मीडिया की चुप्पी पर अभिजीत का बड़ा हमला 🚨
NEWS ANCHOR: अन्ना हज़ारे का अनशन 11वें दिन खत्म हो गया था। आज 17वां दिन है। क्या सरकार से कोई बातचीत शुरू हुई?
अभिजीत 🎯: अन्ना हज़ारे का अनशन 24 घंटे टीवी पर दिखाया जाता था, इसलिए सरकार को झुकना पड़ा। आज सोनम वांगचुक और 25 से अधिक छात्र अनशन पर हैं, लेकिन मीडिया एक टिकर तक नहीं चला रहा।
NEWS ANCHOR: इससे क्या फर्क पड़ता है?
अभिजीत 🔥: अगर मीडिया इस आंदोलन को ईमानदारी से दिखाए, तो सरकार पर भी जवाब देने का दबाव बनेगा। चुप्पी सत्ता के पक्ष में काम कर रही है।
NEWS ANCHOR: धर्मेंद्र प्रधान का कहना है कि NEET की दोबारा परीक्षा सफल रही।
अभिजीत ⚡️: यह बात उन परिवारों से जाकर कहिए जिन्होंने अपने बच्चों को खो दिया। दोबारा परीक्षा से उनके बच्चे वापस नहीं आएंगे। इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
देश के सरकारी शिक्षा तंत्र में हर दिन आ रही ऐसी गिरावट किसी बड़े नीतिगत संकट से कम नहीं है, जहाँ बुनियादी शिक्षा को मजबूत करने के बजाय व्यवस्था लगातार सुस्त पड़ती जा रही है। इस बदहाली के बीच उत्तर प्रदेश के आंकड़े सबसे ज्यादा चिंताजनक हैं, जहाँ पिछले सत्र में बिना किसी दाखिले वाले स्कूलों की संख्या केवल 81 थी, जो इस नए सत्र में लगभग चार गुना बढ़कर 313 तक पहुँच चुकी है।
प्रशासनिक विफलता की पराकाष्ठा देखिए कि इन 313 स्कूलों में एक भी छात्र मौजूद नहीं है, लेकिन इसके बावजूद वहाँ 177 शिक्षकों को कागजों पर तैनात रखा गया है।
पूरे देश में पिछले 10 वर्षों में 94 हजार से अधिक सरकारी स्कूल हमेशा के लिए बंद हो गए यानि औसतन हर दिन 25 सरकारी स्कूलों पर ताले लगाए गए।
केवल पिछले एक वर्ष के भीतर ही देश भर में 4,791 सरकारी स्कूल बंद हुए हैं, जिनमें से आधे से अधिक यानी 2,426 स्कूल अकेले मध्य प्रदेश के हैं। इसके अलावा तेलंगाना में 1392, पश्चिम बंगाल में 568, आंध्र प्रदेश में 474, तमिलनाडु में 369, कर्नाटक में 281 और हिमाचल प्रदेश में 266 स्कूलों को बंद करना पड़ा है।
इस गिरती व्यवस्था ने सरकारी शिक्षा से आम जनता का भरोसा इस कदर तोड़ा है कि पिछले 2 वर्षों में सरकारी स्कूलों का नामांकन 12.75 करोड़ से घटकर 11.89 करोड़ रह गया, जिसके चलते मजबूरन 88 लाख से अधिक बच्चों को प्राइवेट स्कूलों का रुख करना पड़ा।
देश भर में आज 5,663 स्कूल ऐसे हैं जहाँ एक भी छात्र नहीं है, पर 20,667 शिक्षक वहाँ नियुक्त हैं। यहाँ तक कि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में, जहाँ पिछले सत्र में एक भी स्कूल शून्य नामांकन वाला नहीं था, वहीं इस नए सत्र में 149 ऐसे स्कूल हैं जो शून्य नामांकन वाले हैं और इन स्कूलों में 140 शिक्षक कार्यरत हैं।
जब तक सरकारी स्कूलों के बुनियादी ढांचे, जवाबदेही और गुणवत्ता पर ज़मीनी स्तर पर गंभीर काम नहीं होगा, तब तक कागज़ी विकास और 'स्मार्ट एजुकेशन' के बड़े-बड़े दावे सिर्फ एक छलावा साबित होंगे। सत्ता के शीर्ष पर बैठे ज़िम्मेदार नेतृत्व को देश के नौनिहालों के भविष्य से जुड़े इस नीतिगत संकट और प्रशासनिक अकर्मण्यता पर जवाब देना होगा!
