ब्राह्मण संप्रदाय में वेद ही धर्म का सर्वोच्च प्रमाण है "प्रमाणं परमं श्रुति"।वहीं बुद्ध धम्म में शास्त्र तब तक प्रमाण नहीं जबतक की वो तर्क बुद्धि विवेक पर खरा न उतरे" ये बात पूरा सही नहीं हैं मैंने झूठ बोला था।
रेफ्रेंस संलग्न है खुद पढ़ लेवें।
#KKK15#AvinashMishra
तेलंगाना के भूपालपल्ली जिले में एक जलधारा से भगवान विष्णु की एक प्राचीन पत्थर की प्रतिमा प्राप्त हुई है। यह प्रतिमा कतराम मंडल के चिंताकानी गाँव के पास एक जल-मार्ग में रेत के नीचे दबी हुई मिली। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मूर्ति 12वीं शताब्दी की है और काकतीय राजवंश के काल से संबंधित है। काले ग्रेनाइट से निर्मित यह प्रतिमा लगभग पाँच फीट ऊँची है और उस युग की उत्कृष्ट कलात्मक कुशलता को दर्शाती है।
रिपोर्टों के अनुसार, कुछ वर्ष पहले जब जलधारा में पानी का स्तर कम हुआ था, तब गाँव वालों ने प्रतिमा का एक छोटा-सा हिस्सा देखा था। हालांकि, इसका अधिकांश भाग रेत के नीचे ही दबा रहा। हाल ही में जब पानी का स्तर फिर से कम हुआ, तो प्रतिमा का अधिक हिस्सा दिखाई देने लगा। प्रतिमा के वीडियो सोशल मीडिया पर फैलने के बाद स्थानीय निवासियों ने हैदराबाद के एक व्यक्ति के साथ मिलकर इसे जलधारा की तलहटी से सावधानीपूर्वक बाहर निकाला।
हालाँकि प्रतिमा के कुछ हिस्से, जिनमें नाक और उँगलियाँ शामिल हैं, थोड़े क्षतिग्रस्त हैं, लेकिन इसकी अधिकांश संरचना अभी भी सुरक्षित है। अधिकारियों और पुरातत्वविदों द्वारा प्रतिमा की जाँच किए जाने की उम्मीद है, ताकि इसकी सही आयु और ऐतिहासिक महत्त्व की पुष्टि की जा सके। कई स्थानीय लोगों ने यह भी माँग की है कि प्राचीन प्रतिमा के संरक्षण और पूजा के लिए उसी स्थान पर एक मंदिर बनाया जाए।
IS “BUDDHA” MENTIONED IN THE VALMIKI RAMAYAN ?
A Claim says Ayodhya Kand 109.34 calls Buddha a “thief,” proving the Ramayana postdates Buddha. But that particular— 34th verse is absent from most ancient manuscripts and is treated as a later interpolation in the Critical Edition.
"राधा जी ही श्रीकृष्ण हैं और श्रीकृष्ण जी ही राधा जी हैं"✅
#DharmaSavesAll#CJPMustAnswer#IndiaSalutesCaptainSmit
1. ब्रह्मवैवर्त पुराण - श्री कृष्ण द्वारा राधा से “हम दोनों में कोई भेद नहीं”
��्रीकृष्ण-जन्मखण्ड 4.15.56–60✅
श्रीकृष्ण राधा से कहते हैं:-
यथा त्वं च तथाऽहं च भेदो हि नावयोर्ध्रुवम् ।
यथा क्षीरे च धावल्यं यथाऽग्नौ दाहिका सति ।।
हिन्दी अर्थ:-“जैसी तुम हो, वैसा ही मैं हूँ। हम दोनों में निश्चित रूप से कोई भेद नहीं है। जिस प्रकार दूध में उसकी श्वेतता और अग्नि में उसकी दाहक शक्ति अलग नहीं की जा सकती, उसी प्रकार हमारा भी परस्पर भेद नहीं है।”
