जवाहरलाल 1929 मे पहली बार कांग्रेस प्रेजिडेंट बने। तब उम्र उनकी कोई 40 साल रही होगी। 1930 तक कार्यकाल रहा।
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उनके सरदार पटेल उनके बाद 1931 मे पहली बार इस पद पर आए। तब वे करीब 52 साल के थे। कांग्रेस के भीतर उन्हें, दक्षिणपंथ की ओर झुकाव वाला नेता माना जा सकता है।
इसके बाद मदनमोहन मालवीय 1932 मे अध्यक्ष हुए, औऱ 1934 मे राजेंद्र प्रसाद। इन दोनों को भी दक्षिणपंथ की ओर झुकाव वाला नेता माना जा सकता है।
(इनके बीच 1933मे नेल्ली सेनगुप्ता भी अध्यक्ष हुई, मग़र वह एक स्टॉप गैप अरेंजमेंट था। दरअसल सेनगुप्ता के पति स्वतंत्रता आंदोलन मे शहीद हुए थे। औऱ इस वक़्त ज्यादातर सीनियर कांग्रेसी जेल मे थे)
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मै आपको पैटर्न ऑब्जर्व कहने को कह रहा हूं।
यह कि एक दक्षिणपंथी लीडर आता है, औऱ अगले चुनाव मे अपनी सोच के लीडर के लिए रास्ता साफ करता जाता है। यह हालात 1935 तक चलने वाला है।
औऱ इसकी प्रतिक्रिया मे कांग्रेस का वामपंथी तबका, दल के भीतर ही एक कॉकस बनाता है। इसे कांग्रेस सोशलिस्ट दल कहा जाता है। इसमें हैं - आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण, मीनू मसानी, युसूफ मेहर अली।
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औऱ इन पर सरपरस्ती है नेहरू की। जो इसे ऑफिशली जॉइन नहीं करते, लेकिन इसके मेंटर औऱ आइडियोलॉग वही है।
1936 मे नेहरू फिर अध्यक्ष बनते हैं।
1937 मे दोबारा अध्यक्ष बनते हैं।
अब 1938 मे फिर कैसे बनें। सो वे एक वामपंथी सोच के आदमी के लिए रास्ता साफ करते हैं। यह आदमी लंदन मे बैठा हैं। जिसकी अनुपस्थिति मे उसे अध्यक्ष चुन लिया जाता है। इनविटेशन देकर भारत बुलाया जाता है।
यह वामपंथी है - सुभाष चंद्र बोस
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तब महज 41 बरस के सुभाष,
कुछ ज्यादा ही वामपंथी थे।
दरअसल, काले सफ़ेद के विकल्प की आदत हमें इतनी डाल दी गयी है, कि हम सोच ही नहीं पाते कि बीच मे ग्रे के भी सैंकड़ो शेड्स होते हैं।
मसलन, ज़ब मैंने सरदार पटेल औऱ राजेंद्र प्रसाद को दक्षिणपंथी लिखा , तो आपने उन्हें संघी समझ लिया। नेहरू सुभाष को लेफ्टिस्ट कहा, तो आपको उनमे लेनिन माओ दिखने लगे।
ये दोनों ही परसेप्शन गलत है। कांग्रेस, सेंटरिस्ट दल रही है। लेकिन कुछ लोग उस सेंटर के जरा राईट थे, औऱ कुछ इसके जरा लेफ्ट। लेकिन मसलो पर फैसला..
मिलजुलकर होता था।।
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तो नेहरू लेफ्ट मे थे, सुभाष उनके भी लेफ्ट मे थे। बहरहाल, नेहरू ने सुभाष को अध्यक्ष बनवाया। वे नेहरू के उत्तराधिकारी हुए । यह खूबसूरत तस्वीर उसी मौके की है।
अध्यक्ष सुभाष ने योजना आयोग बनाया, नेहरू को उसका चेयरमैन रखा। उनकी सुनी, मानी। यह कार्यकाल, एक तरह से नेहरू का तीसरा कार्यकाल था।
लेकिन, ज्यादा लेफ्टिस्ट होना, दक्षिणपंथ रुझान वाले नेताओं को जंचा नहीं। सुभाष की कार्यशैली भी तानाशाही भरी थी।तो उन्हें दूसरा कार्यकाल देने मे फच्चर फंस गया। वे इस बार मामले को इलेक्शन तक ले गए। जीते भी..
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पर कार्यसमिति न बना सके। उनके 20 नामित सदस्य मे से 17 इस्तीफा देकर हट गए। सिर्फ 3 लोग उनके साथ थे।
जवाहरलाल नेहरू
शरतचंद्र बोस, सुभाष के भाई
तीसरे खुद सुभाष..
