, दीर्घकालीन नीति-निर्माण और सर्विस-डिलीवरी तो मानो साइड बिज़नेस हो गए हैं; पूरी ऊर्जा अपने ही दल के विरोधियों से बचने, उन्हें साधने, ठिकाने लगाने और हर नई आहट में ख़तरा सूंघ लेने में खर्च हो जाती है और इस दरम्यान ब्यूरोक्रेसी एक छोटी-सी कोटरी के भरोसे कभी चलती, कभी रेंगती, कभी ठिठकती, कभी डग भरती और अंततः वही चक्र दोहरा देती है।
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और फिर वही होता है, जो केटीडीएसटीबीएलडी थ्योरी करवाती है। पूरी की पूरी गाड़ी पटरी से उतर जाती है। इसीलिए, बेहतरीन अफ़सरों के बावजूद राजस्थान में बत्तीस साल से सरकारें ताश के पत्तों की तरह फेंटी जा रही हैं।
क्या कहा? ओह तो आप फिर केटीडीएसटीबीएलडी पर अटक गए!
सर, सीधी-सी बात है: ख़ुद तो डूबे सनम, तुम को भी ले डूबेंगे यानी वही केटीडीएसटीबीएलडी!
यहाँ “इनाम” उसे मिलता है, जिसने कम से जोखिम वाली खेती की, न कि उसे जो बाद में केंद्र में जाकर कितना मनोहारी या करिश्माई दिखा। इसके नाम बताने की ज़रूरत है क्या? हो तो बता देंगे। मेरा ख़याल आप सब जानते हैं।
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राज्य में कई अधिकारी लो-साइकोलॉजिकल-सेफ़्टी में काम करते हैं। छोटी-सी त्रुटि पर भी नोटिस, जाँच, स्थानांतरण; मानो हवा में भी खतरे की बू हो। डिरेलर्स अंडर स्ट्रेस! जहाँ प्रतिभाशाली से प्रतिभाशाली मनुष्य अपनी खिड़कियाँ बंद कर लेता है, अपने स्वर दबा लेता है। कल तक जो व्यक्ति मोहल्ले की दुकान संभालता था, क्रिकेट का सट्टा लगाता था, ज़मीनों का धंधा करता था या मातृभूमि के गीत यहाँ गाता था, पसीना विदेश में बहाता था या किसी थके हुए नेता के घर-बाहर हाथों-पांवों की उँगलियाँ चटखाता था या किसी और तरह कृपा-सूत्र साधता था या किसी और के घर हिसाब-किताब की दरी पर झुका मिलता था, वही आज देश की सबसे पुरानी मेधाओं पर ऊँची आवाज़ में धौंस जमाने चला आता है। कितना अजीब है कि लोकतंत्र में ऊँचाई बदलते ही ज़ुबान का स्वर भी अपनी ताैफ़ीक़ भूल जाता है।
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दिल्ली आईएएस को सुरक्षा का उल्टा ज़ायका देती है। वहाँ उसे लगता है कि सिस्टम उसे सुन रहा है, उसकी शक्ति असली है। यह अनुभूति और यह अदृश्य सुरंग उसके भीतर आत्मविश्वास और विनोद की उजली धाराएँ खोल देती है। नतीजा? एक ही व्यक्ति दो अलग मंचों पर दो अलग आकृतियों में दिखता है, जैसे एक ही आईना प्रकाश के कोण बदलने पर दो रूप दिखाए। हम व्यक्तित्व को अक्सर “स्वभाव” मानते हैं, जबकि आधुनिक प्रबंधन के मनोविज्ञान की महीन आवाज़ कहती है: व्यक्तित्व एक परफ़ॉर्मेंस है, जिसे सत्ता, संदर्भ और अपेक्षाएँ गढ़ती हैं।
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राजस्थान का आईएएस “सर्वाइवल-मोड” में होता है, दिल्ली का “इन्फ्लुएंस-मोड” में। मनुष्य वही है; बस रोशनी किस दिशा से पड़ेगी, यह सिस्टम तय करता है। और व्यक्तित्व उसी रोशनी में अपनी रूप-कथा लिख देता है। कभी धुँधला, कभी देदीप्यमान! देखिए तो इन खिले चेहरों को, आपने कभी देखा इन्हें इस तरह प्रफुल्ल और आत्मविश्वास से लबरेज़?
@svoruganti1466@DCsofIndia@IASassociation #IAS @RajGovOfficial@IIMC_India
@theskindoctor13 Only thing UP mandate proves is that Yogi is no Shivraj Singh or Vasundhara Raje.
He and UP Janta has shown BJP leadership the mirror.
@GabbbarSingh Bhai ye to koi Pakistani fancy dress competition lag raha hai. Sab ko apni apni dream dress pehen kar aane ko bola hoga, sab ek hi dress pehan kar AA Gaye.