आगे इसी प्रसंग में पृथ्वी और उसकी सु��न्ध आदि के उदाहरण देकर राधा और कृष्ण की अविभाज्यता बताई गई है।
इसलिए “भेदो हि नावयोर्ध्रुवम्” का सीधा अर्थ है:-
“हम दोनों में निश्चित रूप से कोई भेद नहीं है।”
2. सबसे स्पष्ट कथन - “श्रीकृष्ण ही राधा जी हैं और राधा जी ही हरि हैं”✅
ब्रह्मवैवर्त पुराण, श्रीकृष्ण-जन्मखण्ड 4.15.101✅
त्वं कृष्णाङ्गार्धसंभूता तुल्या कृष्णेन सर्वतः ।
श्रीकृष्णस्त्वमयं राधा त्वं राधा वा हरिः स्वयम् ॥
अर्थ:- “तुम ��ृष्ण के शरीर के आधे भाग से प्रकट हुई हो और हर प्रकार से कृष्ण के समान हो। हे राधा! यह श्रीकृष्ण ही तुम हो; और तुम राधा स्वयं हरि हो।”
3. दोनों नित्य हैं✅
उसी प्रसंग में कहा गया है:-
नित्योऽयं च तथा कृष्णस्त्वं च नित्या तथाऽम्बिके ।
अस्यांशा त्वं त्वदंशो वाऽप्ययं केन निरूपितः ॥
अर्थ:-“जिस प्रकार यह कृष्ण नित्य हैं, उसी प्रकार तुम भी, हे अम्बिके, नित्य हो। तुम इनके अंश हो अथवा ये तुम्हारे अंश हैं-यह कौन निश्चित ���ूप से कह सकता है?”
इससे राधा जी को कोई अस्थायी या बाद में उत्पन्न हुई सत्ता नहीं बताया गया है; राधा जी और श्री कृष्ण दोनों को नित्य कहा गया है।
4. राधा जी श्री कृष्ण की शक्ति और मूल प्रकृति हैं✅
ब्रह्मवैवर्त पुराण 4.15.64–67✅
सर्वशक्तिस्वरूपासि सर्वरूपोऽहमक्षरः ।
अर्थ:-“तुम समस्त शक्तियों का स्वरूप हो और मैं अक्षर, अर्थात् अविनाशी तथा समस्त रूपों वाला हूँ।”
फिर कहा गया है:-
ममाङ्गांशस्वरू���ा त्वं मूलप्रकृतिरीश्वरी ।।
अर्थ:-“तुम मेरे अंग के अंश-स्वरूप हो तथा मूल प्रकृति, ईश्वरी हो।”
शक्त्या बुद्ध्या च ज्ञानेन मया तुल्या वरानने ।।
आवयोर्भेदबुद्धिं च यः करोति नराधमः ।।
अर्थ:- “हे सुन्दर मुख वाली! शक्ति, बुद्धि और ज्ञान में तुम मेरे समान हो। जो मनुष्य हम दोनों में भेद-बुद्धि करता है, वह अधम है।”
5. राधा जी और श्री कृष्ण जी - शरीर और आत्मा के समान✅
उसी प्रसंग में कहा गया है:
आत्मना देहरूपा त्वमस्याधारस्त्वमेव हि ।
अस्यानु प्राणैस्त्वं मातस्त्वत्प्राणैरयमीश्वरः ॥
अर्थ:-“तुम इसके शरीर-रूप हो और तुम ही इसका आधार हो। हे माता! तुम इसके प्राणों के साथ हो और यह ईश्वर तुम्हारे प्राणों के साथ है।”
इस उपमा का उद्देश्य राधा और कृष्ण की अविभाज्यता और परस्पर-आश्रित एकत्व को बताना है।
6.ब्रह्मवैवर्त पुराण - प्रकृतिखण्ड अध्याय 12✅
यहाँ बहुत स्पष्ट रूप से कहा गया है कि पूर्णतम श्रीकृष्ण दो भागों में प्रकट हुए और उसी वर्णन में राधा के वामाङ्ग से प्राकट्य बताया गया है:
परिपूर्णतमः कृष्णः ��्वयं द्विधा विभक्तवान् ।
...
भगवान् श्रीकृष्णस्य वामाङ्गादाविर्भूता श्रीराधा...