आगे का किस्सा आप जानते हैं। सुभाष को अंततः हटना पड़ा। वे हिटलर , तोजो औऱ आजाद हिन्द फ़ौज की राह पर चले गए।
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यह तस्वीर, पहले ब्लैक एंड व्हाइट मे देखी थी। किसी ने रंगीन करके डाली, तो देखकर आँखों को सुकून महसूस हुआ।
कांग्रेस अध्यक्ष के रूप मे सुभाष, नेहरू के उत्तराधिकारी हुए। अगर राह न बदली होती, धैर्य धरते - तो एक दिन प्रधानमंत्री के रूप मे भी नेहरू के उत्तराधिकारी होते।
औऱ ऐसी ही एक तस्वीर बनती।
दो उम्रदराज मित्रो की
दो स्टेट्समैंन की....
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जय जवाहर, जय सुभाष
❤️❤️
इन दो तस्वीरों पर बवाल है. दोनों एक दिन की हैं. दोनों ऐतिहासिक हैं और दोनों ही हिंदुस्तानी कूटनीति की बेमिसाल कहानी कहती हैं.
1983 साल था, महीना मार्च का। दिल्ली से सर्दी विदा हो चुकी थी लेकिन 140 देशों से मेहमानों का आना जारी था। इंदिरा गांधी और नटवर सिंह के कंधों पर सातवें गुटनिरपेक्ष आंदोलन की भारी ज़िम्मेदारी थी। नटवर इस सम्मेलन के सेक्रेटरी जनरल थे इसलिए वो खासतौर से परेशान थे। जल्दबाज़ी में भारत को मेज़बानी मिली थी और ये उन पर था कि वो किसी तरह कार्यक्रम को कामयाबी से निपटा दें। अचानक उन्हें खबर मिली कि फिलिस्तीन मुक्ति संगठन के नेता यासिर अराफात नाराज़गी में वापस लौटना चाहते हैं। नटवर सिंह के तो हाथ पांव ही फूल गए। नाराज़गी की वजह जाननी चाही तो पता चला कि जॉर्डन के शाह को पहले भाषण देने का मौका मिलने की वजह से अराफात गुस्सा गए थे। नटवर सिंह अराफात के तेवरों से परिचित थे। जानते थे कि वो उनके मनाने से नहीं माननेवाले। उन्होंने तुरंत इंदिरा गांधी से विज्ञान भवन आने की विनती की जहां आयोजन हो रहा था। नटवर सिंह ने उनसे फिदेल कास्त्रो को भी साथ लेते आने को कहा। फिदेल कास्त्रो पहुंचे और यासिर अराफात को फोन करके बुलाया। नाराज़ अराफात से फिदेल ने पूछा कि वो इंदिरा गांधी को अपना दोस्त मानते हैं या नहीं..
अराफात ने तपाक से कहा कि वो मेरी दोस्त नहीं, बड़ी बहन हैं। बस, कास्त्रो को मौका मिल गया, बोले- फिर छोटे भाई की तरह बर्ताव करो और सम्मेलन में हिस्सा लो। यासिर अराफात दोनों का ही बहुत सम्मान करते थे। उन्होंने ज़िद छोड़ दी और सम्मेलन में हिस्सा लिया। इसी सम्मेलन के दौरान कास्त्रो- इंदिरा का फोटो बहुत ही मशहूर हुआ। ये फोटो तब लिया गया जब फिदेल कास्त्रो गुट निरपेक्ष आंदोलन की अध्यक्षता भारत को सौंप रहे थे. उन्हें एक लकड़ी का हथौड़ा इंदिरा को देना था. इस दौरान इंदिरा ने उनसे हाथ मिलाना चाहा लेकिन कास्त्रो ने हंसी मज़ाक करते हुए इंदिरा से हाथ ना मिलाकर उनको गले लगा लिया. इंदिरा थोड़ा सकुचा गईं क्योंकि उनकी छवि गंभीर नेता की थी, लेकिन गुटनिरपेक्ष आंदोलन के दो नेताओं के बीच का ये स्नेह देखकर मौजूद सभी प्रतिनिधियों ने जमकर ताली बजाई. वैसे भी कास्त्रो नेहरू की बहुत इज्जत करते थे और इस नाते उनको इंदिरा से भी स्नेह था. ऊपर से सुबह यासिर अराफात वाली बातें.. आखिर सब अच्छे से निपट रहा था तो कास्त्रो ने छूट ले ली.
