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नीरज जी की कलम से...
" खुशबू सी आ रही है इधर ज़ाफ़रान की,
खिड़की खुली है ग़ालिबन उनके मकान की
हारे हुए परिंदो ज़रा उड़के देख तो,
आ जायेगी ज़मीन पे छत आसमान की
बुझ जाए सरे आम ही जैसे कोई चिराग़,
कुछ यूं है शुरुआत मेरे दास्तान की
ज्यूँ लूट ले कहार ही दुल्हन की पालकी
हालत यही है आजकल हिन्दोस्तान की
औरों की घर की धूप उसे क्यों पसंद हो,
बेची हो जिसने रौशनी अपने मकान की
ज़ुल्फ़ों के पेचो-ख़म में उसे मत तलाशिये,
ये शायरी ज़ुबान है किसी बेज़ुबान की
'नीरज' से बढ़कर और धनी है कौन,
उसके दिल में पीर है सारे जहान की
नीरज जी को श्रद्धांजलि..