इस अध्याय के में अर्थ दिया गया है कि परिपूर्णतम श्रीकृष्ण स्वयं दो भागों में विभक्त हुए, और भगवान् श्रीकृष्ण के वामाङ्ग से श्रीराधा आविर्भूत हुईं।
7. ब्रह्मवैवर्त पुराण - कृष्ण-जन्मखण्ड अध्याय 124✅
श्रीकृष्णस्य दक्षिणाङ्गान्माधवः समजायत ।
वामाङ्गाद्राधिका जाता...
अर्थ:-“श्रीकृष्ण के दक्षिणाङ्ग से माधव प्रकट हुए और वामाङ्ग से राधा प्रकट हुईं।”
उसी प्रसंग में राधा जी के लिए आगे कहा गया है:-
श्रीकृष्णवामाङ्गसम्भूता
गुणरूपाभ्यां चाभिन्ना
अर्थ:-“जो श्रीकृष्ण के वामाङ्ग से प्रकट हुई हैं और गुण तथा रूप में उनसे अभिन्न हैं।”
यहाँ “अभिन्ना” शब्द बहुत महत्वपूर्ण है - अर्थात् अलग/भिन्न नहीं।
8. ब्रह्मवैवर्त पुराण - राधा जी के नामों में “कृष्णस्वरूपिणी”✅
राधा-षोडशनाम-वर्णनम् में:-
कृष्णरूपं सन्निधातुं या शक्ता चावलीलया ।
सर्वांशैः कृष्णसदृशी तेन कृष्णस्वरूपिणी ॥
अर्थ:-“जो अपनी लीला से स्वयं कृष्णरूप को अपने समीप ला सकती हैं और सभी अंशों में कृष्ण के समान हैं, इसलिए वे ‘कृष्णस्वरूपिणी’ कहलाती हैं।”
इसके तुरंत बाद:-
वामाङ्गार्धेन कृष्णस्य या सम्भूता परा सती ।
कृष्णवामाङ्गसम्भूता तेन कृष्णेन कीर्तिता ॥
अर्थ:-“जो परम सती श्रीकृष्ण के आधे वामाङ्ग से प्रकट हुई हैं, इसलिए स्वयं कृष्ण ने उन्हें ‘कृष्ण-वामाङ्ग-सम्भूता’ कहा है।”
कभी कभी तो लगता है इन्हीं हरकतों की वजह से "वेद" पढ़ने की मनाही रही होगी!
मूर्खों व जड़ बुद्धियों को आध्यात्मिक बातें/तर्क-विवेक कभी समझ नहीं आ सकता है।
#CJPMustAnswer#DrishyamBlockbuster#SiddharthMalhotra
ऋग्वेद मंडल 10 सर्ग 86 मंत्र 15-18✅
ऋग्वेद भाष्य:- डॉ तुलसी राम(English Translations)
मंत्र-15:- Indra, just as a sharp homed bull bellows and lords over the herds of cattle with pride, so may the joyous process of the creative cycle which the dedicated celebrant and loving Prakrti enacts for you give you satisfaction and joy at heart as lord and master of the world.Indra is supreme over all.
अर्थात्:- हे इन्द्र! जैसे एक शक्तिशाली बैल अपने झुंड पर अधिकार रखता है, वैसे ही प्रकृति (Prakriti) की रचनात्मक शक्ति संसार में सृजन का काम करती है।
यह सृजन की प्रक्रिया आनंद देने वाली है। जो व्यक्ति इस शक्ति को समझता है, उसे भीतर स��� संतोष और आनंद मिलता है।
इन्द्र को यहाँ सर्वोच्च शक्ति के रूप में बताया गया है।
आसान शब्दों में:-
यहाँ Prakriti को संसार को चलाने और उत्पन्न करने वाली रचनात्मक शक्ति माना गया है।
मंत्र 16:- That person does not mle over the self whose hedonic mind roams and rambles around among objects of sensual pleasure. That person rules as master of the self whose radiant mind in a state of peace and freedom blossoms and expands in spiritual wakefulness. Indra is supreme over all.