#EducationCrisis #SchoolSystem #EducationSystem
"SC-ST-OBC उम्मीदवारों का CUT OFF सामान्य वर्ग से ज्यादा क्यों? - श्रीमती अनुप्रिया पटेल
चूंकि आरक्षित वर्ग के लोग अभी भी आर्थिक रूप से सक्षम न होने के साथ समान अवसर से वंचित हैं। ऐसे में इस वर्ग के अभ्यर्थी उम्र सीमा छूट, परीक्षा फीस छूट का लाभ लेने के लिए मजबूर हैं। ऐसे में संविधान प्रदत्त आरक्षण के प्रावधान की आत्मा की रक्षा के लिए इससे जुड़ी इस शर्त को हटाया जाना चाहिए। अगर आरक्षित वर्ग को नौकरी हासिल करने के लिए सामान्य वर्ग से ज्यादा अंक लाने होंगे तब आरक्षण की मूल अवधारणा कैसे बचेगी।
UGC का विरोध करने वाले चंद मुट्ठी भर लोगों को बड़ा चढ़ाकर दिखाने वाले जातिवादी पत्रकार @chitraaum@shubhankrmishra
को JNU के VC के खिलाफ बहुजन समाज के छात्रों का ये हुजूम नजर नहीं आएगा।
निब्बी विधायिका कह रही है लालूजी के राज में मैं रात में डर के मारे गाना गाने नहीं जाती थी.......,
लेकिन निब्बी जी आप तो उस समय 5 वर्ष की ही थी तो क्या आप अपने मां के गर्भ से ही मैरिट के साथ साथ माइक लेकर भी पैदा हुई थी......?!!😊
#बिहार_विधानसभा 📍
#मैथिली_ठाकुर😂😂
अब समझ आया कि एससी,एसटी,ओबीसी का हक-अधिकार मारना हो तो मनुवादी कोर्ट की ओर क्यों भागता है?क्योंकि वहाँ एक ही वर्ग उसमें भी एक ही जाति का कब्जा है?बहुजनों के हक-अधिकार तबतक छीने जाते रहेंगे जबतक न्यायपालिका में बहुजनों की भागीदारी नहीं होगी।
#कॉलेजियम_व्यवस्था_समाप्त_करो
*देश में टॉप ब्यूरोक्रेसी में वंचितों का प्रतिनिधित्व नहीं*
SC,ST,OBC की जनसंख्या= 85% से ज़्यादा
Top ब्यूरोक्रेसी में प्रतिनिधित्व=10% के करीब
IAS: 92% General
OBC 4.3% | SC 2.4% | ST 1.2%
IPS: 90% General
OBC 5.5% | SC 3% | ST 1.4%
IFS: 82% General
OBC 10.6% | SC 4.3% | ST 2.2%
यानी 90% के आसपास शीर्ष नौकरशाही आज भी जनरल कैटेगरी के हाथ में!
'सबका साथ, सबका विकास' सिर्फ नारा साबित हुआ है।
हरियाणा में लेबर लॉ के कथित उल्लंघन को लेकर मज़दूरों का गुस्सा फूट पड़ा है। लंबे समय से 12-12 घंटे काम और वेतन में देरी जैसी समस्याओं से जूझ रहे कामगार अब सड़कों पर उतर आए हैं। बड़ी संख्या में विरोध प्रदर्शन देखने को मिला।
मज़दूरों की साफ़ मांग है—काम के घंटे 12 से घटाकर 8 किए जाएं और हर महीने के पहले हफ्ते में समय पर सैलरी दी जाए। आखिर श्रमिकों को उनका कानूनी हक़ कब मिलेगा?