ये किस्सा नटवर सिंह की किताब में छपा है. यहां तक कि वो घटना भी है जब नटवर ने फिदेल कास्त्रो से जवाहरलाल नेहरू और उनकी पहली मुलाकात के बारे में पूछा था। फिदेल ने बताया कि साल 1960 में जब वो संयुक्त राष्ट्र संघ की 15वीं सालगिरह पर न्यूयॉर्क पहुंचे तो कोई होटल उन्हें कमरा देने को तैयार नहीं था। एक दिन के लिए तो वो क्यूबा के दूतावास में रुक गए लेकिन अगले दिन उन्होंने अपनी नाराज़गी संयुक्त राष्ट्र महासचिव डैग हैमरशोल्ड के सामने ज़ाहिर कर दी। फिदेल ने साफ कहा कि या तो मेरे और मेरे लोगों के रहने का इंतज़ाम कीजिए वर्ना संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रांगण में मैं तंबू डालकर रहूंगा। इस चेतावनी के बाद उन्हें हारलेम के एक होटल ने रहने की जगह दे दी गई। फिदेल कास्त्रो ने नटवर सिंह को बताया कि हर जगह उनके साथ किए गए इस व्यवहार पर खबरें बन रही थीं। जैसे ही फिदेल कास्त्रो को होटल में कमरा मिला उनसे मिलने सबसे पहले जवाहरलाल नेहरू आए। 34 साल के नौजवान फिदेल कास्त्रो अमेरिकियों के इस व्यवहार से निराश थे पर नेहरू ने उनका हौसला बढ़ाया। खुद कास्त्रो ने नटवर सिंह से कहा कि वो उस वक्त नेहरू के दिए हौसले को ज़िंदगी भर नहीं भुला सके।
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Legacy of Gen Sagat Singh
Lieutenant General Sagat Singh Rathore, PVSM, was born on July 14, 1919, in the village of Kusumdesar in Rajasthan. His father, Brijlal Singh, served in World War I with the Bikaner Camel Corps. In 1938, the young Sagat enlisted in the Bikaner Ganga Risala, rising to become one of the few state force officers commissioned as Second Lieutenant during World War II.
Pic: Lt. Gen. Sagat Singh, Centre
The Funeral of Fair Play: How the World Cup Turned Into a Content Carnival 🎡
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The 2026 World Cup was meant to showcase the highest standard of cricket. Instead, it’s being overshadowed by a relentless chase for “viral moments”, where cheap clicks appear to matter more than professional decorum.
The controversy involving RJ Princy Parikh and South African star David Miller isn’t just “cringe.” It’s a warning sign for the sport.
The “I Thought We Were Friends” Ambush
Footage shows RJ Princy Parikh performing her rehearsed clapping bit and “friendship” prank in Miller’s face immediately after the match. This wasn’t a scheduled media interaction. It was a player attempting to decompress after a high-stakes contest reduced to a prop for a Reel.
That distinction matters.
Why This Is a Systemic Failure:
The Erosion of Respect
David Miller is a seasoned international cricketer. Approaching him post-match to “troll” him for engagement isn’t harmless fan behaviour, it reflects poor professional judgment. Athletes are competitors, not reaction generators for digital content.
The Collapse of the Boundary
The field, mixed zones, and tunnels have traditionally been professional spaces reserved for players and accredited journalists. By extending all-access credentials to influencers unfamiliar with the unwritten codes of sportsmanship, broadcasters risk turning elite tournaments into content carnivals.
Commercialized Hubris
This episode follows the #Cupcakegate backlash, where pre-match promos by Star Sports mocked South Africa as “soft.” The outcome? India suffered a 76-run defeat. When hype mutates into mockery, backlash is inevitable. You don’t just lose a match, you lose credibility.
Broadcasters: It’s Time to Recalibrate
Networks and governing bodies, including the International Cricket Council, must confront a serious question:
Are we curating a World Cup, or producing algorithm-friendly theatre?
Fans don’t crave scripted pranks or chest-thumping promos. They want insight. They want intensity. And above all, they want respect for the game and its players.
The Bottomline
If someone cannot distinguish between a professional sporting arena and a content studio, they should not be operating in player-access zones.
It’s time to restore the “pro” in professional sport. Is it time to reconsider influencer access to player areas during ICC events?
Your take. 👇
#CricketTwitter #IndvsSA #T20WorldCup2026 #StarSports #InfluencerCulture #RespectTheGame #HumblePie
Cricket Is an Inexact Sport
In Football, a goal is a goal. In Tennis, a game point is a game point. In sprints, one microsecond is one microsecond. Once a goal is scored or a foul is done - the argument ends. The scoreboard becomes paramount.
Football, tennis, athletics - these are sports of rules. Technology in these sports exists to erase ambiguity in decision making: Hawk-Eye, goal-line technology, photo finish technology. The purpose of technology is not interpretation but verification. The rules are executable.
Cricket actively resists finality. Cricket is, by design, an inexact sport.
From its very grammar, its history, cricket embodies a different philosophy. It does not speak of rules. It speaks of laws - codified by the Marylebone Cricket Club since the 18th century. Rules demand obedience whereas laws require judgment. Rules assume uniformity but laws take context into account.
Cricket can not be played without context. Context of time, of place, of intent and of decaying pitch. Remove context, and cricket collapses into an unrecognisable game.
1/n
#CWC25
Few days before World Cup, Pradeep Rawal showed photos on his phone of the banners he'd been preparing to carry to venues. One of those was: ‘100* – Pratika Rawal: Proud Moment of Father.’
In Navi Mumbai, the banner was unfurled 💯
✍️ My story:
https://t.co/5Bw8P4YDGp