अर्थात्:- जो व्यक्ति अपने मन को इन्द्रियों के सुखों और इच्छाओं के पीछे भटकने देता है, वह वास्तव में ��पने ऊपर शासन नहीं कर पाता।
लेकिन जिसका मन शांत, प्रकाशमय और स्वतंत्र है, और जो अपनी इन्द्रियों व इच्छाओं पर नियंत्रण रखता है, वही वास्तविक रूप से अपने ऊपर शासन करता है।
आसान उदाहरण:-
मन कहता है - “मुझे यह चाहिए, मुझे वह चाहिए।”
अगर इंसान हर इच्छा के पीछे भागता है → वह मन का गुलाम है।
अगर वह अपने मन को नियंत्रित कर सकता है → वह अपने मन का स्वामी है।
मंत्र 17:- That person whose radiant mind in a state of peace and freedom blossoms and expands in spiritual wakefulness does not rule the world of Prakrti. The master that rules the world of Prakrti is the power whose ecstatic presence in peace and sovereignty pervades in and over space and time. Indra is supreme over all.
अर्थात्:- केवल शांत और जागृत मन वाला व्यक्ति प्रकृति के संसार पर शासन नहीं करता।
प्रकृति के संसार को चलाने वाली उससे भी बड़ी एक शक्ति है, जिसकी उपस्थिति शांति और सार्वभौमिक सत्ता के रूप में पूरे समय और स्थान में व्याप्त है।
यानी यहाँ दो बातें अलग की जा रही हैं:
व्यक्ति का शांत/जागृत मन ≠ प्रकृति को चलाने वाली सर्वो��्च शक्ति।
प्रकृति के पीछे एक व्यापक शक्ति है जो समय और स्थान में व्याप्त है।
मंत्र 18:- Indra, lord omnipresent and omnipotent, let this Vrshakapi, lover of joyous showers and shaker of thoughts of evil, know and realise that the duality between the self and the super self is ended. Then he will attain the soul inspiring pranic energy, creative intelligence, new spirit of yajnic performance and full achievement of the saving light of divinity.Indra is supreme over all the world.
अर्थात्:-हे वृषाकपि! जब मनुष्य यह समझ लेता है कि ��सकी अपनी आत्मा और परमात्मा के बीच जो अलगाव वह समझ रहा था, वह वास्तव में समाप्त हो सकता है, तब उसे उच्च आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है।
तब उसके अंदर प्राणशक्ति, रचनात्मक बुद्धि, नई चेतना और दिव्य प्रकाश जागृत होता है।
सबसे आसान भाषा में:
“मैं अलग हूँ और परम सत्य/परमात्मा अलग है” — इस द्वैत की भावना समाप्त होना → उच्च आध्यात्मिक अनुभूति।
ब्राह्मण संप्रदाय में वेद ही धर्म का सर्वोच्च प्रमाण है "प्रमाणं परमं श्रुति"���वहीं बुद्ध धम्म में शास्त्र तब तक प्रमाण नहीं जबतक की वो तर्क बुद्धि विवेक पर खरा न उतरे" ये बात पूरा सही नहीं हैं मैंने झूठ बोला था।
रेफ्रेंस संलग्न है खुद पढ़ लेवें।
@Mahto8989@Mahto8989 बौद्धों के ग्रंथ बुद्ध-गुणालंकार सुत्र में श्री राम,श्री कृष्ण,शिव जी-पार्वती जी सभी का अपमान लिखा गया है।स्त्रियो�� के विषय में त्रिपिटक में बहुत सी खराब बातें लिखी हुई हैं।तो ऐसे बौद्ध ग्रंथों के साथ ऐसा ही होना चाहिए।
इस बात की पहली बार शुरूआत "मान्यवर कांशीराम जी" ने शुरू की थी।लेकिन परिवर्तित रूप में।उन्होनें कहा कुछ और था समय के साथ बदलते बदलते आज बात और हो गयी है।
सबसे पहले इस दावे की उत्प��्ति समझने के लिए “15%–85%” और “90% Resources” वाले कथनों को अलग-अलग देखना जरूरी है।
1. कांशीराम और 15%–85% का विचार✅
• कांशीराम के बहुजन राजनीतिक विमर्श में “15% बनाम 85%” एक प्रमुख अवधारणा थी।
• उनका तर्क था कि लगभग 15% सवर्ण आबादी 85% बहुजन आबादी पर राजनीतिक प्रभुत्व रखती है।
• उनकी पुस्तक “बहुजन समाज के लिए आशा की किरण” (1992) से जुड़े संदर्भों में “85 पर 15 का राज नहीं चलेगा” जैसा राजनीतिक नारा दर्ज मिलता है।
• इसल��ए 15%–85% का राजनीतिक framework कांशीराम के आंदोलन से स्पष्ट रूप से जुड़ा है।
2. लेकिन एक जरूरी अंतर✅
• उपलब्ध शोध-संदर्भों में कांशीराम के कथनों का विषय मुख्यतः राजनीतिक सत्ता, प्रतिनिधित्व और सामाजिक संरचना है।
• इसलिए “कांशीराम ने कहा था कि 15% लोग 90% Resources पर कब्ज़ा रखते हैं”- ऐसा कहना बिना मूल प्राथमिक स्रोत के उचित नहीं होगा।
3. 1998 में कांशीराम का क��न
• 1998 में Malaysia में दिए गए कांशीराम के एक वक्तव्य को बाद के शोध में उद्धृत किया गया है।
• उसमें उन्होंने लगभग यही राजनीतिक गणित रखा कि सवर्ण लगभग 15% हैं और बहुजन 85%।
4. “90% Resources” वाला स्पष्ट रिकॉर्ड
• 4 जुलाई 2015 को लालू प्रसाद यादव ने जातिगत जनगणना के आँकड़े सार्वजनिक करने की मांग के संदर्भ में एक दावा किया।
• Times of India की रिपोर्ट के अनुसार उनका कथन था कि 10–15% आबादी ने देश के 90% Resources पर कब्ज़ा कर रखा है।
• ��ही वह स्पष्ट, दिनांकित रिकॉर्ड है जिसमें “10–15% + 90% Resources” का संयोजन मिलता है।
5. 2018 में “90% Wealth” का अलग दावा
• 2018 में H. L. Dusadh ने “10% population has 90% wealth” जैसा दावा किया।
• उन्होंने इसे Oxfam की रिपोर्ट से जोड़कर प्रस्तुत किया।
6. 2021 में तेजस्वी यादव✅
• 2021 में तेजस्वी यादव ने Indian Express में लिखते हुए एक समान formulation इस्तेमाल किया।
• उन्होंने कहा कि 10% से भी कम dominant elite आबादी 90% resources को corner करती है।
7. 2024 में राहुल गांधी का अलग formulation
• 2024 में राहुल गांधी ने लगभग 90% आबादी के सत्ता और प्रतिनिधित्व में पर्याप्त भागीदारी न होने का मुद्दा उठाया।
8. 2025 का एक और अलग दावा
• 2025 में राहुल गांधी ने लगभग 10% आबादी के Army, corporate sector, bureaucracy और judiciary आदि में representation/control को लेकर दावा किया।
निष्कर्ष:- यह दावा पूर्ण रूप से राजनीतिक बयानबाजी है।जिसका कोई आधार नहीं है।जब आज़ादी के बाद सवर्णों की जातिगत जनगणना नहीं हुई।तो ये 10-15%,90% वाली बातें झूठी व हवाबाजी है।
"अनारक्षित होकर भी यदि वे उच्च पदों पर अपनी योग्यता से पहुँच रहे हैं।तो इसमें कोई बुराई नहीं है।"
“सभी सरकारी/निजी क्षेत्रों में ब्राह्मणों/ब्राह्मणवादियों/सर्वणों का over-representation है… और जब तक यह over-representation रहेगा, जातिवाद बना रहेगा।���
या "90 प्रतिशत रिसोर्सेस पर 10 प्रतिशत लोगों का कब्जा है।"
सोशल-मीडिया प्लेटफार्मों पर ये भ्रामक नैरेटिव लगातार फैलाया जाता है।
लेकिन ये बात फैलाने वालों के पास इस बात का कोई तथ्य/प्रमाण नहीं होता है।यह बात आधारहीन ही लगती है।
Verdict: भ्रामक/अतिरंजित।
1. भारत में ब्राह्मणों/क्षत्रिय/वैश्य(सवर्णों)की वर्तमान अखिल-भारतीय आबादी का कोई आधिकारिक caste-wise Census आँकड़ा उपलब्ध नहीं है। स्वतंत्रता के बाद Census में SC/ST के अलावा जातिवार आब���दी नियमित रूप से नहीं गिनी गई। सरकार ने 2022 में भी यही स्थिति स्पष्ट की थी।
जब 1947 से अब तक आँकडे़ ही नहीं हैं सवर्णों की जनसंख्या के तो ये 10-90% आंकड़ों की बातें आ ही क्यों रही है।
हवाई-किले बनाकर बातें फैलाई गयी है और झूठा नैरेटिव सेट किया है।
2. इसलिए “सवर्ण X% हैं और सरकारी/निजी क्षेत्र में Y% हैं, इसलिए पूरे भारत में over-represented हैं” - ऐसा राष्ट्रीय स्तर पर सिद्ध करने के लिए आवश्यक denominator ही उपलब्ध नहीं है��
3. सरकारी नौकरियों के official central-government data में मुख्यतः SC/ST/OBC जैसे reserved categories की representation प्रकाशित होती है; “Brahmin representation” का एक समान अखिल-भारतीय सरकारी आँकड़ा नहीं दिया जाता। उदाहरण के लिए, 1 जनवरी 2016 को Central Government services में SC 17.49%, ST 8.47% और OBC 21.57% थे।
4. Private sector के बारे में तो दावा और भी कमजोर है। केंद्र सरकार ने private sector में SC/ST/OBC reservation लागू नहीं किया है; private-sector caste representation का कोई comprehensive national official database भी नहीं है।
5. राज्य-विशिष्ट data अलग तस्वीर दे सकता है। उदाहरण के लिए Bihar caste survey में Brahmins 3.67% population बताए गए और government jobs में Brahmins का share 3.60% report हुआ। यह Bihar का data है पूरे भारत का नहीं।
सबसे महत्वपूर्ण बात✅
“Over-representation = जातिवाद” कोई स्वतः सिद्ध statistical conclusion नहीं है।
किसी caste का किसी profession में population-share से अधिक होना अपने-आप यह सिद्ध नहीं करता कि वहाँ जाति के आधार पर discrimination हो रह��� है। इसके लिए recruitment, promotion, educational access, networks, historical advantage/disadvantage और discrimination के अलग-अलग evidence देखने पड़ते हैं।
इसलिए
“भारत के सभी सरकारी और निजी क्षेत्रों में सवर्णों का population के अनुपात से अधिक representation है” - राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध आधिकारिक आँकड़ों से यह दावा सिद्ध नहीं है। कुछ क्षेत्रों/संस्थानों में upper-caste concentration के शोध-साक्ष्य अवश्य हैं, लेकिन उसे पूरे भारत के हर सरकारी और निजी क्षेत्र पर लागू करना गलत generalisation है।
एक और महत्वपूर्ण current point:- Census 2027 में caste enumeration शामिल की जा रही है, इसलिए भविष्य में national caste-population denominator और अधिक स्पष्ट हो सकता है।
देवताओं के वैद्य "अश्विनी कुमारों" की कथा का "दार्शनिक व्याख्या" या "आध्यात्मिक उद्देश्य" क्या है?
अगर पुराणों को हम ऐसे ही सामान्य रूप से पढ़ते जायेगें।तो हमें कभी कोई "वास्तविक अर्थ" कभी समझ ही नहीं आयेगा।आप भ्रमित हो जायेगें।
1. विवस्वान = परम तेज / चेतना का प्रतीक
कथा में विवस्वान (सूर��य) अत���यन्त तेजस्वी हैं। संज्ञा उनके तेज को सहन नहीं कर पातीं:
मुनेरसहिष्णुना तेन तेजसा दुःसहेन च।
-अध्याय 35, श्लोक 2
दार्शनिक रूप में इसे ऐसे समझ सकते हैं:
सूर्य = प्रकाश/चैतन्य/ज्ञान
और
संज्ञा = चेतना की वह अवस्था जो उस अत्यधिक प्रकाश को अभी पूर्णतः धारण करने में सक्षम नहीं है।
अर्थात्-सत्य या ज्ञान का प्रकाश स्वयं समस्या नहीं है; उसे ग्रहण करने की पात्रता आवश्यक है।
2. “संज्ञा” और “छाया” का अ��्यन्त महत्वपूर्ण प्रतीक
संज्ञा अपने स्थान पर अपनी छाया को छोड़ देती हैं:
असहन्ती ततः छायामात्मनः सासृजच्छुभाम्।-
35.6
यहाँ एक बहुत सुंदर दार्शनिक स्तर दिखाई देता है।
संज्ञा → वास्तविक/मूल चेतना
छाया → उसका प्रतिबिम्ब/प्रतिनिधि/बाहरी रूप
जब वास्तविक चेतना किसी अनुभव को सीधे सहन नहीं कर पाती, तो मन उसके साथ एक प्रतिनिधि रूप बनाकर व्यवहार करता है।
इसे आधुनिक भाषा में “direct reality vs mediated appearance” की तरह समझ सकते हैं-हालाँकि यह आधुनिक मनोविज्ञान का सिद्धान्त नहीं बल्कि कथा की एक दार्शनिक reading है।
3. मनु, यम और यमुना — तीन अलग-अलग मानवीय आयाम
सूर्य और संज्ञा से तीन संतानें उत्पन्न होती हैं:
मनु — यम — यमुना
कथा स्वयं बताती है कि ये सूर्य-संज्ञा से उत्पन्न हुए।
इनको प्रतीकात्मक रूप में पढ़ें तो:
मनु → व्यवस्था, मानव-धर्म और सामाजिक/नैतिक व्यवस्था
यम → नियम, संयम, कर्मफल और मृत्यु की सीमा
यमुना → जीवन की प्रवाहमान धारा
विशेष रूप से यम का आगे धर्मराज बनना महत्वपूर्ण है।
अर्थात् सूर्य के तेज/चैतन्य से उत्पन्न व्यवस्था का एक पक्ष धर्म और न्याय बनता है।
4. छाया से उत्पन्न शनि - “छाया” का दूसरा पक्ष
छाया से आगे सावर्णि मनु आदि की उत्पत्ति होती है और कथा में शनि का भी प्रसंग आता है।
यहाँ एक गहरी बात है:
छाया भी पूर्णतः निष्फल नहीं है।
दार्शनिक रूप में “shadow” केवल नकारात्मक चीज नहीं है। अस्तित्व के भीतर प्रकाश के साथ उसकी छाया भी दिखाई देती है।
सूर्य के प्रकाश के कारण ही छाया दिखाई देती है।
इसलिए:
प्रकाश और छाया एक-दूसरे के विरोधी होते हुए भी एक ही अस्तित्वगत प्रक्रिया के दो पक्ष हैं।
5. यम का क्रोध — पक्षपात और न्याय का संघर्ष
कथा में यम को लगता है कि छाया अपने पुत्रों में समान स्नेह नहीं करती और वह क्रोधित होते हैं।
यम कहते हैं कि वह अपने छोटे भाई को अधिक स्नेह करती हैं और इसी कारण उनके मन में क्रोध आता है।
यहाँ कथा एक महत्वपूर्ण धर्म-दर्शन प्रस्तुत करती है:
न्याय की भावना रखने वाला व्यक्ति भी व्यक्तिगत संबंधों और भावनाओं से प्रभावित हो सकता है।
यम का क्रोध इसलिए महत्वपूर्ण है कि आगे वही धर्मराज बनने वाले हैं।
अर्थात्- धर्मराज का अर्थ यह नहीं कि उसमें कभी भावनाएँ उत्पन्न ही नहीं होंगी; बल्कि धर्म की ओर जाने की प्रक्रिया में क्रोध, पक्षपात और मोह पर विजय आवश्यक है���
6. यम को मिला शाप — कर्म और परिणाम
छाया यम को शाप देती हैं कि:
तुम्हारा यह चरण पृथ्वी पर गिर जाए।
इसके बाद यम अपने पिता सूर्य के पास जाते हैं और अपनी ��्थिति बताते हैं।
सूर्य उन्हें समझाते हैं कि माता का वचन असत्य नहीं हो सकता।
यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण सिद्धान्त दिखाई देता है:
सत्य और कर्मफल व्यक्तिगत इच्छा से ऊपर हैं।
यहाँ तक कि सूर्य भी माता के दिए हुए शाप को केवल अपनी शक्ति से “रद्द” नहीं करते।
फिर यम को धर्मराज का पद प्राप्त होता है।
इसका दार्शनिक संदेश हो सकता है:
दुःख → परीक्षा → आत्मसंयम → धर्मबोध → उत्तरदायित्व
7. संज्ञा का त��� — समस्या से भागना नहीं, रूपांतरण
संज्ञा अपने मूल स्वरूप में सूर्य के तेज को सहन नहीं कर पातीं और वन में जाकर तप/योग करती हैं।
यह कथा का बहुत महत्वपूर्ण भाग है।
वह केवल सूर्य से दूर नहीं जातीं; तपस्या और योग के माध्यम से स्वयं को एक नये स्तर पर स्थापित करती हैं।
यानी:- जिस सत्य को अभी धारण करने की क्षमता नहीं है, उसके लिए स्वयं को तैयार करना चाहिए।
इसे आध्यात्मिक साधना की भाषा में कहें तो:
ज्ञान का प्रकाश बढ़ाने से पहले पात्रता का निर्माण।
#GandhiJayanti #TigerBackInBuxa #BanegaSwasthIndia #2October
इन बौद्ध कथावाचकों की पूरी लिस्ट है देख लेवें
1. मनोज ब्लास्टर
2.श्यामसुंदर बौद्ध
3.भागीरथ बौद्ध
4.सुमन प्रताप बौद्ध
5.धम्म गुरू एल पी जी
6.मिलन बौद्ध
7.मुकेश बौद्ध
8.रामनरेश बौद्ध
9.रमा भारती बौद्ध
10.पीयूष बौद्ध"अलबेला"
11.कुलदीप बौद्ध
12.अर्चना बौद्ध
13.शाक्य नरेंद्र बौद्ध
14.शाक्य मुस्कान बौद्ध
15.सोनू नायर बौद्ध
16.अमर सिंह बौद्ध
17.अंजली सिंह बौद्ध
18.नंदनी बौद्ध
19.बीनू बौद्ध
20.विपिन शास्त्री बौद्ध
लिस्ट और बहुत लंबी है
पर क्यों हिंदू की बिल्ली खराब तुम्हारी बिल्ली अच्छी??
हिंदू धर्म के कथावाचकों की भर-भर के बेवजह रोज आलोचना होती रहती है चाहे अनिरूद्धाच��र्य जी हो या कोई और कथावाचक।उनको गपोडी़-पाखंडी कहा जाता है।वामपंथी व नवबौद्ध कोई मौका नहीं छोड़ते खिल्लियाँ उड़ानें में।खूब क्लीपें कटती हैं और X-सोशल मीडिया पर भेजी जाती है।
उतने टाइम विज्ञान व तर्क की कसौटी कसने के कसीदे पढ़ें जाते हैं।
जब वामपंथियों को और नव-बौद्धों को "कथावाचक" व "हिंदुओं की भीड़-सभा से इतनी दिक्कत होती है।मूल कथावाचक व भीड़ के कॉन्सेप्ट से ही समस्या है।तो इतने "बौद��ध कथावाचक" देश में क्यों हैं?
असल बात ये है कि तुम्हें हमारी बिल्ली से दिक्कत है अपनी बिल्ली दुलारी है।
वामपंथियों व नव-बौद्धों तुम्हारा दोगलापन कब जायेगा?तुम्हारा भांडा अब फूट चुका है।
बस भारत देश में जितने हिंदू धर्म के ही "ईश्वरवादी" बाबा ही तो खराब है।बाकि सब "बौद्ध भंते-भिक्षु" 100 प्रतिशत अच्छे पाये जाते हैं देश दुनिया में?
बिना जाँच के निष्कर्ष के किसी भी व्यक्ति पर आरोप नहीं लगा सकते हैं।जब तक आरोप सिद्ध ना हो जाये।
शांतिप्रिय ��ंतों की शांति स्वयं देख लेवें